“आत्मनिर्भरता स्त्रियों का हक है,” जैन संभाव्य विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग वेबिनार में बोलीं यूथ डिग्निटी अवॉर्ड तथा अंबेडकर सम्मान से सम्मानित – नीतिशा खलखो

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दिल्लीः “जैन सम्भाव्य विश्वविद्यालय के शोधार्थियों द्वारा आयोजित वेबिनार शृंखला, “जेंडर : पूर्वाग्रह , रूढ़िवादिता एवम समानता” के चौथे दिन (दिनांक 16/7/2020) के विषय, “हिंदी साहित्य में स्त्री अस्मिता और अधिकार का पुनर्पाठ” पर दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलतराम कॉलेज की सहायक प्राध्यापिका और यूथ डिग्निटी अवॉर्ड तथा अंबेडकर सम्मान से सम्मानित नीतिशा खलखो ने महत्वपूर्ण व्याख्यान प्रस्तुत किया एवं सत्र की शुरुआत जैन सम्भाव्य विश्वविद्यालय के शोधार्थी कौशल कुमार पटेल ने किया जिनका शोधकार्य, ‘ग्रामीण जीवन के बहुतेरे चित्रकार रेणु और शिवमूर्ति के कथा साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन’ पर है।”

सत्र की शुरुआत में नीतिशा खलखो ने बेहद मृदुभाषी एवं सरल तरीके से विषय की अवधारणा व शीर्षक के महत्वपूर्ण बिंदुओं को स्पष्ट किया। ‘स्त्री अस्मिता एवं अधिकार’ शीर्षक को अपने बौद्धिक ज्ञान और तार्किक विश्लेषणों के आधार पर परिभाषित करने का यथेष्ट प्रयास किया। इस सन्दर्भ में उन्होंने , बुद्ध के अप दीपो भव:, प्राचीन वाङमय भाषा संस्कृत से, अहम् ब्रह्मसि तथा प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह के स्वत्व के उद्धरण को प्रस्तुत किया। साथ ही विषय से जुड़े और स्मृति पर निर्धारित बातें, वंश, जेंडर, दार्शनिक संदर्भों, भाषा तथा पाँचों ज्ञानेन्द्रियों का उद्धरण प्रस्तुत कर इसकी उत्कृष्ट व्याख्या की। वेबिनार में नीतिशा ने नामकरण की संस्कृति की चर्चा करते हुए पूर्वोत्तर भारत के नीसी समुदाय के नामों का हवाला दिया। साथ ही सिमोन द बोउआर पुस्तक के सन्दर्भ और स्त्रियाँ पैदा नहीं होती आदि की चर्चा की।

स्त्रियों के मन में संकुचित भावना का बीज, प्रारंभिक समय से ही बोया जाता है अर्थात जेंडर के सेंस छोटी उम्र में ही डाल दिये जाते हैं। व्याख्यान को आगे बढ़ाते हुए गुड़िया के भीतर गुड़िया और मित्रों मरजानी पुस्तक के कुछ पहलुओं की चर्चा की। हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण साहित्यकारों कृष्णा सोबती तथा महादेवी वर्मा के स्त्री अधिकार सम्बन्धी विचारों को भी प्रस्तुत किया। समानता की आकांक्षा, असमानता के लम्बे समय तक के शोषण, पीड़ा और संत्रास के विरोध से उपजती है। आत्मनिर्भरता स्त्रियों का हक़ है। वेबिनार के दौरान नीतिशा खलखो ने अर्थ स्वतंत्रता के सम्बन्ध में महादेवी वर्मा के कथन का उल्लेख किया। अर्थ स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ता हुआ कदम है।

नीतिशा ने स्त्री अधिकार की चर्चा करते हुए समकालीन कथाकार शिवमूर्ति की कहानी , ‘कुच्ची का कानून’ के कुछ संदर्भों का सटीक विश्लेषण किया और साथ ही अपने व्याख्यान में सीमंतनी उपदेश और मराठी साहित्य में दलित आत्मकथा की चर्चा भी की। व्याख्यान के क्रम में समकालीन कथाकार, रोहिणी अग्रवाल के प्रश्न- दुनिया में क्रूर कौन है ? – स्त्री तथा क्रूरतम स्त्रियां – निर्धन , विधवा और पुत्रविहीन हो आदि प्रश्नों का विश्लेषण किया। पूर्व की एक घटना, राजस्थान में प्रायोजित सती प्रथा के सन्दर्भ का भी उल्लेख किया। नीतिशा ने पुरातन और संस्कृति के नाम पर स्त्रियों के दमन के प्रति मुखालफत और विरोध के स्वर की बातें की तथा संस्कृति और परंपरा के नाम पर शोषित स्त्रियों के प्रति मानवीय संवेदना एवं अधिकार को तवज्जों देने की वकालत की। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों के प्रति व्याप्त असहिष्णुता की एवं कुछ मिथकीय आख्यानों का भी उद्धरण प्रस्तुत किया। देवी के नाम पर पूजी जाने वाली स्त्रियां सिर्फ परंपरा का निर्वहन करने का प्रतीक बन रह गयी है। स्त्री यौनिकता के यथार्थ की भी सीमित शब्दों में व्याख्या हुई।

कैसे सृजन के सबसे खूबसूरत पल को एक पल में रौंदा जाता है भ्रूण हत्या के नाम पर। वेबिनार को आगे बढ़ाते हुए नीतिशा ने अर्थ तृप्ति के भावबोध आदि की व्याख्या की और स्त्री नैतिकता का तालिबानीकरण का उत्तर, रमणिका गुप्ता एवं प्रोफेसर थोराट के उद्धरण के माध्यम से दिया। अपने समय के प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. धर्मवीर के साहित्य के प्रसंग से स्त्री नैतिकता के तालिबानीकरण और बौद्धिक हिंसा की चर्चा भी हुई। प्रश्नोत्तर सत्र में डॉ.जगदीश, शोधार्थी रजनी एवं स्वप्ना जी के स्त्री अस्मिता एवं विमर्श से सम्बंधित प्रश्नों का नीतिशा ने सटीक विश्लेषण किया। सत्र के समापन से पूर्व प्रो वी. सी. डॉ. संदीप शास्त्री ने नीतिशा के व्याख्यान की तारीफ की तथा कहा, प्रश्न के जवाब देने से बेहतर प्रश्नों को उठाना होता है और सत्र के संचालन के लिए शोधार्थियों को शुभकानाएं दी। सत्र का समापन डीन ऑफ़ लैंग्वेज डॉ. मैथली पी राव के धन्यवाद ज्ञापन के द्वारा हुआ। डॉ. मैथली पी.राव ने भी नीतिशा के प्रस्तुत व्याख्यान को अपने सीमित शब्दों के माध्यम से इक्कठा करने का कार्य किया और स्त्री अस्मिता एवं अधिकार से सम्बंधित कुछ अन्य संदर्भों का भी उल्लेख किया। शोधार्थियों का ये व्याख्यान 18 जुलाई तक चलेगा, डॉ. निरंजन सहाय और अजय ब्रम्हात्मज भी वक्ता होंगे। शोधार्थियों द्वारा आयोजित यह वेबिनार हिंदी विभाग द्वारा आयोजित किया जा रहा है। इन सभी वेबिनार का हिस्सा आप भी बन सकते हैं।

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