सत्ता इतनी कमजोर हो चुकी होती है कि वह किसी तरह के प्रतिरोध को स्पेस दे ही नहीं सकती!!!

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वैचारिकी का सवाल

आज की तारीख में पूरी दुनिया में एक ही जैसा माहौल है इसके खिलाफ जिन तत्वों को संघर्ष करना है वह पूरी दुनिया में चिन्हित (टारगेटेड) हैं। या तो उनकी  घेरेबंदी की जा रही है या तो वे जेल में हैं। हिंदुस्तान में तो अभी जेल जाने का सिलसिला शुरू हुआ है लेकिन दुनिया के तमाम मुल्क ऐसे हैं जहां पर हमलोगों की तरह काम करने वाले लोगों की लगभग पूरी की पूरी आबादी जेल के भीतर है जैसे कि टर्की में हुआ, चीन में हुआ, रूस में हुआ। ये सब देश ऐसे हैं जहां पर एक ऐसा तंत्र (सिस्टम) बना दिया गया है कि आप सब कुछ कीजिए: खाइए ,पीजिए, मस्त रहिए, लूटपाट कीजिए उससे कोई फर्क नहीं पड़ता केवल राजनीति (पॉलिटिक्स) पर और सरकार की नीतियों पर आप चर्चा मत करिए। इस तरह का राज्य (स्टेट) ऐसा होता है कि इसके दो पक्ष होते हैं एक पक्ष यह होता है कि राज्य डिक्टेटोरियल है, तानाशाही पूर्ण है, फासीवादी है जो कुछ भी कहते हैं लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि सत्ता आंतरिक तौर पर इतनी कमजोर हो चुकी होती है कि उसके अंदर यह क्षमता (कैपेसिटी) बची ही नहीं है कि वह किसी तरह के प्रतिरोध या विरोध को जगह (स्पेस) दे सके। क्योंकि जरा भी विरोध या प्रतिरोध सत्ता को उखाड़ फेंकने की क्षमता रखता है। जिस मुकाम पर सत्ता का विकास (डेवलपमेंट) नवउदारवादी नीतियों (न्यू लिबरल पॉलिसी) के तहत हुआ है उसने सत्ता के लिए एक बेहद अस्थिर (अनस्टेबल) स्थिति (सिचुएशन) बना दिया है। अर्थव्यवस्था (इकोनामी) भी बहुत अस्थिर (अनस्टेबल) है और इस अस्थिरता (अनस्टेबिलिटी) की वजह से उसके अंदर जरा भी उदारता का समावेश करने का मतलब होता है सत्ता टूट के बिखर (कॉलेप्स कर) जाएगी सत्ता अगर स्थिर (इस्टेबल) हो, मजबूत हो तो वह तमाम मामले को नजरअंदाज कर देती है, विरोध को नजरअंदाज कर देती है और हम लोग कहते हैं कि यह सरकार लोकतांत्रिक (डेमोक्रेटिक) सरकार है। सच्चाई यह होती है कि सरकार लोकतांत्रिक नहीं होती बल्कि सत्ता की स्थिरता (स्टेबिलिटी) होती है जो सरकार को उदार या अनुदार बनाती है। यह अलग बात है कि एक उदारवादी पार्टी होती है और एक अनुदारवादी पार्टी होती है। लेकिन नीति (पॉलिसी) के आधार पर कोई फर्क नहीं होता है। नव उदारवादी नीति के आने के बाद यह परिस्थिति दिखाई पड़ती है। आज जो सबसे बड़ी समस्या हम लोगों के खेमें (वामपंथी खेमे) के भीतर है वह यह है कि हम लोग समाजवाद की एक अवधारणा अपने जेहन में बना करके समाज में काम कर रहे थे मजदूरों में, किसानों में, नागरिकों में, जितना भी काम किया हम लोगों ने।सच्चाई यह है कि समाजवाद की उस अवधारणा ने जमीन पर मूर्त रूप नहीं लिया। उस रूप में समाज ने समाजवाद की हमारी अवधारणा को मान्यता नहीं दी। नौजवान, पढ़े-लिखे, बुद्धिजीवी, प्रोफेसर आदि जो हमलोगों के संपर्क में आए वे समाजवादी बने यह एक अलग बात है लेकिन यह एक सामाजिक आंदोलन का रूप नहीं बन पाया और उसके तमाम कारण है। इन तमाम कारणों में एक प्रमुख कारण यह था कि समाजवाद की जिस अवधारणा को लेकर हम लोग चल रहे थे उसमें कुछ समस्याएं निहित थी। जिसकी वजह से उसका संवाद उसकी स्वीकार्यता समाज में बन नहीं पा रही थी। आज जो पूरे