गांव – गांव को किसान आंदोलन का केंद्र बनाएं!

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किसान- श्रमिक एकता के बल पर नया समाज बनाने को आगे आएं!

साथियों,

आज देश का कोई ऐसा कोना नहीं है जो देशव्यापी किसान आंदोलन के ताप से अछूता हो। यह आंदोलन आज पूरे देश की आत्मा की आवाज बन चुकी है, सच्ची जन आकांक्षाओं की एकजुट आवाज बन चुकी है। इस आवाज की बुलंदी को बनाए रखने की जिम्मेदारी आज हर देशभक्त नागरिक की है। इस आंदोलन ने दशकों से जारी किसानों के शोषण- उत्पीड़न और आत्महत्याओं के सवाल को पूरे समाज के सामने ला खड़ा किया है। अब यह तय हो गया है कि खेती- किसानी के बुनियादी सवालों का समाधान किए बिना हमारा समाज एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता और उसे लोकतंत्र के नाम पर कारपोरेटी हुकूमत और मालिकाना पूरी तरह अस्वीकार है। कारपोरेटी मालिकाने की राह बनाने वाले तीन कृषि कानून, बिजली कानून और इससे भी आगे जाकर श्रमिकों को गुलामी की ओर ले जाने वाले नए  श्रम कानून भी उसे अस्वीकार्य है और इन्हें सरकार को वापस ही लेना होगा।

दिल्ली में जारी किसान आंदोलन एक देशव्यापी जन सत्याग्रह का रूप लेता जा रहा है। राजनीतिक, आर्थिक दायरे से आगे बढ़कर यह एक नैतिक प्रश्न का रूप लेता जा रहा है। हुकूमत का असत्य लगातार उजागर हो रहा है और  वह नैतिक तौर पर कमजोर पड़ती जा रही है। यह इस आंदोलन की बड़ी सफलता और योगदान है जो भविष्य के आंदोलनों की सफलता की राह खोलेगी। चाहे मनुष्य हो या पशु-पक्षी भोजन तो सभी के जीवन की शर्त है। इसकी सहज उपलब्धता की राह में कानून बनाकर रुकावट पैदा करना या इसे मुनाफाखोरी का जरिया बनाना पूरी मानवता के प्रति अपराध है। किसान आंदोलनकारी ना सिर्फ सत्याग्रह की राह पर डटे हैं बल्कि अपने आचरण से सामाजिक जीवन का एक आदर्श मॉडल भी दे रहे हैं। लाखों लाख लोगों को बिना किसी भेदभाव के भरपूर भोजन मिल रहा है और उसकी तमाम इंसानी जरूरतें भी पूरी की जा रही हैं, बिना किसी सरकारी मदद के । आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का यह बेमिसाल उदाहरण है। हमारी सरकारों और उनके सरकारी अमले को इनसे सीखने की जरूरत है ताकि वे अपने कारपोरेटी विकास के मॉडल की  निरर्थकता को जान सकें।

यह आंदोलन सामाजिक जीवन की उस संस्कृति को सामने ला रही है जो खेती- किसानी के हजारों सालों के इतिहास में हमारे पुरखों ने गढ़ी थी। यह संस्कृति है सहयोग की, सरोकारों की, मानव जीवन की पवित्रता की, नेकी की, विविधता के साथ एकजुट होने की और असमानताओं के खिलाफ आवाज उठाने की। यही भारतीय संस्कृति है और यही धर्म का सार है। इसी संस्कृति पर मुट्ठी भर कॉर्पोरेटों के लोभ-लालच  के लिए  चोट किया जा रहा था, एक झूठी संस्कृति का आडंबर खड़ा किया जा रहा था। किसान आंदोलन ने इस आडंबर को तार-तार करके भारतीय संस्कृति और धर्म के सच्चे रूप को सामने ला दिया है। इसे संजोना और आगे ले जाना हम सभी का दायित्व है। हर वह बात झूठी है जो इंसान और इंसानियत को बांटती है और उनकी एकता और आगे बढ़ने की राह में रूकावट डालती है।

नई कृषि कानूनों के फरेब को समझना कोई मुश्किल काम नहीं है और इन कानूनों का अडानी- अंबानी की कृषि व्यापार की तैयारियों से रिश्ता समझना भी मुश्किल नहीं है। इन कानूनों का विश्व व्यापार संगठन से किए गए समझौतों से संबंध निकालना भी मुश्किल नहीं है। इन कानूनों से उजड़ने वाले किसानों को नए श्रम कानूनों के द्वारा गुलामी की ओर ले जाने वाले कार्यक्रम को भी हम समझ सकते हैं। कोरोना काल में हमने उसे प्रवासी श्रमिकों की लाचारी के रूप में देखा, यह उजड़ी हुई खेती- किसानी के घरों के बच्चे ही तो थे। उत्तर प्रदेश से लेकर पूरा पूर्वी भारत किसानों के उजड़ने और उनके बच्चों की नौकरी के नाम पर शहरों की नारकीय जिंदगी की एक पीड़ादायक दास्तान है। इस पर हम सिर्फ शर्मिंदा हो सकते हैं, गर्व तो कतई नहीं कर सकते?

