दलित गुमराह तो नहीं हैं

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डा.आम्बेडकर ने एक हद तक मार्क्सवाद को अभिशापित किया। कांशीराम ने तो बहुत ही सजगता के साथ कम्युनिस्टों को हरी घास का हरा सांप कहा। बामन मेश्राम भी मार्क्सवाद को मूलनिवासियों के रास्ते का रोड़ा मानते हैं। और भी बहुत सारे दलित नस्लवादी संगठन हैं जो मार्क्सवाद को दलितों के हाथ का झुनझुमा मानते हैं। अब गौर करिए कि आरएसएस, बीजेपी, शिवसेना, बजरंग दल तथा अन्य अनेक अनुसांगिक संगठन मार्क्सवाद के धुर विरोधी हैं। कम्युनिस्ट ही वह वर्ग है जिससे आरएसएस व इसके अनिसंगिक संगठन डरते हैं और इन्हें  दुश्मन, आतंकवादी, नक्सलवादी व माओवादी कहकर बदनाम भी करते हैं।

भारत में वर्ण-व्यवस्था सदियों से चलता चला आ रहा है। कालान्तर में जातियों ने वर्ण-व्यवस्था का स्थान ले लिया; लेकिन जातियों ने वर्ण-व्यवस्था के अंतर्गत ही अपना विकास सुनिश्चित किया। अब जातियां ही वर्ण-व्यवस्था का अस्तित्व हैं। जातियां ख़त्म हो गईं तो वर्ण-व्यवस्था टूट जाएगी।
सर्वप्रथम जातियों के अस्तित्व पर ज्योतिबा फुले ने प्रहार किया। रामा स्वामी नायकर और पेरियार ने भी जाति पर प्रहार किया। 1936 में डा.आम्बेडकर ने “जातिप्रथा उन्मूलन” पुस्तक की रचना की और ताउम्र जातिप्रथा तोड़ने की कोशिश करते रहे। जब जातिप्रथा उन्हें अभेद्य दीवार की तरह प्रतीत हुई तो वे जातिप्रथा की नींव कमजोर करने व अनुसूचित-जातियों, जनजातियों को बौद्ध-धर्म स्वीकार करने की सलाह देते हुए खुद भी 14 अक्टूवर 1956 को दीक्षा-भूमि नागपुर में लाखों अनुयाइयों के साथ बौद्ध-धर्म स्वीकार कर लिया। इसके बाद भी वे भारत से जातिप्रथा ख़त्म किए जाने के लिए प्रयास करते रहे। उन्हें पता था कि सभी दलित जातियां बौद्ध-धर्म नहीं स्वीकार करेंगी। यदि सम्पूर्ण दलित जातियां बौद्ध-धर्म स्वीकार भी कर लें तो भी अन्य वर्णों एवं ओबीसी की जातियाँ तो अस्तित्व में रहेंगी ही। ऐसी स्थिति में भारत से जातिप्रथा ख़त्म नहीं होंगी। अतः उनका प्रयास था कि संविधान में समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की स्थापना कर दिया जाय। उनका मत था कि संवैधानिक प्रक्रिया में यदि एक व्यक्ति का एक मूल्य स्थापित हो जाय तो देर-सबेर भावी पीढियां इस प्रश्न को हल कर लेंगी। इसीलिए उन्होंने 15 मार्च 1947 को “राज्य और अल्पसंख्यक” लिखकर संविधान सभा के समक्ष अपने द्वारा लिखित संविधान को अवलोकनार्थ प्रस्तुत किया था। उसमें इन्होंने बहुत ही साफ शब्दों में लिख है कि लोकहित में लोकतंत्र को राजकीय समाजवाद की स्थापना अपने संविधान में करना ही होगा। दुर्भाग्यवश, राजकीय समाजवाद कौन कहे डा.