प्रवासी तथा असंगठित मजदूर संगठन का कार्यक्रम

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प्रवासी तथा असंगठित मजदूर संगठन का कार्यक्रम असंगठित क्षेत्र के प्रवासी मजदूरों की संख्या रोज-रोज बढ़ती जा रही हैû इनका जीवन तथा सामाजिक स्थिति प्रवासी मजदूरों का स्व प ले चुका है जिनका न कार्यस्थल तय है ओर न ही निवास स्थलû वास्तव में बेरोजगारों की यह विशाल फौज है, जो पूंजीपतियों की आवश्यकता अनुसार काम में भर्ती किया जाता है, नहीं तो रोजगार के लिए यहां से वहां भटकता रहता हैû
पिछले पंद्रह-बीस वर्षों में खेती की स्थिति यह हो गयी है कि कृषि मजदूर तथा गरीब किसान साल के छह महीनें, जुलाई-अगस्त, नवम्बर-दिसंबर व अपै्रल-मई में खेती में काम करते हैं, जबकि शेष महीनों में इनके सामने भयंकर बेरोजगारी होती हैû इन महीनों में असंगठित क्षेत्र के प्रवासी मजदूरों में गैर कृषि कार्य करनेवालों की संख्या में भारी वृद्धि होती है और काम के अभाव में ये अक्सर भुखमरी के शिकार भी होते हैंû
खेती के महीनों में भी खेती में मशीनों यानी टै्रक्टर, पावर-टिलर, हारभेस्टर आदि का प्रयोग तथा खेती की पूंजी पर बढ़ती निर्भरता के कारण खेत-मजदूर तथा गरीब किसान असंगठित क्षेत्र के प्रवासी मजदूरों की जमात में शामिल हो रहे हैंû खेती के बदलते परिदृश्य में डीजल, बिजली तथा उत्पादन के अन्य साधनों की बढ़ती कीमत तथा खेती के बाद बाजार में माल नहीं बिकने के कारण तबाह मध्यम किसान भी असंगठित क्षेत्र के प्रवासी मजदूर की विशाल फौज में शामिल हो रहे हैंû इनके साथ-साथ विश्वव्यापी साम्राज्यवादी-पूंजीवादी संकट के कारण उत्पादक शक्तियों को लगातार तबाह कर इस जमात में ढकेला जा रहा हैû स्थानीय क्षेत्र या राज्य में रोजगार नहीं मिलने के कारण ये बाहर जाने के लिए विवश हैंû इनके अलावा बाढ़, सुखाड़ तथा विभिन्न तरह के अतार्किक पूंजीवादी विस्तार वाले कल कारखानों के लगने, बांध बनने, दूसरे सरकारी तथा घरेलू व बहुराष्ट्रीय पूंजीपतियों द्वारा जमीन अधिग्रहण के कारण उजड़े किसान व आदिवासी असंगठित क्षेत्र के प्रवासी मजदूरों की जमात में शामिल हो रहे हैंû
पिछले दिनों भूमंडलीकरण तथा नई आर्थिक नीति के दौर में संगठित क्षेत्र में ठेका मजदूरों की बढ़ती संख्या और इनकी अत्यधिक गिरे स्तर के काम की शर्तों के कारण इन्हें भी असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की जमात में ढकेला जा रहा हैû श्रम कानूनों में बदलाव लाकर शासक वर्ग तेजी से संगठित क्षेत्र के मजदूरों को असंगठित क्षेत्र में ढकेलने की कोशिश में लगे हुए हैंû अब तो १०० की जगह १००० मजदूरों वाले कारखानों के मजदूरों को भी मनमाने ढंग से हटाने की छूट मिल गई है जिससे असंगठित क्षेत्र के प्रवासी मजदूरों की संख्या में और तेजी से बढोतरी होगीû यों तो पूरे भारत में असंगठित क्षेत्र के प्रवासी मजदूरों की संख्या में वृद्धि हो रही है, लेकिन बिहार, झारखंडड़, प बंगाल , पूर्वी उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र व संपूर्ण दक्षिण भारत के खेत-मजदूर व असंगठित क्षेत्र के मजदूर प्रवासी मजदूर बनते जा रहे हैंû ग्रामीण इलाके में ५५% आबादी अब विभिन्न तरह के श्रमिक में बदल चुके हैंû इसके अलावा तबाह हुए किसानों तथा टुटपुंजिया व्यवसाय वाले भी इसमें लगातार शामिल होते जा रहे हैं जिन्हें अधिकारिक तौर पर इनमें गिनती नहीं की जाती हैû कृषि मजदूर भी इनका हिस्सा बन चुका हैû पंजाब की खेती तो पूरी तरह बिहार के प्रवासी मजदूरों के श्रम पर ही निर्भर हैû