जिन तीन कानूनों पर चर्चा है, उसमें से एक है “आवश्यक वस्तु संशोधन कानून-2020”। इसके द्वारा अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज, गन्ना और आलू को आवश्यक वस्तुओं से बाहर कर दिया गया है।  आम भारतीय का यही मुख्य भोजन है। इस कानून के द्वारा इन वस्तुओं की बड़े पैमाने पर जमाखोरी के लिए राह खोल दी गई। क्या यह समझना मुश्किल है कि जमाखोरी के बल पर फसल के तैयार होने पर उसका दाम गिराकर सस्ते में किसान से खरीदारी करना फिर बाद में सप्लाई रोक कर देश के 130 करोड़ लोगों को महंगे दामों पर भोजन सामग्री बेचना आसान हो जाएगा। तमाम कानूनी प्रतिबंधों के बावजूद यूपी में 1800 रुपए की न्यूनतम कीमत वाला धान 1000 रुपए में बिक रहा है तो नए कानून के बाद क्या नतीजा होगा।

इसी के साथ दूसरा कानून है “कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य कानून-2020”। इसके द्वारा ए पी एम सी द्वारा पंजीकृत मंडियां, जहां पर तय मूल्य पर कृषि उत्पाद को खरीदने की अनिवार्य व्यवस्था है, उसके समानांतर निजी मंडियां बनाने की छूट दी गई है। इन निजी मंडियों में किसानों को किसी भी मूल्य पर बेचने और साहूकारों को किसी भी मूल्य पर खरीदने की आजादी होगी। यहां पर साहूकारों को 6% का टैक्स भी नहीं देना होगा। जाहिर है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य का नियम बेकार हो जाएगा। देश के 86% किसान छोटे किसान हैं, उनकी फसल को कौड़ी के मोल खरीदना व्यापारियों के लिए आसान हो जाएगा क्योंकि उनके पास मोलभाव की क्षमता ही नहीं होती। नतीजे के तौर पर खेती की आय में और कमी आएगी और बड़े पैमाने पर छोटे किसान खेती से उजड़ कर खानाबदोश हो जाएंगे। इस प्रक्रिया में भारतीय खाद्य निगम का पूरा नेटवर्क ध्वस्त हो जाएगा और लाखों श्रमिक बेरोजगार हो जाएंगे। यहीं पर यह भी सवाल होगा कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत देश की 80% आबादी को जो सस्ता अनाज मिलता था, उसकी व्यवस्था कहां से होगी?

तीसरा कानून है “कृषक कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून-2020”। यह कॉन्ट्रैक्ट खेती का कानून है जो मॉडल कांट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट-2018 का ही नया रूप है। इस कानून के तहत किसान कृषि व्यापार की कंपनियों, खाद्य कंपनियों, थोक व्यापारियों, निर्यातकों और बड़े कुदरा विक्रेताओं के साथ करार करके पहले से तय एक दाम पर अपनी फसल बेंच सकते हैं। कृषि समझौते में बीज की आपूर्ति, तकनीकी सहायता आदि के लिए कम्पनी द्वारा कर्ज दिया जाएगा और अनाज की आपूर्ति के समय गुणवत्ता, ग्रेड, मानक आदि के आधार पर भुगतान किया जाएगा। जाहिर है कि यह पूरा करार ही किसानों को कंपनियों का बंधुआ बना देगी और इसके खिलाफ किसान किसी अदालत में भी नहीं जा सकते। यह कानून पहले से ही कर्ज में डूबे किसान को और कर्ज में उलझा कर पूरी तरह बेदखल कर देगा।

इसी के साथ उत्तर प्रदेश सरकार बिजली संशोधन विधेयक-2020 लाई है। इसके तहत किसानों को 10 रुपए प्रति यूनिट के हिसाब से बिजली का भुगतान करना पड़ेगा। इसका अर्थ हुआ कि अभी 10 हॉर्स पावर की मोटर के लिए 1700 रुपए प्रति माह की जगह लगभग 24,000 रुपए प्रतिमाह भुगतान करना पड़ेगा।