आम्बेडकर साहब के “राज्य और अल्पसंख्यक” की कोई भी पंक्ति स्वीकार नहीं की गई। परंतु, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि बाबा साहब डा.भीमराव आम्बेडकर जातिप्रथा उन्मूलन से एक अंगुल भी टस से मस हुए।
1980 के दसक में मान्यवर कांशीराम का उदय हुआ। इन्होंने कहा कि जातिप्रथा को तोडा नहीं जा सकता है बल्कि जातियों का ध्रुवीकरण करके उनके वोट के द्वारा सत्ता में आया जा सकता है। इस तरह जाति भले न टूटे, जाति भले न ख़त्म हो किन्तु जातियों को मजबूत तो किया जा सकता है। उन्होंने बसपा के द्वारा दलित जातियों को अवसरवाद सिखाया और डा.आम्बेडकर के जातिप्रथा उन्मूलन का उद्देश्य दलित जातियों के मस्तिष्क में उलट दिया।
डा.आम्बेडकर ने भातीय मार्क्सवादियों से मार्क्सवाद सीखा और उसका प्रभाव उन पर बहुत प्रभावकरी नहीं बन पड़ा, बल्कि उन्होंने यह कह दिया कि कम्युनिज्म सूअरों का दर्शन है। हलाकि, अपने इस बात के खण्डन में उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा मैं कार्लाइल से प्रभावित होने के कारण कह और लिख दिया था जबकि श्रमिकों को टोस्ट और मक्खन कौन कहे, उन्हें तो एक जून की रोटी तक नहीं नसीब है। डा.आम्बेडकर ने लिखा है कि भारत में श्रमिकों के दो दुश्मन हैं-1) ब्राह्मणवाद तथा 2) पूँजीवाद। इन व्यवस्थाओं के निदान के भी दो ही रास्ते हैं-1) बुद्धवाद तथा 2) मार्क्सवाद। मुझे बुद्ध का रास्ता अधिक श्रेष्ठकर लगा। मैंने इसे धारण कर लिया है। कालान्तर में यदि तुम्हें बुद्धवाद से समस्या का निदान न ठीक लगे, तो तुम्हें बेशक मार्क्सवाद को ही अपना लेना होगा, और तीसरा कोई भी रास्ता नहीं है। किन्तु, डा.आम्बेडकर की एक पूर्वोक्ति को दलित भी दोहराता रहता है और मान्यवर कांशीराम साहब ने कम्युनिस्ट पार्टियों में बचे-खुचे दलितों को बसपा से जोड़ने के लिए कम्युनिस्टों को “हरी घास का हरा साँप” कहकर दलितों के मन-मस्तिष्क में मार्क्सवाद का विरोध भर दिया। दलित दो जगहों के क्रांतिकारी सिद्धांत (डा.आम्बेडकर का जातिप्रथा उन्मूलन और मार्क्स का वर्ग-संघर्ष) से महरूम हो गया।
इधर बसपा अपने स्वक्छन्दातावादी प्रकृति से मान्यवर कांशीराम के दलित सशक्तिकरण के दर्शन से भी महरूम हो गई। बसपा की नैय्या डूबती नजर आ रही है। कुछ पूर्व से ही बामसेफ के नए संस्करण के साथ मान्यवर बामन मेश्राम साहब के सूर्य रूप में उदित होने लगे हैं। मेश्राम साहब ने बामसेफ का एक अनुसांगिक राजनैतिक पार्टी बीएमपी को राजनैतिक रूप प्रदान कर दिया।
