वर्चस्ववादियों ने हमेशा झूठ रचा है

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वरिष्ठ मार्क्सवादी-आम्बेडकरवादी चिंतक, आलोचक, कवि, लेखक आर डी आनंद सर की बहुचर्चित पुस्तक “सुनो भूदेव” परिकल्पना प्रकाशन, दिल्ली से सन 2019 में प्रकाशित हुआ है। इसके प्रकाशक श्री शिवानंद तिवारी जी एक प्रगतिशील व्यक्ति हैं। अक्सर, आर डी आनंद सर को मार्क्सवादी कह कर दलित साहित्य से खारिज किया जाता है लेकिन जब मैं आनंद सर के दलितों के जीवन पर लिखी कविताओं को पढ़ती हूँ, तो मुझे कहीं से भी नहीं लगता है कि वे दलित अवधारणाओं के आधार पर एक परिपूर्ण दलित कवि नहीं हैं। हालाँकि, दलित जीवन के यथार्थ पर लिखने के लिए दलित होना जरूरी तो हो सकता है लेकिन जरूरी नहीं कि कोई मार्क्सवादी व्यक्ति दलित यथार्थ को नहीं लिख सकता है। इस तरह आनंद सर तो आम्बेडकरवादी भी हैं और मार्क्सवादी भी। आनंद सर दलित जीवन के भोगे हुए यथार्थ को तो लिख ही सकते हैं। दलित साहित्यकार चाहे तो उन्हें दलित साहित्यकार कह सकता है। हालाँकि, आनंद सर अपने को मार्क्सवादी साहित्यकार ही कहलवाना पसंद करते हैं लेकिन वे इस मत के साथ कट्टर नहीं हैं कि कोई दलित साथी उन्हें दलित साहित्यकार नहीं कह सकता है। उनका मानना है कि दलित साहित्यकार भले ही दलित साहित्य को प्रगतिशील व क्रान्तिकारी साहित्य मानता हो लेकिन आनंद सर का तर्क है कि दलित पैदा होना और दलित बने रहने में अंतर है। दलित ब्राह्मणवाद का चौथा वर्ण है इसलिए दलित साहित्य ब्राह्मणवाद का विरोध करते हुए भी ब्राह्मणवाद से प्रभावित और ग्रसित हैं। दलित साहित्य तभी प्रगतिशील माना जा सकता है जब वह ब्राह्मणवाद के अंतर्गत आने वाली सभी जातियों के उन्मूलन के लिए विचार रखे, कार्य करे और कोई ऐसा संगठन बनाए जहाँ लोग डिकास्ट करके ही जुड़ें, तभी वह साहित्य प्रगतिशील साहित्य हो सकता है। जब मैं आनंद सर की पुस्तक “सुनो भूदेव” पढ़ रही थी, मैं पुस्तक पढ़कर बहुत ही आश्चर्यचकित हुई। ऐसी कविताएँ या तो मलखान सिंह साहब ने लिखा है अथवा फिर आर डी आनंद सर ने ही लिखा है। “सुनो भूदेव” का नाम “सुनो ब्राह्मण” की तर्ज पर आनंद सर ने इसलिए दिया होगा क्योंकि ये कविताएँ मलखान सिंह साहब के क्रम की अगली कड़ी की कविताएँ हैं, ऐसा आनंद सर ने अपनी प्रस्तावना में भी लिखा है। आनंद सर की इस बात को उनकी “सुनो भूदेव” में प्रकाशित कविताएँ पुष्टि भी करती हैं।

इस संग्रह में सबसे पहले ब्राह्मणवाद पर “ब्राह्मणवाद” नाम की कविता ही छपी है। यह कविता सचमुच ब्राह्मणवाद को परिभाषित करती है:

ब्राह्मणवाद

ब्राह्मण के अर्थ में नहीं है
यह वर्ण-व्यवस्था है
जातिप्रथा है
क्रमिक गैर-बराबरी है
छूत-विचार है
ऊँच-नीच की भावना है।

(सुनो भूदेव, पेज 29)

इस संग्रह की दूसरी कविता “सुनो भूदेव” है जिसमें आनंद सर ने श्रेष्ठता और वर्चस्व की भावना से ग्रस्त ब्राह्मणों के ईश्वर, देवी, देवता, आत्मा, जन्म, पुनर्जन्म, प्रारब्ध, पाप, पुण्य, ऊँच, नीच, छुआ, छूत इत्यादि की सचेतन स्थापना और वेदों में लिखकर प्रमाणित करने के कुचक्र को व्यवस्थित ढंग से उघाड़ा है। विचित्र बात है ब्राह्मणों ने ऋगवेद में दसवाँ मंडल जोड़कर एक गैर-वैज्ञानिक अवधारणा को स्थापित किया। उनकी स्थापना में एक झूठी कल्पना है, बेसिर-पैर की बातें हैं। विरज पुरुष से पूर्व प्रकृति ही नहीं थी। अज़ीब नौटंकी गढ़ी गई। विरज पुरुष को दूर्वा पर देवताओं ने बलि दी। फिर ऋगवेद और सामवेद की ऋचाएँ निकलीं और तदंतर यजुर्वेद के मंत्र निकले। आज इस बात को सोचने पर विचित्र लगता है और घृणा होती है कि एक पुरुष को काटने पर शून्य में लिखित मंत्र और ऋचाएँ दृश्य रूप में तैरने लगीं और उसको ब्राह्मणों ने लिखना प्रारम्भ कर दिया। निश्चित लाखों मंत्र और ऋचाओं के लिए शून्य में जगह चाहिए। उन मंत्रों और ऋचाओं को लिखने के लिए ब्राह्मणों को उड़ना पड़ा होगा।

यह ख्याल भी कितना विचित्र और बेवकूफी भर लगता है कि एक व्यक्ति आकाश में उड़कर पत्तों पर नरकुल और दवात से लिख रहा था। आखिर कैसे मैनेज किया होगा। कहाँ दवात रखा होगा, कहाँ कलम और किस पोजिशन में लिखा होगा। विचित्र झूठ देखिए कि वह कह सकता है कि ब्राह्मण सिद्ध पुरुष थे, वे शून्य में बैठकर भी लिख सकते थे अथवा सारे मंत्रों और ऋचाओं को बारी-बारी से सम्मुख आमंत्रित कर लिख डाला होगा। जब झूठ बोलना है और बेवकूफियों को स्थापित करना था, तो सब कुछ संभव था। उस मृत विरज पुरुष के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघा से वैश्य और पैर से शुद्र पैदा हुए। यह भी ब्राह्मणों का एक विचित्र झूठ था। आज यह सिद्ध है कि कोई भी परिघटना उसकी प्रक्रिया के बिना संभव नहीं है। इन ब्राह्मणों ने इतने बड़े झूठ को सदियों तक सच बताकर अपने वर्चस्व को स्थापित रखा।