भूमंडलीकरण व नई आर्थिक नीति के दौर में असंगठित क्षेत्र के प्रवासी मजदूरों में ईंट भट्टे, पत्थर तोड़ने वाले, भवन निर्माण, सड़क व मिट्टी काटने वाले क्षेत्र, टेलीफोन तार बिछाने, बांध व विभिन्न परियोजनाओं, ईंट बनाने, क्रैशर में चीप्स बनाने तथा दूसरे छोटे बड़े कारखानों के अलावा पोलदारों, आढ़तियों, आदि के काम ने, ग्रामीण आबादी के बहुत बड़े हिस्से को तेजी से असंगठित क्षेत्र के प्रवासी मजदूर के प में काम करने के लिए खींच लाया हैû दिल्ली, गुजरात, पंजाब, राजस्थान आदि राज्यों के कारखानों में इनकी संख्या अधिक हैû इनमेंं संगठन बनाने तथा संघर्ष करने की भावना की कमी नहीं हैû इनका संगठित व स्वतःस्फूर्त आंदोलन भी फूटते रहा हैû
प्रवासी मजदूरों में घरेलू नौकरों, दरी, जड़ी, चूरी, बीड़ी आदि बनाने वाले दीन-हीन हालत और अपेक्षाकृत कम लड़ाकू तबके के बीच एनû जीû ओû प्रमुखता से छाये हुए हैû तुलनात्मक तौर पर कम संख्या व इनकी बेचारगी की स्थिति इनके पूनर्वास के नाम पर विदेशी फंडों को प्राप्त करने में एनû जीû ओû को सहायता प्रदान करता है û एनû जीû ओû भूमंडलीकरण व साम्राज्यवादी पूंजी के कर्ता-धर्ता के लिए अनुकूल स्थिति प्रदान करता है, क्योंकि इनकी ऐसी कोशिशें उत्पादन के मुख्य क्षेत्र को संघर्ष का केंद्र बनने से रोकता हैû भूमंलीकरण व साम्राज्यवादी प्रभुओं तथा विभिन्न पूंजीवादी सरकारों के द्वारा प्राप्त राशि से ये इनके पूनर्वास के नाम पर झूठे व नकली आंदोलन चला रहे हैं जो संपूर्णता में इस शोषक व्यवस्था को पलटने के बजाय लोगो ं की पूंजीवाद, साम्राज्यवाद तथा भूमंडलीकरण विरोधी चेतना को कुंद कर रही हैû
एनû जीû ओû जैसी संस्थाओं की कोशिश रहती है कि इनका आंदोलन पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ न जाकर स्थानीयता तथा कुछ खास मुद्दे में ही उलझ कर रह जाएû ये मजदूरों को विश्व पूंजीवाद व भूमंडलीकरण के खिलाफ विश्वव्यापी विकल्प पेश करने की लड़ाई की तरफ जाने से रोकते हैंû ये इनकी वर्गीय पहचान को मिटाकर इन्हें अलग-अलग समुदाय के प में बांटते हैंû
भूमंडलीकरण के दौर में साम्राज्यवाद पूंजीवाद के बढ़ते फैलाव के कारण बनने वाले कारखाने, बांध व दूसरी परियोजनाओं के कारण गरीब आदिवासी तेजी से उजडड़ रहे हैंû एनû जीû ओû इस बात के लिए ज्यादा संघर्षशील हैं कि ये कारखाने या बांध नहीं बनाये जायेंû मजेदार बात यह है कि इस आंदोलन को ये संगठन साम्राज्यवाद से दान में मिले पैसे से ही चलाते हैंû
ऐसा वे इसलिए कर रहे हैं ताकि पूंजी की मार से असंगठित प्रवासी मजदूर में तब्दील यह वर्ग अपनी बढ़ती संख्या व राजनीतिक १
अनुभवों के आधार पर मेहनतकशों के क्रांतिकारी हिस्सों के साथ संगठित होकर इस व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष का बिगुल नहीं फूंक देû
