देवेश पथ सारिया की कुछ कविताएं

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शीर्षक: ख़ुशनुमा लड़की रोती है ज़ार-ज़ार

(कीर्ति के लिए)

यदि तुम उसके परिचय के घेरे में हो

या उसकी तथाकथित मित्र ‘बिलैया’ के घेरे में

तो तुम ज़रूर जानते होगे

व्हील चेयर पर बैठी ख़ुशनुमा लड़की के बारे में

जो दिन भर चुटकुलों में बतियाती है

बिलैया की टांग खींचे जाती है

परिवार के बच्चों से लाड़ लड़ाती है

इंटरनेट लिंक पर अनाम राय मंगवाती है

किसी की मनुहार पर मीठा गीत गाती है

 

कदाचित तुम उसे मान बैठोगे

सबसे ख़ुश लड़की

पर सुख उपस्थित है

केवल सतह पर तैरती बर्फ़ सा

नीचे गहराई में दफ़्न है लावा

 

वह बनना चाहती थी

डॉक्टर और पार्श्वगायिका

और शायद बन भी जाती

वह बीमारों की तीमारदार होती

या मंच की सुरीली आवाज़

तब तुम उसे मुफ़्त में न सुन पाते

पर एक मुई दुर्घटना

और पिघल गया सपनों का आइसबर्ग

अब वह धंसी हुई है

गाढ़े, तैलीय, चीकट दुख में

 

गीतों पर मिली ऑनलाइन तालियां

उसकी अपूर्ण इच्छा पर मरहम हैं

मज़ाक को‌ बरतती है वह

अवसाद के विरुद्ध

रक्षात्मक तकनीक के रूप में

‘बिलैया’ की मित्रता है

उसका मानवता पर बचा हुआ यक़ीन

किसी के भी बच्चों में

वह देखती है रूप अपने अजन्मे बच्चों का

 

ज़ार-ज़ार रोती है वह

जब देखती है क्रूर ज़ाहिलपना

इस तथाकथित महान देश के लोगों का

धिक्कारती है

महज दिव्यांग कहकर

ज़िम्मेदारी से हाथ धो लेने वाले नेताओं को

जो सरकारी इमारतों तक में

व्हीलचेयर से जाने लायक रास्ते नहीं बनवाते

 

गड़ जाती है शर्म से

जब परिवार वालों को उसे उठाना पड़ता है

नित्य क्रिया के लिए ले जाना होता है

टूटकर,

वह रोती है फूट-फूट कर

दुर्घटना से पहले का जीवन याद करती है

 

आपके सामने जब प्रकट होती है वह

सबसे ख़ुशमिजाज़ लड़की के रूप में

उसके गालों पर सूखे हुए आंसू होते हैं

और अंगूठों के पीछे, गाल पोंछने से लगा नमक

 

~देवेश पथ सारिया

 

शीर्षक: मंत्रबिद्ध

 

कोई लड़की

यूरोप जैसी कला-प्रेमी

पहने हुए सफ़ेद लंबा गाउन

 

उसने राह चलते सुना

किसी कवि के घर

प्रदर्शनी लगी है कविताओं की

कविताओं की प्रदर्शनी?

हम्म्म्म …

वह घुस जाती है भीतर

 

दरवाज़े से लगता बग़ीचा

और बग़ीचे के बाद

उतना ही चौड़ा हॉल

हॉल में रखी अर्द्ध-पारदर्शी बाल्टियां

सफ़ेद कॉटन के कपड़े से ढँकी हुईं

 

लड़की ने कपड़ा उघाड़ा

और बाल्टी के भीतर से निकलीं

कविता की चार पंक्तियाँ

 

लड़की पर एक टोना सा हुआ

वह दूसरी बाल्टी की ओर बढ़ी

वही चार पंक्तियाँ

तीसरी, चौथी, पांचवी

हर बाल्टी में वही चार पंक्तियाँ

फ़िर भी लड़की उकतायी नहीं

और हर बाल्टी से निकाल कर

उसी जोश से पढ़ती रही

उन्हीं पंक्तियों को फ़िर-फ़िर

 