विडंबना यह है कि इस वैज्ञानिक युग में भी उस काल्पनिक झूठ के कट्टर अनुयायी आज भी हैं। इस कविता से उनके अन्य झूठ भी प्रमाणित होते हैं जैसे मृत विरज पुरुष की आत्मा से चंद्रमा, चक्षुओं से सूर्य, मुख से इंद्र और अग्नि, श्वास से वायु, चरणों से धरती, कानों से चारों दिशाएँ उत्पन्न हुए। जिस पुरुष से सृष्ट का उन्नयन हुआ, यह भी जानिए कि वह पुरुष कौन और कैसे था। यह भी एक विचित्र और महाझूठ उन ब्राह्मणों ने रच डाला था। ब्राह्मणों ने झूठ की हद कर दी। उन्होंने लिखा कि विरज नामक पुरुष के एक सहस्र शीश, एक सहस्र आँखें, एक सहस्र चरण, उसका दस अंगुल सम्पूर्ण ब्रह्मांड को ग्रहण कर लिया, वह पूरा ब्रह्मांड है, वही वर्तमान है, वही भविष्य है, वह अमर है। है न विचित्र बात, इस अमर और ब्रह्मांड के बराबर पुरुष को बलि दिया गया। जो विशालतम है उसको लघु देवताओं ने बलि दिया। ब्रह्माण्ड के बराबर अथवा पूरे ब्रह्माण्ड की बलि देने की बात कितनी हास्यास्पद है। इन्होंने यह नहीं सोचा कि अन्यत्र ब्रह्माण्ड लोग कैसे बलि दे सकते हैं। ब्राह्मणों को न कथा लिखने में शर्म आई, न उटपटांग की वकालत करने में आज भी झिझकते हैं। जिनका पूरा सिद्धांत ही झूठ, फ़रेब और धोखा पर आधारित वर्चस्व का सिद्धांत है।

आनंद सर की कविता “सुनो भूदेव” की कुछ लाइनें प्रस्तुत हैं:

मुख से ब्राह्मण
भुजाओं से क्षत्रिय
जंघा से वैश्य, और
पैर से शुद्र उत्पन्न हुए;
आकाश से चंद्रमा
चक्षुओं से सूर्य
मुख से इंद्र और अग्नि
और श्वास से वायु उत्पन्न हुई;
मस्तक से आकाश
चरणों से धरती
कानों से चारों दिशाएँ,
इस तरह,
देवताओं ने ब्रह्मांड की रचना की,
दुख तो यह है भूदेव!
तुम आज भी नहीं सुधरे
विज्ञान तुमको अभिशाप लगता है।

(सुनो भूदेव, पेज 33)

उनकी कविताओं में “ईश्वर-1”, “ईश्वर-2”, “आत्मा”, “नास्तिक”, “विज्ञान बनाम आस्था”, ईश्वर एक व्याख्या” जैसी कविताओं में ब्राह्मणों की चालाकीपूर्ण विचारों की स्थापनाओं का खंडन और नकार है जिसे विज्ञान का सहारा लेकर आनंद सर ने बहुत बारीकी से समझाया है। आनंद सर ने “ईश्वर-1” नामक कविता में लिखा है कि हमारे अलग-अलग ईश्वर हैं। हिंदुओं के ईश्वर राम-कृष्ण, मुसलमानों के अल्लाह तथा ईसाइयों के ईसा मसीह  हैं। अब सवाल है कि इसमें से असली ईश्वर कौन है? गाँधी और गाँधी जैसे अनेक लोग कहते हैं, ईश्वर, अल्लाह, राम, कृष्ण, ईसा, गॉड, बुद्ध, जैन सब एक ही हैं। हमने इनके अलग-अलग नाम रख रखे हैं। यहाँ यह प्रश्न उठता है जब हम सब यह बात भली-भाँति जानते हैं कि ईश्वर एक है और सभी नाम उसी के हैं, तो फिर हम इतने मूर्ख क्यों हो जाते हैं कि हिन्दू मुसलमान से घृणा करता है और मुसलमान हिंदुओं से घृणा करता है। पूरी दुनिया में धार्मिक और साम्प्रदायिक झगड़े और हत्याएँ होती हैं। यही नहीं, हम इतने ज्यादे मूर्ख हैं कि मनुष्यों द्वारा लिखित काल्पनिक और झूठी किताबों को ईश्वरीकृत कहकर अपने-अपने धर्म के मतानुसार अपनी धार्मिक पुस्तक को ही ईश्वरीकृत और सही मानते हैं, दूसरे धर्म, दूसरी किताब और दूसरे की इबादत को फ़रेब और मनुष्यकृत कहते हुए दूसरे धर्म और इबादत से घृणा करते हैं और उनकी हत्याएँ करते हैं।

एक अन्य तरीके से भी ईश्वर पर चिंतन किया जा सकता है। यदि ईश्वर है, तो उसने अपने अनेक नाम क्यों रखे, अनेक धर्म क्यों बनाए, अनेक धार्मिक पुस्तक क्यों लिखा, अनेक इबादत के तरीके क्यों बनाया? यदि मनुष्यों ने धार्मिक पुस्तक, इबादत और ईश्वर का नामकरण किया है, तो ईश्वर सभी धार्मिक पुस्तकों को खत्म करके एक क्यों नहीं बना देता? क्या सभी मनुष्यों को लड़ाकर ईश्वर को मजा आता है? सब कुछ यदि ईश्वर ने बनाया है, तो वह पाप-पुण्य के अतिरिक्त पाप रहित दुनिया भी तो बना सकता था लेकिन उसने ऐसा नहीं किया, तो इसका अर्थ है वह पूरी सृष्टि को अपने मजे के लिए बनाया है। यह सच नहीं है। ईश्वर जैसी कोई भी शक्ति नहीं है। यह सार्वभौम स्व नियमों से बनता-बिगड़ता है। ब्राह्मणों द्वारा लिखी सभी धार्मिक और ईश्वर संबंधी सारी बातें और सारे तर्क झूठे हैं। ब्राह्मणों ने अपने वर्चस्व के लिए सारे झूठ, फ़रेब और छल की रचना की और लोगों को बरगलाया जिससे उसका वर्चस्व कायम रहे। इस कविता को लिखकर आनंद सर ने उसके ऋग्वैदिक महाझूठ को उजागिर किया है। इस कविता में अनेक वैज्ञानिक प्रश्न पैदा किए हैं।

इस कविता में धर्म, ईश्वर, आत्मा, इबादत, नास्तिक, आस्तिक, कर्ता, सर्वशक्तिमान, कर्म, फल, लख चौरासी योनि, आस्था, तर्क, भौतिक जगत, महाशून्य, जन्म, पुनर्जन्म, मुक्ति, स्वर्ग, नर्क, मोक्ष इत्यादि पर तर्कपूर्ण बातें रखी गई हैं। इस कविता के कुछ अंश देखिए:

