आखिर ऐसा क्या किया

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महारानी अहिल्याबाई होल्कर जी को 295वें जन्मदिन पर सादर नमन करते हुए

‘मल्हार राव’ ने पेशवा बाजीराव की सेना में 1721 में शामिल होकर, 1731 के  ‘मालवा विजय’ में  भरपूर सहयोग किया। जिसके एवज में उन्हें पेशवा द्वारा मालवा क्षेत्र में इंदौर के आसपास 9 परगना क्षेत्र देकर सूबेदार नियुक्त किया गया। इसी समय इंदौर में ‘मल्हार राव’ ने होल्कर वंश की शासन स्थापित की जो कि एक प्रकार से  मराठा साम्राज्य के रूप में जाना गया। ‘होल गाँव’ के निवासी होने के कारण इस वंश का नाम होल्कर वंश पड़ा। होल्कर वंश की जाति ‘धनगर’ बताई जाती है जो कि गड़ेरिया जाति का ही एक नाम है। राजा बनते ही ‘मल्हार राव’ ने 1734 में एक शिविर की स्थापना की जो आज ‘मल्हारगंज’ के रूप में जाना जाता है। ‘मल्हार राव होल्कर’ के इकलौते पुत्र का नाम ‘खंडेराव’ था जिनका विवाह ‘अहिल्या’ से हुआ था।

‘अहिल्याबाई’ का जन्म 31 मई 1725 को महराष्ट्र के चौंढी ग्राम (जामखेड़, अहमदनगर) में ‘मांकोजी शिंदे’ की पुत्री के रूप में हुआ। बारह साल की उम्र भी पूरी नहीं की थीं कि उनका बाल विवाह ‘महाराजा मल्हार राव होल्कर’ के पुत्र ‘खंडेराव होल्कर’ के साथ कर दिया गया। विवाहोपरांत वे ‘अहिल्याबाई खंडेराव होल्कर’ के नाम से जानी जाने लगीं। खंडेराव और अहिल्याबाई को एक पुत्र और एक पुत्री का सुख प्राप्त हुआ। पुत्र का नाम ‘मालेराव’ और पुत्री का नाम ‘मुकताबाई’ था। ‘खंडेराव होल्कर’ की मृत्यु 1754 में एक युद्ध के दौरान रणक्षेत्र में दुश्मन की गोली से हो जाने के पश्चात ‘अहिल्याबाई’ 29 वर्षीय विधवा बन गईं। 19 मई 1766 को पुत्र शोक में जर्जर हुए ‘मल्हार राव’ की मृत्यु के पश्चात ‘मालेराव होल्कर’ इंदौर का शासक बना लेकिन एक साल भी नहीं बीता कि 5 अप्रैल 1767 को ‘मालेराव’ भी अल्पायु में ही इस दुनिया को अलविदा कह गया। ‘मालेराव’ के बाद इंदौर की सत्ता  ‘अहिल्याबाई होल्कर’ ने अपने हाथ में ली। अहिल्याबाई ने लगभग 28 साल इंदौर पर शासन किया। 13 अगस्त 1795 को उनकी जीवन-लीला समाप्त हुई। उनसे पहले ही उनके दामाद गुजर चुके थे और दामाद के साथ ही उनकी बेटी ‘मुक्ताबाई’ भी सती हो गईं थीं। इसलिए उनके बाद उनका सेनापति और मल्हार राव का दत्तक पुत्र ‘तुकोजीराव होल्कर’ ने सत्ता संभाली। अफसोस बुजुर्ग तुकोजीराव मुश्किल से दो साल शासन चलाए होंगे कि वे भी सिधार गए। कुछ दिन के लिए ‘काशीराव होल्कर’ ने सत्ता संभाली लेकिन शीघ्र ही तुकोजीराव के पुत्र ‘यशवंत होल्कर’ ने 1997 में  इंदौर की गद्दी ले ली। इस प्रकार होल्कर राजवंश की एक लम्बी शृंखला बन गयी-

          मल्हार राव होल्कर (02.11.1731 – 19.05.1766), मालेराव होल्कर (23.08.1766 – 05.04.1767), अहिल्याबाई होल्कर (27.03.1767 – 13.08.1795), तुकोजीराव होल्कर (13.08.1795 – 29.01.1797), काशीराव होल्कर (29.01.1997 – 1798), यशवंत होल्कर (1798 – 27.10.1811), मल्हार राव होल्कर तृतीय (27.10.1811 – 27.10.1833), मार्तण्डराव होल्कर (17.01.1834 – 02.02.1834), हरिराव होल्कर (17.04.1834 – 24.10.1834), खांडेराव होल्कर तृतीय (13.11.1834 – 17.02.1844), तुकोजीराव होल्कर द्वितीय (27.06.1844 – 17.06.1886), तुकोजीराव होल्कर तृतीय (31.01.1903 – 26.02.1926) एवं यशवंतराव होल्कर द्वितीय (26.02.1926 – 1947)

