“सवर्णों के सबसे बड़े हितैषी : दलित मार्क्सवादी”

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बस यूं ही ,,,,,,।
एच एल दुसाध सर ने दलित मार्क्सवादियों पर लांछन लगाते हुए टिप्पणी की जिसका उनवान था कि
“सवर्णों के सबसे बड़े हितैषी : दलित मार्क्सवादी “
अशोक कुमार गौतम :
आपका कथन सत्य है ।
मगर दलित मार्क्सवादी ऐसा करते क्यों है?
दुसाध सर :
Ashok Kumar Gautam यह अध्ययन का विषय है
रवि :
अध्ययन पूरा नहीं हुआ तो आप ने ऐसी धारणा क्यों बना ली कि दलित मार्क्सवादी सवर्ण हितैषी होता है । इतनी जल्दबाज़ी क्यों है ? आधी अधूरी जानकारी के साथ इतना बड़ा इल्ज़ाम नहीं लगाना चाहिए ।
जो दुसाध सर की टिप्पणी से सहमत हैं उनसे एक सवाल है और दुसाध सर से भी की मूलतः सवर्ण विरोधियों के पास भारत में जाति उन्मूलन का क्या प्रोग्राम है ?प्रोग्राम है भी या नहीं ? मैं एक दलित मार्क्सवादी हूँ और आप सब को खुली चुनौती देता हूँ । अगर मेरे सवालों के तर्क सहित व्यवहारिक जवाब दे दिए गए तो मैं मान लूंगा कि दलित मार्क्सवादी को अपने अध्ययन में कुछ और जोड़ना चाहिए ।
दुसाध सर :
ravi prakash जी, मैंने न तो मार्क्सवाद की उपयोगिता पर सवाल उठाया है और न हीं दलित मार्क्सवादियों के अध्ययन पर: सवाल उठाया है दलित मार्क्सवादियों की सवर्णों के प्रति नज़रिए पर. हो सकता है मार्क्सवाद के विषय में मेरा ज्ञान शून्य हो, किन्तु मेरे साथ सुखद बात यह है कि 1962 से 1996 तक मार्क्सवादियों के गढ़ बंगाल में रहने: उसके बाद दिल्ली, मुंबई इत्यादि महानगरों में विचरण करते रहने के कारण मार्क्सवादियों को करीब से जानने सुनने का जो अवसर मिला , वह बहुत कम लोगों को मय्यसर हुआ होगा. अतः मेरी राय मायने रखती है. बहरहाल सच कहूँ तो निजितने भी दलित मार्क्सवादियों से मिला, शायद ही किसी में सवर्णों के प्रति वह आक्रोश पाया जो शोषक वर्ग के प्रति होना चाहिए : सबको ही मुख्य शत्रु टाटा बिडला, अंबानी, अमेरिका इत्यादि को बताते पाया. ऐसा करके प्राकारांतर में उन्हे सवर्णों का बचाव करते ही पाया.
मैं दूसरे अंबेडकरवादियों के विषय में दावा नहीं कर सकता, पर , मेरा जो अध्ययन है उसके मुताबिक सवर्ण ही भारत का जन्मजात शोषक वर्ग हैं, जिन्होंने शक्ति के स्रोतों पर बेपनाह कब्जा जमाकर कर इस देश और देश के सर्वस्वहारा वर्ग की स्थिति दयनीय बना रखी है. सवर्णों के सर्वत्र बेहिसाब वर्चस्व के कारण ही मुझमे बेहिसाब आक्रोश है, जिसका प्रतिबिंबन मेरी किताबों/ लेखों में होते रहता है.उनका यह वर्चस्व ही मुझे लिखने पढ़ने और किताबों पर किताबें देने की ऊर्जा प्रदान करता है.
मेरे अध्ययन के हिसाब से बहुजनों के वर्ग शत्रु यही हैं. ऐसे में मेरे हिसाब से जो दलित बहुजनों के वर्ग शत्रु हैं , उनके प्रति दुनिया के सबसे अधिकार विहीन तबके- दलितों- के मार्क्सवादियों का दुर्बलता पोषण करना अचंभित करता है, इसलिए ही दिल की बात जुबां पर आ गयी. मेरी इस बात को सभी अम्बेडकरवादियों से न जोड़कर, डाइवर्सिटि मैन ऑफ इंडिया की निजी राय के रूप में देखें. अधिकांश अम्बेडकरवादी ही मार्क्सवादियों के प्रति भारी आदर का भाव रखते हैं, मेरी तरह उनके आलोचक नहीं हैं. यदि मेरी निजी राय को अम्बेडकरवादियों से जोड़कर देखेंगे तो अपने ढेरों मित्र खो देंगे.
अब जहां तक चुनौती देने की बात है, यह बात दिल से निकाल ही दीजियेगा. मेरी 80 में से शायद आधी किताबें ही चुनौती के कारण ही लिखी गयी है.अब यदि यहाँ कोई सवाल खड़ा करना चाहते हैं तो वह सवाल यह पैदा होता है-:
‘दुसाध के अनुसार भारत व भारत के बहुसंख्य लोगों की दुर्दशा के लिए सवर्ण वर्ग जिम्मेवार है तो दलित मार्क्सवादियों के हिसाब से कौन?
दुसाध के अनुसार बहुजनों के वर्ग शत्रु सवर्ण हैं तो दलित मार्क्सवादियों के अनुसार कौन?’
रवि :
सर नज़रिया बिल्कुल साफ है । दलित मार्क्सवादी वर्ग की बात करता है । उसके शत्रु का वंश ,गोत्र , कुल , जाति और धर्म क्या है इस से कोई सरोकार नहीं है । न हो सकता है । दलित मार्क्सवादी दायरों के सशक्तिकरण की नहीं बल्कि दायरों के उन्मूलन की बात करता है । अम्बेडकर के राजकीय समाजवाद को फॉलो करता है लेकिन मार्क्सवादी तरीके से । मुझे लगता है दलित मार्क्सवादियों पर लांछन लगाने से पहले फ़र्ज़ी बौद्दिस्टों और अवसरवादी अम्बेडकरवादियों पर लिखना चाहिए था !
रवि :
सर दलित मार्क्सवादी मेहनकश दलित सर्वहारा वर्ग की बात करता है उसका शत्रु निजी सम्पत्ति के सिद्धान्त का पक्षधर है । जो हर धर्म , जाति , क्षेत्र में पाया जाता है । जो क्रांति के विरोध में है । जो अवसरवादी मध्यवर्ग की भूमिका निभाता है और मज़दूर आंदोलन को कमज़ोर बनाता है । जिसकी चिंता के केंद्र में मध्यवर्गीय हित और उच्चवर्गीय सत्ता होती है । जिसके पास निम्न वर्ग की समस्याओं के निदान हेतू केवल पूंजीवादी सुधार की नीतियां हैं । जो जाति उन्मूलन का कोई कार्यक्रम पेश नहीं कर पाता है । जो साम्प्रदायिक शक्तियों के हाथ की रबड़ स्टैम्प की तरह काम करता है ।जो मेहनतकश आवाम के लिए वैश्विक सामंजस्य और संगठन की रूपरेखा प्रस्तुत करने में असमर्थ है । जो अम्बेडकर के राजकीय समाजवाद से मुंह मोड़ कर पूंजीवादी संसदीय व्यवस्था का चाकर बना हुआ है ।
दुसाध सर की टिप्पणी के विरुद्ध मैंने जवाब दिया और ये बताने की कोशिश की कि दलित मार्क्सवादी होने का मतलब क्या होता है ?
रवि निर्मला सिंह

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