हम सब के अलग-अलग ईश्वर हैं;
हिन्दू के राम-कृष्ण
मुसलमान के अल्लाह
ईसाइयों के ईसू
ईश्वर हैं;
बौद्ध, जैन और आजीवक धर्म में
कोई ईश्वर नहीं है;
कुछ धर्म बिना ईश्वर के जिए जा रहे हैं,
विज्ञान भी ईश्वर को नहीं मानता है।

(सुनो भूदेव, पेज 38)

आनंद सर की अगली कविता “ईश्वर-2” ऋगवेद में लिखित और प्रमाणित ईश्वरीय विधान को नकारते हुए यह बताती है कि ब्राह्मणों द्वारा लिखी व प्रमाणित सारी बातें आस्था व कल्पना पर आधारित हैं। आनंद सर सिर्फ आलोचना करके ब्राह्मण मतों को नकारते नहीं है बल्कि विज्ञान का सहारा लेते हुए सार्वभौम, पदार्थ और प्रक्रिया को शाश्वत कहते हैं। इस कविता में आनंद सर ने ईश्वर को अनावश्यक माना है। उन्होंने बताया है कि ईश्वर होने का कोई औचित्य है। विज्ञान की सत्यता को प्रमाणित करने के लिए उन्होंने भगत सिंह, मोरिस कॉर्नफोर्थ की पुस्तकों को पढ़ने की सलाह भी दिया है। आनंद सर की कविता “ईश्वर-2” की कुछ पंक्तियाँ उदाहरणार्थ प्रस्तुत कर रही हूँ:

यह सार्वभौम

अपने आप चल रहा है

अनंत का क्रिएटर कोई नहीं है

संचालक की कोई जरूरत नहीं है

पदार्थ, ऊर्जा, गति, स्पेस और समय के साथ

उसमें सन्निहित प्रक्रिया को

अलग नहीं किया जा सकता है

जिसकी वजह से सारी क्रियाएँ होती हैं

और किसी भी वस्तु,

प्राणी और पौधों का जन्म होता रहता है

ऊर्जा जब एक विशेष अवस्था में पहुँचती है

तो चेतना का रूप धारण कर लेती है

पदार्थ का गुणधर्म ही है
जो हमें चिन्तनशील बना देता है
संवेदनाएँ प्रदान कर देता है।

(सुनो भूदेव, पेज 43)

आनंद सर ने जन्म और मृत्यु को भी परिभाषित किया है। जिस जन्म और मृत्यु को ईश्वरवादियों ने ईश्वरीकृत कहकर ईश्वर की इच्छा मात्र बताया है और संसार तथा जीव को माया बताया है, वह महाझूठ है। आनंद सर से विमर्श करने पर यह बात समझ में आई कि धर्म और ईश्वर ऐतिहासिक विकास क्रम में अस्तित्व में आया है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि ईश्वर है। यह भी सत्य नहीं है कि इतिहास में मनीषियों ने इस बात को समझा ही नहीं था। वर्चस्ववादी ब्राह्मणों ने बहुत ठीक से समझा और जाना था कि ईश्वर, देवी, देवता, भूत, प्रेम, तंत्र, मंत्र, पुनर्जन्म, पाप, पुण्य, प्रारब्ध इत्यादि नहीं है लेकिन यदि वे सत्य की अवधारणा को जनता को समझने देते अथवा समझाते, तो इनका वर्चस्व नहीं रहता, ये श्रेष्ठ नहीं रहते, इनको भी अवाम की तरह मेहनत करना पड़ता, ये भी जनता की तरह रहते। ऐसी स्थिति में सभी की हैसियत बराबर होती। इन वर्चस्ववादियों ने कभी भी सत्य को जनता के बीच में नहीं आने दिया। जनता सत्य से दूर रखी गई। इन सब के बावजूद भी सत्ता संस्थान अपने पक्ष में हमेशा अनेक विचारधाराएँ निर्मित करते हैं तथा उसका प्रचार प्रसार करते हैं। अपने सत्ता, श्रेष्ठता, अकर्मण्यता, आश्रमेणता और वर्चस्व के लिए ईश्वर-आत्मा, पूर्वजन्म-पुनर्जन्म, पाप-पुण्य, संचित-प्रारब्ध, ऊँच-नीच, छुआ-छूत, जादू-टोना, तंत्र-मंत्र, चुड़ैल-चमरिया, भूत-प्रेत का भय बनाए रखने और गुमराह करने के लिए स्वयं मोटी-मोटी किताबें लिखकर ईश्वरीकृत बताकर धन, धरती, ऐश्वर्य और स्त्रियों पर कब्जा मार कर बैठे रहे। “बांटों और राज करो” का फार्मूला देश, काल और परिस्थियों में पैदा हुआ। हम यह इल्जाम अंग्रेजों पर लगाते हैं लेकिन हमारे देश में ब्राह्मणों ने इस नीति को प्रारम्भ से ही समझ लिया था तथा कुछ लोगों के सुख, सुविधा और वर्चस्व के लिए मनुष्यों को विभाजित कर दिया। मनुष्यों को विभाजित करने के लिए वर्ण बनाए। वर्णों के स्थान, कार्य, संस्कार, भेषभूषा, खनापन और भाषा तक सुनिश्चित किया। जब आवश्यकता पड़ी तो धीरे-धीरे जातियों में भी विभक्त किया। वे जानते थे कि शिक्षा ही सबसे महत्वपूर्ण हथियार है जिससे मनुष्य सार्वभौम के हर चीजों को समझ सकता है इसलिए निम्न वर्णों को शिक्षा से काट दिया और प्रचार कर दिया कि यह तुम्हारे पूर्वजन्म का पाप है। यदि पुनर्जन्म में शिक्षित, सम्पति वाले, सुखी, सम्पन्न रहना चाहते हो तो ब्राह्मणों की हर बातों को मानों और वेदों-पुराणों में लिखी हर चीजों को स्वीकार करो, ब्राह्मणों-क्षत्रिय की सेवा करो, नहीं तो पुनः अधम गति को प्रप्त हो जाओगे। इस डर से शूद्र ब्राह्मणों एवं उनके पुस्तकों में लिखी हर बातों को आँख मूँद कर स्वीकार करने लगे। इसके बाद भी ब्राह्मणों को डर था कि कुछ बिना शिक्षित हुए भी प्रज्ञावान हो सकते हैं और वे वेदों-पुराणों में लिखी बातों पर तर्क प्रस्तुत कर सकते हैं क्योंकि एक ही स्थिति के बारे में वेद में अलग मत है, पुराण में अलग मत है, शास्त्रों में अलग मत है, मनुस्मृति में अलग मात्य है, श्रुतियों में अलग मत है और स्मृतियों में अलग मत हैं। सब एक दूसरे के विपरीत हैं। ऐसा इस कारण संभव हुआ है कि वे बातें अलग-अलग परिवेश, देश, काल, परिस्थितियों में अलग-अलग विद्वानों द्वारा लिखी गई हैं। चूँकि सभी विचार कल्पना पर आधारित हैं एवं विभिन्न वर्गों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से लिखी गई थीं इसलिए विचारों में वैपरीत्य का होना स्वाभाविक था। ब्राह्मणों ने बड़ी चालाकी के वेदों पर तर्क करने वालों एवं ब्राह्मणों द्वारा लिखी किसी भी पुस्तक के वैपरीत्य पर प्रश्न उठाने वालों को वेद निंदक कहा। यही नहीं सभी पुस्तकों की बातों को उचित माने जाने का आदेश दिया। यदि फिर भी कोई उन विचारों/मतों पर तर्क करता है अथवा उलंघन करता है तो उसको वेद निंदक कहकर उसकी हत्या कर देने का प्रावधान सुनिश्चित कर दिया। आनंद सर जैसे लोग इन वर्चस्वदियों के लिए वेद निंदक हैं। उनका वश चले तो ऐसे चिंतकों की हत्या करने में इन्हें कोई गुरेज नहीं होगा। आज भी सत्ता प्रतिष्ठान के विरुद्ध जो समता, स्वतंत्रता, बन्धुत्व, न्याय, बराबरी, एक मूल्य, मार्क्सवाद, समाजवाद, तर्कवाद, विज्ञानवाद की बात करता हुआ धर्म और ईश्वर की अवहेलना करता है, उसे नक्सल, माओवादी और अर्बन नक्सल कहकर उसको जेल में डाल दिया जा रहा है, धार्मिक अनुयायिओं द्वारा उनकी हत्या करवा दिया जा रहा है अथवा मोब्लिंचिंग करवा दिया जा रहा है। आज भी सत्ता और व्यवस्था के विरुद्ध हम आवाज नहीं उठा सकते हैं। आज भी हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में आनंद सर जैसे अनेक लेखक/कवि/आलोचक/चिंतक/क्रान्तिकारी/सामाजिक कार्यकर्ता यदि सवाल उठा रहे हैं, जन्म, मृत्य, ईश्वर और धर्म की वैज्ञानिक सत्यता/अवधारणा समझा रहे हैं, तो वे अपनी जान जोखिम में डालकर समाज हित में ऐसा कार्य कर रहे हैं। आनंद सर ने अपनी कविता “जन्म और मृत्यु” में एक वैज्ञानिक चेतना की बात की है। यह कविता ईश्वर की धारणाओं के विरुद्ध है। इस तरह यह कविता धार्मिक चिंतन प्रणाली का भरपूर विरोध प्रस्तुत करती है। प्रस्तुत है वह कविता:

जन्म एक प्रक्रिया है

कौन जन्म लेगा निश्चित नहीं है

शुक्राणु और अंडाणु के संयोग से जीवन अस्तित्व में आता है

किन्तु शुक्राणु और अंडाणु

पूर्व में ही अस्तित्ववान और रूपवान नहीं होते हैं

बल्कि ये जीवन की प्रक्रिया जे अंतराल में

अस्तित्व में आते और रूपवान होते हैं

जो अस्तित्व में आएगा

रूपवान होगा

उसकी मृत्यु निश्चित होगी

किन्तु मृत्यु का समय और कारण भी

पूर्व में निश्चित नहीं होता है

मृत्यु भी एक प्रक्रिया है

जब शारीरिक संरचना वाह्य रसायनों को

अवशोषित करने में असमर्थ हो जाती है

तब शरीर की चेतना अवरुद्ध हो जाती है

पुनः क्रियाशील नहीं होती है

जिसे हम मृत्यु कहते हैं।

(सुनो भूदेव, पेज 35)

आनंद सर की “सुनो भूदेव” कविता में उल्लिखित है कि किस तरह ब्राह्मणों ने वर्णों की उत्पत्ति ऋग्वेद के दसवें मंडल में लिखा है। वहाँ लिखा है मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघा से वैश्य और पैरों से शूद्र पैदा हुए लेकिन गीता में लिखा है कि परब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं गुण-कर्म के हिसाब से वर्णों को बनाया है और मनु महाराज ने लिखा कि जन्म से सभी शुद्र होते हैं। संस्कार से द्विज, वेद पढ़ने वाले विप्र और जो ब्रह्म को जान लेता है, वह ब्राह्मण बन जाता है। इसी तरह ब्राह्मणों की विभिन्न पुस्तकों में विभिन्न मत हैं। किसे सही माना जाय? हमारे तर्क का कोई मूल्य नहीं है क्योंकि ब्राह्मणों की लिखी सारी बातें सत्य न मानने वालों को वेद निंदक कह कर हत्या कर दिए जाने का विधान है लेकिन सभी अनुबंधों/अवरोधों के बावजूद भी ब्राह्मणों के मतों का खंडन और निंदा किया जा रहा है। अब लोग विज्ञान के मतों को तरजीह दे रहे हैं। अपनी इस कविता “तेरी सत्ता के अतिरिक्त” में आनंद सर ने श्री कृष्ण को सम्बोधित करते हुए ब्राह्मणों के विरोधाभाष को इंगित किया है। इस विरोधाभाष में मनु महाराज विजयी हैं क्योंकि ब्राह्मणों को जो अधिक सूट करता है उसे अधिक तरजीह देता है। वैसे बहस के लिए श्रीकृष्ण की बात उन्हें कम रुचिकर नहीं लगती है बल्कि उसका विरोध करने व अधिक तर्क करने पर एक वर्चस्ववादी ब्राह्मण अत्यधिक क्रुद्ध हो जाएगा और मारपीट कर लेगा। जब हम यह तर्क करने लगें कि मनु महाराज के अनुसार जब सभी शूद्र हैं और संस्कार कराने से ब्राह्मण हो सकते हैं, तो आखिर शूद्रों का संस्कार करके उन्हें क्यों नहीं ब्राह्मण की कैटेगरी प्रदान की जाती है। शूद्र जन्मनः भी शूद्र और जिंदगी भर शूद्र। उनका संस्कार नहीं किया जाता है। शूद्रों का संस्कार न करना ब्राह्मणों का वर्चस्व है। यह वर्चस्व अनैतिक चेष्ठा है और मनुस्मृति के विरुद्ध है लेकिन यह ब्राह्मणों का वर्चस्व है कि शूद्रों का संस्कार नहीं किया जाना चाहिए। यह अव्यक्त नियम सामाजिक धौंस हैं और इसके विरुद्ध शूद्रों का सवाल करना नाज़ायज है। शूद्रों के इस तर्क पर उन्हें मारा-पीटा जाता है, उनके स्त्रियों से बलात्कार किया जाता है और अंततः शूद्रों की हत्या कर दी जाती है। ब्राह्मणों के ग्रंथों के वैपरीत्य और विरोधाभाष को बहुत काव्यात्मक शैली में आनंद सर ने प्रश्नवाचक रूप से रखा है:

हे परब्रह्म भगवान श्री कृष्ण!