वाम खेमे में निराशा की स्थिति दिखाई पड़ रही है उसका एक प्रमुख कारण यह है कि वह समाजवाद की जिस अवधारणा को लेकर वे चल रहे थे उस अवधारणा को समाज में स्वीकार नहीं किया। इस बात को स्वीकार करना और स्वीकार करके समाजवाद की एक नई अवधारणा के लिए काम करना एक चुनौतीपूर्ण काम है, एक वैचारिक सांस्कृतिक क्षेत्र में नया काम करने जैसा है। उदाहरण के रूप में तीन-चार ऐसे बिंदु हैं जिसे हम समझ सकते हैं। जब मोदी सरकार आती है तो वामपंथी लोग कह रहे हैं कि यह सरकार लोकतंत्र का हनन कर रही है। इस देश में लड़ाई तो लोकतंत्र को पुनः स्थापित करने या अपने हासिल करने की है। जैसे ही हम यह बात कहते हैं वैसे ही इस बात को हम स्वीकार कर लेते हैं कि हमारे देश में किसी न किसी रूप में लोकतंत्र था। अगर किसी न किसी रूप में लोकतंत्र था तो जब हम वामपंथ की पुरानी कार्यनीति पर सोचना शुरू करते हैं तो वह कार्यनीति यह मानती है कि हिंदुस्तान में लोकतंत्र नहीं बल्कि सामंती और औपनिवेशिक सत्ता का प्रभुत्व है और अभी भी हमको आजादी नहीं मिली है वगैरा-वगैरा। यह पूरी एक अवधारणा है और इस अवधारणा का आज के यथार्थ से कोई मेल नहीं बनता है। या तो आज के संदर्भ में यह कहना छोड़ देना चाहिए कि मोदी सरकार लोकतंत्र का खात्मा कर रही है या हम उस अवस्थिति को छोड़ दें जिसमें हम यह कह रहे हैं कि यहां पर सामंतवाद और औपनिवेशिक ताकतों का अभी भी परोक्षतः  नियंत्रण या प्रभाव बना हुआ है। तो यह अवस्थिति अपने आप में अंतरविरोधी है। जब हम कहते हैं कि हमारी सारी लड़ाई लोकतंत्र के लिए है लेकिन सैद्धांतिक तौर पर हम यह कहते हैं कि हम एक ऐसे भविष्य का, एक ऐसे समाज का प्रस्ताव लेकर आए हैं जिसे हम सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के रूप में वर्णित करते हैं कि सर्वहारा वर्ग की हुकूमत होगी, तानाशाही होगी। आज तो हम लोकतंत्र के लिए लड़ रहे हैं लेकिन समाज को हम यह कह कर शिक्षित करने की कोशिश करते हैं कि आप हमारे साथ खड़े होइए ताकि मजदूरों की तानाशाही कायम की जा सके। तो लोकतंत्र को तानाशाही से विस्थापित (रिप्लेस) करने की बात करते हैं। तो जो काम मोदी जी कर रहे हैं  ,लोकतंत्र को तानाशाही से विस्थापित कर रहे हैं वही काम हम भी समाज के हित में मजदूर वर्ग के क्रांति के नाम पर वही बातें करने जा रहे हैं। यह तो विरोधाभासी कथन है। या इस बात को सामान्य रूप में इस तरह कहा जाए कि समाजवाद की हमारी अवधारणा यह थी की ज्यादातर सरकारी नौकरियां सरकारी क्षेत्रों में होंगी जिसे पीएसयू कहा जाता है। पीएसयू और सरकारी विभाग मिला करके एक समाजवादी समाज का बीज रूप हम उस में देखते हैं । समाजवादी समाज की जब हम कल्पना करते हैं तो एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जिसमें सारी आर्थिक गतिविधि एक सार्वजनिक क्षेत्र की गतिविधि होगी। अब दिक्कत क्या है आज का हमारे सामने का यथार्थ यह है कि पब्लिक सेक्टर में काम करने वाले वर्कर स्वयं समाजवाद के प्रति कितने सचेत हैं, स्वयं मजदूर वर्ग के आंदोलन के प्रति कितने सचेत हुए हैं, स्वयं मजदूर वर्ग की आजादी के लिए लड़ने के लिए कितने आगे आए ?