आजादी के 73 वर्ष और अलग राज्य  गठन के 20 वर्ष बाद भी आदिवासियों को नहीं पता अपनी विरासत

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  • विशद कुमार

9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस था, इसकी रिपोर्ट ‘ज्ञान विज्ञान समिति झारखंड’, के महासचिव विश्वनाथ सिंह ने 11 अगस्त को मुझे भेजा। ‘अगस्त क्रांति और विश्व आदिवासी दिवस की प्रासंगिकता’ पर आधारित इस कार्यक्रम का सबसे चौकाना वाला पहलू यह था कि जिस इलाके में यह कार्यक्रम हुआ, उस इलाके के संथाल आदिवासी समुदाय के बुजुर्गों और युवाओं को ‘विश्व आदिवासी दिवस’ के बारे में कुछ भी पता नहीं है।

‘अगस्त क्रांति और विश्व आदिवासी दिवस की प्रासंगिकता’ पर आधारित कार्यक्रम 

रिपोर्ट के अनुसार कार्यक्रम रांची से 300 किलोमीटर और गिरिडीह जिला मुख्यालय से 70 किलोमीटर दूर प्रखंड मुख्यालय देवरी से 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित खटौरी पंचायत के कारीमाटी गांव में आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित स्थानीय संथाल आदिवासी समुदाय के बुजुर्गों और युवाओं ने साफ कहा कि यह ‘विश्व आदिवासी दिवस क्या है? हम लोग नहीं जानते हैं।’

यहां यह बताना जरूरी होगा कि भले ही गिरिडीह जिले का यह क्षेत्र उत्तरी छोटानागपुर के तहत आता है, परंतु यह संथाल परगना से पूरी तरह सटा हुआ है, जहां से शुरू हुआ था ‘संथाल हुल’, जिसने अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिया था। वहीं स्वतंत्रता संग्राम के पहले नायक तिलका मांझी भी इसी क्षेत्र के थे।

यहां यह बताना प्रासंगिक हो जाता है कि जहां 30 जून 1855 ई. को वर्तमान संथालपरगना के 400 गांवों के लगभग 50,000 आदिवासी लोग वर्तमान साहेबगंज के भोगनाडीह पहुंचे और अंग्रेज़ों के खिलाफ आंदोलन का विगुल फूंका था। वहीं सन् 1771 से 1784 तक जंगल का बेटा तिलका मांझी ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया। उन्होंने कभी भी समर्पण नहीं किया, न कभी झुके और न ही डरे।

 

  •  संथाल आदिवासी समुदाय के बुजुर्गों और युवाओं को ‘विश्व आदिवासी दिवस’ के बारे में कुछ भी पता नहीं।
  • स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी तिलका मांझी और बाद के दिनों में सिद्धू, कानू, चांद, भैरव थे।
  • 1900 में मैक पेरहांस की अध्यक्षता बंदोबस्त अधिनियम में यह प्रावधान किया गया कि आदिवासी की जमीन कोई आदिवासी ही खरीद सकता है।

‘विश्व आदिवासी दिवस’ वर्ष 1994 से लेकर आज 26 वर्षों तक यह बुद्धिजीवियों, राजनीतिज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच केवल शुभकामना देने तक ही सीमित रहा है। यह केवल ‘विश्व आदिवासी दिवस’ के साथ ही नहीं है, ऐसा हमारी पीढ़ियों की हर कुर्बानी की विरासत के साथ है।

