क्यों ज़रूरी है वैज्ञानिक दृष्टिकोण?

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वैज्ञानिक दृष्टिकोण किसी भी घटना की पृष्ठभूमि में उपस्थित कार्य-करण को जानने की प्रवृत्ति है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण हमारे अंदर तर्कशक्ति विकसित करता है तथा विवेकपूर्ण निर्णय लेने में सहायता करता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण सवाल करना सिखाता है, इंसान को जिज्ञासु बनाता है, यथार्थ से जोड़ता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार वही बात ग्रहण करने योग्य है जो प्रयोग और परिणाम से सिद्ध की जा सके, जिसमें कार्य-कारण संबंध स्थापित किये जा सकें।

जनसामान्य में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करना हमारे संविधान के अनुच्छेद 51, ए के अंतर्गत मौलिक कर्तव्यों में से एक है।इसलिए प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के लिए प्रयास करे।

दुनिया भर में वैज्ञानिक चेतना की बदौलत हो रहे समाज विकास के विपरीत भारत में अंधविश्वासों, रूढ़ियों, पाखण्डों द्वारा समाज के विकास के रास्ते में डाले जा रहे अवरोधों को दूर करने, एक विवेकशील समाज बनाने के उद्देश्य से ही हमारे संविधान में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को मौलिक कर्तव्यों की सूची में शामिल किया गया था। इसका मक़सद भविष्य में वैज्ञानिक सूचना एवं ज्ञान में वृद्धि से वैज्ञानिक दृष्टिकोण युक्त चेतनासम्पन्न समाज का निर्माण करना था, परंतु वर्तमान सत्य इससे परे है।

जब अपने कार्यक्षेत्र में विज्ञान की आराधना करने, अंतरिक्ष यान लॉंच करने से पहले मुहूर्त देखने, नारियल फोड़ने जैसी अवैज्ञानिक हरकतें करने वाले ‘वैज्ञानिकों’ का सामाजिक व्यवहार ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विपरीत हो, तो बाकी बुद्धिजीवियों तथा आम शिक्षित-अशिक्षित लोगों से क्या अपेक्षा कर सकते हैं!

आज भी हमारा समाज कई तरह के अंधविश्वासों, पाखण्डों की जकड़ में गिरफ़्त है। जातिवादी भेदभाव, धार्मिक भेदभाव, ढोंगी बाबाओं का प्रभाव, डायन-चुड़ैल के नाम पर महिलाओं की हत्याएँ, हर काम करने से पहले मुहूर्त देखना, कर्म के बजाय राशि व पूर्व निर्धारित भाग्य पर अधिक भरोसा करना, आधुनिक विज्ञान के नियमों को आधार बनाकर वैज्ञानिक चेतना फैलाने के बजाय धार्मिक ग्रंथों में विज्ञान ढूँढना, आधुनिक चिकित्सा पद्धति के बजाय तांत्रिकों, ओझाओं, पीर-फ़क़ीरों से इलाज/समाधान की उम्मीद करना, वर्षा पाने के लिये यज्ञ या मेंढक-मेंढकी की शादी करवाने, दिन-वार देखकर कहीं जाने, खान-पान का निर्णय लेने, बलि देकर मनोकामना पूरी करने की इच्छा रखने, सूर्य-चन्द्र ग्रहण को राहु-केतु का कोप मानने, शादी के लिये युवक-युवती के सोच-विचार, व्यवहार, मेडिकल फ़िट्नेस जाँचने के बजाय कुण्डली मिलान करने आदि इसके कुछ उदाहरण हैं।

समाज की नस नस में अंधविश्वास, रूढ़ियाँ भरी हुई हैं, रही सही कसर धार्मिक कट्टरपंथ फैलाने वाली राजनैतिक पार्टियाँ कर रही हैं। अपनी नाकामियों को छुपाने, जनता को विवेकशील होने से रोकने के लिये राजनैतिक नेता अंधविश्वासों को बढ़ावा देते हैं। क़ोरोना महामारी को ताली-थाली बजाकर भगाने, महामारियों को देवी-देवता का प्रकोप मानने, गाय पर हाथ फेरने से कैन्सर का इलाज करने, ढोंगी बाबाओं के आश्रमों में मत्था टेकने, उन्हें महिमामण्डित करने, समाज को उन्नति की राह पर ले जाने के बजाय धार्मिक कर्मकांडों, मंदिर-मस्जिद पर उलझा के रखने, रुपये की मूल्य में हो रही गिरावट को रोकने के लिये उन पर देवी देवताओं की तस्वीर छपवाने के सुझाव देने जैसे हज़ारों उदाहरण हमारे समाज में मौजूद हैं जिसमें राजनैतिक नेता अंधविश्वास फैलाते हुए देखे गये हैं।

ईश्वर-अल्लाह की इच्छा से सृष्टि-प्रकृति का संचालन मानने वाले समाज में प्रकृति के नियमों पर पकड़ बना कर नये नये खोज/अविष्कार करने वाले वैज्ञानिकों के पैदा होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
जिन बच्चों को परीक्षा में अच्छे परिणाम लाने के लिये भगवान-अल्लाह की प्रार्थना-इबादत करने की सलाह दी जाती है वे कैसे मेहनत के महत्व को समझ सकते हैं?
पूर्व निर्धारित भाग्य पर भरोसा करने वाला समाज कैसे अपना भविष्य निर्माण खुद करने पर विश्वास कर सकता है?
अपनी ग़रीबी-बदहाली को पिछले जन्मों के कर्मों का फल मानने वाला समाज कैसे उन शोसकों, भ्रष्टाचारियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकता है जो उसकी दुर्दशा के लिये ज़िम्मेदार हैं?
समाज में व्याप्त जातिगत ऊँच नीच को ईश्वर द्वारा पैदा किया गया विभाजन मानने वाले समाज में सामाजिक भेदभाव ख़त्म करना कैसे सम्भव हो सकता है?
धर्म-परम्पराओं की आड़ लेकर महिलाओं पर कई बंदिश लगाने वाले समाज में नारी स्वतंत्रता, महिला सशक्तिकरण कैसे अमल में लाया जा सकता है?

आज वक़्त की पुकार है कि हम तर्कवादी, विवेकशील, वैज्ञानिक दृष्टिकोण युक्त समाज निर्माण करने की ओर आगे बढ़ें। किसी भी देश व समाज का विकास विज्ञान व तकनीकी के विकास व उसका मानवता के हित में उपयोग करने, समाज के तर्कशील, अंधविश्वास मुक्त, सड़ी-गली परम्पराओं से मुक्त होने से ही हो सकता है।अंधविश्वासों, रूढ़िवादी परम्पराओं में जकड़ा समाज उन्नति की सीढ़ियाँ नहीं चढ़ सकता है।

—धर्मेन्द्र आज़ाद

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