यूक्रेनः युद्ध के ख़िलाफ़ शांति की अपील, ऐपवा ने किया पोस्टर प्रदर्शन

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26 फरवरी 2022
ऐपवा की वाराणसी जिला इकाई ने रूस द्वारा यूक्रेन पर हमले का पुरज़ोर विरोध किया है। ऐपवा राज्य सचिव कुसुम वर्मा ने कहा कि रूस और यूक्रेन के बीच के लम्बे विवाद को कूटनीतिक माध्यम से हल होना चाहिये साथ ही अमेरिका और नाटो घटकों के हस्तक्षेप की हम निदा करते हैं। सभी न्याय पसन्द और लोकतंत्र पसन्द ताकतें चाहती हैं कि रूस यूक्रेन पर बमबारी समाप्त करें अपनी सेनाओं को वहां से हटाए और तत्काल युद्ध बन्द करें। ऐपवा जिला सचिव स्मिता बागड़े ने कहा की रूस यूक्रेन पर आक्रमण कर रहा है जिससे यूक्रेन में महिलाओं और बच्चों समेत आम नागरिक मारे जा रहे हैं, यह भी सच है कि रूस में आज जनता सड़को पर निकलकर अपने ही देश के राष्ट्रपति पुतिन की दादागिरी के खिलाफ आवाज भी उठा रही है जिसे सत्ता की मद में चूर शासक वर्ग सुन नही रहा है। ऐपवा जिलाध्यक्ष सुतपा गुप्ता ने कहा कि इतिहास गवाह है कि युद्ध समस्या का हल नहीं बल्कि मनुष्यता के लिए खतरा है इस कठिन दौर में हम सभी को यूक्रेन के पक्ष में आवाज़ बुलंद करनी चाहिए और वहां की जनता का साथ देना चाहिए।
पोस्टर प्रदर्शन में विभा वाही, ऐपवा सहसचिव सुजाता भट्टाचार्य, उपाध्यक्ष विभा प्रभाकर, प्रतिभा एवं धनशीला शामिल थी।

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बस प्रसंगवश, इस पोस्ट के साथ मुकेश त्यागी जी की तीन फेसबुक पोस्टें भी जोड़ी जा रही हैं, ताकि पाठक मामले को भलीभाँति समझ सकेंः