बता दें कि भोगनाडीह पहुंचे संथालों के बीच सिद्धू, कानू, चांद, भैरव भाइयों ने इसी सभा में यह घोषणा कर दी गई कि  संथाल समुदाय अब मालगुज़ारी नहीं देंगे। इसके बाद अंग्रेज़ों ने इन चारों भाइयों को गिरफ़्तार करने का आदेश दिया। परंतु जिस पुलिस दरोगा को वहां भेजा गया था, संथालियों ने उसकी गर्दन काट कर हत्या कर दी। इसके बाद सरकारी अधिकारियों में भी इस आंदोलन को लेकर भय प्राप्त हो गया। यह आन्दोलन लगभग जनवरी 1856 में समाप्त हुआ और तब जाकर संथाल परगना का निर्माण हुआ जिसका मुख्यालय दुमका बना। इस संथाल हुल के फलस्वरूप ही जब 1900 में मैक पेरहांस की अध्यक्षता बंदोबस्त अधिनियम बना तो उसमें यह प्रावधान किया गया कि आदिवासी की जमीन कोई आदिवासी ही खरीद सकता है। क्रेता एवं विक्रेता का निवास एक ही थाने के अंतर्गत होना चाहिए। संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम जब 1949 में पारित किया गया तो 1900 के बंदोबस्ती नियम के इस शर्तें को धारा 20 में जगह दी गयी जो आज भी लागू है ।

इस ‘संथाल हुल’ के महत्व को इस तथ्य से और ज्यादा समझा जा सकता है कि मार्क्सवादी दर्शन के प्रणेता कार्ल मार्क्स ने भी अपनी पुस्तक ‘नोट्स ऑफ इण्डियन हिस्ट्री’ में इस ‘संथाल हुल’ को सशस्त्र जनक्रान्ति की संज्ञा दी है। जब यह ‘संथाल हुल’ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा के केंद्र में आता है, तब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पहले स्वतंत्रता सेनानी के नाम की चर्चा भी होनी शुरू हो जाती है, जहां राष्ट्रीय पटल पर मंगल पांडे का जिक्र होता है, जबकि सच यह है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी तिलका मांझी और बाद के दिनों में सिद्धू, कानू, चांद, भैरव थे।

बताना लाजिमी होगा कि 1771 से 1784 तक जंगल का बेटा तिलका मांझी ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया। उन्होंने कभी भी समर्पण नहीं किया, न कभी झुके और न ही डरे। उन्होंने 1784 में ने क्लीवलैंड को मार डाला। बाद में आयरकुट के नेतृत्व में तिलका मांझी की गुरिल्ला सेना पर जबरदस्त हमला हुआ जिसमें कई लड़ाके मारे गए और तिलका मांझी को गिरफ्तार कर लिया गया। 13 जनवरी 1785 के उन्हें चार घोड़ों में बांधकर घसीटते हुए भागलपुर लाया गया। परंतु मीलों घसीटे जाने के बावजूद तिलका मांझी जीवित थे। बताया जाता है कि खून में डूबी उनकी देह तब भी गुस्सैल थी और उसकी लाल-लाल आंखें ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कं. के राज को डरा रही थीं। अंग्रेजों ने तब भागलपुर के चौराहे पर स्थित एक विशाल वटवृक्ष पर उन्हें सरेआम लटका कर उनकी जान ले ली। हजारों की भीड़ के सामने तिलका मांझी हंसते-हंसते फांसी पर झूल गए।

ऐसे में संथाल समाज का अपनी विरासत को न जान पाना चिंता का विषय इसलिए है कि झारखंड अलग राज्य गठन के बाद से अब तक राज्य में केवल सत्ता की मारामारी और राजनीति के अलावा और कुछ नहीं हो पाया है, जिसके परिणाम स्वरूप आदिवासी समाज आज भी वहीं खड़ा है, जहां वह अंग्रेजी शासनकाल में खड़ा था।

बता दें कि 1982 में संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) द्वारा आदिवासियों के उत्थान के लिए एक कार्यदल गठित की गई थी। संयुक्त राष्ट्र संघ के पहल पर 9 अगस्त 1982 को एक सम्मेलन किया गया और उसकी स्मृति में वर्ष 1994 से प्रतिवर्ष 9 अगस्त को ‘विश्व आदिवासी दिवस’ मनाने की घोषणा की गई।

