भाग-9 मनुष्य को अपनी ही ताकत के आगे बेबस बना देता है अलगाव

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लेखकः एरिक फॉम
अनुवादः प्रणव एन

अलगाव सभी मूल्यों में विकार का कारण बनता है। अर्थव्यवस्था और इसके मूल्यों – लाभ, कार्य, मितव्ययिता और संयम – को जीवन का सबसे बड़ा मकसद बना लेने से मनुष्य सच्चे नैतिक मूल्यों – अच्छा अंतःकरण, तमाम सद्गुण आदि –  का विकास करने में नाकाम हो जाता है। लेकिन अगर ‘मैं जिंदा ही न रहूं तो सद्गुणों की खान कैसे बन सकता हूं? अगर मैं किसी बात से अवगत ही नहीं तो भला अच्छा अंत-करण कहां से लाऊंगा?’ अलगाव की स्थिति में जिंदगी का हर क्षेत्र – आर्थिक या नैतिक – दूसरे से स्वतंत्र होता है। इनमें से हरेक क्षेत्र किसी खास अलगावग्रस्त गतिविधि तक सिकुड़ा रहता है और दूसरे क्षेत्रों से कटा होता है।

मार्क्स ने इस बात को पहचान लिया था कि अलगावग्रस्त दुनिया में मानवीय आवश्यकताओं की क्या गत हो जाती है। उन्होंने उस प्रक्रिया की पूर्णता को अद्भुत स्पष्टता से तभी देख लिया था जिस रूप में यह आज दृष्टिगोचर हो रही है। समाजवादी दृष्टिकोण से, बेशक सबसे ज्यादा अहमियत ‘मानवीय आवश्यकताओं की संपदा’ को, उत्पादन की नई प्रणाली को और उत्पादन के नए उद्देश्य को दी जानी चाहिए। दूसरे शब्दों में इसका जोर ‘मानवीय शक्तियों के नए प्रकटीकरण पर और मनुष्य मात्र की समृद्धि पर’ होना चाहिए। इसके विपरीत पूंजीवाद की अलगावग्रस्त दुनिया में आवश्यकताएं मनुष्य की छिपी हुई जरूरतों की अभिव्यक्ति नहीं होतीं। यानी वे मानवीय आवश्यकताएं नहीं होतीं। पूंजीवाद में हर व्यक्ति ये सोचने में लगा रहता है कि दूसरे में कैसे कोई नई आवश्यकता बनाई जाए, उसे किसी नई निर्भरता के हवाले किया जाए, उसमें किसी नए प्रकार के लुत्फ की लालसा जगाई जाए ताकि वह किसी नए ‘त्याग’ के लिए मजबूर हो, आर्थिक बर्बादी की ओर बढ़ जाए। हर व्यक्ति अपने अहं को तुष्ट करने के लिए दूसरों के ऊपर अलौकिक सत्ता स्थापित करने में लगा रहता है। इसलिए वस्तुओं की भीड़ के साथ मनुष्य को अपने अधीन करने वाली अनजान हस्तियों का क्षेत्र भी बढ़ता जाता है। हर नया उत्पाद आपसी ठगी और लूट की नई संभावना होता है। मनुष्य के रूप में मनुष्य अधिकाधिक दरिद्र होता जाता है। इन शत्रुतापूर्ण हस्तियों को पाने के लिए उसकी पैसों की जरूरत बढ़ती जाती है। पैसों की ताकत उत्पादन की मात्रा में बढ़ोतरी के अनुपात में ही कम होती जाती है। दूसरे शब्दों में पैसों की बढ़ती ताकत के हिसाब से उसकी जरूरतें बढ़ती जाती है। इसलिए पैसों की जरूरत आधुनिक अर्थव्यवस्था द्वारा निर्मित वास्तविक जरूरत है और यह इकलौती जरूरत है जो आधुनिक अर्थव्यवस्था पैदा करती है। पैसों की मात्रा इसकी एकमात्र महत्वपूर्ण