2022 विधानसभा चुनाव के सबक और वामपंथ का भविष्य

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स्वदेश कुमार सिन्हा

2022 के विधानसभा चुनाव में गैर भाजपा विपक्षी दलों की भारी हार तथा वामपंथ के भविष्य को लेकर चिन्ताओं के बीच मुझे ‘गेटे’ के प्रसिद्ध नाटक ‘फाउस्ट’ (Faust) के एक पात्र मेफिस्टोफीलिस का वो कथन याद आता है,जब वह कहता है,” सिद्धांत,मेरे दोस्त फीका है और जीवन का चिरन्तन वृक्ष हरा”( Theory, my friend is grey and green is the eternal tree of life)| होता यह है कि अगर सिदधांत जीवन की गति के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चलता.तो केवल यही नहीं कि वह परिवर्तन के प्रभावकारी उपकरण के रूप में अपनी सार्थकता खो देता है, बल्कि जड़सूत्र बनकर अवरोधक बन जाता है।

वास्तव में सामाजिक सत्य ही सिद्धांत का आधार होता है, उसके बदलने के साथ ही सिद्धांत को भी बदलना होता है। इसके परस्पर संबंधों को उत्कृष्ट रूप से प्रगट करते हुए ‘गेटे’ ने इस नाटक में सटीक बात की है।

__2022 के सात राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में 6 राज्यों में गैर भाजपा दलों को विशेष रूप से 100 वर्षों से भी अधिक परानी कांग्रेस पार्टी को मिली हार तथा इसमें कम्यनिस्टों के हालात पर ‘गेटे का यह कथन । सटीक बैठता है। सबसे बड़ी त्रासदी तो यह है कि अनेक एग्जिट पोलों से लेकर अन्य चुनावी सर्वेक्षणों में कम्युनिस्ट बिलकुल नदारत है,यहाँ तक कि गूगल पर भी 6 राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में इनको मिले वोटों की संख्या कहीं भी खोजे नहीं मिलती है। एक समय उत्तर प्रदेश में गोरखपुर तथा इसके आस-पास मऊ,गाजीपुर और आजमगढ़ में अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी का जबरदस्त आधार था,पर भारतीय राजनीति के ‘मंडलीकरण’ के पश्चात इसकी जगह सपा-बसपा जैसी पार्टियों ने ले ली तथा कुछ हद तक भाजपा ने सपा का और बसपा का सम्पूर्ण आधार अपने में समाहित कर लिया। उत्तराखंड तथा हिमाचल प्रदेश में भी एक समय में कम्युनिस्ट पार्टी का जबरदस्त आधार था। तात्कालीन पार्टी के महासचिव ‘पी सी जोशी’ यहीं के थे, परन्तु आज वहाँ भी कोई इसका नामलेवा नहीं रह गया है।

चुनाव के बारे में भारतीय कम्युनिस्ट संगठनों का विभ्रम तथा भारतीय राजनीति में मन्दिर-मंडल राजनीति की शुरुआत