नर्मदा बचाओ आंदोलन व दूसरे क्षेत्रों में उजडड़े गरीब किसानों व मेहनतकशों के तबके के आंदोलनों का अनुभव यही बताता है कि स्थानीय आबादी, समूह आदि के प में इनका संघर्ष वहां के लोगों के जीवन में तो कोई फर्क नहीं लाया लेकिन साम्राज्यवादी-पूंजीवादी फंड़ों से फलती-फूलती इन संस्थाओं व इनके नेताओं को विदेशी धन, पुरस्कार, विचार गोष्ठियों में मंच, मिडिया में प्रशंसा और प्रचार खूब मिलाû इसलिए असंगठित क्षेत्र के प्रवासी मजदूरों को संगठित करने तथा आंदोलन करने के लिए एनû जीû ओû तथा एनû जीû ओû मार्का प्रवृतियों का तीव्रता के साथ विरोध किया जायû हर हालत में इसके संगठन व आंदोलन के क्रांतिकारी तथा परिवर्तनकामी चरित्र की रक्षा की जाए व उसका फैलाव किया जाएû
भूमंडलीकरण के दौर में अपने गलाकाटू प्रतिद्वंद्विता के बावजूद साम्राज्यवाद के नेतृत्व में तमाम देशों के पूंजीपति डब्लूû टीû ओ, विश्व बैंक, आईû एमû एफû व दूसरी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से लगातार एकजूट हो रहे हैंû यह एक जूटता मूलतः श्रमिक वर्ग के खिलाफ ज्यादा से ज्यादा मुनाफा बटोरने के लिए हैû भारत के पूंजीपति वर्ग भी इस गठबंधन में शामिल हैंû इसीलिए रोज-रोज श्रम कानूनों को आसान बनाकर ‘हायर एण्डड़ फायर’ यानी अपनी इच्छा अनुसार काम में भर्ती करने और निकालने की पूरी छूट के लिए ये प्रयासरत् हैंû पूंजीपतियों के गठबंधन की सरकार, मिडिया, बुद्धिजीवी सबके सब लगातार मजदूर विरोधी कानूनों तथा माहौल की वकालत कर रहे हैंû
आज गांव-शहर सभी जगह सरकारी व विदेशी सहायता से जो निर्माण कार्य हो रहे हैं, खेती में नया विकास हो रहा है उसके कारण नवोदित भूस्वामी, ठेकेदार आदि के प में नए पूंजीपति का तेजी से विकास हो रहा हैû इसके अलावा ढेरों बड़े तथा स्थानीय पूंजीपति भी तेजी से विकास किये हैंû भूमंडड़लीकरण के दौर में रोज-रोज उजड़ रहे मेहनतेशों के श्रम के दोहन से सुपर मुनाफा कमाकर ये काफी मजबूत हुए हैंû इसके साथ-साथ एक मजबूत शहरी मध्यवर्ग भी इनकी पैरोकारी के लिए मौजूद हैû इस मध्यवर्ग में पुराने सामंती समाज के लोग से लेकर लघु उद्योग कर्मी, उंचे वेतन पाने वाले नौकरी पेशेवर लोग शामिल हैंû
नये वर्ग के प में प्रवासी मजदूरों की जिंदगी ग्रामीण मजदूर तथा गरीब किसान की जिंदगी से भी बदतर हो गयी हैû गांव में कमोबेस एक स्थायी घर होता है, बच्चे कभी-कभी स्कूल का दर्शन कर आते हैं, एक सामाजिक जीवन होता है, एक संगठित ताकत के प में अस्तित्व रहता है इसलिए संघर्ष व संगठन आसान होता हैû लेकिन प्रवासी मजदूर के प मेंं न इनके रोजगार की गारंटी है न ही काम के घंटे निश्चित हैंû एक फैक्ट्री से दूसरे फैक्ट्री, एक इलाके से दूसरे इलाके व एक शहर से दूसरे शहर भटकने के लिए ये अभिशप्त हैंû इनके व इनके परिवार के लिए स्वास्थ्य व शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं रहती हैû यहां इन्हें अक्सर अपनी कमाई हुई मजदूरी से भी हाथ धोना पड़ता हैû औरतों के साथ छेड़खानी व बलात्कार आम हो जाती हैû हमारे विकासमान पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में प्रवासी मजदूरों को आवासीय समस्या से भयंकर प से जूझना पड़ता हैû या तो गंदे इलाके के अंधरे कमरे में ८-१० मजदूर इकट्ठे रहते हैं या सड़क किनारे तंबू में या फिर झुंगी झोपडि़यों में जहां सौचालय या पानी की व्यवस्था नहीं होती हैû वह भी बीच-बीच में पुलिस-प्रशासन द्वारा उजाड़ दिया जाता हैû असमाजिक तत्वों की कहर भी इन पर टूटती रहती हैû फिर अपने परिवार से दूर ऐसे महौल में रहते हुए अक्सर इनमें से कई बुरी संगत के शिकार हो जाते हैंû
