तीस्ता सीतलवाड़ के मुद्दे पर कांग्रेसियों की शह पर एनजीओ-जगत के टुकड़खोरों ने किया जनता का भरपूर मनोरंजन

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वाराणसीः देश के भावी कर्णधार योगी बाबा की यूपी स्थित भोले की नगरी काशी में कांग्रेसियों की शह पर एनजीओ-जगत के टुकड़खोरों ने तीस्ता सीतलवाड़ के मुद्दे पर 27 जून को शास्त्री-घाट पर गज़ब का मनोरंजक दृश्य उपस्थित किया। सर्व-धर्म प्रार्थना की नौटंकी के उपरांत न्यायपालिका की कथित निष्क्रियता और तीस्ता सीतलवाड़ की सरगर्मियों पर अगिया-बैताली भाषणवीरों ने उपस्थित पुलिस वालों का भी भरपूर मनबहलाव किया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार तीस्ता सीतलवाड़ की बनारस स्थित एजेंट-लाभार्थी मुनीज़ा खान ने इस विरोध-प्रदर्शन को आयोजित करने में अहम भूमिका निभाई। हिंदूवादी सरकार का हर मौके और हर बहाने से विरोध करने को तत्पर फादर आनंद मैथ्यू और उनकी टीम भी दस्तूर के हिसाब से रविवार को खूब सक्रिय दिखी। वर्तमान सरकार के काल में एनजीओ-जगत की फंडिंग पर पर्याप्त नकेल कसी जा चुकी है, इसी का नतीजा है कि वित्तीय-पूँजी के बिलबिलाए चाकर पब्लिक प्लेस पर भी आपस में धींगामुश्ती करने से बाज नहीं आते।
राष्ट्रपति के नाम संबोधित ज्ञापन एसडीएम को सौंपे जाने के उपरांत सभा विसर्जित ही होने वाली थी कि जागृति राही नामक स्वयंभू गाँधीवादी महिला ने पीवीसीएचआर के डॉ. लेनिन रघुवंशी की आरती उतारने का कार्यक्रम शुरू कर दिया। जागृति राही उवाचः “लेनिन रघुवंशी तुम एलआईयू की चमचागीरी बंद कर दो वर्ना बहुत बुरा होगा।” लेनिन रघुवंशी ने पहले तो प्रतिकार करना चाहा फिर इस बात का एहसास होते ही सकपका गए कि सामने स्त्री है। कसी हुई पटकथा के हिसाब से सीन में एंट्री मारते हुए जागृति राही के वाहन-चालक अनूप श्रमिक हाजिर हुए और उखाड़ने-पछाड़ने की धमकी देने लगे।
दलित पृष्ठभूमि से आने वाले अनूप श्रमिक का कष्ट यह है कि जाति के हिसाब से दलित एक्टिविस्ट होने का रुतबा और उस रुतबे से मिलने वाला पैसा तो उनका होना चाहिए लेकिन नव-दलित आंदोलन के नाम पर बाजी मार ले जाते हैं डॉ. लेनिन रघुवंशी। हमारा मोर्चा ने इस मौके की जो तस्वीरें खींची हैं उससे साफ पता चलता है कि तीस्ता की रिहाई की माँग करने वाले ज्यादातर एनजीओबाज और कांग्रेसी हैं। कभी मज़दूर-वर्गीय वैचारिकी के गंभीर अध्येता रहे सुनील सहस्त्रबुद्धे भी विरोध-प्रदर्शन में चार-चाँद लगाने के लिए मौजूद थे। बुनियादी मार्क्सवादी प्रस्थापनाओं और धार्मिक सुधार, पुनर्जागरण-प्रबोधन के हर बुद्धिसंगत नुक्ते का प्रति-तर्क सुनील सहस्त्रबुद्धे के पास मौजूद है। दो और दो चार होते हैं यह तो सर्वमान्य है लेकिन दो और दो बराबर पाँच बताने के लिए जितना द्रविड़-प्राणायाम करने की जरूरत पड़ती है वह सब सुनील सहस्त्रबुद्धे किए हुए हैं।
वर्गेतर सामाजिक आंदोलनों, मानवाधिकार आंदोलनों पर जारी अंतहीन बकवास के अंतर्य तक पहुँचने की कोशिश के क्रम में कुछ बुद्धिजीवियों की राय जानने का प्रयास किया गया। पक्के शराबी और धुर समाजवादी घूरेलाल का कहना है कि उनकी जानकारी के हिसाब से तीस्ता सीतलवाड़ सामाजिक कार्यकर्ता तो हैं लेकिन मज़दूर आंदोलन और उसकी वैचारिकी से उनका कोई लेना-देना नहीं। हम उनकी कास्ट और क्लास पर नहीं जाते लेकिन क्या सचेतन तौर पर उन्होंने इतिहास को आगे गति देने वाली ताकतों का पक्ष चुना है, इसका सीधा सा जवाब है कि नहीं। तो फिर तीस्ता कौन हैं और मज़दूरों को उनके पक्ष में क्यों लामबंद होना चाहिए? क्या मानवाधिकार कार्यकर्ता की कोई वर्गीय पक्षधरता नहीं होनी चाहिए?
