तेभागा, तेलंगाना व नक्सलबाड़ी लाल सलाम… लाल सलाम

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वो डरते हैं कामरेड!
तमाम कायदे कानून तोड़ने से
आपके संघर्ष को जुबां पे लेने से
आपका त्याग संघर्ष वो बलिदान
नहीं है उन लोगों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण
वो भले ही अपने नारों में
तेभागा, तेलंगाना व नक्सलबाड़ी
लाल सलाम… लाल सलाम का नारा
अपने टोली में बड़ी ऊंची आवाज में लगाता हो
यहां तक कि अपने कामरेड की शहादत पर
लाल फरेरी तेरी कसम
खून का बदला खून से लेंगे
गगन भेदी नारे
हवा में मुठ्ठी ताने हुए
जरूर चिल्लाते हैं
लेकिन ये सबकुछ वो उन दायरों में ही करना चाहते हैं
जहां तक संवैधानिक उन्हें छूट मिली हुई है
आप तो कामरेड
उन संवैधानिक दायरों को
शोषित-पीड़ित जन के लिए
तोड़ के कब ही आगे बढ़ चुके
इसलिए तो उन फरेब नारे बजों से
उम्मीद करना बेईमानी ही होगी
कि आपके ऊपर जेल में हो रही
यातनाओं के पक्ष में
अपनी आवाज उठायेंगे
ये उम्मीद तो करना बेईमानी ही होगा
जो नक्सलबाडी के शहीदों के खून के साथ समझौता किया
शीला मरांडी व प्रशांत बोस उर्फ किसन दा भाकपा(माओवादी) पार्टी के केन्द्रीय सदस्य व पोलित ब्यूरो सदस्य हैं। दोनों सहजीवन साथी भी हैं। दोनों वरिष्ठ साथी हैं जो गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हैं। झारखंड के जेल में तीन महीनों से कैद हैं, जहां विभिन्न ऐजेंसी के लोग दो-तीन दिन में आके पुछताछ करते हैं और मानसिक टॉर्चर भी किया जा रहा है ना तो मानवाधिकार व पत्रकार साथियों से मिलने की इजाजत दिया जा रहा है ना इन्हें उचित ईलाज करवाने के लिए रिम्स या एम्स में भर्ती करवाया जा रहा है। यहां तक कि ठीक ढंग से चल पाने में भी अस्वस्थ हैं। जबकि एक राजनीतिक पार्टी होते हुए दोनों साथियों के साथ राजनीतिक बंदी का तरह व्यवहार भी नहीं किया जा रहा है। जो इस व्यवस्था का मानवीय क्रूरता उजागर हो रहा है। ये व्यवस्था आखिर इन दोनों वरिष्ठ साथियों से इतना खौफ क्यों खा रहे हैं कि एक अस्वस्थ व्यक्ति को जेल के अंदर भी सेल में बंद करके यातना दी जा रही है। हो सकता है कि इन दोनों साथियों व इनके पार्टियों के साथ देश के तमाम वामपंथी पार्टी व प्रगतिशील साथियों को वैचारिक मतभेद हो, लेकिन क्या सरकार के द्वारा जेल में जिस तरह से यातनाएं दी जा रही है, उस पर तमाम संवेदनशील साथियों का खामोशी आखिर क्या साबित करता है। आप इस लिए डर रहे हैं कि ये पार्टी हमारे यहां प्रतिबंधित पार्टी है, इसलिए अगर हम इनके पक्ष में आवाज उठायेंगे तो हम भी संवैधानिक दायरे का उल्लंघन कर देंगे और हमें भी नक्सली, माओवादी व देशद्रोही का ठप्पा ये क्रूर व्यवस्था लगा देगा। क्या आपके लिए मानवता से बढ़कर ये काले कानून व मानव विरोधी ये व्यवस्था पसंद है। अगर आप मानवता के पक्ष में खड़ा नहीं हो सकते हैं तो आप शोषक के खिलाफ कितना तन के खड़ा हो सकते हैं।
प्रेसिडेंसी जेल, कोलकाता की एक कोठरी की दीवार पर लिखी इस कविता को नक्सलबाड़ी विद्रोह के दौरान संभवतया एक छात्र ने लिखा था
शांति!
यहां सो रहा है मेरा भाई
उसके पास मत खड़े हो
जर्द चेहरे और उदास दिल के साथ
वो तो एक हंसी है, मत ढको उसकी देह को फूलों से
फूल पर फूल चढ़ाने का क्या अर्थ
अगर कर सको
दफन कर लो उसे अपने हृदय में
तब तुम पाओगे
हृदय के पक्षी की चहचहाहट जाग उठी है
जाग उठी है तुम्हारी सुषुप्त आत्मा
अगर बहा सकते हो तो
बहाओ कुछ आंसू
और अपनी देह का सारा खून

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