कई जगह इन्हेंं बंधुआ मजदूरों की तरह बंद घेरे में रखा जाता हैû मालिकों के साथ इनका कोई लिखित या कानूनी संबंध नहीं होता है, इसलिए मालिक जब चाहता है मनमानी मजदूरी देकर इन्हें हरा दिया जाताû विरोध करने पर कई बार उन्हें मार-पिट तथा हत्या तक का शिकार होना पड़ता हैû कार्य स्थल पर अक्सर दुर्घटना के बाद इनके उपचार और मुआबजा का कोई तर्कपूर्ण व्यवस्था नहीं हैû हाइवे, मैट्रो, डड़ैम पूल, फलाई ओभर बनाने में लगे मजदूर अक्सर दुर्घटना के शिकार होते रहते हैंû जहां तक श्रम कानूनों में संशोधन कर लगातार संगठित क्षेत्र के मजदूरों को वे सहारा बनाया जा रहा है, वहां इन असंगठित प्रवासी मजदूरों के हितों की तो कोई बात भी करने वाला नहीं हैû
जिस गुजरात उद्योगिक विकास की उपलब्धि का डंका पूरे विश्व में पीटा जाता है और जिसका डंका बजाकर श्री नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बन गए उस गुजरात में पूंजी के इस विशाल ढेर को पैदा करने वाले प्रवासी मजदूरों को देश के अन्य कोनों की तरह वहां भी न्यूनतम मजदूरी नहीं मिल पाती हैû गुजरात का सबसे बड़ा औद्योगिक केंद्र तथा मजदूरों की सबसे घनी आबादी वाला शहर अपनी गंदगी के लिए कुख्यात रहा है जहां कभी भयंकर प्लेग भी हुआ थाû
प्रवासी मजदूर जब घर लौटते होते हैं तो उनकी यात्रा सुरक्षित नहीं होती हैû अक्सर रेलवे कर्मचारी ( टीû टीû ) उनके टिकट फाड़कर उनसे मनमाना पैसे वसूलते हैंû कभी- कभी तो गुंडों की तरह व्यवहार करते हुए उनकी पूरी कमाई छीन लेते हैंû जो मजदूर इनसे बचकर घर पहुंचते हैं उनके स्वागत के लिए स्थानीय सूदखोर इंतजार करते रहते हैं जो उनकी कमाई का बडड़़ा हिस्सा हड़प लेते हैं, क्योिंक जाने से पहले व ऐसे सूदखोरों से ही कर्ज लेकर जाते हैं और बीच-बीच में परिवार के लोग भी बीमारी जैसी ज रतों के लिए भारी सूद पर कर्ज लेते रहते हैंû
बंधुगण, इस स्थिति का एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि काफी तीव्रता से प्रवासी मजदूर एक सामाजिक शक्ति का स्व प ग्रहन कर चुका हैûं भूमंडलीकरण व नई आर्थिक नीति के इस दौर में इस बदलते परिवेश की मांग है कि मजदूर तथा अन्य मेहनतकशों के आंदोलन को संगठित करने के लिए असंगठित क्षेत्र के प्रवासी मजदूरों पर प्रमुखता से ध्यान केंद्रित किया जायेû दुर्भाग्यवश आज की तारीख में मजदूर वर्गीए पार्टियां, क्रांतिकारी बुद्धिजीवी व ट्रेड यूनियन के एजेंडे में असंगठित क्षेत्र के प्रवासी मजदूरों को संगठित करने की कोई ठोस तथा दूरगामी योजना नहीं हैû यह मजदूर वर्ग की पार्टियों की कमजोरी है कि उनके बीच से एक लड़ाकु दस्ते को निकाल नहीं पा रही है जो संपूर्ण देश में असंगठित प्रवासी मजदूरों के बीच वर्ग संघर्ष के संदेश को फैला देû इस सम्मेलन के माध्यम से यहां उपस्थित लोगों, परिवर्तन कामी मजदूर वर्ग की पार्टियों, ट्रेड यूनियनों व बुद्धिजीवियों से अपील है कि इन्हें संगठित करने तथा इनके संघर्ष को मेहनतकशों के शोषण मुक्त समाज बनाने की दिशा की तरफ ले जाने पर गंभीरता से विचार किया जाएû
