इलिका प्रिय की कहानीः मजदूरों का गांव

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गाड़ी की घर्र घर्र की आवाज उस शांत माहौल में गूंज रही थी। लोग नींद में उंघ रहे थे। किसी को बेहोशी आ रही थी, किसी को मतली, पर थकान और भूख उन्हें नींद में ले जाने के लिए तैयार थे। रवि का कंठ सूख रहा था। उसने बोतल उठाकर देखा एक बूंद भी निकलने की संभावना न थी। क्या यही दिन देखने के लिए वे चल पड़े थे? उसके आंखों के सामने कई तस्वीर उभर रहे थे, जो काम किया, उसका पेमेंट मिलेगा, यही सोचकर वे दो महीने रूक गये थे और कभी चलने की सोची भी तो लाॅकडाउन कड़ाई से लागू हो गया। अपने छोटे से कमरे में 10 साथियों के साथ वह गर्मी बिताना तब कितना खतरनाक था, जब किसी पर भी कोरोना का शक हो सकता था। सिर्फ पैसे मिलने की लालच ने उन परिस्थिति में भी वहां बंधक बना रखा था। पर पैसे न मिले, एक पैसे भी न मिले और जो जेब में थे वे भी चले गयेे, क्या खाएं, क्या पीएं, कैसे भूख मिटाए? भीषण समस्या आ खड़ी हुई थी। अब बस अपना घर अपना गांव ही याद आ रहा था।
जब लाॅकडाउन में ठील मिली और प्रवासी मजदूरों की वापसी को हरी झंडी दिखाई गयी तब उसे याद है कई साथी उसी स्थिति में घर को निकल गये थे, पैदल ही क्योंकि उन्हें न मोबाइल एप का ज्ञान था, न ही पैसे थे इतने की भाड़ा देकर घर जा सके! पर रवि और उसके जैसे लोग रूके थे वहां। पैदल जा पाने की जहमत नहीं उठा सकते थे। कोरी -कोरी जोड़कर पैसे जमा किये, बस से जाने को। पर जैसे ही वे निकले थे, फैक्टरी मालिक ने उन्हें रोक लिया था, नौकरी से निकाल देने की धमकी देकर, पैसे न देने की धमकी देकर और इस हालत में उनका लौटना भी रूक गया। पर वे रोते किसके कंधे पर सर रखकर, उनके तमाम साथी तो ऐसी ही समस्या झेल रहे थे।
पूरे देश की हालत किसी से कहां छुपी थी। जगह-जगह मजदूरों का रैला था, पैदल जाने वालों का, बसों में जानवरों की तरह ठंुस-ठुस कर जाने वालों का, ट्रेनों, बसों में दुगना पैसा देकर जाने वालों का, कहीं कोई ट्रकों मे दुगने पैसे देकर भरी गर्मी में लोहे के पाइपों पर बैठकर घर लौट रहे थे। अजीब यातना, हद दर्जे की यातना। और तब जाकर सरकार को शर्म आई और श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलवाई। और अब स्थिति यह थी कि जिसे दो दिनों में झारखंड पहुंचना था, बिहार पहुंचना था, आज चैथा दिन था, वे कहां थे उन्हें पता नहीं?
जो खाना लाए थे, वह खत्म हो गये थे, सरकार ने हर स्टेशन पर चिप्स के जो पैकेट रखवा दिये थे, वही कहीं-कहीं से उठाकर लोग अपनी भूख मिटा रहे थे, दो दिनों से। पर अबकी तो स्टेशन भी नहीं दिखता? जहां चिप्स टंगे हो, जंगली इलाका, विरान इलाका। पीछले 12 घंटों से! क्या ड्राइवर को मालूम था उसे इस रास्ते से होकर जाना है?
