अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरुद्ध कथित कम्युनिस्ट देशों की जनता का पक्ष लेना ही होगा

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प्रश्न है कि क्या उत्तरी कोरिया एक समाजवादी मुल्क है? मेरा मानना है कि जो देश अमेरिका जैसे क्रूर साम्राज्यवादी देश के साथ लोहा ले रहा है और उससे किसी भी स्थिति में युद्ध के लिए तैयार है, अमेरिका ने जिसे चारों ओर से घेर रखा है और आधुनिक मिसाईलों से उसके निशाने पर है, वह देश अमेरिका के सामने किसी भी शर्त पर घुटने टेकने के लिए तैयार नहीं, वह अपने नागरिकों को सम्मान के साथ जीना सिखा रहा है और कहता है कि जीयेंगे तो समाजवाद के साथ और मारेंगे तो समाजवाद के साथ. उसके तमाम नागरिकों को सैनिक ट्रेनिंग लेना अनिवार्य है. वहाँ सभी के लिए एक जैसी शिक्षा व्यवस्था और एक जैसी चिकित्सा व्यवस्था है. अमेरिका की घेराबंदी ने उसकी अर्थ व्यवस्था को युद्ध केंद्रित अर्थ व्यवस्था बना दिया है. भले ही लोग आर्थिक अभाव की जिंदगी जीते हैं किन्तु फिर भी अमेरिका उससे भयभीत रहता है. इसलिए उसे हम समाजवादी मुल्क नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे?
साथी इस पर अपनी टिप्पणी से मुझे अवगत कराएंगे. इसी आशा के साथ.
उत्तर कोरिया साम्राज्यवाद विरोधी मुल्क है, यह सही है। पर वहां की शासक पार्टी बहुत पहले मार्क्सवाद लेनिनवाद को छोडकर ‘जूछे विचार’ को अपना चुकी है जो ऐतिहासिक भौतिकवाद को नकारता है। वे विकास के भौतिक और सामाजिक नियमों को नकार कर मनुष्य को निर्णायक मानते हैं और इस विचार के जरिए विशिष्ट व्यक्ति के नेतृत्व की दिशा में आगे बढते हुए एक विशिष्ट परिवार के नेतृत्व तक पहुंच गए हैं। एक विशिष्ट परिवार को स्थापित रखना है तो निश्चय ही उसके चारों ओर एक विशिष्ट अभिजात्य वर्ग भी खडा होता ही है जिसके हित इस विशिष्ट परिवार को पीढी दर पीढी नेतृत्व में बनाए रखने के साथ संबद्ध हैं। साम्राज्यवादी उसके बारे में जो अतिशयोक्ति भरा दुष्प्रचार करते हैं अपने स्वार्थ में उस पर भरोसा नहीं करते हुए भी एक परिवार और उसके साथ जुडे आभिजात्य के शासन को समाजवादी तो नहीं माना जा सकता और ऐसे शासन में दमन और शोषण का आ जाना अवश्यंभावी है, उसकी मात्रा अमरीकी प्रचार से चाहे कम हो। मेरी नजर में हमें कोरिया में साम्राज्यवादी दखलअंदाजी का विरोध करना चाहिए पर उसे समाजवादी के रूप में प्रशंसित करना तो समाजवाद को बदनाम ही करेगा।
तो क्या वहाँ समाजवादी व्यवस्था के नियम लागू नहीं है? Juche idea kim il sung की विचारधारा थी जो व्यक्ति केंद्रित थी परंतु उस समय के कम्युनिस्ट नेता भी उनके साथ थे. परंतु आपकी ये बात सही है कि वे विकास के भौतिक और सामाजिक नियमों को नकार कर व्यक्ति को निर्णायक मानते हैं. यह चिंतन मार्क्सवाद विरोधी चिंतन ही कहा जायेगा जिससे आगे चलकर दमन और शोषण अवश्यंभावी है. इसलिए जहाँ मार्क्सवाद नहीं है वहाँ समाजवाद का नियम लागू नहीं हो सकता है.
एक विशिष्ट समूह का सत्ता पर अधिकार है तो वहां सर्वहारा अधिनायकत्व का होना मुझे तो नहीं लगता। विशिष्ट समूह की सत्ता का अर्थ है कि वह समस्त श्रमिक वर्ग के अधिशेष को कम या अधिक हस्तगत करता ही है, वह समस्त समाज के उपभोग में से एक भाग स्थाई रूप से हस्तगत कर रहा है। इन दोनों स्थितियों में उसे समाजवाद से पीछे जाना तो माना ही जायेगा चाहे कानूनी तौर पर निजी संपत्ति नहीं भी हो।
पूंजीवाद से समाजवाद के संक्रमण काल में वैश्विक स्तर पर तमाम तरह के प्रयोग, तमाम तरह के व्यावहारिक विचलन देखने को मिलेंगे..! पार्टी का अधिनायकत्व, परिवार का अधिनायकत्व, राजकीय प़ूजीवाद,,, इत्यादि।
क्रान्तियां और प्रतिक्रांतियां भी होंगी..! जब तक पावर सेंटर पूंजीवाद की ओर झुका रहेगा तब तक विशुद्ध समाजवाद आ ही कैसे सकता है..! समाजवाद में तो हिंसा लेशमात्र भी ध होगी, लेकिन जब तक पूंजीवादी राज्य की हिंसा बरकरार है कोई कितना भी समाजवादी क्यूं न हो जाए हिंसा के विचार और व्यवहार के अमानवीय दोष से मुक्त नहीं हो सकता..! इसी प्रकार निजी सम्पति के प्रति मोह और अपनी सत्ता को बचाए रखने की प्रवृत्ति वालों के बोलबाले के बीच समाजवाद का सपना देखने वालों में गस प्रवृत्ति का पूर्णतया लोप नहीं हो सकता..!