भारतीय कम्युनिस्ट चुनाव लड़ने या ना लड़ने को लेकर हमेशा विधर्मों के शिकार रहे हैं। सन् 1952 के पहले स्वतंत्र भारत में हए लोकसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी थी। नेहरू द्वारा केरल में विश्व में पहली चुनाव दवारा बनी सरकार को बर्खास्त कर देना भी इसकी लोकप्रियता का प्रमाण था, परन्तु पार्टी विभाजन के बाद यह भ्रम और गहरा गया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने हथियारबंद संघर्ष को अपने दस्तावेज़ों में पूर्णतः खारिज करते हए केवल चुनाव की रणनीति अपनाने की बात की थी, लेकिन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने सभी संसदीय तथा गैर संसदीय रास्तों को अपनाने की बात की थी, परन्तु वास्तव में इन्होंने जनसंघर्षों और वर्गसंघर्षों को पूर्णतः त्यागकर केवल संसदीय रास्ता अपना लिया था। त्रिपुरा,पश्चिमी बंगाल तथा केरल में इनकी सरकार होने एवं ट्रेडयूनियन, किसान-मजदूर यूनियन, छात्रों तथा सांस्कृतिक संगठनों में पार्टी लाइन के हिसाब से ही चुनावी रणनीतियाँ बनने लगी थीं। एक समय में ‘इप्टा’ प्रगतिशील लेखक संघ तथा जनवादी लेखक संघ का संस्कृति,कला और रंगमंच में जबरदस्त आधार था। सन् 1943 में बंगाल में पड़े भयंकर अकाल के खिलाफ एक देशव्यापी प्रतिरोध विकसित करने में इप्टा की महत्वपूर्ण भूमिका थी, परन्तु बाद में ये सब संगठन अपनी पार्टी लाइन के अनुसार ही चलने लगे।
इसका एक विपरीत ध्रुव भी पैदा हआ। पार्टी का पूर्ण रूप से निषेध करते हुए इन संगठनों में भारी पैमाने पर गैरजनवादी, अवसरवादी और जातिवादी तत्वों का प्रवेश हआ। इन संगठनों का नारा था “साम्प्रदायिक लोगों को छोड़कर सभी का स्वागत है”। इसने इनका रहा-सहा जनाधार भी समाप्त कर दिया। वास्तव में वामपंथियों का चुनावी राजनीति में शामिल होने पर कोई खास मतभेद कभी नहीं रहा, परन्तु व्यापक जन आंदोलनों में भागीदारी के साथ दोनों का समन्वय न कर पाने के कारण कम्युनिस्टों ने इन दोनों कामों को आधे-अधूरे मन से किया और इस कारण दोनों में ही 
भारी असफलता का सामना करना पड़ा। लेनिन ने लिखा है”जब क्रान्तिकारी रुझान नीचे की ओर हो,तब उन्होंने कम्युनिस्टों को रूसी संसद ‘ड्यूमा’ में जाने की सलाह दी थी। वास्तव में हमारे देश में कम्युनिस्टों द्वारा चुनावी बहिष्कार की बात 1967 में बंगाल में हए नक्सलवादी किसान विद्रोह के बाद पैदा हई। इस आंदोलन के परिणामस्वरूप मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन हो गया। वास्तव में यह विद्रोह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की लाइन के अनुसार हुआ था। अपनी ढेरों सकारात्मक उपलब्धियों के बावजूद नक्सलवादी क्रान्तिकारी यह नहीं समझ पाए कि व्यक्तिगत हिंसा का रास्ता हमारा नहीं हो सकता है, इसी कारण चारू मजूमदार के नेतृत्व में बनी भारत की कम्यनिस्ट पार्टी(माले) राज्य की हिंसा के सामने टिक नहीं पाई और खण्ड-खण्ड में टूट कर बिखर गई। आज भी चारू मजूमदार की आतंकवादी लाइन के सामाजिक प्रयोगों और व्यवहार में पूरी तरह से पिट जाने के बाद आज भी उसके ढेरों पैरोकार प्रतिदिन पैदा हो रहे हैं। इन खण्ड-खण्ड में टूटे ग्रुपों की चुनाव में भागीदारी पर उनके विचार हास्यास्पद हैं। अधिकांश इतने छोटे हैं कि वे न तो जन-कार्यवाहियाँ कर सकते हैं न ही चुनाव में भागीदारी, परन्तु जब ये लोग चुनाव के बहिष्कार की बात करते हैं तब वे