तेज हवा के झोंके ने रवि के माथे के पसीने को पोछ दिया, वह फिर अपनी सोच में डूब गया, उसे याद आ रहे थे वह शब्द जो मालिक ने कहा था, जाओ जहां जाना है जाओ, पर जा न पाओगे?’’ आज उनके शब्दों का अर्थ उसे समझ में आ रहा था, उसे ऐसा लगा जैसे यह उसके मालिक का ही आदेश था कि ट्रेनें घरों तक न पहुंच सके, वे मुड़कर उनकी फैक्टरी में ही पहुंचे। इस भूलभुलैया सफर में सैकड़ो लोग गुम हो या न हो, पर गांव लौटने को लालायित भीड़ डर कर रूक तो जाएगी, उनकी फैक्टरियों के लिए।
रवि कुछ सोच ही रहा था, कि गाड़ी ने हिचकोला खाया, यानी गाड़ी रूक रही थी कोई स्टेशन था, पूरे 13 घंटे बाद। रवि ने बाहर झांका, हां कौन सा स्टेशन मालूम नहीं, पर है, क्या नल है? क्या पानी है हां! हां! है। वह झट उठा और दरवाजे की ओर बढ़ा, वहां पहले से ही लोगेां की भीड़ खड़ी हो गयी थी। जैसे ही गाड़ी धीमी हुई वे कूद पड़े, कोई गीर भी गया, पर सभी इस प्रकार भाग रहे थे, मानो जिंदगी और मौत का खेल खेल रहे हो, कब कौन-सा रूप झेलना पड़े, उन्हें मालूम न था। कल की अंधयारी से बचने के लिए वे हर जद्दोजहद में लगे हुए थे।
नलों पर धक्का-मुक्की की भीड़ उभर पड़ी, कौन कितना भर रहा था पता नहीं, अब जब पानी ने खाने की जिम्मेदारी ले ली थी, तब हर कोई अपनी भूख मिटाने की हद तक पानी भर लेना चाहता था। रवि ने भी धक्का-मुक्की की और बड़ी मुश्किल से दोनों बोतलों में पानी भर पाया, ट्रेन ने भोंपू बजा दिया था और अब अपने भटके रास्ते पर चलने को फिर से तैयार हो चुकी थी। सभी श्रमिक फिर अब ट्रेन की ओर दौड़ रहे थे। रवि भी ट्रेन के दरवाजे तक पहुंच चुका था। ट्रेन का दरवाजा पकड़ते ही ट्रेन तेज हो चली थी, रवि ने पीछे मुड़कर देखा, कुछ लोग गिरते-पड़ते रेल के दरवाजे की ओर दौड़ रहे थे, एक-दूसरे को धक्का देकर दरवाजा पकड़ रहे थे और दरवाजे पर चढ़ने वालों की इतनी भीड़ थी कि उसे भेदकर अंदर घुस पाना मुमकिन न था। हर व्यक्ति उस भीड़ को धकेलकर चढ़ जाना चाहता था। पता नहीं इसमें कोई छूटे भी होगें या सब चढ़ सके होंगे?
इस दरवाजे की ओर भी कुछ लोग दौड़ रहे थे, रवि ने हाथ बढ़ा दिया, किसी ने हाथ पकड लिय़ा और उसने उपर खींच लिया। उपर चढ़ने के बाद उसकी नजर उसपर पड़ी वह दिपलाल था। चेहरा काला हो चुका था, गहरी थकान चेहरे पर साफ दिख रही थी। उसे देखकर रवि एक पल ठिठका, फिर अपनी सीट पर आकर बैठ गया। दिपलाल भी उसी जगह बैठने की जगह ढुंढने लगा, ऐसा लग रहा था जैसे उसे चक्कर आ रहा हो, रवि ने हिचकते हुए सीट दी, वह बैठेगा या नहीं, पर वह लपककर बैठ गया। कुछ देर उसने अपने दोनों हाथों से चेहरे को ढंका और फिर हाथ हटाकर रवि की ओर देखने लगा।
दोनों एक ही गांव से थे। रवि का घर भुंइया बस्ती में था, जो गांव के एक कोने मंें बसी हुई थी, दिपू यादव बस्ती से था, जो कुर्मी बस्ती के बगल में थी। और उनके कुछ आगे पीछे ही राजपूतों-ब्राहमणों की बस्ती भी थी। राजपूत ब्राहमणों के घर शहर के लिए भले ही बहुत बड़ा महत्व न रखते हो, पर गांव के लिए आलिशान बंग्ले की तरह थे, बड़ी-सी जमीन पर बड़े-बड़े कमरे, बाग बगीचे सब। यादवों, कुर्मियों में कुछ राजपूतों जैसे थे, पर अक्सर की स्थिति उनकी तरह न थी वरना दिपलाल शहर कमाने न जाता। रहने भर घर था बस! रवि भूमिहीनों में था और दिपलाल दो बीग्घा, तीन बीघा वालों में। 20 बीघा पच्चास बीघा वाले यादवों इनसे भी सीना तानकर चलते थे। राजपूतों और ब्राहमणों की तो बात ही अलग थी। पर ये भी कम कहां थे, वे खुद को भुईयां, पासवानों से कहीं श्रेष्ठ जो मानते थे। अगर राजपूतों का सीना इनके सामने तना दिखता था, तो इनका भी भुंईया, पासवानों, डोमों के सामने। और उनकी भी अपनी बिरादरी थी, पर यह भुईयां बस्ती, जिनकी बस्ती क्या थी, किसी तरह खप्पड़ से ढकी छावनी थी, किसी के यहां दो मिट्टी के कमरे, तो किसी के एक ही। हालांकि आजकल हालत कुछ सुधरे थे, पर नजरिये का हालात कैसे सुधरता?