मैंने गीता पढ़ी है

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम गुण कर्म विभागशः

तस्यम कर्तारामपि मांविद्वय कर्तारंव्ययम

लेकिन मनु ने गडमड कर दिया

उन्होंने लिख दिया

जन्मते जायते शूद्रः संस्कारः द्विज उच्चते

वेदपाठी भवति बिप्रह ब्रह्मजानाति ब्राह्मणः

कोई भी गुण कर्म के हिसाब से

हमें उच्च कुल वाला नहीं मानता

हमें ब्राह्मण क्षत्रिय नहीं मानता

सब हमें जन्मनः शुद्र मानते हैं

और छुआछूत करते हैं।

(सुनो भूदेव, पेज 125)

आनंद सर की कविताओं में ब्राह्मणवादी वर्चस्व सिद्धांतों का निरूपण है, व्याख्या है, विरोध है एवं विरोध का साहस है। श्रीकृष्ण और मनु के वर्ण सम्बन्धी विचारों के श्लोक को अपनी कविता में तुलनात्मक ढंग से रखकर आनंद सर ने प्रश्न खड़ा किया कि शुद्र वर्ण संस्कार रहित क्यों है जब ईश्वर और ब्राह्मणों द्वारा रचित विधान में भी वर्ण परिवर्तन की सुविधा है? सुविधा के बाद भी वर्चस्व सिद्धांत कहता है कि नहीं शुद्र को वर्ण बदलने, शिक्षा ग्रहण करने और संपत्ति रखने का अधिकार नहीं है। शूद्रों को वेदों, पुराणों, श्रुतियों, स्मृतियों और अनेक ब्राह्मणी ग्रंथ पढ़ने का अधिकार नहीं है। मनु से बहुत स्पष्ट लिख दिया है कि उनके पवित्र ग्रंथों के श्लोकों का उच्चारण सुन लेने मात्र से कान में शीशा पिघलाकर डाला जाएगा, पढ़ लेने से जीभ काट ली जाएगी और याद कर लेने से गला काट लिया जाएगा। इसका अर्थ है जिस समाजवाद के बारे में उन्होंने लिखा है वह उन्हीं के वर्ण के लोगों के अतिरिक्त किसी और पर लागू नहीं किया जाएगा। हाथी के खाने के दाँत कुछ और दिखाने के दाँत कुछ और। ब्राह्मणों के आंतरिक छूट को क्षत्रियों पर भी लागू नहीं किया जाता है, तो फिर शूद्रों पर क्यों और कैसे लागू किया जा सकता है। शूद्रों को वेदों-पुराणों के मंतव्यों पर प्रश्न करना प्रभु वर्ग की खिलाफत करना है इसलिए उन्होंने वेद निंदकों की हत्या जायज और अनिवार्य किया था। आज भी सवर्णों के मध्य वेदों पर एक नास्तिक की भाँति प्रश्न करना बर्दाश्त नहीं किया जाता है। ऐसी स्थिति में आनंद सर का इस तरह कविता लिखना जानबूझकर सूली पर चढ़ने के बराबर है। आनंद सर सिर्फ कविता ही नहीं लिखते हैं बल्कि कविता में प्रश्न करते हैं बल्कि उनके नियमों को खुलकर न मानने की हिम्मत भी करते हैं। आनंद सर का प्रश्न वाज़िब है। जब संस्कार के द्वारा वर्ण बदला जा सकता है तो ब्राह्मण वर्ण अपने ही लिखे का उलंघन क्यों करते हैं, क्यों एक वर्ण को शूद्र बनाए रखने का कुचक्र करते हैं, क्यों स्वयं सवर्ण और शूद्रों को अवर्ण अथवा निम्न वर्ण बनाने रखना चाहते हैं। ऐसा वे सिर्फ और सिर्फ इसलिए करते हैं जिससे धन और धरती उनके कब्जे में रहे, जिससे कि सारी संपत्ति उनके कब्जे में रहे, जिससे कि उत्पादन के सारे संसाधनों के मालिक वे रहें। ऐसी स्थिति में शूद्रों को उनकी जीहजूरी निश्चित करना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में दलितों को उनकी हरवाही-बिरवाही जरूर करनी पड़ेगी। ऐसी स्थिति में दलितों को उनका नौकर बनकर रहना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में दलितों को उनका खेत मजदूर होना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में हर हाल में दलितों को उनका दासत्व स्वीकार करना पड़ेगा। लेकिन, अब समय बदल रहा है। दलित हर जुल्मों को सहने के बाद भी इस स्थिति तक पहुँच गया है कि करोड़ों दलित पढ़ चुके हैं, लाखों नौकरियाँ कर रहे हैं, शेष आंदोलित हैं कि समता, स्वतंत्रता और बन्धुत्व आना ही चाहिए। जाति और धर्म एक धोखा है। ब्राह्मण और चमार मनुष्यकृत है, ।वह भी ब्राह्मणों के वर्चस्व की वजह से है। इसे बदला जाना चाहिए। समाजवाद के लिए दलित हुंकार भर चुका है। जमाना बदलेगा। आनंद सर का इस कविता में प्रश्न, इनकार तथा नकार दलित हिम्मत है। यह एक क्रान्ति है। कविता के अंश को पढ़िए और आंदोलन को समझिए:

भूदेव!

जन्मनः सभी शूद्र हैं

हाँ, लेकिन संस्कार से जातियाँ बदल जाती हैं

तो मेरी जाति संस्कार से क्यों नहीं बदली जाती

क्योंकि शूद्रों का संस्कार वर्जित है

फिर मैं ऐसे संस्कार को नहीं मानता।

(सुनो भूदेव, पेज 132)

जब-जब समाज में प्रश्न उठने लगते हैं, लोग सिर उठाने लगते हैं तथा लोग सच जानना चाहते हैं, तब-तब वर्चस्ववादी पाप, कर्म, पूर्वजन्म और प्रारब्ध जैसे काल्पनिक झूठे सिद्धांतों का सहारा लेते हैं। ऐसे प्रश्न उठेंगे, लोग हिम्मत करेंगे इसलिए ब्राह्मणों ने पूर्व ही समय-समय पर अनेक तर्क, उलझाव और डर की योजनाएँ लिपिबद्ध कर के रखीं थी। जहाँ जिस श्लोक की जरूरत पड़ी, वहाँ उसका प्रयोग कर जनता को भ्रमित कर संतुष्ट किया।  गीता में लिखे दो श्लोकों का सहारा लेते हुए आनंद सर ने हमें समझाने की कोशिश की है कि श्रीकृष्ण जब कहते हैं कि सब कुछ सोचना बंद कर मेरी शरण में रहो, मैं तुम्हें सभी पापों/व्यधियाँ से मुक्त कर तुम्हें मोक्ष भी दे दूँगा, फिर भी ब्राह्मण नहीं मानता है। उसे जैसे भी कष्ट होगा वह ईश्वर की शरण छोड़ कर अच्छे से अच्छे चिकित्सक के पास उपचार के लिए भाग जाता है। वह उस समय कर्म की बात करता हुआ घोर नास्तिक/अनीश्वरवादी हो जाता है। जबकि आनंद सर कहते हैं कि ब्राह्मण यह भी जानता है कि उसी के अनुसार व गीता में लिखे श्रीकृष्ण के श्लोक के अनुसार कर्म भी पूर्व में ही सुनिश्चित है। मनुष्य क्या कोई भी चीज बिना ईश्वर की मर्जी के कुछ नहीं कर सकता है, फिर मनुष्य निर्दिष्ट कर्म के अतिरिक्त क्या कर सकता है। क्या इतनी सी बात ब्राह्मण नहीं समझ पाता है। वह सब समझता है क्योंकि वह यह जानता है कि उसने जो कुछ लिखा गया है, वह दूसरों को नियंत्रित करने के लिए लिखा है, न कि खुद को उसमें फँसा लेने के लिए इसलिए वह अपनी लिखी चीजों का उलंघन करता है। इसी बात को बहुत ही तर्कपूर्ण ढंग से आनंद सर ने अपनी कविता में स्थान दिया है:

मैं बताऊँ प्रभु!

