इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है

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शहीद-ए-आजम भगतसिंह

डाॅ. दिनेश पाल

सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग

जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा

“पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की

तलवार विचारों की सान पर तेज होती है” – भगतसिंह

उपर्युक्त पंक्ति दिल्ली अदालत के निर्णय की आलोचना करते हुए, जनवरी 1930 में उच्च न्यायालय में भगत सिंह ने कहा था। यह कथन हमेशा प्रासंगिक बना रहेगा क्योंकि बिना वैचारिक मजबूती के क्रांति या आंदोलन कारगर नहीं हो सकते। भागतसिंह एक क्रांतिकारी के साथ- साथ एक विचारक, दार्शनिक व चिंतक भी थे।

‘भगतसिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज‘ के संपादक ‘चमन लाल जी’ भगतसिंह को भारतीय क्रांतिकारी चिंतन का प्रतीक मानते हुए लिखते हैं- “अपने सात वर्ष के अल्पकालिक तूफानी बाज़ जैसे क्रांतिकारी कार्यकर्ता, संगठनकर्ता, चिंतक और लेखक के रूप में भगतसिंह ने जो भूमिका निभाई और जिस शान व आन के साथ उसने 23 माचर्, 1931 को शहादत के लिए फांसी का रस्सा गले में पहना, इसकी मिसाल भारत में ही नहीं, दुनिया में भी बहुत कम मिलती है, और इसीलिए भगतसिंह न केवल भारतीय क्रांतिकारी चिंतन के प्रतीक बने हैं, आने वाले समय में वे विश्व की क्रांतिकारी परंमरा के महत्वपूर्ण नायक के रूप में भी अपना उचित स्थान प्राप्त करेंगे।”1

भगतसिंह के भीतर क्रांति का बीज परिवार के आँगन में बचपन में ही पड़ गया था, जिसे तात्कालीन परिस्थिति और उनके अध्ययन ने उसे पुष्पित-पल्लवित किया। उनका जन्म पंजाब प्रांत के लायलपुर जिला में (अब पाकिस्तान में) 28 सितम्बर, 1907 को एक जाट परिवार में हुआ। कुछ विद्वान 19 अक्टूबर, 1907 मानते हैं, लेकिन ज्यादातर विद्वानों की सहमति 28 सितम्बर पर ही है। उनके पिता का नाम ‘सरदार किशन सिंह संधू‘ और माता का नाम ‘विद्यावती कौर‘ था। पिता किशन सिंह काँग्रेस पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता थे। भगत सिंह के दादा का नाम ‘अर्जुन सिंह संधू‘ था, जो आर्यसमाज से जुड़ने के कारण कुछ हद तक तार्किक स्वभाव के थे। उनके सबसे छोटे चाचा ‘स्वर्ण सिंह‘ भी क्रांतिकारी व्यक्ति थे, जो 1910 में जेल यातनाओं से शहीद हुए।

भगत सिंह बचपन के चार साल की पढ़ाई अपने पैतृक गाँव बंगा चक्क न. 105 गुगैरा ब्रांच (अब पाकिस्तान में) में पूरी किये और आगे की पढ़ाई हेतु पिता जी के साथ लाहौर चले गए। तब लाहौर में स्वतंत्रता सेनानी व क्रांतिकरियों के कीर्तिमान गूंज रहे थे। किशोरावस्था में ही इनके चेतना के बीजों से विचारों का प्रस्फुटन दिखने लगा था। भगत सिंह के पत्र, लेख एवं जेल की डायरी आज भी क्रांतिकारियों के लिए इस्पाती दस्तावेज हैं, जिसमें परिपक्व चिंतनशील विचारों का संग्रह है। उन्होंने पहला पत्र 22 जुलाई, 1918 को लाहौर से अपने दादा अर्जुन सिंह को उर्दू में लिखा था, तब वे छठी कक्षा में पढ़ रहे थे।