एक कड़ी की तरह कहीं कोई छोटा था तो अगली ही कड़ी में बड़ा, बस कुछ लोग थे जो सबसे छोटे थे, उपेक्षित थे और गांव के एक कोने में बसे हुए थे। वरना यादव, यादव थे, और भुंइया भुइंया। उसी का तो असर था जो दिपलाल सीना तानकर रवि को घुरता था। रवि जो अपने दोस्तों के साथ यदि कभी उस मैदान में पहुंच जाता, तो उसकी खिल्ली उड़ाने के लिए दिपलाल और उसके दोस्त हमेशा तैयार रहते थे। उन्हें उस वक्त बड़ी चिढ़ होती थी, जब गांव के एक मात्र स्कूल में वह रवि भी पढ़ता था। राजपूत, ब्राहमणों और अमीर यादवों के बच्चे बड़े प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते थे, पर दिपलाल जैसे यादव घर के बच्चे भी वहीं जाते थे, जहां भुंईया बस्ती के बच्चे जाते थे। जहां वे उनके हाथ का छुआ पानी नहीं पी सकते थे, वहां वह साथ में बैठता था, एक बार उसकी पीटाई भी की थी, दिपलाल ने यादव, कुर्मी लड़को के साथ मिलकर।
नफरत की यह बीज लेकर वह शहर भी आया था, जहां संयोग से दोनों एक ही फैक्टरी में काम करते थे, वहां भी दिपलाल जैसे कामगार जो कि अपने ओहदे से भी उनसे उंचे पोस्ट पर थे , अपनी जातिवादी नफरत को बनाए रखे थे, और रवि जैसे कामगार को यह शहर भी उत्पीड़न देने से बाज न आती थी। बराबर होकर भी, बराबरी न थी।
पर लाॅकडाउन ने सारे भेद भूला दिये थे, सबसे नीचले स्तर के मजदूर हो या टीम लीडर हो, सबको उसने सड़क पर ला खड़ा किया था। पहले कुछ दिनों तक उनकी जेबें लूटते रहे, उन्हें समान मानसिक पीड़ा देते रहें और यूं कहें जिन्होंने मानसिक पीड़ा सहने का अनुभव पा लिया था, उनके लिये यह थोड़ा कम कष्टदायक था, उनके बनिस्पत जिन्होंने अब तक इस हद तक की मानसिक पीड़ा नहीं उठाई थी। भले ही जातिय भूत अबतक उनके मस्तिष्क से न निकला था, पर लाॅकडाउन ने सबको भेदकर उन्हें लाकर एक ही फर्श पर पटक दिया था, जहां सभी बस एक वर्ग के लोग थे मजदूर वर्ग, जिन्हें छांटकर अमीर वर्ग ने अलग कर दिया था।
सभी मजदूर बेहाल थे, कोई किसी की जाति नहीं पूछ रहा था, जो मजदूर थे, बस वे मजदूर थे। सताए मजदूर, बेबस मजदूर, झंुड पर झुंड, सभी घर भाग रहे थे, कुछ रास्ते में मारे जा रहे थे, इस ट्रेन में भी वे सताई हालत में पड़े थे, दो दिनों का खाना लेकर चलने वाले के लिए इस भटके रास्ते पर चलती गाड़ी में भूखे-प्यासे रहने के सिवाय कोई उपाय न था। किसी के हांेठ सूख रहे थे, किसी की अतंरिया, कोई आखरी सांस गीन रहा था ,किसी को डर था, जिंदगी का अंत यही न हो जाए, भूखे लोग पानी से भूख मिटा रहे थे, तो कुछ के पास पानी भी न था।
एक बेबस भीड़ ! अभी भला कौन कहता कि इस भीड़ को जाति के तराजू में रख दो, तो सैकड़ों में बंट जाएगी, नहीं! वह एक झूठा भ्रम था, छलावा था, लूटेरों का जाल था जो उसके आंखों में पर्दा डालकर उनका सब कुछ लूट लेना चाहते थे, उन्हें बांटकर उनकी ताकत खत्म कर देना चाहते थे, पर यहां सारे पर्दे फट गये थे। रवि ने दिपलाल के सूखते होंठ देखे, रहा न गया और पूछा-‘‘भइया! कुछ खाया आपने!’’