मार्क्स के शब्दों में “यह त्रासदी में प्रहसन बन जाता है।” भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) जो आज भी मध्य प्रदेश, झारखंड, उड़ीसा तथा महाराष्ट्र के कुछ जंगली इलाकों में हथियारबंद संघर्ष की चारू मजूमदार की रणनीति आज भी लागू कर रहे हैं, उनकी इन रणनीतियों से गहरे मतभेदों के बावजूद जब वे चुनाव के बहिष्कार की बात करते हैं तब कम से कम यह तो माना जा सकता है कि उनकी लाइन के अनुसार चुनाव के बहिष्कार की बात सही है, यद्यपि उनके बहिष्कार का चुनाव पर कोई असर नहीं दिखता है, क्योंकि पोस्टर लगाने,मशाल जुलूस निकालने अथवा कछ निर्दोष मतदानकर्मियों की हत्या के अलावा वे और कुछ भी नहीं कर पाते हैं।
एक और संगठन भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (लिबरेशन) है ,लम्बे समय तक इसे ‘विनोद मिश्रा ग्रुप’ के भी नाम से भी जाना जा सकता है। ये लोग लम्बे समय तक भूमिगत रहकर बिहार में हथियारबंद संघर्ष चलाते रहे। ‘रणवीर सेना’ जैसे अनेकों कुख्यात सामंती और जातिवादी संगठनों से इनकी प्रायः मुठभेड़ भी होती रहती थी,इसी तरह के संघर्ष में इनके एक तात्कालीन महासचिव ‘जौहर’ शहीद हो गए थे। जब उन्हें यह एहसास हआ कि बिहार जैसे मैदानी इलाकों में वे हथियारबंद संघर्ष नहीं चला सकते,तब उन्होंने चुपचाप अपनी लाइन बदल ली तथा चुनाव में भागीदारी करने लगे। पहले इन्होंने ‘इण्डियन पिपुल्स फ्रंट’ बनाया, जिसमें एक समय में नीतीश कुमार की पार्टी भी शामिल थी, परन्तु कुछ समय बाद ही वे सीधे-सीधे भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ‘लिबरेशन’ के नाम से ही चुनाव लड़ने लगे। इन्हें एक समय में ‘आरा’ लोकसभा सीट पर विजय मिली थी,आज भी बिहार विधानसभा के प्रत्येक चुनाव में आठ-दस सीटें मिलती रहती हैं, परन्तु इसका एक हास्यास्पद पक्ष यह भी है कि इसके तात्कालीन महासचिव विनोद मिश्रा ने पार्टी दवारा हथि संघर्ष को छोड़ने तथा चुनाव में भागीदारी को लेकर अनेक बेसिर-पैर के तर्कों को पेश किया, लेकिन वास्तविकता तो यह है कि उन्होंने चारू मजूमदार के हथियारबंद संघर्ष के लाइन की कभी समग्र व्याख्या की ही नहीं। इन्होंने कभी भी इस लाइन को कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए विनाशकारी नहीं ठहराया, बल्कि मजबूरी में चोर दरवाजे से अपनी लाइन बदल ली। एक दूसरी महत्वपूर्ण बात यह हई कि उन्होंने ने यह भी मान लिया भारतीय जाति व्यवस्था एक न बदलने वाली सच्चाई है तथा अब वे भी जहाँ जिस जाति के लोगों की संख्या ज्यादा होगी,वहाँ वे उसी जाति का उम्मीदवार खड़ा करेंगे। उन्होंने अपने मुख्य पत्र में इस बात को अत्यधिक स्पष्टता से व्यक्त किया है। मुख्यत: इस विजातीय लाइन के कारण कुछ सीटें तो अवश्य मिल जाती हैं, परन्तु गैर राजनीतिक तथा जातिवादी होने के कारण इनके अधिकांश विधायक पद, प्रतिष्ठा और पैसे के मोह में लालू-नीतीश की पार्टी में चले जाते हैं। वास्तविकता यह है कि अधिकांश कम्युनिस्ट संगठनों के चुनावों और जन आंदोलनों के समन्वय को लेकर यही हालात हैं। सात राज्यों के विधानसभा चुनाव में सपा, बसपा तथा कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद जब हमारे मित्र सोशल मीडिया पर अपनी खीझ मिटाने के लिए यह कहते हैं कि अब चुनाव से कुछ नहीं हो सकता, अब देश को क्रान्ति चाहिए,तो वास्तव में वे भी जानते हैं कि फिलहाल आज के दौर में यह संभव नहीं है।