भगत सिंह अपना आदर्श व प्रेरणा स्रोत ‘शहीद कर्तारसिंह सराभा’ को मानते थे। वे हमेशा कर्तार सिंह की फोटो अपने पास रखते थे। कहते थे कि ‘यह मेरा गुरु, साथी व भाई है‘। जब 19 वर्ष की युवा अवस्था में 16 नवम्बर, 1915 को कर्तार सिंह सराभा को फाँसी दिया गया तब भगत सिंह की उम्र मात्र आठ वर्ष थी। 1896 में गाँव सराभा, जिला लुधियाना में जन्मे कर्तार सिंह हँसते हुए फाँसी पर चढ़े थे। अमृतसर, पंजाब में 13 अप्रैल, 1919 को हुए जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड ने तो भगत सिंह को पूरा झकझोर कर रख दिया। मात्र बारह वर्ष की आयु में ही 12 मील पैदल चलकर जलियांवाला बाग रक्तरंजीत मिट्टी लेने पहुँच गए। 1922 में चैरी-चैरा काण्ड के बाद पंद्रह वर्ष की अल्पायु में ही उनका काँग्रेस व महात्मा गाँधी से पूरी तरह मोहभंग हो गया था, जबकि उनके पिता जी काँग्रेस पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता थे। सन् 1923 में भगत सिंह, नेशनल कालेज, लाहौर के छात्र थे। क्रांतिकारी अध्यापकों एवं साथियों से ऐसा नाता जुड़ा कि मात्र सोलह साल की आयु में घर को अलविदा कहने का निर्णय ले लिया। उधर घर में दादी जी अपने लाडले पोते के शादी की बात छेड़े हुई थीं, तबतक इधर से पिता जी के नाम पत्र पहुँच गया, जिसमें लिखा था-

“ पूज्य पिता जी,

नमस्ते!

मेरी जिन्दगी मकसदे आला (उच्च उद्देश्य) यानी आज़ादी-ए-हिन्द के असूल (सिद्धान्त) के लिए वक्फ (दान) हो चुकी है। इसलिए मेरी जिन्दगी में आराम और दुनियावी खाहशात (सांसारिक इच्छाएँ) बायसे कशिश (आकर्षक) नहीं हैं।

आपको याद होगा कि जब मैं छोटा था, तो बापू जी ने मेरे यज्ञोपवीत के वक्त ऐलान किया था कि मुझे खिदमते वतन (देश-सेवा) के लिए वक्फ कर दिया गया है। लिहाजा मैं उस वक्त की प्रतिज्ञा पूरी कर रहा हूँ।

उम्मीद है आप मुझे माफ फरमाएंगे।

आपका ताबेदार

भगतसिंह”2

लाहौर के नेशनल काॅलेज की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने देश की आजादी के लिए 1926 में ‘नौजवान भारत सभा‘ का गठन किया। भगतसिंह और भगवतीचरण वोहरा ने इस संगठन को मजबूत करने के लिए अधिक से अधिक युवाओं को जोड़ने लगे। इसी बीच 09 अगस्त 1925 को घटित हुए काकोरी काण्ड के मुकदमे का सजा सुनाया गया, जिसमें रामप्रसाद ‘बिस्मिल‘, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, रोशन सिंह और अशफाक उल्लाह खाँ को फाँसी की सजा सुनाई गयी और साथ ही अन्य 16 लोग को आजीवन कारावास की सजा हुई। इन चारों क्रांतिकारियों के सजा-ए-मौत का असर भगतसिंह पर गहरा पड़ा। अंग्रेजों को भगाकर देश की आजादी के लिए भगतसिंह के जोश व जुनून में और इजाफा हुआ। 8-9 सितम्बर 1928 को अपने नेतृत्व में चला रहे ‘नौजवान भारत सभा‘ का विलय चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में चल रहे ‘हिन्दुस्तान प्रजातांत्रिक संघ‘ में कर दिया और नया नाम दिया गया- ‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक संघ‘। हिसप्रस का एक सशक्त अंग बनाया गया, जिसका नाम रखा गया- ‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना‘ और इस सेना के कमांडर इन चीफ ‘चन्द्रशेखर आजाद‘ को बनाया गया। देश के लिए सेवा, त्याग और पीड़ा सहन कर सकने वाले युवा तेजी से इस संगठन के साथ जुड़ने लगे। चन्द्रशेखर आजाद का सह मिलने और सुखदेव आदि क्रांतिकारी साथियोें का साथ मिलने से भगतसिंह और साहस के साथ क्रांति करने लगे।