उपर्युक्त सूची में से आज कि तारीख में ‘अहिल्या बाई होल्कर’ को जीतने लोग जानते हैं उतना किसी और को नहीं, विशेष रूप से गड़ेरिया(पाल) जाति के कुछ संघटनों व पार्टियों में। आखिर इस लोकप्रियता के कारण क्या हैं? जबकि इस राजवंश के संस्थापक ‘मल्हार राव होल्कर’ अहिल्याबाई से सशक्त शासक थे। इस राजवंश को विस्तार देने वाला वफादार सेनापति ‘तुकोजीराव’ अहिल्याबाई के काल में सेना सशक्तिकरण हेतु आर्थिक सहयोग के लिए तरस गया। आगे चलकर अहिल्याबाई के उतराधिकारी न होने के कारण तुकोजीराव और उसके वंशज इस राज्य पर शासन भी किए। इस वंश का सबसे प्रतापी और प्रतिभाशाली शासक ‘यशवंत राव होल्कर हुआ। मुगल सम्राट शाह आलम ने बहादुरी से प्रभावित होकर ‘महाराजाधिराज राजराजेश्वर आलीजा बहादुर’ की उपाधि से विभूषित किया। यशवंत होल्कर ने 1802 में पुणे के निकट हादसपुर में सिंधिया और पेशवा बाजीराव द्वितीय की संयुक्त सेनाओं को हराया। यशवंतराव ने पुणे में अमृतराव को अगले पेशवा के रूप में स्थापित कर दिया। महाराजा यशवंत राव होल्कर ने जब देखा कि अन्य राजा अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के चलते एकजुट होने के लिए तैयार नहीं थे, तब अंतत: 24 दिसंबर 1805 को राजघाट नामक स्थान पर अंग्रेजों ने शांति संधि (राजघाट संधि) पर हस्ताक्षर कर दिए। बताया जाता है कि वे भारत के एक मात्र ऐसे राजा थे जिन्हें अंग्रेजों ने शांति संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए संपर्क किया था। पूरा प्रदेश अपने पास रखते हुए संप्रभु राजा के रूप में शांति संधि किया था। अफसोस इस राजा की चर्चा आज बिल्कुल नहीं होती। कम से कम अहिल्याबाई होल्कर के नाम पर जो मंच सजता है, वहाँ इनकी कुछ तो चर्चा होनी चाहिए।

क्या अहिल्याबाई की लोकप्रियता का कारण उनका शासिका (स्त्री) होना था? यदि ऐसा है तो फिर ‘महारानी तुलसाबाई होल्कर’ भी अप्रत्यक्ष शासिका रही हैं क्योंकि 1811 में जब ‘महाराजा मल्हारराव तृतीय’ का राज्याभिषेक हुआ तब उनकी उम्र मात्र 4 वर्ष की थी इसलिए प्रशासन का कार्यभाल उनकी माता तुलसाबाई ने ही संभाला था। गफ्फूर खान पिंडारी ने चुपके से 9 नवंबर 1817 को अंग्रेजों के साथ एक संधि की और 19 दिसंबर 1817 को तुलसाबाई की हत्या कर दी। अंग्रेजों ने सार थॉमस हिस्लोप के नेतृत्व में, 20 दिसंबर 1817 को हमला कर माहिदपुर की लड़ाई में 11 वर्ष के महाराजा मल्हारराव तृतीय, 20 वर्ष के हरीराव होल्कर एवं 20 वर्ष की भीमाबाई होल्कर की सेना को परास्त किया। पता नहीं ‘अहिल्याबाई’ के समर्थक तुलसाबाई और भीमाबाई का नाम भी लेते हैं या नहीं, खैर!