गीता में तुमने लिखा है

सर्व धर्म परित्यज्य मामेकम शरणं ब्रज

अहम त्व सर्वपापेभ्यो मोक्षेश्याम मसूचः

लेकिन तेरा आस्तिक इतना मक्कार है

बुखार हुआ नहीं कि क्रोसिन जरूर खा लेता है

कैंसर होने पर तेरा इंतजार नहीं करता है

है न धूर्तता वाली बात

जब कभी उसको

तेरी यह भरोसे वाली बात समझाओ

वह कर्म की बात पर आ आता है

प्रभु! उसको यह नहीं पता है

कि कर्म की परिभाषा भी तूने गढ़ रखी है

प्रकृते क्रियमाणानि गुनैः कर्माणि सर्वशः

अहंकारविमूढ़आत्मा कर्ताहम इति मन्यते

लेकिन चांडाल इस बात को भी नहीं मानता है।

(सुनो भूदेव, पेज 126)

आनंद सर ने अपने इस संग्रह में ब्राह्मणों के वर्चस्ववाद, जातिवाद, छुआछूत, ऊँचनीच, भेदभाव, आत्मा, ईश्वर, धर्म, अधर्म, पाप, पुण्य, शिक्षा, सम्पत्ति, अधिकार आदि के उस दर्शन की महत्वा और उसकी हकीकत को अपनी कविताओं के माध्यम से रखा है। आनंद सर लिखते हैं कि ईश्वर कुछ और नहीं, ब्राह्मणों की मति है। धर्म ब्राह्मणों के वर्चस्व की वाणी है। अधर्म शूद्रों के जीवन के भौतिक आवश्यकताओं की चेष्ठा है। स्वर्ग और नर्क की अवधारणा एक धार्मिक अवधारणा जरूर है जो वस्तुपरिस्थियों के चलते उत्पन्न हुआ लेकिन कालांतर में ब्राह्मणों ने अपने वर्चस्व को स्थापित करने के लिए एक झूठ का प्रचार किया है। ईश दर्शन ब्राह्मणों का महाझूठ है। ईश्वर की वाणी व आकाशवाणी इनका भ्रम तो था ही, कालांतर में महाझूठ को स्थापित किया और अपने प्रभुत्व के लिए अनेक हथकंडे अपनाए। आनंद सर की कविताओं में इन सब का पर्दाफाश निहित है। “न इति”, “ऋचाएँ”, “नारीशुद्रो”, “मैं आस्था बेचता हूँ”, “तेरी सत्ता के अतिरिक्त”, “भूदेव ऐसा क्यों है” इत्यादि कविताओं में ब्राह्मणों के वर्चस्ववादी धार्मिक दर्शन की व्याख्या के साथ निर्ममता से आनंद सर ने इन्हें और दर्शन को नंगा किया है। “शम्बूक”, “एकलव्य” और “हे भगवान बुद्ध” बिल्कुल अलग प्रकृति और मनोविज्ञान की कविता है। यह आनंद सर की बुद्धिमत्ता और एक अलग किस्म की स्थापना का प्रयास है।

मैंने कहा, हट चाण्डाल!

उधर से एक विनीत आवाज़ आई

सभी में तो शिव है

तब इतनी घृणा क्यों?

मुझे माफ़ करना प्रभु!

मैंने तुम्हारा ध्यान करते हुए

मूर्ति रूप में कल्पना की है

जबकि तुम निराकार हो।

मैंने तुम्हारी प्रसंशा में वर्णन किया है

जबकि तुम वर्णनातीत हो।

मैंने तुम्हें मंदिरों में ढूढ़ा है

जबकि तुम सर्वव्यापी हो।

अरे शंकराचार्य!

लोक इतना मूर्ख नहीं है

तुम्हारे चित और पुट के खेल को समझता है,

तेरा ईश्वर एक कुचक्र है।

(सुनो भूदेव, पेज 77)

आनंद सर की कुछ कविताएँ, जैसे “नौटंकी नाच”, “नीम गवाह”, “दादी की आत्मकथा”, “धमकी” तथा “हरवाह”, जैसी कविताएँ दलितों का भोग हुआ यथार्थ तो है ही, साथ ही दलित उत्पीड़न का ऐतिहासिक दस्तावेज भी है। जब मैं आनंद सर की आत्मकथा “क्या लिखूँ क्या छोड़ दूँ” पढ़ रही थी, कुछ इस तरह का जिक्र मिला था। आत्मकथा में आनंद सर लिखते हैं कि दूर से आते हुए ठाकुर साहब की आवाज अथवा उनके सायकिल की घंटी सुनकर ही रास्ते में पड़ने वाले घरों के शूद-चमार अपनी-अपनी चारपाई छोड़कर पहले से ही खड़े रहते थे। उनके गुजरते ही लोग “बाबू जयराम” करते थे और बाबू साहब बिना कुछ उत्तर दिए अपनी गोल के साथ बातचीत करते चले जाते थे लेकिन जिस घर से जयरमी की आवाज न आई, वहीं सायकिल रुक जाती थी और जोर से गुर्राकर पूँछते, का रे बदरिया! का रे कलुआ! कहाँ हए रे? औरतें राम राम करते हुए बोलने का साहस करतीं, बाबू साहब! ऊ ससुरारी गए हैं। बाबू साहब बड़बड़ाते हुए सायकिल पर बैठते और चले जाते। यह एक तरह का सवर्ण आतंक था। बाइदवे, कोई चमार जयरमी करने से रह गया अथवा चारपाई से उतरने को रह गया अथवा गलती से बैठा मिल गया, तो बाबू साहब या पंडित जी सायकिल से उतरकर उसको बलपूर्वक मारते थे और ऐसा न घटित होने की हिदायत देते थे। “नीम गवाह” कविता में घटित घटना आनंद सर के अनुसार एक सच्ची घटना है जो उनके बचपन में उनके सामने घटी थी।

बुझारत की नीम गवाह है

उतनी मिट्टी आज भी लाल है

गोजई खटिया पर से उठ भी नहीं पाए थे

हूँचा-हूँचा कई हूँचा मार दिया था

ओ ओ करके चार पसर खून

मुँह से बाहर निकल आया

गाँव भर के चमार हाथ जोड़े खड़े थे

बाबू साहब! यह पाहुन हैं।

(सुनो भूदेव, पेज 62)