मंडल-मंदिर की राजनीति और कम्युनिस्ट संगठनों की बढ़ती दिक्कतें

अगर हम संख्या की दृष्टि से देखें तो भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन विभिन्न ग्रुपों में बँटे होने के बावजूद वे संख्या बल में आज भी एक बड़ी ताक़त हैं, परन्तु आज केरल को छोड़कर लम्बे समय से इनके द्वारा शासित बंगाल और त्रिपुरा में इनके शासन का अंत हो गया है। बिहार में एक समय में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का आधार था, परन्तु आज वहाँ भी इनका कोई नामलेवा नहीं है। बिहार विधानसभा की कुछ सीटें माले लिबरेशन जीतती रही है , परन्तु उसके विषय में मैंने पहले ही उल्लेख कर दिया है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के ‘कन्हैया कुमार’ को एक समय में उनके प्रशंसक एक नायक तथा भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के तारणहार के रूप में देख रहे थे, परन्तु वे भी शीघ्र ही कांग्रेस में जाकर आज अपनी प्रासंगिकता पूर्णरूप से समाप्त कर चुके हैं। आजकल अकसर यह कहा जाता है कि कम्युनिस्ट ही भारतीय संसदीय राजनीति में एकमात्र ईमानदार, गैर साम्प्रदायिक और गैर जातिवादी हैं, इसलिए मंडल कमीशन के लागू होने तथा बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद संघ परिवार की जो राजनीति उभरी उसमें भाजपा,सपा और बसपा ने उन स्थानों पर कब्जा कर लिया,जहाँ कभी कम्युनिस्टों का मजबूत आधार था, लेकिन यह केवल अद्धसत्य है। मंडल-मंदिर की राजनीति ने कम्युनिस्टों सहित भारतीय राजनीतिक दलों पर गहरा प्रभाव डाला।

प्राचीन काल से ही किस तरह भारतीय ग्राम समाजों में राजनीति से घोर विमुखता थी, इसके लिए हमें मार्क्स के भारतविषयक एक महत्वपूर्ण लेख के कुछ उद्धरणों को देखना चाहिए-“सामंतवादी व्यवस्था के कारण राजा सर्वेसर्वा ज़रूर थे, लेकिन गाँव की भूमि पर उनका कोई अधिकार नहीं था। हाँ,कल पैदावार का कुछ हिस्सा उन्हें कर के रूप में ज़रूर दिया जाता था। भूमि पर अधिकार गाँव का होता। राजा को उसका कर-भार देने के बाद शेष सारी उपज गाँव के ही काम में लाई जाती थी।”

‘गांव में किसानो के अतिरिक्त बढई. लोहार. कम्हार जुलाहा, मोची, धोबी, तेली, हज्जाम जैसे मजदूर किस्म के लोग भी रहते थे,वे भी गाँव की ही ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ही खटते थे। बाहरी दुनिया से इन समुदायों का लेनदेन या विनिमय नाममात्र का होता था। आवागमन के साधन बहुत ही सीमित थे।’ ___ “सदियों तक गाँव की सामाजिक-बौद्धिक स्थिति अनुर्वर, अन्धविश्वासपूर्ण, संकुचित और रूढ़ बनी रही। ये गाँव आर्थिक प्रवाहहीनता, सामाजिक प्रतिक्रियावाद और सांस्कृतिक अन्धेपन के अलग-अलग दुर्ग थे; लगभग सारा भारतीय समाज इन्हीं स्वायत्तशासी, स्वपर्याप्त, स्वसृत गाँवों में केन्द्रीभूत था और यह मानव समाज एक ही प्रकार के अन्धविश्वासों, प्राचीन देव-देवियों, संकुचित ग्रामीण एवं जातीय चेतना और एक स्थायी दृष्टिबोध के शिकंजे में युगों तक पड़ा रहा।”

दिल्ली में तख्तोताज बदलते रहते थे, हमलावर आते, शहरों में लूटमार कर चले जाते थे, परन्तु भारतीय ग्राम्य व्यवस्था का ढाँचा ज्यों का त्यों बना रहता था, राजनीति में इन समाजों को कोई रुचि नहीं थी,’को नृप हो हमें का हानि’ जैसे महावरे प्रचलन में थे।