मतलब साफ है कि ‘विश्व आदिवासी दिवस’ वर्ष 1994 से लेकर आज 26 वर्षों तक यह बुद्धिजीवियों, राजनीतिज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच केवल शुभकामना देने तक ही सीमित रहा है। यह केवल ‘विश्व आदिवासी दिवस’ के साथ ही नहीं है, ऐसा हमारी पीढ़ियों की हर कुर्बानी की विरासत के साथ है।

आम आदिवासियों में अपनी विरासत की अनभिज्ञता के कई कारणों में शायद एक कारण यह भी है कि झारखंड अलग राज्य गठन के बीस वर्षों के दौरान सभी सरकारों ने आदिवासियों में कुछ खास लोगों की एक जमात पैदा की, जो सत्ता के इशारे पर कदम—ताल करते रहे हैं।

कहना ना होगा कि 20 वर्षों बाद झारखंड सरकार ने 9 अगस्त के ‘विश्व आदिवासी दिवस’ पर राजकीय अवकाश की घोषणा की। पता नहीं यह सद्बुद्धि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को कैसे आई?

अगर यह घोषणा 20 साल पहले हुई होती तो शायद आम आदिवासियों में आज अपने आदिवासियत का एहसास हुआ होता।

कहना ना होगा कि अलग राज्य गठन के 20 वर्षों में झारखंड, 11 मुख्यमंत्रियों सहित तीन बार राष्ट्रपति शासन को झेला है, जो शायद भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में किसी राज्य की यह पहली घटना है। इन 11 मुख्यमंत्रियों में रघुबर दास को छोड़कर सभी 10 मुख्यमंत्री आदिवासी समुदाय के रहे हैं, बावजूद राज्य के आम आदिवासियों के जीवन से जुड़े, सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक स्तर पर कोई बदलाव नहीं आ पाया है। मतलब झारखंड अलग राज्य की अवधारणा केवल भाषणों और किताबों तक सिमट कर रह गया है।

कारण साफ है, जिन्हें भी सत्ता मिली, वे केवल अपनी कुर्सी बचाने के ही फिराक में लगे रहे।

आजादी के 73 वर्षों बाद भी झारखंड के आदिवासियों के विकास में कोई बेहतर प्रयास नहीं किये गये। उल्टा आदिवासियों को उनके जंगल—जमीन से बेदखल करने का प्रयास होता रहा। विकास के नाम पर कारपोरेट घरानों का झारखंड पर कब्जे की तैयारी चलती रही है। मतलब कि जिस अवधारणा के तहत झारखंड अलग राज्य का गठन हुआ वह आज भी हाशिए पर पड़ा है।