जब मैं “दादी की आत्मकथा” कविता को पढ़ रही थी, मैंने आनंद सर से पूछा कि क्या यह घटना सही है? आनंद सर ने बताया कि हाँ, यह सही घटना है। उन्होंने बताया कि यह न सिर्फ सही घटना है बल्कि मेरी अपनी दादी की घटना है और उन्होंने हम लोगों को कई बार बताया है। यकीन नहीं होता कि पचास वर्ष पूर्व हमारे सदृश्य मनुष्य इतना अहमी और निर्दयी था। हालाँकि, हम लोग अनेक कथाओं, उपन्यासों, कहानियों, कविताओं, संस्मरणों, रिपोरताजों में पढ़ते हैं लेकिन तब वह कुछ बनावटी लगता था लेकिन जब बिल्कुल करीबी साहित्यकार, बुद्धिजीवी और चिंतक से जुबानी सुना तो हकीकत पर यकीन आया। अजीब बिडम्बना थी।

सुहागरात की सुबह का सूरज

मेरे घूँघट में झाँक भी नहीं पाया था

कि कुँए की जगत पर ठाकुर ने

मेरा बाल ऐसे पकड़ा

जैसे शेर ने मेमने को दबोच लिया हो

गाँव वाले सर झुकाए खड़े थे

उनके आँखों की रोशनी चली गई

तभी मेरा गगरा मेरे हाथ से छूट गया

मैं दर्द के मारे चीख पड़ी

बाल से घसीटता हुआ निर्दयी

मुझे अपने घूर पर जोर से पटका

चमाइन! तुझे किसी ने बताया नहीं

परम्परा भूल गई

कि बाबू साहब के दरवाजे तक जाना है

मोहर बहारना है

हौदी भरना है

ठकुराइन के पाँव छूना है।

(सुनो भूदेव, पेज 63)

“पड़ताइन बुआ”, “मालकिन और दक्खिन टोले की औरतें”, “कथा वाचक”, “पंडित पुरवा” ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का भोगा हुआ यथार्थ है। इसमें कई कविताएँ दलित जीवन का यथार्थ है तो तीन कविताएँ ब्राह्मण जीवन का यथार्थ है। आनंद सर की एक बात मुझे बहुत अपील करती है कि जातिप्रथा की विसंगतितों पर कविता लिखते समय भी उन्होंने गरीब व प्रगतिशील चेतना के ब्राह्मण-ब्राह्मणी के जीवन के यथार्थ को लिखना नहीं भूले। इस तरह के दलित चिंतक, लेखक, कवि, साहित्यकार अन्य कोई अभी तक दिखाई नहीं पड़ा। आनंद सर का ऐसा दृष्टिकोण इसलिए बन सका होगा क्योंकि वे दलित उत्पीड़न के साथ-साथ श्रमिक व गरीबों का उत्पीड़न भी ध्यान में रखते हैं। हमारे व्यक्तिगत विमर्शों के दौरान आनंद सर बताते हैं कि माना, ब्राह्मण-क्षत्रिय अधिकतर श्रेष्ठ और संपन्न हैं लेकिन उनमें भी कुछ प्रतिशत तो गरीब और उत्पीड़ित हैं, आखिर उनके बारे में कौन लिखेगा, सिर्फ ब्राह्मण? यदि दलित लिख देता है, तो क्या बुरा है? आनंद सर का यह चिंतन वर्ग-चिंतन है। वह वर्ग चिंतन उनकी कविता “पड़ताइन बुआ” में दिखता है:

वो मेरा हाथ पकड़कर

अपने हाथों पर रखकर कहतीं

देख, क्या अंतर है

तेरा खून मेरा खून एक ही तो है

तेरा शरीर मेरा शरीर एक जैसा ही तो है

ये हरामज़ादे!

न जाने क्यों जाति बना रखे हैं

न जाने क्यों छूत-विचार करते हैं

वो कहती थीं

क्या बाभन क्या चमार

हरामियों ने जबर्दश्ती जाति बनाई है।

(सुनो भूदेव, पेज 104)

दलित जब भी कहता है कि सवर्ण जातिवाद करता है, तो सवर्णों का तर्क होता है कि जातिवाद खत्म हो गया है, यदि कुछ बचा है तो वह अवशेष मात्र है। आनंद सर की कविता “अब कहो कि जातिवाद खत्म हो गया है” में उल्लिखित अनेक स्थानों की विभिन्न प्रकार की घटनाओं द्वारा प्रमाणित होता है कि सवर्णों में अभी भी जाति का जहर कूट-कूट कर भरा है। कहीं घोड़ी पर दूल्हे को चढ़ने की वजह से बारात रोक दी जाती है और दूल्हे को मारा-पीटा जाता है। कहीं सार्वजनिक स्थान पर सवर्ण के बगल बैठने से दलितों को मारा-पीटा जाता है। कहीं कोई दलित इसलिए सवर्णों द्वारा अपमानित किया जाता है कि उसने मूँछे बड़ी क्यों रखी थी। कहीं किसी दलित स्त्री की बकरी सवर्ण के खेत में चली जाती है, तो उसकी भरपाई उस स्त्री को बलात्कार से चुकाना पड़ता है। कहीं कुँए के जगत पर स्थान कर लेने से दलित स्त्री नंगी घुमाई जाती है। कहीं किसी दलित स्त्री के खूबसूरत मोजा पहन लेने से मार खाना पड़ता है। दलित अधिकारी ब्राह्मण चपरासी से पानी माँग ले, तो वह कई बार थूक कर पानी देता है। कहीं दलित सवर्ण बस्ती के रास्ते दलित लाश नहीं ले जा सकता है। कहीं सवर्ण डॉक्टर दलित मरीज का इलाज नहीं करता है। आज भी दलितों की अजीब दशा है। उक्त कविता की कुछ पंक्तियाँ:

प्रशांत बाबू

तुम घोड़ी चढ़कर बारात जाओगे?

मनशा ताल्लुका बताने से काम नहीं चलेगा,

पिटाई तो बनती है।

राजपूती जूती

मोजड़ी की राजपूतानी पहनेगी

सूदिन की हिम्मत कैसे हुई?

अलीगढ़ के न्यायिक मजिस्ट्रेट हो

जार्ज बुश तो नहीं,

चपरासी है तो क्या हुआ

ब्राह्मण से पानी माँगोगे?

तो भला वह गिलास में क्यों नहीं थूक देगा

आखिर अपनी जाति क्यों भूल जाते हो?