विशेषता बनती चली जाती है। यह जैसे हर अस्तित्व को उसकी अमूर्तता में तब्दील करती चलती है वैसे ही अपने विकास क्रम में खुद भी मात्रात्मक अस्तित्व में सिमट कर रह जाती है। अति और असीमित ही इसका वास्तविक पैमाना बन जाते हैं। यह आंशिक तौर पर इस तथ्य में दिखता है कि उत्पादन और आवश्यकता का विस्तार अमानवीय, नीचतापूर्ण, अप्राकृतिक और काल्पनिक आकांक्षाओं का तिकड़मी ताबेदार बन जाता है। निजी संपत्ति यह नहीं जानती कि अपरिपक्व जरूरतों को मानवीय आवश्यकताओं में कैसे बदला जाए। धुन और सनक ही इसका आदर्शवाद है। कोई हिजड़ा चांदी के चंद सिक्कों की खातिर अपने राजा का जोश बढ़ाने के लिए, उसकी हवस को उकसाने के लिए वैसे शर्मनाक हथकंडे नहीं अपनाता, जैसे कि उद्योग नाम का यह हिजड़ा अपने प्रिय पड़ोसी की थैली से कुछ सोने के सिक्के खींचने या कहीं और से चांदी के चंद सिक्के हासिल करने के लिए अपनाता है। हर उत्पाद मछली पकड़ने वाला ऐसा कांटा है जिसके सहारे एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति का सार यानी उसका पैसा हड़पने की कोशिश करता है। हरेक वास्तविक या संभावित जरूरत एक कमजोरी है जिसके जरिए चिड़िया पकड़ी जा सकती है। चूंकि मनुष्य का हर अधूरापन स्वर्ग का बॉन्ड (ऋणपत्र) है, और स्वर्ग एक ऐसा बिंदु है जो पुजारी को उसके दिल तक पहुंचने का रास्ता दे देता है, इसलिए हर जरूरत अपने पड़ोसी से दोस्ती की पेशकश करने और यह कहने का एक मौका है कि ‘प्रिय मित्र, मैं आपको वह चीज दूंगा जिसकी आपको जरूरत है, पर शर्त आप जानते हैं। आप जानते हैं कि खुद को मेरे नाम करने के लिए आपको किस स्याही का प्रयोग करना है। आपको आपकी मनचाही चीज मुहैया कराते हुए मैं आपको छलूंगा।’ उद्यमी (इंट्रेप्रेन्यर) अपने पड़ोसी की घोर अनैतिक सनकों को भी स्वीकार कर लेता है, उसके और उसकी जरूरतों के बीच दलाल की भूमिका निभाता है, उसकी हवस को खाद-पानी देता है और उसकी हर कमजोरी पर नजर रखता है ताकि बाद में अपनी इस पूरी मेहनत की भरपूर कीमत वसूल कर सके। इस प्रकार अपनी अलगावजन्य जरूरतों का गुलाम हो चुका मनुष्य शारीरिक और मानसिक रूप से एक अमानवीकृत हस्ती होता है, स्वचेतन और आत्मक्रियाशील पदार्थ। यह वस्तु-मानव बाहरी दुनिया से खुद को जोड़ने का एक ही तरीका जानता है इसे हासिल करते हुए और इसे इस्तेमाल करते हुए। वह जितना ही अलगावग्रस्त होता है, दुनिया से उसके रिश्ते पर हासिल करने और इस्तेमाल करने की इस भावना की जकड़न उतनी ही मजबूत होती जाती है। ‘आप जितना ही कम होते हैं, अपनी जिंदगी को आप जितना ही कम अभिव्यक्त करते हैं, आपके पास उतना ज्यादा होता है, आपकी अलगावग्रस्त जिंदगी उतनी अहम होती है और आपकी अलगावग्रस्त हस्ती की बचत भी उतनी ज्यादा होती है।’