एक समय आएगा जब पूरी दुनिया कम से कम समाजवाद के स्वप्न के साथ क्रान्तियों के जरिए या प़ूजीवाद के विकल्प की तलाव में स्वतः राजकीय प़ूजीवाद की अवस्था में पह़ुच जाएगी..! तब उसके सामने पूंजीवादी प्रतिरोध नहीं होगा। यही वह समय होगा जब सामंतवाद, पूंजीवाद, फासीवाद के पुनः वापस आने का खतरा मिट जाएगा..! तब धीरे-धीरे राजकीय समाजवाद में पह़ुचने का सिलसिला शुरू होगा, एक बार सभी देशों के राजकीय समाजवादी हो जाने पर राष्ट्र, वर्ग और हर प्रकार के शोषण से मुक्त साम्यवादी समाज की स्वाभाविक परिस्थिति बनेगी..!
रातों रात किसी देश में साम्यवाद नहीं आ सकता..!
समाजवाद और साम्यवाद किसी अकेले व्यक्ति, अकेली पार्टी के चाहने से नहीं आ सकता, यह पूरे समाज के सामने इसके लिए आवश्यक भोतिक परिस्थिति पैदा होने पर ही आ सकता है..!
समाज में शोषक वर्ग द्वारा स्थापित विचारों, निजी सम्पत्ति के प्रति मोह, व्यक्तिवाद, श्रेष्ठतावाद रातों रात खत्म नहीं हो सकता..! जैसे जैसे कोई व्यवस्था उत्पादन के वितरण का सामाजीकरण करती जाएगी, व्यक्तियों की सुरक्षा और भविष्य के भय को कम करती जाएगी, निजी सम्पत्ति के प्रति मोह कम होता जाएगा..!
हमारा लक्ष्य इस शोषणकारी प़ूजीवादी व्यवस्था का धीरेधीरे अ़त होना चाहिये..!
हम चीन, कोरिया, क्यूबा, वियतनाम की आलोचना की बजाय इनके द्वारा पैदा की गई भौतिक परिस्थितियों में इनके सहयोग से पूंजीवाद को पटखनी दे दें, उसके बाद बनी दुनिया में पार्टी की तानाशाही, परिवार की तानाशाही को समाजवाद की राह की बाधा समझते हुए उसे ठिकाने लगाने का सवाल हल कर ही लिया जाएगा..!
मजदूर से बड़े बड़े कारखानों में बड़े पैमाने पर सामूहिक उत्पादन करता है, पर उसका न तो सामूहिक उपभोग कर पाता है और न ही सरप्लस उत्पादन के वितरण में उसका दखल रहता है..! यह विरोधाभाषी भौतिक परिस्थिति उसे इस उत्पादन व्यवस्था को पलट कर समाजवादी उत्पादन व्यवस्था लाने के लिए प्रेरित करती है..!
पूंजीवाद में उत्पादन में सामूहिकता बस इतनी होती है कि मजदूर अपने शोषण के प्रतिकार में समाजवाद लाने के लिए प्रतिबद्ध पार्टी को राज्य पर नियंत्रण करने में सहयोग दे, उनमें समाजवादी राज्य बनाने की चेतना तभी उत्पन्न होगी जब वह राज्य पूंजीवाद के विराट पैमाने के सामूहिक उत्पादन में शामिल होता है..!
पहले मालिक जाता है, फिर मालिकपना जाता है..!
क्यूबा, उत्तर कोरिया – साम्राज्यवादी दखलंदाजी का विरोध करना चाहिए, पर आज की स्थिति में ये इंकलाबी ताकतों को मदद कर पायेंगे, काल्पनिक बात है।
वियतनाम – लगभग अमरीकी खेमे में है, चीन के साथ गहन अंतर्विरोध है।
चीन – कोरिया, वियतनाम के बाद कहीं भी जनसंघर्ष का साथ नहीं दिया है, बल्कि बांग्लादेश, श्रीलंका से लेकर तमाम उदाहरण हैं जहां जनसंघर्ष के विरुद्ध शासकों का साथ दिया है।
यथार्थपरक स्थिति तो यही है।
क्रांतिकारी आंदोलन को अपने आधार पर चलना होगा और अपने जैसे अंतरराष्ट्रीयतावादी मजदूर आंदोलनों पर, जैसे अभी इटली, ब्रिटेन, आदि के मजदूरों ने फिलिस्तीनी संघर्ष के पक्ष में कार्रवाइयां कीं। इससे अतिरिक्त की उम्मीद मेरी नजर में यथार्थ पर आधारित नहीं। हाँ, विश्व पूंजीवादी खेमे में बढता टकराव द्वंद्व क्रांतिकारी आंदोलन के लिए मौका बना रहा है जैसे प्रथम विश्व युद्ध ने अक्टूबर क्रांति के लिए बनाया था। सवाल हमारे इस मौके का लाभ उठा सकने लायक शक्ति के रूप में संगठित होने का है, एक अखिल भारतीय लेनिनवादी पार्टी के निर्माण का है।
चीन इंक़लाबी ताकतों की मदद शायद न कर पाए पर उसका राज्य पूंजीवादी उत्पादन विशुद्ध पूंजीवादी उत्पादन को ठप कर उन देशों में क्रान्ति की परिस्थितियां जरूर पैदा कर देगा..!
दरअसल कहने का आशय यह है कि चीन क्या है से ज्यादा हमे यह समझना चाहिए कि चीन है..!
इस है से क्या परिस्थिति बनी है

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