अगर एका बनेगी तो लोगों के बीच जाकर, उनके बीच रहकर, उनका हिस्सा बनकर काम करने से

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कामरेड देवब्रत सेन स्मारक व्याख्यान

का० देवव्रत सेन स्मारक व्याख्यानमाला की कड़ी में दिनांक २८–०५–२०२० को उनके जन्मदिन के अवसर पर वर्चुअल व्याख्यान का आयोजन श्री कामता प्रसाद के संयोजकत्व में किया गया। मेहनतकशों की वर्तमान स्थिति, चुनौतियां एवं कार्यभार विषयक व्याख्यान के वक्ता सिद्धार्थ रामू थे।

का० देवव्रत सेन का जीवन कम्यूनिष्ट आन्दोलन के पूर्ण कालिक समर्पित कार्यकर्ता का जीवन था। उनके जीवन के अंतिम चार–पांच वर्ष पेट के कैंसर की असह्य पीड़ा से जुझते एक क्रान्तिकारी का आचरण कैसा होना चाहिए इसकी मिशाल था। जीवन के गिनेचुने अंतिम दिनों में जब मृत्यु ही प्रतिक्षित हो उस कालखण्ड में भी देबू दा युवा साथियों को अपने अनुभवों से दीक्षित करते रहे। अपनी मृत्यु के चंद दिन पूर्व ही कृशकाय शरीर में दर्दनिवारक दवा की भारी डोज के सहारे अपने अंतिम सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्होने भारतीय भूखण्ड की भावी राजनैतिक और सांस्कृतिक दशा और दिशा पर लगभग दो घण्टे के अर्थपूर्ण व्याख्यान में अपने श्रोताओं को अपनी जीवन दृष्टि और भविष्य के सपनों से रुबरु कराया था। जिसके चंद दिनों के उपरान्त ही पूरी तरह से अशक्त हो गए।

दिनांक २८–०५–२०२० को सम्पन्न व्याख्यानमाला की कड़ी में श्री रामू सिद्धार्थ का व्याख्यान मेहनतकशों की वर्तमान स्थिति, चुनौतियां एवं कार्यभार विषय पर था। श्री रामू द्वारा भारतीय कम्यूनिष्ट आंदोलन की सीमाओं, उसके उच्चजातीय मध्यवर्गीय चरित्र पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। श्री रामू ने कामरेड देवव्रत के उस निष्कर्ष से भी सहमति व्यक्त किया कि वर्तमान समय में विभिन्न स्तरों पर छिटके असंख्य कम्यूनिष्ट कार्यकर्ता सिर्फ सैद्धान्तिक बहसों के आधार पर एक प्लेटफार्म पर नही आ सकते है, जो लोग जमीन पर काम कर रहे है वो काम करते हुए ही एकजुटता प्राप्त कर सकते हैं। भारत में वर्गीय चेतना जाति चेतना में घुली मिली है, कम्युनिष्ट आन्दोलन को वर्गीय चेतना तथा जातीय चेतना से समृद्ध दलित और पिछड़ी जाति समूहों से उभरने वाला नेतृत्व ही गतिमान कर सकता है। कोरोना की आपदा ने मेहनतकश और मजदूर तबके को अच्छी तरह से समझा दिया है कि राज्य ने किस तरह से उनको केले के छिलके की तरह फेंक दिया है। कोरोना ने दुनिया को दिखा दिया है कि पूंजीवाद के सबसे बड़े दुर्ग कथित समृद्ध राष्टª किस तरह से विफल हैं। मार्क्सवादी नजरिए से इस देश की सांस्कृतिक अधिरचना का अध्ययन किया जाय तो उसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाएगा जिस पर फूले, पेरियार और ललई सिंह पहुंचे थे। मार्क्स ने जिस प्रकार पूंजीवाद का क्रिटीक प्रस्तुत कर यूरोप के भौतिकवादी चिन्तन को वैज्ञानिक आधार दिया उसी प्रकार भारत में जाति व्यवस्था या ब्राम्हणवाद का क्रिटीक फूले, पेरियार आदि ने प्रस्तुत किया है। वर्तमान समय में ब्राम्हणवाद में सम्मिलित पूंजीवाद का क्रिटिक भारतीय कम्यूनिष्ट आन्दोलन को प्रस्तुत करना होगा, जहां से आगे की राह निकलेगी।