 बताना जरूरी होगा कि झारखंड अलग राज्य की अवधारणा आजादी के कई वर्षों पहले से ही बनी थी, जो आजादी के 63 साल बाद जमीन पर आई। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमारे नीति नियंता आदिवासियों के प्रति कितने संवेदनशील थे, क्योंकि झारखंड अलग राज्य की अवधारणा तब तैयार की गई थी, जब 1912 में बंगाल से बिहार को अलग किया गया, तब उसके कुछ वर्षों बाद 1920 में बिहार के पाठारी इलाकों के आदिवासियों द्वारा आदिवासी समुहों को मिलाकर ‘छोटानागपुर उन्नति समाज’ का गठन किया गया। बंदी उरांव एवं यूएल लकड़ा के नेतृत्व में गठित उक्त संगठन के बहाने आदिवासी जमातों की एक अलग पहचान कायम करने के निमित अलग राज्य की परिकल्पना की गई। 1938 में जयपाल सिंह मुंडा ने संताल परगना के आदिवासियों को जोड़ते हुये ‘आदिवासी महासभा’ का गठन किया। इस सामाजिक संगठन के माध्यम से अलग राज्य की परिकल्पना को राजनीतिक जामा 1950 में जयपाल सिंह मुंडा ने ‘झारखंड पार्टी’ के रूप में पहनाया। यहीं से शुरू हुई आदिवासी समाज में अपनी राजनीतिक भागीदारी की लड़ाई। 1951 में देश में जब वयस्क मतदान पर आधारित लोकतांत्रिक सरकार का गठन हुआ तो बिहार के छोटानागपुर क्षेत्र में झारखंड पार्टी एक सबल राजनीतिक पार्टी के रूप पहचान विकसित हुई। 1952 के पहला आम चुनाव में छोटानागपुर व संताल परगना को मिलाकर 32 सीटें आदिवासियों के लिये आरक्षित की गईं, अत: सभी 32 सीटों पर झारखंड पार्टी का ही कब्जा रहा। बिहार में कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में झारखंड पार्टी उभरी तो दिल्ली में कांग्रेस की चिन्ता बढ़ गई। तब शुरू हुआ आदिवासियों के बीच राजनीतिक दखलअंदाजी का खेल। जिसका नतिजा 1957 के आम चुनाव में साफ देखने को मिला। झारखंड पार्टी ने चार सीटें गवां दी। क्योंकि 1955 में राज्य पुर्नगठन आयोग के सामने झारखंड अलग राज्य की मांग रखी गई थीं। 1962 के आम चुनाव में पार्टी 20 सीटों पर सिमट कर रह गई। 1963 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिनोदानंद झा ने एक सौदेबाजी के तहत झारखंड पार्टी के सुप्रीमो जयपाल सिंह मुंडा को उनकी पार्टी के तमाम विधायकों सहित कांग्रेस में मिला लिया। एक तरह से झारखंड पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया। शायद पहली बार राजनीतिक ताकत की खरीद—फरोख्त की संस्कृति आदिवासी नेताओं में प्रवेश हुई। झारखंड अलग राज्य का आंदोलन यहीं पर दम तोड़ दिया।

   1966 में अलग राज्य की अवधारणा पुनः जागृत हुई। ‘अखिल भारतीय अदिवासी विकास परिषद’ तथा ‘सिद्धू-कानू बैसी’ का गठन किया गया। 1967 के आम चुनाव में ‘अखिल भारतीय झारखंड पार्टी’ का गठन हुआ। मगर चुनाव में कोई सफलता हाथ नहीं लगी। 1968 में ‘हुल झारखंड पार्टी’ का गठन हुआ। इन तमाम गतिविधियों में अलग राज्य का सपना समाहित था। जिसे तत्कालीन शासन तंत्र ने कुचलने के कई तरकीब आजमाए। 1969 में ‘बिहार अनुसूचित क्षेत्र अधिनियम 1969’ बना। 1970 में ईएन होरो द्वारा पुनः झारखंड पार्टी का गठन किया गया। 1971 में जयराम हेम्ब्रम द्वारा सोनोत संथाल समाज का गठन किया गया।

1972 में आदिवासियों के लिये आरक्षित 32 सीटों को घटाकर 28 कर दिया गया। इसी बीच शिबू सोरेन आदिवासियों के बीच एक मसीहा के रूप में उभरे। महाजनी प्रथा के खिलाफ उभरा आन्दोलन तत्कालीन सरकार को हिला कर रख दिया। शिबू आदिवासियों के भगवान बन गये। शिबू की आदिवासियों के बीच बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए वामपंथी चिंतक और मार्क्सवादी समन्वय समिति के संस्थापक कामरेड एके राय और झारखंड अलग राज्य के प्रबल समर्थक बिनोद बिहारी महतो द्वारा 4 फरवरी 1973 को झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन हुआ और मोर्चा का कमान शिबू सोरेन को थमा दिया गया। महाजनी प्रथा के खिलाफ आंदोलन अब झारखंड अलग राज्य की मांग में परिणत हो गया। 1977 में शिबू लोकसभा का चुनाव जीत कर दिल्ली पहुंच गये। पार्टी के क्रिया कलापों एवं वैचारिक मतभेदों को लेकर पार्टी के भीतर अंतर्कलह बढ़ता घटता रहा। पार्टी कई बार बंटी मगर शिबू की अहमियत बरकरार रही। उनकी ताकत व कीमत में बराबर इजाफा होता रहा। उन्हें दिल्ली रास आ गयी। सौदेबाजी में भी गुरू जी यानी शिबू सोरेन प्रवीण होते गये। अलग राज्य की मांग पर सरकार की नाकारात्मक रवैये को देखते 1985 में कतिपय बुद्धिजीवियों ने केन्द्र शासित राज्य की मांग रखी। झामुमो द्वारा अलग राज्य के आंदोलन में बढ़ते बिखराव को देखते हुए 1986 में ‘आल झारखंड स्टूडेंटस् यूनियन’ (आजसू) का तथा 1987 में ‘झारखंड समन्वय समिति’ का गठन हुआ। इन संगठनों के बैनर तले इतना जोरदार आंदोलन चला कि एक बारगी लगा कि मंजिल काफी नजदीक है। मगर ऐसा नहीं था। शासन तंत्र ने इन आंदोलनों को किसी प्रकार की तबज्जो नहीं दी।