साइमन कमीशन का बहिष्कार विशाल प्रदर्शन के साथ लगभग पूरे भारत में किया गया, जिसमें सर्वाधिक विशाल प्रदर्शन अक्टूबर 1928 में लाहौर में लाला लाजपत राय के नेतृत्व में हुआ। 30 अक्टूबर 1928 को ब्रिटिश पुलिस द्वारा लाला लाजपत राय पर जमकर लाठियाँ बरसाई गईं, जिससे उन्हें काफी शारीरिक व मानसिक चोट पहुँची और 17 नवम्बर 1928 को उनका देहांत हो गया। लाला जी से वैचारिक असहमति के बावजूद इस हत्या को भगतसिंह ने ‘राष्ट्रीय अपमान‘ मानते हुए बदला लेने का फैसला किया। लाला लाजपतराय की हत्या के ठीक एक माह बाद 17 दिसम्बर 1928 को करीब सवा चार बजे लाहौर पुलिस मुख्यालय के सामने पुलिस सुपरिन्टेंडेंट जे॰पी॰ साॅण्डर्स के आते ही राजगुरु ने एक गोली सीधे उसके सर में मार जमीन पर गिड़ा दिया, जिसके तुरन्त बाद भगतसिंह ने दनादन 3-4 गोली दाग कर उसे मौत की नींद सुलाकर भाग निकले। इनका पीछा करने के कारण भारतीय सिपाही चन्नण सिंह को चन्द्रशेखर आजाद के गोली का शिकार होना पड़ा। 18 दिसम्बर 1928 को सुबह लाहौर में हर तरफ पोस्टर लग गए, जिसमें हिसप्रस की ओर से लाला लाजपतराय की हत्या का बदला लेने का दावा था। भगतसिंह दृढ़ निश्चयी थे, जो ठान लिया वो पूरा करके ही मानते थे। साॅण्डर्स को मारने के बाद भगतसिंह अपनी हुलिया बदलकर दुर्गा भाभी, शची एवं राजगुरु के साथ लाहौर से कलकत्ता पहुँचे।

8 अप्रैल 1929 को केन्द्रीय असेम्बली में ‘पब्लिक सेफ्टी बिल‘ तथा ‘टेªड डिस्प्यूट्स बिल‘ के खिलाफ धमाका करने को निर्णय लिया गया। इसे अंजाम देने हेतु भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त का नाम चुना गया। तय किया गया कि बम फेंक कर भागना नहीं है बल्कि गिरफ्तारी देनी है, साथ ही यह भी निश्चित किया गया था कि इस धमाके का मकसद किसी को हताहत करना नहीं, बल्कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद का कान खोलना था। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 8 अप्रैल, 1929 को केन्द्रीय असेम्बली में एक ऐसे जगह पर बम फेंका गया जहाँ कोई मौजूद नहीं था। पूरा हाॅल धुआँ भर गया, लेकिन कोई भी गंभीर रूप से घायल नहीं हुआ। यह एक ऐसा क्रांतिकारी व राजनीतिक विस्फोट था कि इसकी गुंज सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में सुनाई पड़ी। बम फटते ही उन्होंने ’इंकलाब जिन्दाबाद!, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!‘ का नारा लगाया और अपने साथ लाये हुए पर्चे हवा में उछाल दिया। आगे चलकर यही नारा क्रांतिकारियों के लिए सूत्र वाक्य हो गया। ‘इंकलाब जिन्दाबाद‘ आज भी हर आन्दोनल में जोश भरने का काम करता है और आगे भी करता रहेगा। बम विस्फोट के बाद दोनों क्रांतिकारी भागने की बजाय खाकी कमीज तथा निकर पहने बैठे रहे। कुछ ही देर बाद पुलिस आ गयी और दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया। ऐसा नहीं था कि भगतसिंह पहली बार गिरफ्तार हुए थे, इससे पहले भी लगभग बीस वर्ष की उम्र में मई 1927 में उनकी गिरफ्तारी हो चुकी थी, जिसका संबंध अक्टूबर 1926 में दशहरा मेेले में हुए बम विस्फोट से था।

