भगत सिंह की जयंती पर 23 मार्च को बीएचयू, सिंह द्वार से अस्सी घाट तक जुलूस दोपहर तीन बजे

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वाराणसीः आगामी 23 मार्च को भारत की धरती पर जन्मे मार्क्सवादी विचारक और अमर शहीद भगत सिंह की जयंती पर बीएचयू, सिंह द्वार से अस्सी घाट तक दोपहर तीन बजे शानदार-रंगारंग जुलूस निकाला जाएगा, जिसमें बीसीएम, ऐपवा और दूसरे तमाम लाल झंडा थामने वाले संगठन और समतामूलक व बराबरी-न्याय पर आधारित समाज के पक्षधर इंसाफपसंद नागरिक हिस्सा लेंगे। पुराने कॉ. मेहदी बख्त से प्राप्त पर्चे के अनुसार 23 मार्च का दिन देश की आम जनता की असली आजादी चाहने वाले अमर शहीदों की शहादत का दिन है। 23 मार्च 1931 के दिन अंग्रेजी हुकूमत ने हमारे तीन जांबाज क्रान्तिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को सूली पर चढ़ा दिया था। इन क्रान्तिकारियों की शहादत के 92 साल बाद भी देश के हालात दिन ब दिन बद से बदतर होते जा रहे हैं। देश के आम लोग रोजगार, अच्छी शिक्षा और बेहतर इलाज से वंचित होते जा रहे हैं। ऐसा क्यों?
भगतसिंह और उनके साथियों ने स्पष्टत: और बार-बार अपने बयानों, पर्चों और लेखों में बताया था कि आजादी के संघर्ष में कांग्रेस के नेतृत्व में जो लड़ाई लड़ी जा रही है, उसका लक्ष्य व्यापक जनता की शक्ति का इस्तेमाल करके देशी पूँजीपति वर्ग के लिए सत्ता हासिल करना है, गोरी बुराई की जगह काली बुराई को लाना है, दस फीसदी ऊपर के लोगों की आजादी हासिल करना है। दूसरी ओर उन्होंने साफ-साफ शब्दों में घोषणा की थी कि क्रान्तिकारी आजादी हासिल करने का मतलब 90 फीसदी आम मेहनतकश जनता के लिए आजादी हासिल करना समझते हैं, वे साम्राज्यवाद और सामन्तवाद का नाश करने के साथ ही देशी पूँजीवाद का भी खात्मा करना चाहते हैं। इसी रास्ते अपनी मेहनत की रोटी खाने वाली देश की 90 फीसदी आबादी का चौतरफा विकास संभव था।
लेकिन 1947 के बाद हमें जो आजादी मिली वह आधी-अधुरी साबित हुई। इसमें पूँजीपतियों और दूसरों की मेहनत पर ऐश करने वालों को विकास का भरपूर मौका मिला। जबकि देश की एक बहुत बड़ी आबादी गरीबी, गुलामी और अशिक्षा के दलदल मे ही जीती रही। अधुरी आजादी को ही पूरी आजादी मान लेने के चलते संघर्ष के बलपर हमने जो भी अधिकार हासिल किया था उसका अधिकांश हिस्सा एक एककर हमसे छीनता गया। अब तो आजादी के 75 साल बाद भारतीयों की अंग्रेजी राज से भी ज्यादा लूट होने लगी है। जिन ताकतों के खिलाफ भगत सिंह और उनके क्रान्तिकारी साथियों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया था, उन्हीं गोरे उपनिवेशवादियों और काले अंग्रेजों का मजबूत गठजोड़ आज आम जनता के सामने दीवार बनकर खड़ा हो गया है।
इसलिए नौजवानों का कर्तव्य है की वो भगत सिंह के विचारों को समझे और उसको हथियार बना कर आज एक बेहतर हिंदुस्तान बनाने के लिए अपनी कमर कस लें। हमें एक ऐसा हिंदुस्तान चाहिए जहाँ सबको स्तरीय शिक्षा, हर हाथ को काम, हर पेट को रोटी, हर जरूरतमंद आदमी को दवा-इलाज मिले। जहाँ मजदूरों किसानों और महिलाओं के साथ भेदभाव और शोषण न होता हो। जहाँ मिनटों में करोड़ों रूपये कमा लेने वाले अम्बानी और अडानी जैसे मुनाफाखोरों के पैसे पर पलने वाले नेता और उनकी पार्टियाँ हाड़तोड़ मेहनत करने वाली जनता को नैतिकता का पाठ न पढ़वा सके। वे सत्ता के लोभ में इस देश के लोगों को जाति या धर्म के नाम पर लड़वा न सके। एक ऐसे हिंदुस्तान को साकार करने के प्रयास में जुटना ही भगतसिंह और उसके साथियों की सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
साथियों, आज इस अभियान को लेकर कई अन्य साथी भी देश के कोने-कोने में क्रांति की अलख जगा रहे हैं। हमें उन सबसे भी एका बनाकर। इसे एक मजबूत धारा की शक्ल देना है।
कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने सही कहा है-
विपत्ति में तुम अकेले नहीं हो / असंख्य सोते कुलबुलाते हैं चट्टानों में मिल कर एक धारा बनने को/ इसे पहचानो / राह निकलेगी निश्चय
आयोजकों में सर्वोपरि तौर पर शहीद भगतसिंह विचार प्रसार मंच, ऑल इंडिया सेकुलर फोरम, अखिल भारतीय समन्वय समिति, मानव रक्त फाउंडेशन, इंकलाबी नौजवान सभा, ऐपवा, आइसा, ऐक्टू, बीसीएम, रेहड़ी-पटरी संघ, स्टूडेंट्स फ्रंट, मंच दूतम, दिशा छात्र संगठन, भगत सिंह यूथ फ्रंट, वाई4एस, समाजवादी छात्र सभा वाराणसी, पूर्वांचल किसान यूनियन, वाराणसी और लेखक संगठन जन संस्कृति मंच, प्रगतिशील लेखक संघ शामिल है। जैसे-जैसे और संगठन जुड़ते जाएंगे, उनके नामों को शामिल किया जाता रहेगा।

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