यह सवाल हमारे सामने पैदा होता है। हम यह देखते हैं कि इन लोगों की एक बड़ी आबादी ने चाहे वे रेलवे में काम करते हो या पोस्ट ऑफिस में या किसी भी सेक्टर में भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में आने के लिए वोट किया है। और यह भी देखने में आता है कि इस पीएसयू की वजह से मजदूर वर्ग के भीतर एक पूंजीवादी सत्ता का समर्थक सुविधाप्राप्त तबका पैदा हुआ है। अगर इमानदारी से कहा जाए तो समाजवाद की दिशा में आगे बढ़ने का आर्थिक मॉडल जो हमने अपनाया था वह आर्थिक मॉडल ऐसा था जिसने ना तो समाजवाद को बढ़ने में कोई मदद की और ना ही पूंजीवाद को आगे बढ़ने में। मतलब यह कि यह समाजवाद की राह में भी रुकावट बन गया और पूंजीवाद की राह में भी। वास्तविकता में हम देखें तो यह हमें दिखाई पड़ेगा कि जो हमारा आर्थिक मॉडल था वह समाजवाद के राह में भी बेड़ी बना और पूंजीवाद की राह में भी। अगर हम ऐसा कहेंगे कि भविष्य का समाजवादी समाज ऐसा होगा जिसमें हम पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग वाली व्यवस्था लागू करेंगे तो यह बात जनता को समझ में नहीं आएगी। आम जनता सरकारी कर्मचारियों को एक भ्रष्ट और सूदखोर तथा जनता के विरुद्ध काम करने वाले व्यक्ति (इंडिविजुअल) के रूप में देखती है, चाहे वह चतुर्थ  श्रेणी का कर्मचारी हो चाहे वह प्रथम श्रेणी का। इस सच्चाई को हम कैसे छुपाने या ढकने की कोशिश करेंगे। इस तरह से अगर हम आगे बढ़ते जाएं तो जिसे हम समाजवादी संस्कृति कहते हैं, समाजवादी जीवन दृष्टि बोलते हैं वे तमाम चीजें जो हम कह रहे थे वह कहीं से भी समाजवाद का जो हमारे मन में पवित्र भाव था उसके साथ मेल नहीं खाती थी। इसलिए देखा जाए तो जिन-जिन देशों में इन रास्तों पर चलकर समाजवाद आया था उन-उन देशों में आम जनता की समाज के प्रति बहुत नकारात्मक धारणा निर्मित हुई। उस समाजवादी व्यवस्था से उनके मन में एक घृणा और नफरत का भाव पैदा हुआ। और इसका फायदा उठा कर के इन सभी देशों में बहुत भयानक किस्म की तानाशाही पैदा होती है। जितने भी भूतपूर्व समाजवादी देश हैं आज वह भयंकर तानाशाही वाले समाज में तब्दील हो चुके हैं। इसी तरह हम शिक्षा, संस्कृति आदि की भी बात कर सकते हैं। हमने जिन सामाजिक सुधारों को एजेंडा बनाया जैसे धर्म का सवाल जाति का सवाल, ये तमाम सवाल आज कारोबारी सवाल बन गए हैं। तो हम जिस विचार या विचारधारा को लेकर चल रहे थे वही अपने में व्यवहारिक धरातल पर एक निष्प्रभावी, अनुपयोगी दिखाई पड़ने लगी। यह एक ऐसी स्थिति में लाकर हमें खड़ा कर देती है जिससे समाज में एक नए किस्म का वैचारिक संकट पैदा हो जाता है। यह वैचारिक संकट अपने देश में भी पैदा हुआ है और पूरी दुनिया के पैमाने पर भी । इस वैचारिक संकट को अगर हम संबोधित नहीं करते हैं या इसको हल नहीं करते हैं तो नई ऊर्जा, नई उष्मा पैदा नहीं होगी।अगर नई ऊर्जा, नई उष्मा पैदा नहीं होगी तो नए किस्म की एकता भी पैदा नहीं होगी।और नई शक्तियां भी खड़ी नहीं हो पाएंगी। क्योंकि इसमें जो कुछ भी नयापन था उस नएपन के प्रभाव में ही तीस-चालीस साल पहले लोग आए और उन्होंने इतने लंबे समय तक काम किया। लेकिन आज की तारीख में यह एक घिसा-पिटा शो बन गया है। तमाम चीजें ऐसी हैं जो हम लोगों के सामने पैदा होती हैं या हम लोग अमूमन दुनिया भर के बारे में पढ़ते रहते हैं और देखते हैं कि दुनिया के दो ही देशों की क्रांतियों की ज्यादा चर्चा होती है एक रूस की और दूसरे चीन की। रूसी तरीके से या चीनी तरीके से हिंदुस्तान में क्रांति होगी इसकी चर्चा वामपंथी पार्टियां करती रहती हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि दुनिया में वामपंथी विचारों को लेकर तमाम क्रांतियां हुई हैं। यह सारी क्रांतियां अलग-अलग किस्म की हैं और इन सारी क्रांतियों के अलग-अलग सबक हैं। रूस चीन के अलावे जर्मनी की क्रांति का अलग सबक है स्पेन की क्रांति का अलग और इसी तरह पोलैंड, ईरान, वियतनाम, इंडोनेशिया, अल्बानिया, क्यूबा आदि सभी देशों की क्रांतियों के अलग-अलग सबक हैं। हम अमूमन रूस की क्रांति की चर्चा करते हैं, आखिर क्यों? क्योंकि रूसी क्रांति जब हुई तो रूसी क्रांति के नेताओं की पहलकदमी और नेतृत्व में तृतीय इंटरनेशनल यानी कि तृतीय कम्युनिस्ट इंटरनेशनल का गठन हुआ था। पहला इंटरनेशनल मार्क्स के जमाने में बना, दूसरा इंटरनेशनल मार्क्स की मृत्यु के बाद बनता है और तीसरा इंटरनेशनल एंगेल्स की मृत्यु के बाद लेनिन के नेतृत्व में रूस में बनता है। तृतीय कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने कम्युनिज्म या समाजवाद की जो परिभाषा की थी उसी मॉडल पर पूरी दुनिया में काम हुआ था। इसलिए क्रांति की वैचारिकी की बात जब भी आएगी तब-तब तृतीय इंटरनेशनल और तृतीय इंटरनेशनल के बहाने रूसी मॉडल की या एक हद तक बात करें तो चीनी मॉडल की बात होगी। तृतीय इंटरनेशनल की क्रांति की वैचारिकी में बहुत सारी समस्याएं हैं जिस पर चर्चा करना अभी का विषय नहीं है। इन सभी चीजों को लेकर हमें काम करना पड़ेगा। और ना सिर्फ काम करना पड़ेगा बल्कि हम लोगों को इसी संदर्भ में एक वैचारिक पत्रिका की बात भी करनी पड़ेगी और उसे निकालना भी पड़ेगा। इस वैचारिक पत्रिका कि आज बहुत जरूरत है क्योंकि यही आज के वैचारिक ठहराव और जड़ता को तोड़ने का काम कर सकती हैं। यह वैचारिक जड़ता तभी टूटेगी जब तमाम तरह के मौजूद क्रांतिकारी विचारों के बीच में संवाद शुरू होगा। रूसी तरीके ने दुनिया में तमाम तरह के क्रांतिकारी विचारों के साथ संवाद की प्रक्रिया को रोक दिया और सबको किनारे लगा कर के अपने आप को एकमात्र क्रांतिकारी विचारधारा घोषित कर दिया। बाकी सारे विचारों को या तो संशोधनवादी, या ट्राटस्कीवादी, या सुधारवादी आदि ठहरा दिया गया। जबकि ज्ञान का अर्थ होता है कि यथार्थ के तमाम पहलू हो सकते हैं और इन तमाम पहलुओं में संवाद होना चाहिए। कहने का अर्थ यह है कि मार्क्सवाद का गांधीवाद से या अंबेडकरवाद से या फुलेवाद से या अराजकतावाद आदि से संवाद होना चाहिए। और इसके साथ ही साथ किसी देश की संस्कृति और ज्ञान-परंपरा के साथ भी संवाद होना चाहिए जैसे कि भारत की भी अपनी एक संस्कृति, एक ज्ञान-परंपरा है और उसके साथ भी संवाद की जरूरत है। इन संवाद से ही तुलनात्मक रूप से एक ऐसी वैचारिकी पैदा होती है जो लोगों को पराई नहीं लगती बाहरी नहीं लगती। और इससे यह लगता है कि विचारों की भी एक अपनी सातत्यता (कॉन्टिनुटी) होती है। कोई आसमानी विचारधारा के रूप में यह प्रकट नहीं होती। वैचारिक पत्रिका इन तमाम सवालों को संबोधित करने का काम करेगी। चीजों को लेकर हम लोगों को प्रश्नों के रूप में ही सही एक नजरिया लिखित तौर पर तैयार करना चाहिए ताकि वामपंथी आंदोलन में इसे एक बहस के रूप में ले जाया जा सके। निश्चित तौर पर इसके निर्माण की प्रक्रिया सामूहिक ही हो सकती हैं।

                  – ओ.पी.सिन्हा, नरेश कुमार 

 

 

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