शहीद-ए-आजम जेल में जाने के बाद भी टूटे नहीं बल्कि वहाँ अच्छे से अपने मिशन को और धार देने में लग गए। जेल में भगतसिंह और उनके साथियों द्वारा 64 दिनों तक भूख हड़ताल किया गया, जिसमें यतीन्द्रनाथ दास को अपनी शहादत भी देनी पड़ी। यतीन्द्रनाथ की शहादत के बाद सड़कों पर जनसैलाब उमड़ आया। जेल में रहते हुए भगतसिंह ने अध्ययन और लेखन का काम तेज कर दिया। उनके किशोरावस्था में जिस चेतना का अंकुरण हुआ था उसे पल्लवित-पूष्पित करने का भरपूर मौका मिला और इसके साक्षी हैं उनके द्वारा लिखे गए लेख एवं जेल नोटबुक। चमन लाल लिखते है कि “भगतसिंह की जेल नोटबुक में विश्व भर के 107 लेखकों व 43 पुस्तकों के शीर्षक दर्ज हैं। दो रिपोर्टों- मोंटफोर्ड रिपोर्ट व साईमन रिपोर्ट का भी जिक्र है।”3

भगतसिंह के चेतना की पहली झलक ‘पंजाब की भाषा और लिपि की समस्या‘ लेख से मिलती ह,ै जो कि 1924 में पंजाब हिन्दी साहित्य सम्मेलन के आमंत्रण मर लिखा था, जिसमें 50रु का इनाम भी मिला। मात्र 17 साल की उम्र में एक चिंतक व दार्शनिक की तरह वैचारिक लेख लिखने लगे थे। 15 नवम्बर एवं 22 नवम्बर, 1924 को ‘मतवाला‘ पत्रिका के दो अंकों (वर्ष: 2 अंक सं. 13-14) में ‘बलवन्तसिंह‘ छद्म नाम से ‘विश्व प्रेम‘ शीर्षक से लेख लिखकर जो अपना वैश्विक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है, वह काबिल-ए-तारिफ है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम!्‘ तथा ‘विश्वबन्धुता!‘ को अमूल्य कल्पना मानते हैं। वाकई यह आदर्शवादी कल्पना सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन यथार्थ में जो इसकी स्थिति है, वह सवाल के घेरे में है। जिस देश में जाति, धर्म, रंग एवं क्षेत्र के आधार पर भेदभाव होता हो, भला वह देश ‘वसुधैव कुटुम्बकम!्‘ तथा ‘विश्वबन्धुता!‘ जैसे सपने को साकार कैसे कर सकता है। भगतसिंह ‘विश्व-प्रेम‘ में लिखते हैं- “अहंकारियों का अहंकार तोड़ उन्हें नम्रता करनी होगी। निर्बलों को बल, पराधीनों को स्वाधीनता, अशिक्षितों को शिक्षा, निराशावादियों को आशा की आभा, भूखों को रोटी, बेघरों को घर, नास्तिकों को विश्वास, अन्धविश्वासियों को विचार-स्वतंत्रता देनी होगी। क्या लोग इतना काम करेंगे। ऐ विश्वबन्धुता चिल्लानेवालो। क्या तुम उसके लिए तैयार हो?………. जब तक काला-गोरा, सभ्य-असभ्य, शासक-शासित, धनी-निर्धन, छूत-अछूत आदि शब्दों का प्रयोग होता है तब तक वहाँ विश्वबन्धुता और विश्वप्रेम? यह उपदेश स्वतंत्र जातियाँ कर सकती हैं। भारत-जैसी गुलाम जाति इसका नाम नहीं ले सकती।”4