कांशीराम साहब ने बहुजन का नारा दिया था और जय भीम उनका मूल मन्त्र था। मेश्राम साहब ने बहुजन के स्थान पर मूलनिवासी शब्द को प्रचारित किया तथा “जय भीम” के स्थान पर “जय मूलनिवासी” को अभिवादन  के बतौर पेश किया। इनका नारा है-बोल पचासी-मूलनिवासी”।
डा.आम्बेडकर ने अपनी पुस्तक “शूद्र कौन थे” में लिखा है कि आर्य कोई प्रजाति नहीं है। आर्य एक भाषा है। यह भाषा भारत और उसके इर्द-गिर्द बोली जाती थी। इसके बोलने वालों को आर्य कहा जाने लगा। इस तरह दलित व ब्राह्मण दोनों ही आर्य हैं। बाबा साहब ने तिलक के सिद्धान्त को गलत साबित किया कि आर्य यूरेशिया व काकेशिया से भारत में आए हैं। बाबा साहब ने लिखा है कि शूद्रों की तरह ब्राह्मण भी भारत के मूलनिवासी हैं। डा.आम्बेडकर के इस सिद्धांत के विरूद्ध बामन मेश्राम साहब ने अमेरिका के साल्टलेक सिटी, उटाह विश्वविद्यालय के मानवीय आनुवंशिक एकलिस संस्थान के विद्वान बामसाद ने भारत के ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैश्यों  के DNA  का मिलान यूरेशिया के लोगों से किया जो  क्रमशः 99.9, 99.88 और 99.86 प्रतिशत मिलता है। अर्थात भारत के ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैश्य युरेशियन है। यही नहीं बामन मेश्राम साहब ने उद्घोषणा किया है कि अब हमें दूसरी आजादी की लड़ाई लड़नी पड़ेगी। जिस तरह भारत से अंग्रेजों को खदेड़कर आजादी प्राप्त की गई है, ठीक वैसे ही युरेशियन ब्राह्मणों को भारत से निष्कासित कर दलितों (उनके शब्दों में मूलनिवासियों को) को आजादी दिलाना बामसेफ और बीएमपी-मेश्राम का उद्देश्य है। क्या यहाँ यह बात अजीब और हास्यास्पद नहीं लगता है कि जो ब्राह्मण 8-10 हजार वर्षों से भारत में रह रहा हो, जिसकी न जाने कितनी पीढियां इस देश के नागरिक हैं, ज़र-जमीनें स्थाई हैं और डा.आम्बेडकर के तर्कों और सिद्धान्तों के आधार पर ब्राह्मण भारत का मूलनिवासी है-उसे खदेड़ने की बात कर रहे हैं। ओबीसी वर्ग के शासक ने 70 हजार दलितों को नौकरियों में उनके पदों से रिवर्ट कर निम्न पदों पर पुनर्स्थापित करने का ऐतिहासिक पाप किया है। यही वर्ग है जो दलितों की पिटाई में सबसे अग्रणी रहता है। उसे शूद्र मानता है और उससे शूद्र मनवाने के चक्कर में दलित उसे मूलनिवासी मानता हुआ दोस्त मानता रहता है। यह भी हास्यास्पद लगता है कि सछूत वर्ग अछूत की श्रेणी में आकर अपने को पतित जाति में क्यों शामिल करेगा?