एक ओर, अमरीकी-ब्रिटिश साम्राज्यवाद व नाटो समर्थित उक्रेन के उन्मादी राष्ट्रवादी फासिस्ट शासक तथा हथियारबंद नाजी गिरोह हैं। दूसरी ओर, सोवियत संघ पूर्व के पुराने रूसी साम्राज्य को बहाल करने के सपने देखते रूसी साम्राज्यवादी – उग्रराष्ट्रवादी। दोनों ने उक्रेन की बहुसंख्यक उक्रइनी व अल्पसंख्यक रूसी भाषा-भाषी आबादी को अपना मोहरा बनाया है और ये सारी जनता, जिसकी परस्पर शत्रुता का कोई कारण नहीं, ही इस युद्ध का वास्तविक शिकार बनेगी।
उक्रेन की विशाल उपजाऊ भूमि, खनिज संपदा, पूंजीवाद की पुनर्स्थापना के बाद जंग खा रही औद्योगिक क्षमता पर कब्जा इनका निशाना है। दुनिया भर में अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, पूर्व यूगोस्लाविया, माली, कोरिया, लीबिया, बोलिविया, कजाखस्तान, ताइवान, वेनेजुएला, वगैरह एक के बाद एक देशों को अपने प्रभुत्व में लेने की जो लडाई दो साम्राज्यवादी खेमों में कई साल से चल रही है, उक्रेन उसकी अगली कडी है। एक सदी पहले ऐसी ही साम्राज्यवादी होड़ ने 1914 में वैश्विक जंग का रूप ले लिया था और इजारेदार पूंजीपतियों ने मुनाफे और संसाधनों की होड़ में करोड़ों मेहनतकश आम लोगों के खून से अपनी प्यास बुझाई थी। साम्राज्यवादी लुटेरों की वैसी ही होड़ फिर से न सिर्फ विभिन्न देशों के बीच भयानक वैश्विक जंग का खतरा बढ़ा रही है, साथ ही उन देशों के अंदर फासीवादी – अंधराष्ट्रवादी उन्माद के नंगे नाच की जमीन भी तैयार कर रही है।
जिस तरह एक सदी पहले मजदूर वर्ग के शिक्षक लेनिन ने मेहनतकश जनता को साम्राज्यवादी लडाई को अपने-अपने देशों के शासकों के खिलाफ लडाई में बदलने का आह्वान किया था, वही आज के लिए भी सही है। सभी देशों की आम जनता को आपस में एक दूसरे का खून बहाने में शामिल होने के बजाय अपने शासकों के जंगी इरादों का सशक्त प्रतिरोध करना होगा।
यह संतोषजनक है कि पूंजीवादी मीडिया में दुष्प्रचार व जंगी उन्माद की सुनामी के बावजूद अभी तक किसी भी देश की जनता में युद्ध के समर्थन में जोश देखने में नहीं आया है। हर देश में जनता युद्ध नहीं चाहती। किंतु युद्ध के प्रति इस उदासीनता को युद्ध के सक्रिय विरोध में तब्दील करना होगा, सभी न्याय व शांति प्रेमी जनवादी व्यक्तियों और खास तौर पर सबसे अधिक शोषित उत्पीडित वंचित मेहनतकश जनता की यही जिम्मेदारी है क्योंकि अपने मुनाफे वास्ते युद्ध भड़काने वाले पूंजीवादी साम्राज्यवादी शासकों द्वारा तदजनित विनाश, रक्तपात, महंगाई, भुखमरी, बीमारी, बेरोजगारी का सारा बोझ इसी जनता पर डाला जायेगा। इस जंग के खतरे के मुकाबले का मंत्र अभी भी वही है –
दुनिया के मजदूरों एक हो!
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“बमबारी का निशाना मजदूर बस्तियों पर ही होना चाहिए। अमीरों के घरों के आसपास खुली जगह ज्यादा होती है, बम बरबाद होंगे।” चर्चिल का तकनीकी सलाहकार, लॉर्ड चेरवेल।
तब प्रस्ताव था कि प्रमुख नाजियों के बंगलों, फार्मों, कंपनी हेडक्वार्टर आदि को खास निशाना बनाया जाये। पर पूंजीवादी देशों के अमीर अभिजात वर्ग को डर था कि बदले में नाजी भी ऐसा ही करेंगे। दोनों एक दूसरे को बचा कर चलना बेहतर समझते थे।
याद आया क्योंकि अभी भी कुछ लिबरल लोगों ने कहा कि रूसी अमीरों के घर परिवार लंदन पेरिस मोनाको बार्सिलोना में हैं, उनके बैंक खातों से लेकर शानदार नौकाएं व ऐश्वर्य का समस्त साजोसामान नाटो देशों में है, तो उन्हें निशाना बनाया जाये, न कि आम लोगों को तकलीफदेह पाबंदियां।
पर पूंजीवाद ऐसे नहीं चलता।
महंगे लग्जरी सामान को पाबंदी से बाहर करवाया इटली ने, हीरा जवाहरात को बेल्जियम ने, तेल गैस को जर्मनी ने, आदि आदि। कुल मिलाकर पाबंदियां वही हैं जिनसे अमीरों को तकलीफ नहीं हो, रूस भी बदले में ऐसी ही पाबंदी लगा रहा है। बल्कि खबर है कि जर्मनी आदि ने पिछले दिनों में पहले के औसत से अधिक गैस रूस से खरीदी है। चीन ने भी रूस को समर्थन जरूर दिया पर कल पुतिन-शी चिनफिंग वार्ता का चीन द्वारा जारी सार बताता है कि पुतिन को चेता दिया गया है कि उक्रेन में लगी चीनी पूंजी का नुकसान न होने पाये। पाबंदियों से होने वाली परेशानियों को झेलना है मेहनतकश जनता को, कुछ हद तक मध्य वर्ग को।
इसीलिए पहले आशंका में गिरे शेयर बाजार वाले आश्वस्त हो गये कि उनके कारोबार व मुनाफे पर कोई आंच नहीं आने वाली, शेयर बाजार फिर से चढने लगे।
पूंजीवाद ऐसे चलता है!
कई लोग अक्सर मोदी को ‘चेतावनी’ देते मिलते हैं कि फासीवादी गिरोहों पर नियंत्रण रखे, नहीं तो हिंसा ‘अव्यवस्था’ से निवेशक चले जायेंगे। ये भोले लोग हैं या कुछ छिपे धूर्त भी। फासीवादी गिरोहों का खर्च तो चलता ही इन निवेशकों के पैसे से है क्योंकि इस हिंसा ‘अव्यवस्था’ से इन पूंजीवादी निवेशकों का मुनाफा और बढता है, घटता नहीं।
मजदूर वर्ग को भी इतना ही वर्ग सचेत हो, वैश्विक एकजुटता कायम करते हुए, सभी देशों के पूंजीवाद को उखाड फेंकना होगा।
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ये जो लोग उक्रेन से छात्रों को सुरक्षित लाने के लिए इतने चिंतित हैं, इन्होंने ये भी सोचना चाहिए कि इन छात्रों को उक्रेन चीन रूस जार्जिया न जाने कहां कहां जाना क्यों पडता है? इस देश में ऐसी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था क्यों नहीं है जो सभी छात्रों को यहीं शिक्षा हासिल हो सके? यहां शिक्षा इतनी महंगी क्यों है कि सिर्फ अमीरों के लिए आरक्षित हो गई है? जिन्हें यहां मौका नहीं मिलता वो इन देशों में जाकर खरीद लेते हैं, पर यहां सबके लिए समान सुलभ सार्वजनिक सार्वत्रिक शिक्षा व्यवस्था का विरोध करते हैं। तब इन्हें टैक्सपेयर का पैसा याद आता है। अब सरकार इन्हें लाने की व्यवस्था करेगी तो किसका पैसा लगेगा रे?
एकमात्र आरक्षण जिसका विरोध करना चाहिए वह यह अमीरों वाला आरक्षण है। पर ये लोग विरोध करते हैं अगर वंचितों उत्पीडितों के लिए थोडी सी भी सुविधा दी जाये। तब इन्हें मेरिट याद आती है, ये उक्रेन वगैरह में कौन सी मेरिट से जाते हैं भाई, पैसे की मेरिट से न?
खैर, फिर भी हम इनकी तरह अपने साथी इंसानों से नफरत नहीं करते, वो तो इनके प्रिय मोदी शाह टाटा अंबानी अदानी का काम है जो ऐसी तकलीफ में भी तीन गुना भाडा मांगते हैं। हम तो इंसानी हमदर्दी वाले हैं। सरकार करे इन्हें लाने की व्यवस्था, हम नहीं करेंगे विरोध, टैक्सपेयर्स के पैसे के नाम पर।

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