1934 में स्थापित ‘इंदौर विश्वविद्यालय’ को 1988 में अहिल्याबाई की स्मृति में ‘देवी अहिल्या विश्वविद्यालय’ नाम दिया गया। होल्कर राज्य प्रशासन ने टाटा एण्ड संस के साथ मिलकर 1934 में इंदौर में विमानतल तलाश किया। जुलाई 1948 में पहली बार ग्वालियर, दिल्ली एवं मुंबई के लिए इंदौर से वायु सेवा की शुरुआत हुई। अप्रैल 1950 में हवाई अड्डा भारत सरकार को सौंप दिया गया। इंदौर विमानतल के नए एकीकृत टर्मिनल भवन का उद्घाटन 14 फरवरी 2012 को किया गया। 11 मार्च 2018 को इसे ‘देवी अहिल्याबाई होल्कर हवाई अड्डा’ नाम दिया गया। 27 मई को भारत सरकार ने राजपत्र जारी करके 28 मई 2019 से अंतर राष्ट्रीय हवाई अड्डा का दर्जा दे दिया। अब इस प्रकार का नामकरण वाकई सम्मान देने के लिए किया जाता है या किसी समूह को राजनीतिक रूप से रिझाने के लिए, यह तो भारत के राजनीतिज्ञ ही बता सकते हैं। यह तो सत्य है कि जो सरकारें कुछ नया निर्माण करने में असमर्थ होती हैं, वही पुरानी चीजों का नाम बदलने में ज्यादा रुचि दिखातीं हैं।

बहरहाल पुनः सवाल यही है कि आखिरकार ‘अहिल्याबाई होल्कर’ ने ऐसा क्या किया है कि उनकी लोकप्रियता है और शेष शासकों का नहीं? होल्कर राजवंश के किसी राजा की प्रतिमा मिले या न मिले लेकिन अहिल्याबाई होल्कर की प्रतिमा जरूर मिल जाएगी। पड़ताल करने पर पता चलता है कि अहिल्याबाई एक बड़ी ‘शिवभक्त’ शासिका थीं। उन्होंने अपने राजकोष का ज्यादातर हिस्सा मंदिर निर्माण, मंदिर जीर्णोंद्धार एवं मंदिर में पुजारी नियुक्त कर खर्च कीं। जाहिर सी बात है कि यह आस्थावान लोग के लिए तो थोड़ा सुखद जरूर लगा होगा और जाति विशेष के लिए व्यवसाय भी मिल गया होगा। आज की तरह पर्यटन स्थल तो उस वक्त नहीं बन पाया होगा कि दूसरी जाति के लोगों को भी कुछ छोटे-मोठे रोजगार मिलें। मंदिर पुनर्निर्माण का प्रमाण देश के कई कोने-अंतरे मिल जाएंगे, एक प्रमाण तो काशी का विश्वनाथ मंदिर (पुराना) भी है। उनके द्वारा घाट, तालाब और सड़क निर्माण कराने की भी जानकारी मिलती है, हो सकता है इसका प्रमाण भी हो। कुछ लोग तो कहते हैं कि बड़ी हीं न्यायप्रिय शासिका थीं, अफसोस न्याय के कुछ उदाहरण नहीं मिल पाए लेकिन आध्यात्मिक प्रवृत्ति की थीं इसलिए यह सच ही होगा।

अहिल्या बाई ने अपने पति ‘खंडेराव’ की मृत्यु के पश्चात सती न होकर सत्ता संभालने का साहसपूर्ण फैसला तो लिया, लेकिन अपनी पुत्री ‘मुक्ताबाई’ को दामाद के गुजरने पर सती होने से नहीं रोक पाईं। खुद का बाल-विवाह हुआ और बेटी सती हुई फिर भी बाल-विवाह और सती प्रथा के खिलाफ कोई उचित फैसला लेने की जानकारी नहीं मिलती। साम्राज्य विस्तार हेतु किसी खास संघर्ष या युद्ध की जानकारी भी नहीं मिलती। वर्ण-व्यवस्था और पुरोहितवाद को बोल-बाला भी पता चलता था। जिसके यहाँ मंदिर और पुजारी बहाली को ही सर्वाधिक प्रमुखता दी जाएगी वहाँ यह तो सामान्य सी बात है। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आखिरकार  गरेडिया (पाल) समाज के कुछ लोग इन्हे आदर्श और प्रेरक क्यों मानता है? इस पर भी शोध होना चाहिए। सिर्फ जातीय मोह है या उस समाज के लिए कुछ सराहनीय कार्य भी की हैं? यह तो जरूर है कि जिस जाति विशेष के कुछ लोगों के लिए व्यवसाय का विकल्प मुहैया कराई होंगी, वे तो इनकी लोकप्रियता में कुछ सहयोग जरूर ही किए होंगे। भले ही सम्मान करें या न करें। ‘होल्कर राजवंश’ पर विस्तृत शोध और विश्लेषण की दरकार है जो कि इतिहास के विद्यार्थियों द्वारा ही सार्थक शोध किया जा सकता है।

(नोट- यह लेख गूगल और विकिपीडिया के तथ्यों पर आधारित है।)

© डॉ. दिनेश पाल

 असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी)

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