डा,आम्बेडकर के दर्शन को मान्यवर कांशीराम ने उलट दिया। कांशीराम को सुश्री मायावती जी ने उलट दिया। और अब मेश्राम साहब में सब की ऐसी की तैसी करते हुए जातिप्रथा उन्मूलन, जाति सशक्तिकरण, जाति ध्रुवीकरण व सत्ता ग्रहण का एनकेन प्रकारेण का तरीका ही उलट दिया है और दलित जातियों को एक नए भंवरजाल में डाल दिया है।

दलित न जातिप्रथा उन्मूलन के लिए कन्विंस है, न जाति ध्रुवीकरण के लिए ही, न बौद्ध धर्म के लिए और न मूलनिवासी के दूसरी आजादी के लिए ही तैयार है। दलित ब्राह्मणों पर जातिवाद का आरोप लगता है किन्तु खुद आरक्षण के भँवर में इस तरह उलझा है कि स्वयं ही जाति प्रमाण-पत्र बनवाकर सिद्ध करता रहता है कि हे ब्राह्मण देवता! मैं ही चमार हूँ, मैं ही कोरी हूँ, मैं ही पासी हूँ, मैं ही धोबी हूँ, मैं ही भंगी हूँ। ब्राह्मण कहाँ कह रहा है कि तुम चमार न रहो, कोरी न रहो, पासी न रहो। जैसा वह चाहता है सम्भ्रांत दलितों की एक लालच पूरी दलित जातियों को शूद्र-चमार बनाए रखने में मदद करती है।

एक बहुत ही विचारणीय बिंदु पर मैं चर्चा को ले चल रहा हूँ। डा.आम्बेडकर ने एक हद तक मार्क्सवाद को अभिशापित किया। कांशीराम ने तो बहुत ही सजगता के साथ कम्युनिस्टों को हरी घास का हरा सांप कहा। बामन मेश्राम भी मार्क्सवाद को मूलनिवासियों के रास्ते का रोड़ा मानते हैं। और भी बहुत सारे दलित नस्लवादी संगठन हैं जो मार्क्सवाद को दलितों के हाथ का झुनझुमा मानते हैं। अब गौर करिए कि आरएसएस, बीजेपी, शिवसेना, बजरंग दल तथा अन्य अनेक अनुसांगिक संगठन मार्क्सवाद के धुर विरोधी हैं। कम्युनिस्ट ही वह वर्ग है जिससे आरएसएस व इसके अनिसंगिक संगठन डरते हैं और इन्हें  दुश्मन, आतंकवादी, नक्सलवादी व माओवादी कहकर बदनाम भी करते हैं। यहाँ मैं कम्युनिस्ट की बात कर रहा हूँ। मैं नक्सलाइट और माओवादियों की पक्षधरता की बात नहीं कर रहा हूँ और न मैं उन्हें कम्युनिस्ट ही मनाता हूँ। आप सोचिए दलित और आरएसएस में कौन सा ऐसा कॉमन तत्व है जो दोनों को कम्युनिस्ट ही दुश्मन नजर आ रहे हैं। मेरा मनना है कि मार्क्सवाद आंबेडकरवाद का दोस्त है। दलित वर्ग को मार्क्सवाद के निश्चित दोस्ती करनी चाहिए। दर्शन का पूरा हिस्सा आम्बेडकर के रास्ते का सहयोगी है। मार्क्सवाद में न भाग्य है, न भगवान है, न तंत्र-मन्त्र है, न जादू-टोना है, भूत-प्रेत का कांसेप्ट है। मार्क्सवाद का मूल मन्त्र है कि यदि सब को शिक्षा सब को काम उपलब्ध कराया जाय तथा निजी संपत्ति का उन्मूलन कर दिया जाय। खेती, ज़मीन, संसाधन, बीमा बैंक का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाय तो जातिवाद तो आधा अपने आप ख़त्म हो जाएगा। बाकी राज्य,  मसीनरी, शासन, प्रशासन और मिडिया के माध्यम से अनेक संस्कृति कार्यक्रमों के द्वारा कुछ पीढ़ियों के अंतराल में जाति और धर्म को राजनीति और मानव में हस्तक्षेप का करना बंद करा सकने में सक्षम हुआ जा सकता है। लेकिन, सच यह है कि दलितों को गुमराह करने के लिए पूँजीवादी शक्तियां और आरएसएस के घुसपैठिए दलितों को वर्ग-संघर्ष से रोकते हैं। मार्क्सवाद को दलितों का दुश्मन सिद्ध कर रखे हैं।
महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आज दलित और आरएसएस दोनों मूल रूप से नस्लवाद की बात करते हैं। आरएसएस यदि हिंदुत्व को एक नस्ल मानता है तो दलित तथाकथित  मूलनिवादियों को एक नस्ल मानता है। दोनों नहीं चाहते हैं कि उनकी नस्ल ख़त्म हो। हाँ, यह जरूर चाहते हैं कि हमारी नस्ल स्थापित रूप से शासन करे और अपने सिद्धांत, मान्यताएं, रीति-रिवाज, संस्कृति, पूजा-पद्धति, धर्म और ईश्वर को स्वीकार करे। दलित अंनिश्वरवादी है, लेकिन दलितों की बहुसंख्यक जातियां हिन्दू धर्म और ईश्वर को ही मानती हैं, भले ही वे बुद्ध और आम्बेडकर में  विश्वास रखते हों।
मार्क्स ने पूँजी के खण्ड-3 पृष्ठ 601 पर लिखा है कि “शासक वर्ग शासित वर्ग की अग्रतम मेधाओं को आत्मसात करने में जितना अधिक समर्थ होता है, उसका शासन भी उतना ही अधिक स्थिर और घातक होता है।” भारत और दलित के परिप्रेक्ष्य में उक्त युक्ति डा.आम्बेडकर को संविधान निर्माता बनाकर, कांशीराम को दलितों का चाणक्य बनाकर, सुश्री मायावती को दलितों  की देवी बनाकर तथा पुनः बामन मेश्राम को क्राँति का दूत बनाकर औपनिवेशिक सत्ता और शासक वर्ग ने दलितों के अग्रतम मेधाओं को अपने अनुसार दलितों का नेता और मशीहा साबित कराकर सिद्ध कर दिया है कि वे दलितों को वास्तविक क्राँति व् वर्ग-संघर्ष से दूर कर अधिक स्थिर और घातक शासन कर रहे हैं।
यहाँ दलितों को समझना है कि यदि ब्राहण और दलित दो राष्ट्र की तरह आमने-सामने हैं, दोनों के उद्देश्य एक दूसरे के विपरीत हैं तो दोनों के एक ही धरती पर मार्क्सवाद दुश्मन कैसे है?
दलितों के संगठन मार्क्सवाद को भारत में लागू न होने वाला संगठन मानते हैं। तर्क के लिए कहते हैं कि मार्क्स यदि भारत में पैदा हुए होते तो सर्वप्रथम वे जाति को तोड़ने की बात करते, किन्तु वे फ़्रांस में पैदा हुए, भला क्या जाने की जातिवाद क्या होता है। यहाँ दलितों का दोगलापन स्पष्ट दिखता है कि एक तरह मार्क्सवाद के बहाने तो जातिवाद को तोड़ने की बात करते हैं किन्तु जब भारतीय पृष्ठभूमि पर राजनैतिक रूप से मैदान में दलितों को देखते हैं तो एकदम नंगा नस्लवादी राजनीति का हिमायती है।
यहाँ शंका होना स्वाभाविक है कि दलितों के अग्रतम मेधाओं पर ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद अपनी तीसरी दृष्टि हमेशा लगाए रखती है। ब्राह्मणों सहित अन्य जातियों के गरीब वर्ग से दलितों की एकता तोड़ देते है तथा इन्हें आपस में जातियों और धर्मों के भेद-भाव में उलझाए रखते हैं। दलित सर्वहारा वर्ग है। क्रांतिकारी वर्ग है। इसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है, पाने के लिए संसार है। इसलिए, प्रभु वर्ग (पूँजीवाद) डरता है कि कहीं कोई असली सर्वहारा वर्ग का नेता मार्क्सवाद के सिद्धांत पर भारत में वर्गीय एकता स्थापित करते हुए क्राँति का सूत्रपात न कर दे। इसलिए दलित वर्ग को एक फॉल्स गॉड फादर देकर उसी में हमेशा फसाए रखता है तथा स्वयं सुरक्षित-निश्चिन्त स्थिर व घातक शासन करता रहता है।


आर डी आनंद
एल-1316, आवास बिकास कॉलोनी,
बेनीगंज, फैज़ाबाद, अयोध्या-224001

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