युवकों के बीच यदि कोई सर्वाधिक चहेता स्वतंत्रता सेनानी रहा है, तो वो हैं- भगतसिंह। अपने समय से लेकर आज तक युवाओं के दिल में जगह बनाए हुए हैं और आगे भी बना रहेगा। अफसोस इस बात का है कि आज के ज्यादातर युवा भगतसिंह को आदर्श मानने के बावजूद उनके विचार व चिंतन से अनभिज्ञ रहते हैं। इसका मूल कारण है, अध्ययन से कतराना। युवाओं को यह गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि अध्ययन व लेखन के बिना वह विचारवान नहीं हो सकता है और विचारविहीन जीवन पशुता के समान है। आज हमारे यहाँ युवाओं की संख्या ज्यादा ह,ै इसलिए भारत युवाओं का देश कहलाता है। आज से पंचानबे साल पहले ‘मतवाला‘ (वर्ष: 2, अंक: 38, 16 मई, 1925) में ‘युवक!‘ शीर्षक से लेख प्रकाशित हुआ था, जिसके लेखक थे, ‘बलवन्तसिंह‘। ‘बलवन्तसिंह‘ छù नाम से भगतसिंह ने कई लेख लिखा है। ‘युवक‘ लेख में युवाकाल को भगतसिंह ने बड़े ही मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से चित्रित किया हैै, जो कि आज के युवाओं के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है। वे युवावस्था का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करते हुए लिखते हैं कि “युवावस्था मानव-जीवन का वसन्तकाल है।………. जैसे क्रांतिकारी के जेब में बमगोला, षड्यंत्री की असटी में भरा-भराया तमंचा, रण-रस-रसिक वीर के हाथ में खड्ग, वैसे ही मनुष्य की देह में युवावस्था। 16 से 25 वर्ष तक हाड़-चाम के सन्दूक में संसार-भर के हाहाकारों को समेटकर विधाता बन्द कर देता है।……… चाहे तो त्यागी हो सकता है युवक, चाहे तो विलासी बन सकता है युवक। वह देवता बन सकता है, तो पिशाच भी बन सकता है। वही संसार को त्रस्त कर सकता है, वही संसार को अभयदान दे सकता है। संसार में युवक का ही साम्राज्य है। युवक के कीर्तिमान से संसार का इतिहास भरा पड़ा है।”5

अपने यहाँ शुरू से कुछ लोगों का मानना रहा है, कि विद्यार्थियों को राजनीति से पूर्णतः दूर रह कर पढ़ाई करना चाहिए। ऐेसे मासूम उपदेशक आज भी देखने को मिल ही जाते हैं, खासकर  विश्वविद्यालयों में जब विद्यार्थी आन्दोलन करते हैं। जब कोई विद्यायक या मंत्री आता है तो विद्यार्थियों को बुलाकर स्वागत में लग जाते हैं, उसका भाषण भी सुनते हैं तब राजनीति नहीं लगती लेकिन कोई सत्ता के खिलाफ व व्यवस्था के खिलाफ भाषण देता है या आवाज उठाता है तो उसे राजनीति कहने लगते हैं। मतलब उनके अनुसार सत्ताधारी नेताओं की खुशामद करना राजनीति नहीं और सवाल करना राजनीति है।  जुलाई, 1928 में ‘किरती‘ में ‘विद्यार्थी और राजनीति‘ नाम से छपे लेख में भगतसिंह लिखते हैं कि “जिन नौवजवानों को कल देश की बागडोर हाथ में लेनी है, उन्हें आज अक्ल के अन्धे बनाने की कोशिश की जा रही है।……. यह हम मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है, उन्हें अपना पूरा ध्यान उस ओर लगा देना चाहिए लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार सोचने की योग्यता पैदा करना उस शिक्षा में शामिल नहीं? यदि नहीं ंतो हम उस शिक्षा को भी निकम्मी समझते हैं, जो सिर्फ क्लर्की करने के लिए ही हासिल की जाए। ऐसी शिक्षा की जरूरत ही क्या है?”5