दिल्ली के मुस्लिम तथा मुगल बादशाहों ने यहाँ तक कि अंग्रेजों ने भी कभी भी भारतीय परम्पराओं,पिछड़ी मूल्य-मान्यताओं तथा अमानवीय जाति व्यवस्था में कभी कोई हस्तक्षेप नहीं किया, क्योंकि अंग्रेज भी सन् 1857 का हश्र देख चुके थे। बाद के दौर में अंग्रेजी शिक्षा ने इस ढाँचे में कछ हस्तक्षेप ज़रूर किया,जिसे मार्क्स ने भारत में अंग्रेजी राज्य की दोहरी भूमिका कहा है, परन्तु यह लम्बी और विवादास्पद कथा है। बहुत से विचारक और इतिहासकार यह भी मानते हैं कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम ने भी भारतीयों की गैर राजनीतिक मानसिकता को कुछ हद तक तोड़ा, परन्तु इसमें भी सच्चाई बहुत कम है। स्वाधीनता संग्राम के सर्वमान्य नेता मोहनदास करमचंद गांधी बने, क्योंकि उनकी ‘महात्मा’ की छवि भारतीय लोकजीवन में सहज स्वीकार्य थी, इसलिए विचारों में होते हए भी उन्होंने ‘महात्मा का चोला धारण कर लिया और स्वाधीनता संग्राम के निर्विवाद नेता बन गए, उनके कथित चमत्कारों की चर्चा गाँव-गाँव में होने लगी थी।
गांधी का नेतृत्व तथा कुछ हद तक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के दबाव ने भी भारत की आज़ादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, इस दौर में भारतीय जनता का कुछ हद तक राजनीतिकरण भी हुआ। देश की आज़ादी के बाद कांग्रेस एक सर्वमान्य वर्चस्व की राजनीतिक पार्टी बनकर उभरी, आम जनता में कांग्रेस की छवि गांधी-नेहरू वाली थी, इसलिए उसे जनता का अपार समर्थन हासिल हआ। इस राजनीति में उसे किसी अन्य पार्टी से कोई बड़ी चुनौती नहीं मिली और वह आराम से चनाव जीतती रही। 70 के दशक में उसके वर्चस्व को कछ चनौतियाँ जरूर मिलीं. जब राज्यों में मिली-जली संविदा सरकारें बनीं, जिसमें जनसंघ भी शामिल था, हालाकि यह दौर बहत छोटा था, लेकिन यह प्रतियोगी राजनीति की शुरुआत थी। 90 के दशक में मंडल-मंदिर की राजनीति आने के बाद देश में पहली बार बड़े पैमाने पर प्रतियोगी राजनीति की शुरुआत हुई तथा इसने कांग्रेस के वर्चस्व को समाप्त कर दिया। भारतीय लोकजीवन में अभी भी पिछड़ी जातिवादी और साम्प्रदायिक मूल्य-मान्याताएँ व्याप्त हैं, इसलिए इस दौर की राजनीति में उनका आना भी स्वाभाविक था, परन्तु इन सबका सबसे अधिक फायदा संघ परिवार ने उठाया तथा इन सब पर सवार होकर वह । दिल्ली की सत्ता एवं देश भर की अधिकांश विधानसभाओं पर काबिज़ हो गई। उसने कुछ समय तक चली प्रतियोगी राजनीति का अंत करके एक नई वर्चस्व की राजनीति की शुरुआत की।

भारतीय राजनीति के अतीत और वर्तमान का मोटा-मोटा परिदृश्य यही है। इन सबमें सबसे बुरी हालत बहुजन अस्मिता की पार्टी ‘बसपा की हई। कांशीराम ने जिस अस्मिता तथा पहचान की राजनीति की शुरुआत की थी, उसे मायावती ने करीब-करीब -करीब समाप्त कर दिया। अनेकों बार उत्तर प्रदेश की मख्यमंत्री बनने के बावजूद वे चनावी । दलदल में फँसकर केवल अपनी सत्ता और भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए भाजपा सहित सभी दलों से गठजोड़ बनाती रहीं, उन्होंने दलितों में व्याप्त पिछड़ी मूल्य-मान्यताओं तथा उनके हिन्दूकरण के खिलाफ कोई सांस्कृतिक पुनर्जागरण का काम नहीं किया,इसी का फायदा उठाकर भाजपा ने उनके वोटों पर कब्जा कर लिया। इस बार के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव से तो यही लगता है कि वे उत्तर प्रदेश की राजनीति से करीब-करीब बाहर हो गईं। कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि अब वे भाजपा की मदद से राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति बनना चाहती हैं, जिससे वे बहजन राजनीति से पूरी तरह विमुख होकर सुख से अपना शेष जीवन बिता सकें,अगर ऐसा होता है तो उनकी नियति उस अन्तिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र’ की तरह होगी, जिन्हें सन् 1857 के विद्रोह में पराजित होने के बाद अंग्रेजों ने रंगून भेज दिया और वे फिर कभी दिल्ली लौट न सके।