सिर्फ एक ही संशोधन है जो इतिहास ने मार्क्स की अलगाव की परिभाषा में किया हैः मार्क्स मानते थे कि श्रमिक वर्ग सबसे ज्यादा अलगावग्रस्त होता है और इसीलिए अलगाव से मुक्ति की शुरुआत भी अनिवार्यतया श्रमिक वर्ग की मुक्ति से ही होगी। मार्क्स यह नहीं देख पाए कि अलगाव किस हद तक विशाल जनसंख्या की नियति बन जाएगा, खासकर आबादी के लगातार बढ़ते उस तबके की जो मशीनों के बजाय मनुष्यों के साथ जोड़-तोड़ करता है। देखा जाए तो आज क्लर्क, सेल्समैन और एक्जीक्युटिव शारीरिक श्रम करने वाले कुशल कामगारों के मुकाबले कहीं ज्यादा अलगावग्रस्त हैं। श्रमिक का कार्य आज भी कई व्यक्तिगत विशेषताओं जैसे कौशल, भरोसा आदि पर  निर्भर करता है। उसे अपना व्यक्तित्व, अपनी मुस्कान, अपनी राय नहीं बेचनी पड़ती सौदेबाजी के लिए। सिंबल मैनिपुलेटर्स (संकेतों के साथ जोड़-तोड़ करने वाले) महज अपने स्किल (कुशलता) के लिए नहीं बल्कि अपने व्यक्तित्व से जुड़ी उन विशेषताओं के लिए रखे जाते है जो उन्हें आकर्षक व्यक्तित्व पैकेज बनाती हैं, जिनकी वजह से उन्हें हैंडल करना, अपनी जरूरतों के अनुरूप ढालना आसान होता है। वे सही मायनों में ‘कंपनीमैन’ होते हैं , शारीरिक श्रम करने वाले उन श्रमिकों के मुकाबले कहीं ज्यादा, क्योंकि कंपनी उनकी जान होती है। लेकिन जहां तक खपत का सवाल है तो उस मामले में शारीरिक श्रम करने वाले मजदूरों और नौकरशाही के सदस्यों में कोई अंतर नहीं होता। वे सब के सब नई-नई वस्तुएं पाने, उनका स्वामित्व हासिल करने और उनका उपभोग करने को लालायित रहते हैं। वे निष्क्रिय ग्रहणकर्ता हैं, उन्हीं वस्तुओं से जकड़े और कमजोर किये हुए उपभोक्ता जो उनकी कृत्रिम जरूरतें पूरी करती हैं। वे उत्पादक तौर पर दुनिया से नहीं जुड़े हैं कि इसे इसकी पूर्ण वास्तविकता में समझें और इस प्रक्रिया में इसके साथ एकात्म हो सकें। वे वस्तुओं को और वस्तुएं उत्पादित करने वाली मशीनों को पूजते हैं और इस अलगावग्रस्त दुनिया में वे अजनबी, एकदम अकेला महसूस करते हैं। नौकरशाही की भूमिका को कम करके आंके जाने के बावजूद मार्क्स का सामान्य विवरण आज भी पूरी तरह सच हैः ‘उत्पादन मनुष्य को सीधे तौर पर वस्तु, या वस्तु मानव या वस्तु की भूमिका में मानव नहीं बना देता। यह उसे आध्यात्मिक और भौतिक तौर पर अमानवीकृत रूप में इन भूमिकाओं को निभाने की स्थिति में डाल देता है… इसका उत्पाद होता है आत्म सचेत और आत्म सक्रिय पदार्थ यानी मानवीय पदार्थ।’

मार्क्स को इस बात का अंदाजा शायद ही रहा हो कि हमारी ही बनाई वस्तुएं और परिस्थितियां किस हद तक हमारा मालिक बन जाएंगी, लेकिन  फिर भी उनकी भविष्यवाणी की कठोर सचाई का इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है कि मानव जाति आज अपनी ही ईजाद की हुई परमाणु शक्ति और अपने ही बनाए राजनीतिक संस्थानों की कैदी बनी बैठी है। डरी हुई मानवता उत्सुकता से इस सवाल के जवाब का इंतजार कर रही है कि क्या वह अपनी ही बनाई हुई चीजों की ताकत से, अपनी ही नियुक्त की हुई नौकरशाही के अंधे कारनामों से बच पाएगी या नहीं।

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