भगतसिंह का सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर चिंतन जबरदस्त है। आज भी अध्येता ठहर कर मंथन करने को मजबूर हो जाता है। जून, 1928 में ‘किरती‘ में ‘विद्रोही‘ छù नाम से भगतसिंह का लेख छपा था, जिसका शीर्षक था- ‘अछूत समस्या’। इसमें लिखते हैं कि  “हमारे देश-जैसे बुरे हालात किसी दूसरे देश के नहीं हुए। यहाँ अजीब-अजीब तरह के सवाल उठते रहते हैं। एक अहम सवाल अछूत-समस्या है। समस्या यह है कि 30 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में जो 6 करोड़ लोग अछूत कहलाते हैं, उनके द्वारा पानी निकालने से कुआँ अपवित्र हो जाएगा। ये सवाल बीसवीं सदी में किए जा रहे हैं, जिन्हें सुनते ही शर्म आती है।…… कितनी शर्म की बात होती। कुत्ता हमारी गोद में बैठ सकता है। हमारी रसोई में सवतंत्र फिरता है, लेकिन एक इन्सान का हमसे स्पर्श हो जाए तो बस धर्म भ्रष्ट हो जाता है। इस समय मदन मोहन मालवीय जी जैसे बड़े समाज सुधारक, अछूतों के बड़े प्रेमी और न जाने क्या-क्या, पहले एक मेहतर के हाथों अपने गले में हार डलवा लेते हैं, लेकिन बाद में कपड़ों सहित स्नान किये बिना स्वयं को अशुद्ध समझते हैं। क्या खूब यह चाल है!…….. पशुओं की हम पूजा कर सकते हैं, लेकिन इन्सान को पास नहीं बिठा सकते।……..अक्सर यह कहा जाता है कि वह साफ नहीं रहते। इसका उत्तर साफ है कि वे गरीब हैं, इसलिए उनकी गरीबी का इलाज करो। सफाई और शिक्षा सब आ जाएगी। ऊँची- ऊँची जातियों के गरीब लोग भी कोई कम गन्दे नहीं रहते। गन्दे काम करने का बहाना भी नहीं चल सकता, क्योंकि माताएँ बच्चों का मैला साफ करने से मेहतर तथा अछूत तो नहीं हो जातीं।”6 अफसोस की बात यह है कि आज सौ साल बाद भी यह विकराल समस्या मौजूद है, जबकि आजाद देश में इसके खिलाफ कई कानून भी बन चुके हैं, फिर भी घृणित मानसिकता के लोग बेशर्मी से छुआछूत करते हैं।

वर्तमान समय में देश की साझी विरासत खतरे में आ गई है। कुछ नेता और पत्रकार साम्प्रदायिकता की फसल काटने में लगे हुए हैं। नेता धर्म के नाम पर वोर बटोर रहे हैं, तो पत्रकार टीआरपी। किसी भी समाज में साम्प्रदायिकता मानवता लिए जहर जैसी होती है। साम्प्रदायिकता का दंश आम जनता को झेलना पड़ता है। जून, 1928 के ‘किरती‘ में प्रकाशित ’साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज‘ लेख आज के गोदी मीडिया के लिए विशेष रूप से अनुकरणीय है। भगतसिंह अपने समकालीन प्रिंट मीडिया पर लिखते हैं कि “अखबारों का असली कत्र्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेलमिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था, लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कत्र्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आँखों से रक्त के आँसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता हैं कि ‘भारत का बनेगा क्या?‘”7

भगतसिंह का सर्वाधिक चर्चित लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ?‘ रहा है। वास्तव में नास्तिक होने से उनके कुछ साथी घमण्डी व अहंकारी कहने लगे थे, जिसके जवाब में उन्होंने यह लेख लाहौर जेल में रहते हुए लिखा था। यह लेख पहली बार लाहौर से छपने वाले साप्ताहिक अखबार ‘द पीपुल’ में 27 सितंबर, 1931 को छपा। इस लेख में उन्होंने तथाकथित सर्वशक्तिमान ईश्वर की उपस्थिति पर तर्क, विवके, विज्ञान व समाज की खुशहाली से जुड़े तमाम सवाल खड़े किए हैं। साथ ही सृष्टि के निर्माण, मनुष्य की उत्पत्ति, मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना, धर्म की ओट में ईश्वर का डर व लूट-खसोट, समाज में व्याप्त गरीबी एवं शोषण आदि पर गंभीर विचार दिए हैं। अंग्रेजी हुकूमत के संदर्भ में लिखते हैं- “अंग्रेजों की हुकूमत यहाँ इसलिए नहीं है कि ईश्वर चाहता है, बल्कि इसलिए है कि उनके पास ताकत है और हममें उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं। वे हमें अपने प्रभुत्व में ईश्वर की सहायता से नहीं रखे हुए हैं बल्कि बन्दूकों, राइफलों, बम और गोलियों, पुलिस और सेना के सहारे रखे हुए हैं। यह हमारी उदासीनता है कि वे समाज के विरुद्ध सबसे निन्दनीय अपराध, एक राष्ट्र द्वारा अत्याचारपूर्ण शोषण सफलतापूर्वक कर रहे हैं। कहाँ है ईश्वर? वह क्या कर रहा है? क्या वह मनुष्य जाति के इन कष्टों का मजा ले रहा है? वह नीरो है, चंगेज है, तो उसका नाश हो।”8 अपने ‘अराजकतावाद-1‘ में तो लिखते हैं कि “हम छुटपन से बच्चों को यह बताना शूरू कर देते हैं कि सबकुछ भगवान है, मनुष्य तो कुछ भी नहीं। अर्थात् मिट्टी का पुतला है। इस तरह के विचार मन में आने से मनुष्य में आत्मविश्वास की भावना मर जाती है। उसे मालूम होने लगता है कि बहुत निर्बल है। इस तरह वह भयभीत रहता है। जितने समय यह भय मौजूद रहेगा उतनी देर पूर्ण सुख और शान्ति नहीं हो सकती।”9