इन कानूनों के साथ इसी कोरोना काल में श्रमिकों के अधिकारों को खत्म करने के लिए पुराने श्रम कानूनों को खत्म करके चार नई श्रम संहिता लाई गई और मालिकों को श्रमिकों को रखने और निकालने की पूरी छूट दे दी गई, निश्चित समय के लिए नौकरी पर रखने का रास्ता साफ कर दिया गया। श्रमिकों के निवास, स्वास्थ्य आदि की जिम्मेदारी से मालिकों को मुक्त कर दिया गया और मजदूर- कर्मचारी सप्लाई करने वाली कंपनियों को पूरी छूट दे दी गई।

इन कानूनों के साथ ही ग्रामीण कोऑपरेटिव बैंकों में बड़ी निजी पूंजी के निवेश और फिर अधिग्रहण का कानून बनाकर बची-खुची सहकारिता की व्यवस्था को खत्म कर दिया गया।

अब यदि इन तमाम कानूनों को एक साथ रख कर देखें तो यह बात एकदम समझ में आ जाएगी कि यह देश की आर्थिक राजनीतिक आजादी पर देशी-विदेशी कारपोरेट ताकतों, वित्तीय ताकतों का हमला है, जो कानून की शक्ल में हमारे सामने आया है। ठेका या करार खेती में 25 वर्ष, 50 वर्ष की अवधि के लिए खेती की जमीन का भी करार करने की व्यवस्था है। इसके तहत बड़े कारपोरेट लाखो एकड़ जमीन का मालिकाना लेकर खेती करवा सकते हैं, विशेष तौर पर निर्यात के लिए। यह कानून धीरे-धीरे खेती का पूरा रूप ही बदल देंगे। हजारों-लाखों एकड़ के बड़े-बड़े फार्म होंगे और उन फार्म पर किसान गुलामी करेंगे। खेती का यह अमेरिकी मॉडल है जो अमेरिका में ही पूरी तरह असफल हो चुका है और वहां बड़ी संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं। उद्योगों में कॉरपोरेटी मालिकाना बेरोजगारी पैदा करती है और कृषि क्षेत्र में आत्महत्याएं। तबाही की इस जमीन पर पनपते हैं दुनिया के सबसे बड़े अमीर।

उत्तर प्रदेश में सहकारी गन्ना मिलों के निजीकरण के बाद पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसानों का क्या हाल हुआ, यह किसी से छुपा नहीं है। कानून  है कि गन्ना मिलों द्वारा 14 दिनों में किसानों का पूरा भुगतान करना होगा और देरी होने पर ब्याज सहित भुगतान करना होगा। लेकिन हर साल दस हजार करोड रुपए से अधिक का किसानों का पैसा मिल मालिक दबा कर बैठ जाते हैं और किसानों को भुगतान करने के नाम पर सरकार से हजारों करोड़ की  सब्सिडी भी लेते हैं । यह हाल किसानों के हित में बने कानूनों के बाद है, नए कृषि कानून इस सुरक्षा को भी खत्म कर देते हैं तो मालिकों को कौन रोकेगा? लूट की इस प्रक्रिया में लगातार छोटे किसान उजड़ते हैं और हर शहर के बाजार में सैकड़ों हजारों की संख्या में खुद को बेचने के लिए खड़े होते हैं। इनमें से अधिकांश को कोई खरीददार नहीं मिलता और वह सड़क के किनारे पटरियों पर पशुओं के बीच रात गुजारते हैं। इन किसान- मजदूरों में  महिलाएं भी बड़ी संख्या में अब आने लगी हैं। जब हम किसानों की तबाही पर बात करेंगे तो यह सच्चाई सामने आएगी ही। इनके द्वारा बनाई गई ऊंची ऊंची इमारतों को तो हम देखते हैं लेकिन अपने ही जैसे किसान मजदूरों को भुला देते हैं ।

किसान आंदोलन ने इन सारे घावो को उभार दिया है और पूरे देश के सामने इसके सही इलाज की चुनौती प्रस्तुत की है। हमारे देश के गांव की खुशहाली की चर्चा अंग्रेजी जर्नल मेटकाफ ने की है और कहा है कि ये स्वायत्त रिपब्लिक की तरह हैं जो अपनी सारी जरूरतों को खुद पूरा कर लेते हैं और अपने सामाजिक- धार्मिक- शैक्षिक- न्यायिक जीवन का स्वयं प्रबंधन करते हैं। राजाओं के आने जाने से इन पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता। इन्हीं के बल पर हमारा देश सोने की चिड़िया कहलाता था और विश्व बाजार में उसकी एक तिहाई हिस्सेदारी थी। और आज क्या कारण है कि हमारे गांव अभाव और लाचारी का पर्याय बन गए, हर किसान कर्ज में डूब गया। इस लाचारी में भी उसने भोजन के मामले में पूरे देश को आत्मनिर्भर बना दिया और इसके बदले में हम उसे पूरी तरह उजाड़ कर विश्व गुरु बनने का ख्वाब दिखा रहे हैं। यह पाखंड कब तक चलेगा?