साथियो, 28 मई कॉमरेड देवब्रत सेन की स्मृति दिवस के अवसर पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। ‘मेहनतकशो की वर्तमान स्तिथि चुनौतियां और कार्यभाग विषय’ पर डॉक्टर सिद्धार्थ रामू जो कॉमरेड देवब्रत सेन के साथी और घनिष्ट मित्र रहे हैं, को लाइव व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया। प्रसारण शाम 5 बजे शुरू हुआ और देखते ही देखते– ——–श्रोता जुड़ गए।
डॉक्टर सिद्धार्थ ने देवब्रत सेन को एक मित्र साथी और शिक्षक के तौर पर याद किया।
अपने घंटे भर की बातचीत में डॉक्टर सिद्धार्थ ने कहा कि लॉकडाउन ने साबित कर दिया, पूंजीवाद सिवाए बर्बादी के अब कुछ नहीं दे सकता, मेहनतकशों को रोटी और छत नहीं दे सकता यहां तक कि अपने सबसे बड़े पूंजीवाद मॉडल देश अमेरिका, इटली, फ्रांस और स्पेन में वह कोरोना जैसे संक्रमण का इलाज तक नहीं कर सकता।
उन्होंने कहा कि आज शासक वर्ग इस बुरे समय को अच्छे समय में बदलने की बात कर रहा है, हम अपनी बात को इसी पर केंद्रित करने की कोशिश करेंगे कि मेहनतकश वर्ग इस बुरे समय को अच्छे समय में कैसे बदल सकता है।
अपने 12-14 साल के पूर्णकालिक क्रांतिकारी जीवन के हवाले से उन्होंने कहा कि उनका मानना है अगर कोई क्रांतिकारी संगठन, ग्रुप या पार्टी कुछ प्रगतिशील बहस चलाकर, क्रान्तियों के इतिहास का विश्लेषण करके, मीटिंगें करके, किताबें छाप करके या अनुवाद करके कोई क्रांतिकारी आधार तैयार कर रहा है और इसी आधार के बूते कोई मोर्चा या एका बना लेगा तो वह भ्रम में है और अपने साथ साथ क्रांतिकारी शक्तियों को भी धोखा दे रहा है। अगर एका बनेगी तो लोगों के बीच जाकर, उनके बीच रहकर, उनका हिस्सा बनकर काम करने से। और यह कामबाहरी जैसा या शैलानी मानसिकता से नहीं होगा। यहाँ तक कि अगर कोई मजदूर वर्ग की पत्रकारिता करना चाहता है तो उसे भी बुर्जुआ अखबार, टी वी आदि रिसोर्सों से काम नहीं चलाना चाहिए बल्कि लोगों के बीच रहकर पत्रकारिता करनी होगी, जैसे कि मार्क्स ने अपने समय में किया था।
यहां एक बात का ज़िक्र जरूरी है कि यह एक ऐतिहासिक समय है और इतिहास में ऐसा समय कभी कभी आता है, जब मजदूर वर्ग खुद समझ जाता है कि ये सारे ऐश्वर्य, सड़कें, फ़्लाईओवर, हवाई जहाज, मेट्रो, रेलें उसके लिए नहीं हैं। जबकि यही समझाने में क्रांतिकारियों के पसीने छूट जाते, बीसों वर्ष लग जाते। परन्तु मजदूर वर्ग का यह अहसास उसकी क्रांतिकारी चेतना नहीं है। क्रांतिकारी चेतना के लिए मध्य वर्ग के कुछ लोगों को मजदूरों के बीच जाना होगा। और क्रांतिकारी कार्य करना होगा। क्योंकि यहाँ के मेहनतकश वर्ग की एक हद तक मध्य वर्ग पर निर्भरता है।इसी क्रम में डॉ सिद्धार्थ ने बिना लाग लपेट के कहा कि अपने यहाँ का मार्क्सवादी विज्ञान जड़सूत्रवाद का शिकार है। यहाँ 40-45 साल तक काम करने वाला संगठन जिसके दस्तावेज की पहली लाइन है कि इस देश का कम्युनिस्ट आंदोलन बौद्धिक तौर पर कमजोर है, जाहिर है तब पहला कार्यभार यही निकलेगा की आंदोलन को बौद्धिक तौर पर मजबूत बनाया जाय। उसने किया भी। वह टूट फूट, बिखराव का शिकार रहा, क्रांति नहीं कर पाया पर, एक से एक बौद्धिक पैदा किया। यहाँ के क्रांतिकारी अपने जनसंघर्षों, जननायकों की थाती को नहीं स्वीकारते जैसे कि मार्क्स ने स्वीकारा है कि द्वन्दात्मक भौतिकवाद, मार्क्सवादी विज्ञान, ऐतिहासिक भौतिकवाद…….आप जो भी कह लें वह अकेले मार्क्स की खोज नहीं है। उन्होंने अपना योगदान उसे व्यवस्थित कर समाज को बदलने के विज्ञान के रूप में प्रस्तुत करने को बताया है।डॉ सिद्धार्थ ने देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय की ‘इंडियन फिलॉसफी’ और के दामोदरन की ‘भारतीय चिंतन परंपरा का इतिहास’ का ज़िक्र किया जिन्हें कम्युनिस्ट खेमे में खूब पढ़ा जाता है खूब सराहा जाता है। इन किताबों में इन दार्शनिकों ने राजा राममोहन राय, विवेकानंद, ईश्वर चंद विद्यासागर और गाँधी को सामाजिक क्रांति का नायक माना है। जबकि ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले, अछूतानंद, पेरियार, डॉ अम्बेडकर आदि को सुधारवादी नायक तक के रूप में भी याद नहीं कियाहै। उनके संघर्षों और योगदान पर एक शब्द भी खर्च नहीं किया है। जबकि ये लेखक कम्युनिस्ट खेमे में बड़े श्रधेय हैं, बड़े दार्शनिक के रूप में माने जाते हैं।
अंत में उन्होंने बताया कि आजकल एक बहुत अच्छी बात हुई है। पहले की तरह अनपढ़ और दलित पिछड़े वर्ग का नेतृत्व सवर्णों के हाथ में नहीं है। आप कम्युनिस्ट पार्टियों के ढाँचे को उठाकर देख लीजिए दलित पिछड़े वर्ग से बड़े अच्छे प्रतिभाशाली नौजवान आये हैं वही हमारे उम्मीद की किरण हैं।

प्रस्तुति संतोष कुमार/जनार्दन चौधरी

 

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