‘‘नहीं! पानी भी नहीं मिला।’’-उसकी आंखें चढ़ी हुई थी, उसने बड़ी मुश्किल से ये दो शब्द कहे। रवि ने बैग में हाथ डाला कुड़कुड़े का एक पैकट था, जो पीछले स्टेशन पर उसने लिया था। उसने हिचकते हुए दोनों हाथ दिपलाल की ओर बढ़ा दिया, जिसमें एक में कुड़कुड़े था दूसरे में बोतल, एक में भूख की हल्की दवा दूसरे में प्यास की, दिपलाल ने झट हाथ बढ़ाकर उसे ले लिया, उसे खाकर उसने पानी पीया और रवि की ओर भी पैकेट बढ़ाया।
-‘‘तुम भी खाओ!’’
‘‘इसी में?’’
‘‘हां! हम अलग हैं क्या?’’-दिपलाल बोला।
रवि हिचका-‘‘भइया ! आप हमारे हाथ का छूआ भी नहीं पीते! ’’
‘‘रवि भाई! अगर आज हम अपनी जाति को न पहचान सके, तो फिर कभी नहीं पहचान सकेंगे। झूठे जात की दीवार ने बहुत तोड़ा है हमें, लूट लिया हमें, अब और नहीं लूटने दो!’’-दिपलाल ने कहा -‘‘हिचको मत! मौका अच्छा है तोड़ दो इसे, तुम भी हम भी! अभी गांव जाना है, वहां घर बसाना है, इस दीवार के साथ हम वहां नहीं जी सकते और यह शहर की फैक्टरी हमें बस पीसने भर जीने देगी। याद रखना होगा तुम और हम और हम सब, हमसब गांव के लोग सब मजदूर है, बस मजदूर है, किसान के बेटे मजदूर। इसके सिवाय हमें कोई दूसरी पहचान नहीं चाहिए। अब जीऊं या मरूं, पर उस दीवार को खड़ा न होने दूं।’’-दीपलाल के स्वर में क्रोध था, ठगे जाने का क्रोध, जिल्लत पाने का क्रोध, यूज हो जाने का क्रोध। उसकी बातें और भी लोग सुन रहे थे, और उन्हें अब लग रहा था यह ट्रेन अनासाय ही भटक कर नहीं चल रही है, इसका भटकना बेकार न था, यह उनकी असली पहचान करने के लिए थी, जो एक ही नाव के सवारी थे, जिनके पास हर रोज रोजी-रोटी की चिंता थी, बच्चों की पढ़ाई की चिंता थी, महंगाई की मार थी, कर्जदार बनने की समस्या थी, सैकड़ों समस्या थी एक बेहर जीवन जीने के रास्ते पर मगर वे जिनके पास यह सब था, अपने मजे के लिए, इनकी एकता तोड़ने के लिए इन्हें बांट रखे थे, जातिय पहचान देकर।
अब दीपलाल ने भी हाथ बढ़ा दिया था, रवि ने भी बढ़ा दिया था, और उस बोगी में बैठे सारे लोग जो किसी न किसी गांव से थे, जिनका कोई न कोई टाइटल था, जिससे जुड़ी उनकी पहचान थी, उस पहचान को भूलकर वे भी उनके बढ़ते हाथ की ओर देख रहे थे, मुमकिन हो कि वे भी गांव जाकर ऐसे ही हाथ बढ़ाएं।

इलिका प्रिय अभी पढ़ाई कर रही हैं और बाल पत्रिका चंपक में कहानियाँ लिखती हैं। इसके अलावा कुछ और पत्र-पत्रिकाओं में लेख और कहानियाँ प्रकाशित। 

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