प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के उत्तर प्रदेश सचिव और वर्तमान साहित्य के संपादक डॉ. संजय श्रीवास्तव ने कल इस मुद्दे पर फोन पर हुई बातचीत में कहा कि वर्ग-समाज में निरंतर टकराव होता रहता है। पूँजी के विभिन्न धड़ों के पैरोकार भी आपस में सतत संघर्षशील होते हैं। इन पैरोकारों को अपने असली मालिकों यानि कि पूँजीपति वर्ग के सामने यह सिद्ध करना होता है कि उसके हितों की वे बेहतर ढंग से रखवाली कर सकते हैं। निष्क्रिय उग्र-परिवर्तनवादी जनोत्तेजकों के आह्वान पर कैरियर-नौकरी सब कुछ दाँव पर लगा देने के प्रच्छन्न प्रश्न पर उन्होंने कहा कि किंचित खा-कमा रहे मध्यवर्ग के चिंतनशील तबके को क्या आत्मघाती कदम उठाते हुए बेरोजगारों की फौज में शामिल हो जाना चाहिए? आगे उन्होंने खुद ही स्पष्ट किया कि विद्रोह किसी के लिए भी विकल्प नहीं होता। निर्विकल्प ही विद्रोही होता है और वह होगा मज़दूर वर्ग।
गँजेड़ियों के समाज में बेहद लोकप्रिय लोकनाथ गायक (बदला हुआ नाम) कहते हैं कि खलिहर, श्रमविरत, धंधेबाज अपनी मूल प्रकृति में जनशत्रु ही होते हैं फिर भले ही वे चोला सामाजिक कार्यकर्ता का क्यों न धारण किए हुए हों। शामिल-बाजा के प्रत्येक किरदारों की लिस्ट एलआईयू के लोगों के पास होती है। बस प्रसंगवश, मुझे यानि कि इन पंक्तियों के लेखक कामता प्रसाद को इस कार्यक्रम की सूचना बीसीएम के अनुपम कुमार की फेसबुक वॉल से मिली थी। हालांकि वे लोग इस तमाशे के दर्शक नहीं बने।
निर्माण मज़दूर राम जियावन की राय थी कि क्रांतिकारी वाम को अपनी विफलता को छिपाने के लिए एनजीओबाजों, वित्तीय पूँजी के टुकड़खोरों और चुनावबाजों के साथ गलबहियाँ डालना तत्काल बंद कर देना चाहिए। अगर तुम्हारे पास अभी लोग नहीं हैं और अगर तुम्हारी कोई ताकत नहीं है तो इस बात को स्वीकार करो और जनता के बीच भ्रम पैदा करने से बचो। कार्यपालिका अगर भ्रष्ट है, विधायिका अगर पूँजी की चेरी है तो न्यायपालिका का भी भरण-पोषण मज़दूरों से निचोड़े जाने वाले अधिशेष से ही तो होता है। बिना श्रम किए जिन लोगों को समस्त ऐशो-आराम की सुविधा पूँजीपति वर्ग देता है, उन्हें वह अपने हितों की सेवा में तो लगाएगा ही लगाएगा। इसी भाँति मीडिया स्टेट का चौथा खंभा होता है, डेमोक्रेसी का नहीं क्योंकि वर्ग समाज में निरपेक्ष डेमोक्रेसी जैसी कोई चीज नहीं होती। क्या राहुल गाँधी-तीस्ता सीतलवाड़ और किसी गरीब आदिवासी को एक जैसे लोकतांत्रिक अधिकार हासिल हैं?

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