झारखंड ने याद किया सावित्रीबाई फुले को

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·       विशद कुमार

 

पहली बार हुआ है कि झारखंड के लगभग सभी जिलोंं में सावित्रीबाई फुले की 190वीं जयंती मनायी गयी। कई जन संगठनों द्वारा राज्य के विभिन्न हिस्सों में सावित्रीबाई फुले के साथसाथ मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा को भी याद किया गया। जहां झारखंड जनतांत्रिक महासभा द्वारा 03 जनवरी को जमशेदपुर के भुला चौक पर सावित्री बाई फुले और जयपाल सिंह मुंडा की जयंती मनाई गई।

इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि भारत की पहली महिला शिक्षिकासावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ था। वे भारत की एक समाजसुधारिका एवं मराठी कवयित्री थीं। उन्होंने अपने पति ज्योतिराव गोविंदराव फुले के साथ मिलकर स्त्रियों के अधिकारों एवं शिक्षा के लिए बहुत से कार्य किए। सावित्रीबाई भारत के प्रथम कन्या विद्यालय में प्रथम महिला शिक्षिका थीं। उन्हें आधुनिक मराठी काव्य की अग्रदूत माना जाता है। 1852 में उन्होंने अछूत बालिकाओं के लिए एक विद्यालय की स्थापना की थी। उस वक्त सामाजिक अस्पृश्यता इस कदर थी कि वे जब स्कूल जाती थीं, तो लोग पत्थर मारते थे। उन पर गंदगी फेंक देते थे। उस वक्त लड़कियों के लिये जब स्कूल खोलना पाप का काम माना जाता था। अत: समझा जा सकता है कि उस वक्त कितनी सामाजिक मुश्किलों को झेलते हुए खोला गया होगा, देश में एक अकेला बालिका विद्यालय।

वहीं जयपाल सिंह मुंडा के बारे में वक्ताओं ने कहा कि झारखंड अलग राज्य की परिकल्पना सबसे पहले जयपाल सिंह मुंडा ने की थी। उसे धरातल पर उतारने के लिए भी समस्त झारखंडियों को एकजुट भी किया। उन्हीं के परिकल्पना और संघर्ष का ही परिमाण है कि झारखंड एक अलग राज्य बना। मौके पर कृष्णा लोहार, दीपक रंजीत, बिश्वनाथ, स्वपन महतो, बृन्दावन महतो, विष्णु गोप, सुनिल हेम्ब्रम, ठाकुर बास्के, रामपद सिंह सरदार, विष्णु महतो, बिकाश महतो, मंगलराम सहिस, संतोष कुमार, निर्मल, हरिपद महतो, सुभम, विष्णु कर्मकार, तरणी सिंह, महेंद्र सिंह, भरत सिंह, पंकज महतो, कोलोल कर्मकार आदि लोग शामिल रहें।

पहले की नीतियों में ‘शिक्षा तक पहुंच’ पर ज़ोर दिया गया था, जबकि आज ज़रूरत इस बात की है कि शिक्षा की गुणवत्ता पर बल दिया जाए। यहीं से अगर हम नई शिक्षा नीति की समीक्षा शुरू कर दें तो पाएंगे कि यह नीति मानकर चल रही है कि ‘शिक्षा तक पहुंच’ का कार्य पूरा हो चुका है, जबकि यह बात सही नहीं है। आज भी देश में 30 करोड़ लोग निरक्षर हैं और करीब 3.5 करोड़ बच्चे भी स्कूलों से बाहर हैं। दूसरी बात यह है कि पहले की नीतियों में भी शिक्षा की गुणवत्ता को ज़रूरी बताया गया है और यह कहकर स्पष्ट किया गया है कि भारतीय शिक्षा के लक्ष्यों में सबसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति में ‘संवैधानिक मूल्यों’ को व्यवहार में उतारने की क्षमताएं विकसित करना है।

 

 

 

 

 