किसान आंदोलन को इस राजनीतिक- आर्थिक पाखंड से मुक्त होने की प्रक्रिया के रूप में भी समझा जाना चाहिए। यह जितना ही आगे बढ़ेगा राजनीति का चेहरा उतना ही साफ होगा,  कारपोरेटी विकास मॉडल की उतनी ही हवा निकल जाएगी। झूठ और लफ्फाजी की काट सत्य पर आधारित जन आंदोलन ही होता है। हमें यह भी समझना होगा कि इस सच में समाज के सभी शोषित- उत्पीड़ित समूहों की वास्तविक पीड़ा शामिल होती है। वास्तविक आंदोलन के दौरान ही हम एक दूसरे की पीड़ाओं को समझना और साझा करना सीखते हैं और अपनी खोई हुई इंसानियत को पुनः वापस पाते हैं।

यह सच है कि हमने जीवन की सुख सुविधाओं को जुटाने और तकनीकी के मामले में बहुत प्रगति की है लेकिन इसकी काफी बड़ी कीमत चुका कर। इस पूरे दौर में हुकुमतें ताकतवर हुई हैं, सरकारी अमले का मनमानापन बढ़ा है, पूंजीपति कारपोरेट बने हैं, धर्म का दिखावा बढ़ा है, बाजार की आजादी बढ़ी है आदि। लेकिन हमारा समाज कमजोर हुआ है, किसानों- श्रमिकों के जीवन की खुशियां छिनी है,लोकतंत्र कमजोर हुआ है, युवाओं के भविष्य से खिलवाड़  बढ़ा है, सामाजिक एकता छिन्न-भिन्न हुई है, महिलाओं की असुरक्षा बढ़ी है, आर्थिक असमानता की खाई गहरी हुई है, पर्यावरण का नाश हुआ है, इंसान की उपेक्षा बढ़ी है, जीवन जगत की पीड़ाएं बढ़ी हैं, सच्चा धर्म कमजोर पड़ा है, आम लोगों का सरकारों पर और एक-दूसरे पर भरोसा बेहद कम हुआ है आदि। अब हमें फैसला करना है कि हम विकास किसे मानते हैं? हमारे लिए सामाजिक जीवन और प्रकृति की वरीयता और स्वायत्तता महत्वपूर्ण है या बनावटी चमक-दमक? मनुष्य और मनुष्यता को खोकर विकास करने का नतीजा हमारे सामने है, हमें इसकी दिशा बदलनी ही होगी ।

किसान आंदोलन ने इस बदलाव की शुरुआत कर दी है और सारे जरूरी सवालों को सामाजिक जीवन के एजेंडे पर ला दिया है। हमें एक स्वर से घोषित करना है कि अब हमें कारपोरेटी एजेंडा स्वीकार नहीं है। हमें अपना समाज, अपनी आजादी, अपनी प्रकृति, अपनी खेती- किसानी और अपना लोकतंत्र ज्यादे प्यारा है। हम इंसान की तरह पूरी गरिमा के साथ जीवन जीने का संकल्प करते हैं।

सभी बहनों भाईयो से आग्रह है कि बदलाव के इस बड़े आंदोलन के साथ खड़े होकर अपने सपनों, संकल्पों को हकीकत में बदलें और एक न्यायपूर्ण समाज बनाएं।

  • किसान आंदोलन के संदेश को जन जन तक पहुंचाएं।
  • हर गांव, मोहल्ले में वैकल्पिक ग्राम समितियों का गठन करें और उसके मार्फत सार्वजनिक कार्यों में भागीदारी करें।
  • किसान कानूनों को वापस लेने के लिए हर ग्राम समितियों में प्रस्ताव पारित करें और उसे सरकार को भेजें।
  • कारपोरेटी निजीकरण की नीति के खिलाफ जागरूकता फैलाएं।
  • आपसी विवादों को अपनी समितियों के द्वारा सुलझाएं।
  • सामाजिक एकता की संस्कृति का प्रचार प्रसार करें।

साभिवादन

किसान आंदोलन समर्थन समिति, लखनऊ।

शिवाजी राय संयोजक (94502189) रामकृष्ण सह संयोजक (9335223922) सी बी सिंह  (9450457421 ) ओ पी सिन्हा (9415568777) के के शुक्ल (9453682439) वीरेंद्र त्रिपाठी (8318300049) होमेंद्र मिश्रा (8318036750) रजनीश भारती (8303515219) संतोष परिवर्तक (9415038714) श्रीकांत साहू (9415038714), संतोष सिंह, राधेश्याम यादव, श्रीकान्त मिश्र, नरेश कुमार ,ज्योति राय,एहसानुल हक़ मालिक,अजय असुर ।

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