अपने गौरवमय अतीत में खेत-मजदूर व गरीब किसान के प में पिछले ४०-५० वर्षों में इस वर्ग ने ऐतिहासिक संघर्षों को जन्म दिया है तथा एक से एक लड़ाई जीतते हुए न सिर्फ अर्ध सामंती भूमि-संबंधों के बंधनों से खुद को मुक्त किया है, बल्कि वर्ग के प में एक राजनैतिक शक्ति की हैसियत से भारतीय राजनीति को प्रभावित भी किया हैû अपने अनुभवों तथा भयंकर शोषण के कारण इनमें तीव्र वर्ग घृणा व वर्गीय चेतना मौजूद हैû अक्सर स्वतः स्फूर्त ढंग से इनका आंदोलन व संघर्ष फूटने रहता हैû सन् १९९९ ईû में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ में इनके विद्रोह की लपटों को देश की राजधानाी तथा पूरा देश महसूस कर चुका हैû फिर भी इनका सुसंगठित संगठन व संघर्ष आगे नहीं बढ़ रहा हैû
इस समस्या के आलोक में खेत-मजदूरों व असंगठित क्षेत्र के प्रवासी मजदूरों का क्षेत्रीय, राज्य स्तरीय व राष्ट्रीय स्तर पर संगठन बनाकर इन्हें संगठित किया जा सकता हैû इनके काम का जो स्व प है और जो इनकी स्थिति है उसमें स्थानीय सीमाओं में बंधकर इन्हें सुदृढ़ प से संगठित करना संभव नहीं हैû इसलिए इनका केंद्रीय स्तर पर संगठन बनाना समय और इस वर्ग की बहुत बड़ी आवश्यकता हैû
अक्सर खेत-मजदूर व गरीब किसान प्रवासी मजदूर के प में एक इलाके से दूसरे इलाके, एक राज्य से दूसरे राज्य में काम करने चले जाते हैंû ऐसी स्थिति में इनमें कार्यरत जाग क मजदूर उस इलाके या राज्य में अपने संगठन से संपर्क बनाकर खुद को संघर्ष के लिए संगठित कर सकते हैंû मसलन बिहार के खेत-मजदूर व गरीब किसान असंठित प्रवासी मजदूर के प में दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और गुजरात में अपने इस संगठन से जुड़कर वहां काम कर सकते हैं और पुनः अपने गांव लौटने पर अपने राज्य के संगठन से जुड़कर काम कर सकते हैंû
इसलिए इस सम्मेलन में हम प्रस्ताव रखते हैं कि अखिल भारतीय असंगठित प्रवासी मजदूरों को संगठित करने के लिए एक संगठन का निर्माण करेंû इसके साथ-साथ इलाके तथा राज्य स्तर पर खेत-मजदूरों व असंगठित मजदूरों का स्वतंत्र संगठन बनाकर विभिन्न संघर्षों तथा इनकी समस्या व कांतिकारी परिवर्तन में इनके महत्व को रेखांकित करने हुए सम्मेलनों, गोष्ठियों व विभिन्न प्रचारात्मक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाएû तात्कालिक मांग के तौर पर निम्नलिखित मांगों को प्रमुखता के साथ उठाते हुए इसे केंद्रित कर प्रचार तथा संघर्ष के कार्यक्रम लिया जाना चाहिएû
हमारी मांगें हैंः-
१û न्यूनतम मजदूरी तथा काम के ८ घंटे तय होंû २û झुग्गि-झोपडिड़यों की जगह सरकार तथा नियोजन कर्ता उनके रहने की समुचित व्यवस्था करेंû ३û प्रवासी मजदूरों को कम दाम पर रेलवे टिकट के साथ सुरक्षित यात्रा की सुविधा देû तथा ४û प्रवासी मजदूरों को दुर्घटना या मौत के बाद सरकार परिवार के लिए २० लाख रपये मुआबजा ज्र्क्षतिपूर्ति की राशि तय करे।

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