हम हैं राही लाक डाउन के

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व्यंग्य
नवेन्दु उन्मेष

पहले हम प्यार के राही थे लेकिन अब हम लाक डाउन के राही हो गये हैं। जब
गांव में रहते थे तो छोटा-मोटा धंधा करते थे। तभी गांव के रमुआ ने आकर
कहा गांव में रहकर मजदूरी करने से अच्छा है। बड़े शहरों में चलो वहां
अच्छा काम मिलेगा और अच्छी पगार भी। हमने पांचवी कक्षा में सरदार पूर्ण
सिंह का लेख पढ़ा था मजदूरी और प्रेम। उस लेख में उन्होंने कहा है कि
मजदूरों को मजदूरी के साथ प्रेम भी दीजिए। रमुआ ने भी कहा कि शहर में
मजदूरी तो मिलती ही है। प्रेम की मिलता है। यही सोचकर हम अपना गांव और
परिवार छोड़कर शहर में चले आये। इसके बाद गांव का वह बरगद का पेड़ छूट गया
जिसकी छांव में हम पले-बढ़े थे। गांव की वह मिट्टी भी छूट गयी जिसमें हम
खेलेकूदे थे। शहर में आकर हम शहर के हो गये।
अब जब लाक डाउन हो गया तो मुझे मालिक ने छोड़ दिया। मकान मालिक ने छोड़
दिया। शहर के लोगों ने छोड़ दिया। सरकार ने विश्वास में मुझे नहीं लिया।
फिर सोचा अपने गांव लौट चलें। तब हमें याद आया एसडी बर्मन का वह
गाना-वहां कौन है तेरा मुसाफिर जायेगा कहां। दम ले ले घड़ी भर रे सैया।
लेकिन हमें दम लेने का मौका कहां मिला। हम तो रेलवे लाइन पर चलते हुए
गांव की और पैदल चल दिये क्यों कि सड़क मार्ग पर पुलिस डंडे चला रही थी।
इसके बाद मीडिया वाले मेरे पीछे पड़ गये। जोर शोर से बताने लगे कि मजदूर
पैदल घर की ओर लौट रहे हैं। मीडिया वालों को मेरे माध्यम से अपनी टीआरपी
बढ़ाने का मौका मिल गया। अब हम मजदूर न होकर टीआरपी बढ़ाने की सामग्री हो
गये। जिसे देखों वह मेरे पीछे पड़ गया। कहने लगा कहां जा रहे हो। वह मेरी
मदद क्या करता। मेरे लिए समस्याएं खड़ी करने लगा। लेकिन हम चलते रहे और
चलते रहे। हम में से कुछ लोग पैदल चलते रहे तो कुछ लोग साइकिल से चलते
रहे। हमने सोचा हम गांधी के सच्चे अनुयायी हैं। गांधी जी पैदल चलते थे।
गांधी जी ने पैदल चल कर देश को आजाद करा दिया था। तो हम भी पैदल चल कर
देश से गरीबी की समस्याओं को उजागर करेंगे। हमने पैदल चल कर देश की गरीबी
को उजागर किया तो सरकार ने मनरेगा में काम देने का वादा किया। मनरेगा के
आर्थिक पैकेज को भी बढ़ाया। राशन में मुफ्त चावल देने का वादा किया। अगर
हम नहीं होते तो मनरेगा का आर्थिक पैकेज भी नहीं बढ़ता।
हमने शहर में भवनों को बनाया। मंदिर-मस्जिद को बनाया। कल-कारखानों को
बनाया। लेकिन उनमें भी हमें ठौर-ठिकाना नहीं मिला। मुझे सिर्फ वहां एक
मजदूर समझा गया। हम हुनरमंद होने के बावजूद एक पैदल यात्री के अलावा कुछ
भी नहीं रह गये हैं। हम वोट बैंक भी बनकर रह गये हैं। जब राजनीतिक दलों
को हमारे वोट की जरूरत पड़ती है वे षहर से बुलाकर अपने पक्ष में वोट दिलवा
लेते हैं। इसके बाद हमें ज्यों का त्यों छोड़कर चले जाते हैं। आखिर हम
मजदूर जो ठहरे। आप ही सोचिये। एक टूटी हुई साइकिल चल नहीं सकती लेकिन
लाकडाउन में टूटा हुआ मजदूर पैदल चलता है। मजदूर को रेलवे लाइन पर चलते
हुए नींद आ गयी तो जिस ट्रेन और रेलवे ट्रैक को उसने बनाया था वहीं ट्रेन
उस पर चढ़ गयी। मजदूर सोच रहा था जिसे हमने बनाया वहीं मेरे लिए आफत बनकर
हम पर टूट पड़ा। इसके बाद हम न घर के रहे न घाट के।
नवेन्दु उन्मेष
शारदा सदन, इन्द्रपुरी मार्ग-एक
राजा जेनरल स्टोर के सामने
रातू रोड, रांची-834005
संपर्क-9334966328

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