वहीं ज्ञान विज्ञान समिति, झारखंड द्वारा राज्य के 13 जिलों में सावित्रीबाई फुले का जन्मदिन मनाया गया। इन तमाम जिलों के प्रखंड ग्राम पंचायत स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए गए। अवसर पर अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क और भारत ज्ञान विज्ञान समिति के राष्ट्रीय समिति द्वारा पूरे देश में 3 जनवरी को कॉल फॉर नेशन अभियान के लिए आह्वान किया गया। यह अभियान दिल्ली बॉर्डर पर डटे हुए और आंदोलनरत किसानों के संघर्ष को समर्थन देने के उद्देश्य से किया गया। झारखंड के गिरिडीह जिले में सर्वाधिक 19 स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित किए गए जिसमें दिन में लोगों ने सभा आयोजित कर सावित्रीबाई फुले का जन्मदिन मनाया और वर्तमान में नागरिक शिक्षा को सावित्रीबाई फुले द्वारा संचालित जनभागीदारी और स्त्री मुक्ति तथा नारी सशक्तिकरण के साथ सामाजिक सुधार में शिक्षा की मौलिकता पर चर्चा आयोजित की गई। वहीं रात्रि में लोगों ने अपने घरों के सामने मोमबत्तियां जलाकर और हाथ में तख्तियां लेकर तीन कृषि  काले कानून और नई शिक्षा नीति का विरोध जताते हुए इसे रद्द करने की मांग की गई। इस क्रम में अभियान का हिस्सा बने धनबाद में एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया गया, जहां हजारों की संख्या में महिलापुरुष, मजदूरकिसान, विद्यार्थी युवा शामिल हुए।

इस अवसर पर सावित्रीबाई फुले के जन्मदिन को मनाते हुए उनकी तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित कर कार्यक्रम की शुरुआत की गई, कार्यक्रम को संवोधित करते हुए भारत ज्ञान विज्ञान समिति के राष्ट्रीय महासचिव डॉ काशीनाथ चटर्जी ने कहा कि हमारे देश में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 लागू कर दी गई है। इस नीति पर संसद में बहस किए बिना ही इसे लागू कर दिया गया है। 34 वर्षों के बाद आई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को यह कहकर लागू किया गया है कि आज देश में स्थिति बदल चुकी है और यह नीति आज की परिस्थितियों के अनुरूप है। यह भी कहा गया है कि पहले की नीतियों मेंशिक्षा तक पहुंचपर ज़ोर दिया गया था, जबकि आज ज़रूरत इस बात की है कि शिक्षा की गुणवत्ता पर बल दिया जाए। यहीं से अगर हम नई शिक्षा नीति की समीक्षा शुरू कर दें तो पाएंगे कि यह नीति मानकर चल रही है किशिक्षा तक पहुंचका कार्य पूरा हो चुका है, जबकि यह बात सही नहीं है। आज भी देश में 30 करोड़ लोग निरक्षर हैं और करीब 3.5 करोड़ बच्चे भी स्कूलों से बाहर हैं। दूसरी बात यह है कि पहले की नीतियों में भी शिक्षा की गुणवत्ता को ज़रूरी बताया गया है और यह कहकर स्पष्ट किया गया है कि भारतीय शिक्षा के लक्ष्यों में सबसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति मेंसंवैधानिक मूल्योंको व्यवहार में उतारने की क्षमताएं  विकसित करना है। शिक्षा की गुणवत्ता की अवधारणा भले ही सापेक्ष है और परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होती है, परंतुविश्व नागरिकके विकास का लक्ष्य तो शिक्षा की गुणवत्ता का मूलभूत लक्ष्य है ही। राष्ट्रीय शिक्षा नीति से आज भी देश यह अपेक्षा करता है कि वहगुणवत्ता युक्त शिक्षातक प्रत्येक नागरिक की पहुंच को सुनिश्चित बनाए। दूसरी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षा नीति को भारतीय संविधान की मूल भावना को अपनाना भी है और पोषित भी करना है। परंतु नई शिक्षा नीति के मूल में जाने पर स्पष्ट हो जाता है कि यह गरीब किसान, मजदूर, आदिवासी, दलित पिछड़े वर्ग को शिक्षा से पूरी तरह वंचित करने की कारपोरेट पोषित सत्ता का योजनागत एक एजेंडा है। ऐसे में आज भारत की पहली महिला शिक्षिकासावित्रीबाई फुले की प्रासंगिकता हमारे लिए प्रेरणा श्रोत है। उस कठीन दौर में भी उन्होंने जिस तरह तत्कालीन  सामाजिक परिवेश का मुकाबला करके महिला शिक्षा को बढ़ावा दिया, वह प्रेरणा श्रोत है। आज हमें एक व्यवस्थित शिक्षा के लिए सत्ता से संघर्ष करना होगा। उन्होंने आगे कहा कि वर्तमान कृषि कानून ग्रामीण अर्थव्यवस्था और भोजन की आत्मनिर्भरता को खत्म करने की दिशा में उठाया गया खतरनाक कदम है। इसका हमें पूरजोर विरोध करते हुए किसान आंदोलन के साथ खड़ा होना होगा।