वास्तव में इतिहास की गति बहत निर्मम होती है, हमारे चाहने न चाहने से कुछ भी नहीं होता है,दलित राजनीति को इस बात पर भी गौर करना होगा कि यह राजनीति,चाहे वह बाबासाहेब अम्बेडकर की बनाई रिपब्लिकन पार्टी हो या कांशीराम की बहुजन समाज पार्टी -उनकी नियति ब्राह्मणवादी एवं कट्टरपंथी पार्टियों में विलीन हो जाने की हई। क्या इसके पीछे कोई अम्बेडकर की दलित राजनीति की गलत रणनीतियाँ तो नहीं थीं ? सपा ने ज़रूर उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीति को एक मजबूत विपक्ष के रूप में स्थापित कर लिया है। ढेरों धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक ताक़तों के बीच उसका जनाधार मजबूत भी हुआ है, परन्तु उसे यह भी महसूस करना होगा कि केवल एक-दो जातियों तथा अल्पसंख्यकों के वोटों के बल पर वह सत्ता कभी नहीं पा सकती। करीब 125 वर्ष पुरानी कांग्रेस की स्थिति हर चुनाव में बद से बदतर होती जा रही है, यद्यपि यह पार्टी भी भारतीय पूंजीपति वर्ग की पक्षधर एक मजबूत पार्टी रही है ,परन्तु उसका क्षरण सम्पूर्ण भारतीय राजनीति के लिए एक खतरनाक संकेत वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों का भविष्य और निष्कर्ष इन विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टियों तथा संगठनों के लिए कुछ महत्वपूर्ण सबक छिपे हैं। यह भी सही है कि हर चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टियों का लगातार क्षरण हो रहा है, उत्तर प्रदेश में तो उसे ‘नोटा’ से भी कम वोट मिले हैं, उसके वोटों का प्रतिशत उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में इतना कम हो गया है कि अब सम्पूर्ण मीडिया उसे उद्धृत भी नहीं करती। यह पहले भी मैं बता चुका हूँ कि संख्या बल के आधार पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियाँ सबसे बड़ी हैं, परन्तु बंगला देश जैसे छोटे देश में जहाँ कट्टरपंथी ताकतों का बोलबाला है ,वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टियों का आधार हमसे काफी ज्यादा है। नेपाल की, तो हम बात ही छोड़ दें क्योंकि वहाँ की राजनीति में कम्युनिस्टों का जबरदस्त आधार है। इनके कारणों की तलाश करने पर एक-दो महत्वपूर्ण बातें सामने आती हैं। पहली तो यह है कि कम्युनिस्टों में व्यापक बिखराव है , छोटे-बड़े सैकड़ों संगठन मौजूद हैं,ज्यादातर अहंकार और दंभ तथा अपने को एकमात्र सही समझने की प्रवृत्ति से भरे हैं। दूसरी यह है कि चुनावों और जन आंदोलनों को लेकर अधिकांश में मोटी-मोटी दो राय रही है-पहला चुनाव का बहिष्कार करना चाहिए, क्योंकि लेनिन ने संसद को ‘सूअरबाड़ा’ तथा मार्क्स ने इसे ‘गप्पबाजी का अड्डा’ कहा है, हाँलाकि यह मानने वाले लोग इस बारे में केवल अधूरी जानकारी कोट करते हैं, जैसे-धर्म के विषय में मार्क्स के विचारों को। इसमें दूसरी लाइन यह है कि हमें पूरी तरह से चुनावी राजनीति करनी चाहिए, इसका क्लासिक उदाहरण सीपीआई, सीपीएम जैसी पार्टियाँ हैं, जो संसदीय राजनीति में पूरी तरह धंसकर जन आंदोलनों को तिलांजलि दे चुकी हैं।
वास्तव में मुझे ये दोनों दृष्टिकोण सही प्रतीत नहीं होते हैं, चुनाव के बारे में मैं लेनिन की राय पहले ही लिख चुका हूँ, ‘क्रान्ति’ शब्द हमें चाहे जितना गौरवशाली या रोमांचकारी लगे फिलहाल अभी उसका समय 