जब सारी बाल्टियों का अर्द्ध-पारदर्शीपन

बाक़ी आधा सच भी उंडेल चुका

वह जाने के लिए मुड़ी वापस

तभी हवा में गूंजने लगीं

कवि की आवाज़

‘कहाँ छुपी थी तुम, आई हो आज’

 

आवाज़ गूंजती रही

सुनाती रही कविताएं तमाम

जो कवि ने लिखी थीं अधूूरी-पूरी

 

लड़की जो बौरा सी गयी थी

चार ही पंक्तियों के जादू में

अब देख रही थी जादू का पोर-पोर

मंत्रबिद्ध रोम-रोम

 

उन कॉटन के कपड़ों को

बाल्टियों से हटाते समय

नहीं पढ़ा था उसने

कपड़ों पर अंकित

चार पंक्तियों के कवि का जीवनकाल

कवि सात वर्ष पहले ही मर चुका था

 

~ देवेश पथ सारिया

 

 

शीर्षक: रचनाकार अपरिपक्व मरता है

 

खंगाले-सँभाले जाने चाहिए

एक हालिया मरे कवि की

अधूरी कविताओं के ड्राफ्ट

 

ज़रूरी नहीं

कि वे सारी कविताएँ लिखी गई हों

जीवन के अंतिम वर्षों में ही

कुछ अटकी रही होंगी बरसों-बरस

बाट जोहती नदी के कलकल प्रवाह की

और कवि करता रहा होगा प्रतीक्षा

विचार के उस प्रस्थान-बिंदु की

जहाँ वह कविता के चरम पर संतुष्ट हो सके

हाय कि जीवन छोटा पड़ गया

उन वांछित अनुभवों के लिए

 

अधपकी रचनाएँ बताएँगी

हर रचनाकार

कुछ अपरिपक्व ही मर जाता है

अतृप्त उड़ती है कवि की आत्मा

 

अंत्येष्टि के फौरन बाद

श्रद्धांजलि सभा की जगह

ढूँढ़ो अधूरी कविताओं की

उस डायरी या कंप्यूटर के फ़ोल्डर को

 

वे कविताएँ नक़्शा हैं

उन कोनों-कुजारों का

जहाँ नहीं पहुँच पाया

अरबों वर्ष पुराना सूर्य

जहाँ पहुँचना चाहता था

कुछ दशक जिया कवि

~•~

बतौर रचनाकार मैं हिन्दी कवि और कथेतर गद्य लेखक हूँ। मैं अपनी कुछ कविताएं आपको प्रेषित कर रहा हूँ।

सम्प्रति:  ताइवान में खगोल शास्त्र में पोस्ट डाक्टरल शोधार्थी।  मूल रूप से राजस्थान के राजगढ़ (अलवर) से सम्बन्ध।

साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशन: हंस, नया ज्ञानोदय, वागर्थ, कथादेश, कथाक्रम, परिकथा, पाखी, आजकल, बनास जन, मधुमती, कादंबिनी, समयांतर, समावर्तन,  जनपथ, नया पथ, कथा, साखी, अकार, आधारशिला, बया, उद्भावना, दोआबा, बहुमत, परिंदे, प्रगतिशील वसुधा, शुक्रवार साहित्यिक वार्षिकी, कविता बिहान,  गाँव के लोग, ककसाड़, अक्षर पर्व, निकट, मंतव्य, मुक्तांचल,  उम्मीद, विश्वगाथा, गगनांचल,  रेतपथ, कृति ओर, अनुगूँज, प्राची, कला समय, पुष्पगंधा आदि ।

समाचार पत्रों में प्रकाशन: राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर,  प्रभात ख़बर,  दि सन्डे पोस्ट।

 

वेब प्रकाशन: सदानीरा, जानकीपुल, हिंदवी, कविता कोश, पोषम पा, हिन्दीनेस्ट, इंद्रधनुष, अनुनाद, बिजूका, पहली बार, समकालीन जनमत, मीमांसा, शब्दांकन, कारवां, साहित्यिकी, द साहित्यग्राम, लिटरेचर पॉइंट, अथाई, हिन्दीनामा।

 

विशिष्ट: मेरी कविताओं का अनुवाद मैंड्रिन (यूनाइटेड डेली न्यूज़ अखबार) में प्रकाशित हो चुका है।

 

 

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