तेलंगाना सरकार द्वारा 16 जनवादी संगठनों को बैन किये जाने के विरोध में उतरे छात्र संगठन 

0
2135
विशद कुमार
आज जहां सारा देश कोरोना महामारी से जूझ रहा है, सोशल मीडिया और अखबार ऑक्सीजन व वेंटिलेटर के अभाव में मर रहे लोगों की खबरों से भरे पड़े हैं, वहीं दूसरी ओर तेलंगाना की राज्य सरकार व केंद्र सरकार इस आपदा को जनवादी संगठनों व लोकतांत्रिक आवाजों के दमन के अवसर के रूप में इस्तेमाल कर रही है।
जिसका जीता-जागता उदाहरण है पिछले दिनों तेलंगाना की चंद्रशेखर राव सरकार ने केंद्र सरकार के इशारे पर रिवोल्यूशनरी राइटर्स एशोसिएशन (विरसम) सहित 16 जन संगठनों (जिसमें 4 छात्र संगठन भी शामिल हैं) को प्रतिबंधित कर दिया गया।
इस फासीवादी फैसले के खिलाफ इंक़लाबी छात्र मोर्चा ने एक प्रेस बयान जारी कर कहा है कि के. चंद्रशेखर राव के नेतृत्व वाली तेलंगाना की राज्य सरकार ने मोदी- शाह और NIA के इशारे पर चार छात्र संगठनों ‘तेलंगाना विद्यार्थी वेदिका (TVV)’, ‘डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन’, ‘आदिवासी स्टूडेंट्स यूनियन, तेलंगाना’ ‘विद्यार्थी संघम’ सहित ‘रेवोल्यूशनरी राइटर्स एसोसिएशन’ (विरसम) और 11 अन्य जन संगठनों को माओवादियों का संगठन बता कर प्रतिबंधित कर दिया है। इंक़लाबी छात्र मोर्चा तेलंगाना सरकार के इस फासीवादी कदम का पुरजोर विरोध व निंदा करता है।
वहीं भगतसिंह छात्र मोर्चा ने एक प्रेस बयान जारी कर कहा है कि हर चुनावी पार्टी अपने आप को जनता का उद्धारक बताती हैं लेकिन सत्ता में आते ही जनता का खून ही चुसती है और जनता का ही भरपूर दमन करती है। लोकतंत्र का ढोंग रचने वाली पार्टियां यह बताए कि यह कैसा लोकतंत्र है? जिसमें जनता का पक्ष रखने वाले संगठनों को प्रतिबंधित किया जा रहा। भगतसिंह छात्र मोर्चा इस प्रतिबन्धन को जनता पर एक और फासीवादी हमलों के रूप में देखता है। पुरे देश में आज जनता मोदी की केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की साम्राज्यवाद परस्त और सामंती नीतियों से परेशान हैं। आदिवासी इलाके हो या कृषि सेक्टर हर तरफ फासीवादी ताकतें अपना पैर पसार रही। देश को हिंदू-मुस्लिम के नाम पर बाँट कर देश में साम्राज्यवादी पूंजी का विस्तार करने की साज़िश रची जा रही। इसी का विरोध करते हुए आज 6 महीने से भी अधिक दिनों से कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली के चारों तरफ किसान आंदोलनरत है। इसके पहले CAA-NRC-NPR के खिलाफ भी देश में हुजूम उमड़ पड़ा था। जनता के इन्ही प्रतिरोधों को रोकने के लिए इन सरकारों ने दमनकारी रूप ले लिया है। जनता का विरोध जितना बढ़ता है सरकारें उतना दमन करती है। 2018 में भीमाकोरेगाँव हिंसा के मामले में सुधा भारद्वाज, वरवरा राव, रोना विल्सन, शोमा सेन, वर्णन गोंजालवेज आदि को जेल में कैद कर रखा है वही हिंसा के असली जिम्मेदार संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे मोदी-अमित शाह की शह पर खुले खुले घूम रहे हैं। पिछले साल 2020 में भी फासीवादी मोदी सरकार ने कोरोना आपदा को अवसर बनाते हुए दर्जनों झूठी गिरफ्तारियां की और सभी को जेल में भर दिया जिनमें उमर खालिद, मशरत ज़हरा, हैनी बाबू, देवांगना, नताशा आदि शामिल हैं।
  मोर्चा ने कहा है कि पूरे देश के शासक वर्गों को आज एक भूत सता रहा है- माओवाद का भूत। अपने हर विरोधी को माओवादी बता कर उसका दमन किया जा रहा है। चाहे किसानों का आंदोलन हो, मजदूरों का आंदोलन हो, छात्रों का आंदोलन हो या मानवाधिकार के लिए आवाज उठाने वाले संगठन हों, सबको माओवादियों द्वारा संचालित बताया जा रहा है। ऐसे आम लोगों के अंदर यह जानने की जबरदस्त उत्सुकता पैदा हो रही है कि आखिर ये माओवाद क्या है? माओवादियों की माँगें क्या हैं? वे कैसा समाज चाहते हैं? उन्हें बोलने क्यों नहीं दिया जा रहा? उन्हें क्यों प्रतिबंधित किया गया है?