 भाजपा ने भी 1988 में वनांचल अलग राज्य की मांग रखी। 1994 में तत्कालीन लालू सरकार में ‘झारखंड क्षेत्र स्वायत परिषद विधेयक’ पारित किया गया। जिसके अध्यक्ष शिबू सोरेन को बनाया गया। 1998 में केन्द्र की भाजपा सरकार ने वनांचल अलग राज्य की घोषणा की। झारखंड अलग राज्य आंदोलन के पक्षकारों के बीच झारखंड और वनांचल शब्द को लेकर एक नया विवाद शुरू हो गया। भाजपा पर यह आरोप लगाया जाने लगा कि वह झारखंड की पौराणिक संस्कृति पर संघ परिवार की संस्कृति थोप रही है। शब्द को लेकर एक नया विवाद शुरू हो गया। अंततः वाजपेई सरकार में 2 अगस्त 2000 को लोक सभा में झारखंड अलग राज्य का बिल पारित हो गया।

15 नवम्बर 2000 को देश के और दो राज्यों छत्तीसगढ़ व उत्तरांचल अब उत्तराखंड सहित झारखंड अलग राज्य का गठन हो गया। तब से लेकर अब तक झारखंड में 11 मुख्य मंत्री हुये और एक रघुबर दास को छोड़कर सभी के सभी आदिवासी समुदाय से हुये है। मगर जिन अवधारणाओं को लेकर झारखंड अलग राज्य का गठन हुआ वह 20 वर्षों और 11 मुख्यमंत्रियों के बीच कहीं गुम होता नजर आ रहा है। राज्य के आदिवासी  दूसरे प्रदेशों में रोजगार के लिये पलायन करते रहे हैं। बिहार और उत्तरप्रदेश के तमाम ईट भट्ठों में झारखंड के आदिवासी युवक-युवतियां काम करते हुये देखे जा सकते हैं। दिल्ली व मुंबई जैसे महानगरों में झारखंड की युवतियों को देह व्यापार के धंधे में जबरन लगाये जाने की खबरें बराबर सुर्खियों में आती रही हैं। दलालों का एक बड़ा रैकेट पूरे झारखंड में काफी सक्रिय है। जो शादी का प्रलोभन देकर यहां की युवतियों को दूसरे प्रदेशों में ले जाते हैं और महानगरों में बेच देते हैं।

खनिज संपदाओं से भरपूर इस राज्य के लोगों की बदहाली का आलम यह है कि दिसम्बर 2016 से अबतक झारखंड में भूख से लगभग 30 लोगों की मौत भूख से हुई है। ये आंकड़े वे हैं जो खबरों में आए। कुपोषण की तस्वीर भी काफी भयावह है।

इन तमाम कुव्यवस्थाओं की एक लंबी फेहरिश्त है।कहना ना होगा कि आजादी के 73 वर्ष और अलग राज्य के 20 वर्ष बाद भी आदिवासियों को नहीं पता अपनी विरासत

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