(सुनो भूदेव, पेज 67)

आनंद सर की कुछ अन्य कविताएँ “मौसम”, “परिदृश्य”, “कार्बन” और “और बरसेगा जरूर” बहुत ही प्रतीकात्मक सौंदर्य के साथ लिखी गई कविताएँ है जिसे बिना हिंट के समझना कठिन है। एक कविता है “क्रान्ति के फूल” जो क्रान्ति की उपस्थिति का महत्व बताता है। मैं “मॉडर्न रिव्यू” के संपादक को लिखे भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के पत्र से क्रान्ति के अर्थ को स्पष्ट करना अधिक उचित समझती हूँ, “क्रान्ति शब्द का अर्थ परिवर्तन की भावना व आकांक्षा है। लोग साधारणतया जीवन की परंपरागत दशाओं के साथ चिपक जाते हैं और परिवर्तन के विचार मात्र से ही काँपने लगते हैं। यही वह अकर्मण्यता की भावना है, जिसके स्थान पर क्रान्तिकारी भावना जागृत करने की आवश्यकता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अकर्मण्यता का वातावरण निर्मित हो जाता है और रूढ़िवादी शाक्तियाँ मानव समाज को गलत रास्ते पर ले जाती हैं। ये परिस्थितियाँ मानव समाज की उन्नति में गतिरोध का कारण बन जाती हैं। क्रान्ति की इस भावना से मनुष्य की आत्मा स्थायी तौर पर ओत-प्रोत होनी चाहिए, जिसे कि रूढ़िवादी शाक्तियाँ मानव समाज की प्रगति में बाधा डालने को संगठित न हो सकें। यह आवश्यक है कि पुरानी व्यवस्था सदैव बदलती रहे और वह नई व्यवस्था के लिए स्थान रिक्त करती रहे, जिससे कि यह आदर्श व्यवस्था संसार को बिगड़ने से रोक सके। यह है हमारा वह अभिप्राय जिसको हृदय में रखकर हम इंक़लाब का नारा ऊँचा करते हैं।” यदि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के क्रान्ति का अर्थ आनंद सर की कविता “क्रान्ति के फूल” के एक-एक शब्द में देखें, तो बिल्कुल अतिशयोक्ति नहीं होगी।

क्रान्ति के फूल बड़े प्यारे होते हैं

सफेद गुच्छेदार

ये शहीदों के पथ पर नहीं चढ़ाए जाते

शहीद अपना सिर इन फूलों पर चढ़ाते हैं

क्रान्ति की सुगंध

बड़ी वैज्ञानिक-वैज्ञानिक महकती है

इन फूलों को छूते ही

नस्लें सड़ने लगती हैं

कौम धड़ाम-धड़ाम गिरते हैं

जैसे नदी अपने किनारों को काटती-छाँटती है

भक्तों का मोतियाबिंद

क्रान्ति के रस से छट जाता है

क्रान्ति श्रमजीवियों का प्रसाद है

निठल्लों पर कोड़ा है क्रान्ति।

(सुनो भूदेव, पेज 160-61)

आनंद सर के “सुनो भूदेव” की “भगत सिंह ने कहा था” कविता में संसदीय लोकतंत्र और नौकरशाही के झाँसे से बचते हुए क्रान्ति का आह्वान है। “मसौदा” कविता के माध्यम से आनंद सर ने कहा है कि माँगने से अधिकार नहीं मिलता है। क्रान्ति ही एकमात्र विकल्प है। एक क्रान्तिकारी संगठन बनाएँ। उसमें युवाओं के संगठन, स्त्रियों के संगठन, मजदूरों के संगठन और भी तमाम जन संगठन का निर्माण करें। सब को शिक्षा सब को काम। जाति आधारित विज्ञापन बन्द।अंतरजातीय और प्रेम विवाहों को प्रोत्साहन। जाति संगठन, जाति सभा, खाप व जाति पंचायत पर कानूनी प्रतिबंध। धर्म समागमों पर रोक। मठ-मंदिरों पर रोक। ऑफिस और स्कूलों में धार्मिक कर्मकाण्डों पर रोक। बड़े-बड़े फ़ार्मों, जागीरों, खेती की जमीनों, भुसम्पत्तियों, बागानों, उद्योगों, संसाधनों का राष्ट्रीयकरण। सफाई का कोई भी कार्य कोई जाति नहीं करेगी। मशीनीकरण और ड्रेनेज सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाया जाएगा। शेयर बाजार बंद। जमाखोरी, मुनाफाखोरी, दलाली, खानदानी पेशे बन्द। सूदखोरी दंडनीय अपराध। निजी शिक्षण संस्थानों का राष्ट्रीयकरण। प्राइवेट प्रैक्टिस , निजी चिकित्सालय, निजी मेडिकल कॉलेज प्रतिबंधित। उत्पादन के सभी कल-कारखाने राजकीय नियंत्रण में लिए जाएँगे। सभी झुग्गी-झोपड़ियाँ प्रतिबंधित कर उन्हें नगरीय आवास दिलाए जाएँगे। पुराने महलों, कई घरों के मालिकों के सभी घर, पाँच सितारा होटलों, बारात घरों, विलासिता के अड्डों को आवासीय काम्प्लेक्स में तब्दील कर दिया जाएगा। बड़े पैमाने पर आवासीय कॉलोनियों का निर्माण किया जाएगा। बहुत निजी स्तर पर आस्था, पूजापाठ, अरदास, नमाज को सम्मान। सामाजिक और राजनीतिक जीवन में धर्म का दखल पूर्णतः वर्जित होगा। मठ, मंदिर, वक्फ, गुरुद्वारों, चर्चों की जमीनें और संपत्ति जप्त। धार्मिक संगठन और धार्मिक गोलबंदी दंडनीय अपराध घोषित किया जाएगा। जाति प्रमाण पत्र नहीं जारी किए जाएँगे। आरक्षण खत्म। शिक्षा और नौकरियाँ अनिवार्य। निजी संपत्ति किसी के पास नहीं होंगी। निजी वाहन की जरूरतें खत्म। आवश्यकतानुसार सभी को परिवहन उपलब्ध होगा। सर्वहारा की तानाशाही होगी। जनवादी केन्द्रीयता होगी। स्वतंत्रता का अर्थ बदल जाएगा। उत्पादन का उद्देश्य मुनाफा कमाना नहीं बल्कि सभी की आवश्यकता की पूर्ति होगी। न कोई ब्राह्मण होगा न कोई चमार और न ही किसी की कोई अलग किस्म की अलग औकात। बहुत खूबसूरत आनंद सर। आप को बधाई। आनंद सर के अतिरिक्त अभी तक किसी दलित कवि ने क्रान्ति के मसौदे पर कुछ नहीं लिखा है। या तो दलित क्रान्ति करना नहीं चाहता है या तो क्रान्ति के मसौदे को संज्ञान में नहीं ले पाया है। आनंद सर ने इस कविता में बिल्कुल स्पष्ट करने की कोशिश की है कि क्या-क्या और कैसे-कैसे कर दिया जाय, जिससे कि जातिप्रथा की सदियों पुरानी मजबूत और संगमरमरी दीवार भरभरा कर गिर जाय।

संदीपा दीक्षित

मया बाजार, फैज़ाबाद

02.11.2020

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