इस साम्राज्यवाद परस्त पूंजीवादी और अर्धसामंती व्यवस्था के हाथ जनता के खून से सने हुए हैं। देश के कोने – कोने में चाहे किसी भी पार्टी की सरकार हो, सब जनता का खून चूसने में एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। इसका विरोध करने वालों और सच्चे लोकतंत्र के लिए संघर्ष कर रहे संगठनों और एक्टिविस्टों का बर्बरतापूर्वक दमन किया जा रहा है। ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिन लोगों के हाथ खुद खून से सने हुए हों उन्हें क्या हक है किसी संगठन को प्रतिबंधित करने का?
मोर्चा ने सवाल करते कहा है कि लोकतंत्र का ढोंग करके 70 सालों से देश की सत्ता पर लुटेरे वर्गों ने कब्जा कर रखा है। इन लुटेरों से यह पूछा जाना चाहिए कि किसकी इजाजत से वे देश की खेती- किसानी, उद्योगों, खानों- खदानों, जल- जंगल- जमीन आदि को कौड़ियों के भाव देशी- विदेशी पूंजीपतियों के हवाले कर रहे हैं। जो सरकारें आम जनता को अस्पताल, बेड व ऑक्सीजन सिलेंडर तक नहीं उपलब्ध करवा पा रही हैं, असली अपराधी तो वो हैं। उन्हें क्या हक है स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे की मांग उठाने वाले संगठनों को प्रतिबंधित करने का? अगर प्रतिबंधित ही करना है तो सबसे पहले RSS- BJP- बजरंग दल- विश्व हिंदू परिषद- हिन्दू युवा वाहिनी- सनातन संस्था जैसे देशद्रोही व दंगाई संगठनों को प्रतिबंधित किया जाए। रिवोल्यूशनरी राइटर्स एसोशिएशन (विरसम) पिछले 60 सालों से जनतंत्र की लड़ाई लड़ रहा है। इसकी स्थापना जाने- माने बुद्धिजीवी और क्रान्तिकरी कवि वरवर राव ने किया था। जो भीमा कोरेगांव के फ़र्ज़ी केस में हाल ही में जेल से जमानत पर रिहा हुए हैं।
क्या हमारे लिए गुस्से व शर्म की बात नहीं है कि देश के प्रतिष्ठित व वरिष्ठ लेखकों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेलों में ठूंस दिया गया है और जनसंहारों के अपराधी प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और मुख्यमंत्री बने बैठे हैं? इन 16 जन संगठनों को प्रतिबंधित करने का तात्कालिक कारण है इनके द्वारा जन विरोधी व साम्राज्यवाद परस्त तीन कृषि कानूनों का विरोध, अलोकतांत्रिक नागरिकता संशोधन अधिनियम CAA-NRC का विरोध और भीमा कोरेगांव मामले में जानबूझकर फंसाये गए 16 एक्टिविस्टों की रिहाई के लिए इनके द्वारा संघर्ष किया जाना। इंक़लाबी छात्र मोर्चा देश के समस्त न्यायपसंद व जनवादी लोगों, लेखकों, बुद्धिजीवियों, छात्र- छात्राओं व संगठनों से यह अपील करता है कि इन 16 संगठनों पर लगाये गए प्रतिबंध के खिलाफ उठ खड़े हों व आवाज़ उठाएं। क्योंकि आज अगर आप चुप रहे तो कल आपकी भी बारी आएगी। फिर कोई बोलने वाला शेष बचा नहीं रहेगा क्योंकि ये सिलसिला यहीं नहीं रुकने वाला है।
मोर्चा मार्टिन निमोलर की पंक्तियों को उद्धृत करते हुए कहता है –
पहले वे कम्युनिस्टों के लिए आए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था
फिर वे आए ट्रेड यूनियन वालों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था
फिर वे यहूदियों के लिए आए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं यहूदी नहीं था
फिर वे मेरे लिए आए
और तब तक कोई नहीं बचा था
जो मेरे लिए बोलता
भगत सिंह छात्र मोर्चा कहता है क्या हमारे लिए गुस्से व शर्म की बात नहीं है कि देश के प्रतिष्ठित व वरिष्ठ लेखकों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेलों में ठूंस दिया गया है और जनसंहारों के अपराधी प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और मुख्यमंत्री बने बैठे हैं? इन 16 जन संगठनों को प्रतिबंधित करने का तात्कालिक कारण है इनके द्वारा जन विरोधी व साम्राज्यवाद परस्त तीन कृषि कानूनों का विरोध, अलोकतांत्रिक नागरिकता संशोधन अधिनियम CAA-NRC का विरोध और भीमा कोरेगांव मामले में जानबूझकर फंसाये गए 16 एक्टिविस्टों की रिहाई के लिए इनके द्वारा संघर्ष किया जाना। भगतसिंह छात्र मोर्चा देश के समस्त न्यायपसंद व जनवादी लोगों, लेखकों, बुद्धिजीवियों, छात्र- छात्राओं व संगठनों से यह अपील करता है कि इन 16 संगठनों पर लगाये गए प्रतिबंध के खिलाफ उठ खड़े हों व आवाज़ उठाएं। क्योंकि आज अगर आप चुप रहे तो कल आपकी भी बारी आएगी। फिर कोई बोलने वाला शेष बचा नहीं रहेगा क्योंकि ये सिलसिला यहीं नहीं रुकने वाला है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here