झारखंड विधानसभा के सचेतक और पूर्व मंत्री मथुरा प्रसाद महतो ने कहा कि सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा में जनभागीदारी, सुलभ और समुचित शिक्षा का जो इतिहास रचा है उसे वर्तमान शिक्षा नीति से गहरा आघात पहुंचने वाला है।

अवसर पर पलामू जिले में किसान संवाद का आयोजन किया गया जहां ज्ञान विज्ञान समिति झारखंड के राज्य अध्यक्ष शिव शंकर प्रसाद ने अपने वक्तव्य में कहा कि वर्तमान में जिस कृषि कानून को केंद्र सरकार ला रही है वह कानून देश के किसानों को मंजूर नहीं है, तो सरकार इसे जबरन क्यों थोप रही है? जाहिर सरकार की नीयत खोट है, जो केवल किसानों के लिए ही नहीं बल्कि इस लोकतांत्रिक देश के लिए भी खतरनाक है।

 कोडरमा में ज्ञान विज्ञान समिति झारखंड के जिला अध्यक्ष भारत रामरतन अवधिया और पूर्व प्रांतीय अध्यक्ष असीम सरकार के नेतृत्व में तीन स्थानों पर समारोह आयोजित कर सावित्रीबाई फुले को श्रद्धा सुमन अर्पित की गई और उनके जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए चर्चा की गई। अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि केंद्र सरकार ने पूंजीपतियों और कारपोरेट के हवाले देश की कृषि और शिक्षा को सौंपने की पूरी तैयारी कर दी है, यह बात जनता को समझना और समझाना जरूरी है, ताकि सरकार को रास्ता दिखा सकें। चतरा, लातेहार, गिरिडीह में ज्ञान विज्ञान समिति के समता मंच के नेतृत्व कारी साथियों ने रात्रि में मोमबत्ती जलाकर तथा कार्डबोर्ड पर लिख कर अपना अपना विरोध जताया। नई शिक्षा नीति पर विरोध जर्द करते हुए समता मंच के साथियों में शैलेश्वरी देवी, चिंता देवी, सामंती कुमारी और राखी शर्मा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और सावित्रीबाई फुले के पद चिन्हों पर महिलाओं को संगठित करने का संकल्प लिया। युवा मंच में योगेंद्र गुप्ता, किशोर मुर्मू, प्रेम महोली, हेमलाल दास, मंदिर रविदास ने कार्यक्रम के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस संबंध में ज्ञान विज्ञान समिति के राज्य महासचिव विश्वनाथ सिंह ने कहा कि हम लगातार जनता के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, स्वरोजगार तथा आत्मनिर्भर भारत के लिए प्रयासरत रहे हैं और अगर सरकार इस तरह की कोई कानून लाती है जो जनता को आघात पहुंचाने वाली हो तो समिति जनता को लामबंद कर के और लोकतांत्रिक एवं गांधीवादी तरीके से इस तरह के नीतियों का हमेशा विरोध करती रहेगी और वैकल्पिक रास्ते की तलाश में लगातार प्रयासरत रहेगी। हमारा काम जनता और सरकार के बीच में दूरी को कम करना है तथा एक सेतु का काम करना है एवं जनता के प्रति सरकार कितना जवाब दे बनी रहे और सक्षम और समझदार जनता बनी रहे, इसके लिए हमारी समिति लगातार काम करती रही है और आगे भी करती रहेगी।

 

 

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