भगतसिंह तमाम वैचारिक लेख और पत्र के अलावे मदनलाल ढींगरा, सूफी अम्बाप्रसाद, बलवंत सिंह, मथुरा सिंह एवं कर्तार सिंह सराभा आदि जैसे अपने अग्रज व आदर्श क्रांतिकारियों के परिचय भी लिखे हैं, जो ‘किरती‘ और ‘चाँद‘ (फाँसी अंक: नवम्बर, 1928) में प्रकाशित हुआ था। शिव वर्मा सहित कई लेखकों का मानना है कि भगतसिंह के ‘समाजवाद का आदर्श’, ‘आत्मकथा’, ‘भारत में क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास’ एवं ‘मौत के दरवाजे पर’ शीर्षक से लिखित पांडुलिपियाँ रहस्यमय ढ़ंग से गायब हैं।

26 अगस्त, 1930 को अदालत द्वारा भगत सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 129, 302 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा-4 व 6 एफ तथा आईपीसी की धारा 120 के अंतर्गत अपराधी सिद्ध किया गया। 7 अक्टूबर, 1930 को अदालत द्वारा 68 पृष्ठों के फैसले में  भगतसिंह, सुखदेव एवं राजगुरु को सजा-ए-मौत सुनाया गया। सजा माफी के लिए तमाम अपील दायर किये गए, जबकि भगतसिंह सजा-माफी बिल्कुल नहीं चाहते थे। सजा सुनाने से मात्र तीन दिन पहले 4 अक्टूबर, 1930 को अपने पिता का पत्र लिख चुके थे कि आप मेरे साथ सलाह-मशविरा किए बिना मेरे बचाव हेतु आवेदन कैसे दे दिए। अपने फाँसी पर लटकाये जाने से मात्र तीन दिन पहले 20 मार्च, 1931 को भगतसिंह, राजगुरु एवं सुखदेव ने पत्र लिखकर अनुरोध किया कि हमें फाँसी पर लटकाये जाने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाए। फाँसी से मात्र एक दिन पूर्व 22 मार्च, 1931 को ‘बलिदान से पहले साथियों को अंतिम पत्र’ में लिखते हैं कि “दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिन्दुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगतसिंह बनने की आरजू किया करेंगी और देश की आजादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी।”10 भगतसिंह पढ़ने के इतने आदि थे कि फाँसी के वक्त ‘रिवाॅल्युशनरी लेनिन’ किताब पढ़कर कमरे से निकले। भगतसिंह अपने क्रांंितकारी साथी सुखदेव और राजगुरु के साथ हँसते तथा देशभक्ति गीत गाते हुए, 23 मार्च, 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर लाहौर के सेंट्रल जेल में फाँसी पर चढ़ गए।

 

संदर्भ सूची-

  1. भगतसिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज, सं. चमन लाल, आधार प्रकाशन प्रा. लि., हरियाणा, 2018, पृ. सं. 13
  2. वही, पृ. सं. 38
  3. वही, पृ. सं. 24-25
  4. वही, पृ. सं. 48, 50
  5. मैं नास्तिक क्यों हूँ? और अछूतों के सवाल, भगतसिंह, बुद्धम् पब्लिशर्स, जयपुरए 2019, पृ. सं. 30
  6. वही, पृ. सं. 20, 21, 22, 23
  7. भगतसिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज, पृ. सं. 153
  8. वही, पृ. सं. 262
  9. वही, पृ. सं. 131
  10. वही, पृ. सं. 232
  11. विकिपीडियाडाॅ. दिनेश पालसहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग

    जय प्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा

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