बहत दूर है। चुनाव बहिष्कार भी फासीवादियों को ही मजबूत करता है, क्योंकि वे भी अधिनायकवादी शासन ही चाहते हैं। जन आंदोलनों से पूर्णतः दूरी बनाकर केवल चुनावी राजनीति में फंस जाना भी इसी राजनीति को मजबूत करता है। संसदीय पार्टी के साथ चुनावी राजनीति में कम्युनिस्ट संगठनों की क्या भूमिका होगी,इस पर भी अनेक भ्रम हैं। अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी कांग्रेस को राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग की पार्टी मानती थी, इसलिए वह उसके साथ मोर्चा बनाने को एक प्रगतिशील कदम बताती थी। दूसरी ओर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी कांग्रेस को दलाल पूंजीपति वर्ग की पार्टी मानती थी तथा उसके साथ मोर्चा बनाने के खिलाफ थी। उनकी यही अवस्थिति अभी भी बरकरार है, इसके अलावा सैकड़ों छोटे-मोटे कम्यनिस्ट ग्रुपों और संगठनों की मेरे समझ के अनसार इस सम्बन्ध में कोई निश्चित राय नहीं है। समय-समय पर वे हालातों के अनुसार अपनी राय में बदलाव करते रहते हैं। बदलती हई नई परिस्थितियों का मूल्यांकन करने की क्षमताएँ करीब-करीब समाप्त हो गई हैं तथा वे जबरदस्त विभ्रम एवं जड़सूत्रवाद के शिकार हैं। भाजपा के फासीवाद के उभार के बाद कम्युनिस्ट संगठनों ने कांग्रेस सहित सभी बुर्जुआ पार्टियों के सामने घुटने टेक दिए और उन्हें ही एकमात्र तारणहार मानने लगे। यह कुछ हद तक तो स्वाभाविक था, परन्तु बुर्जुआ पार्टियाँ यह भलीभाँति जानती हैं कि भारतीय कम्युनिस्ट एक विलुप्त प्राणी जैसे हो रहे हैं, इसलिए उनके साथ बनाया हुआ मोर्चा उन्हें कोई लाभ-हानि नहीं पहुँचाएगा,अत: सपा जैसे दल भी जातीयता के आधार पर बनी पार्टियों तथा संगठनों के साथ मोर्चा बनाने में ही रुचि लेते हैं. लेकिन आज का यह भी कट सत्य है कि कांग्रेस और सपा जैसे अन्य विपक्षी दलों को हम जितना भी नापसंद करें अथवा परिवारवादी कहें,पर वे भाजपा तथा संघ परिवार की तरह फासिस्ट नहीं हैं, जिन्होंने कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका तीनों का अपहरण कर लिया है। कम्युनिस्टों के पास फिलहाल किसानों,मजदूरों, छात्रों और मध्यवर्ग के चेतनशील तबकों को साथ लेकर व्यापक जन आंदोलनों को विकसित करने एवं दिल्ली को करीब साल भर तक डेरा डालकर बैठे किसानों की तरह लम्बे दौर तक का आंदोलन चलाने तथा जनता की पिछड़ी मूल्य-मान्यताओं के खिलाफ आधुनिकता की लड़ाई विकसित करने के लिए इन पर पार्टियों से जुड़े क्रन्तिकारी मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों को अपने व्यक्तिवाद एवं महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर आंदोलनात्मक तथा प्रचारात्मक कार्यवाहियाँ करने की फौरी जरूरत है, इसके अलावा इनके पास फिलहाल कोई विकल्प नहीं है।
दलित एवं कम्युनिस्ट राजनीति एक दूसरे के स्वाभाविक मित्र हो सकते हैं, लेकिन दलित राजनीति को अस्मिता की राजनीति की सीमाओं को भी पहचानना होगा क्योंकि केवल ‘जय भीम, लाल सलाम’ के नारे से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है और अंत में नाजियों द्वारा उत्पीड़ित एक जर्मन यहूदी कवि ‘पास्टर निमोलर’ की यह कविता आज के दौर में और भी प्रासंगिक हो गई है।
पहले वे यहादियों के लिए आये, मैं कुछ नहीं बोला क्योंकि मैं यहदी नहीं था। फिर वे ट्रेड यूनियनों के लिए आये, फिर भी मैं कुछ नहीं बोला क्योंकि मैं ट्रेडयूनियन में नहीं था। फिर वे कम्युनिस्टों के लिए आये, फिर भी मैं नहीं बोला क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था। फिर वे मेरे लिए आये, कोई नहीं बचा था जो मेरे लिए बोलता।

पतास्वदेश कुमार सिन्हा 103/बी, पॉकेट-ए 1 मयूर विहार, फेज-3 दिल्ली-110096

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