राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से 22 दिसंबर को राष्ट्रीय अवकाश व उत्सव दिवस घोषित हो – सालखन मुर्मू

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  • विशद कुमार
दयू प्रदेश अध्यक्ष झारखंड, राष्ट्रीय अध्यक्ष आदिवासी सेंगेल अभियान, एवं पूर्व सांसद सालखन मुर्मू ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि 22 दिसंबर को हासा यानी भाषा जीतकर माहा अर्थात मातृभूमि – मातृभाषा विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। उन्होंने आगे कहा कि 22 दिसंबर 1855  को अंग्रेजों ने संताल आदिवासियों को उनका देश- “संताल परगना ” और “संथाल परगना टेनेंसी कानून” बनाकर आजादी प्रदान किया था। क्योंकि झारखंड के भोगनाडीह गांव में 30 जून 1855 को महान वीर शहीद सिदो मुर्मू के नेतृत्व में 10,000 संताल आदिवासी लड़ाकूओं ने अंग्रेजो के खिलाफ संताल हूल या संताल विद्रोह का बिगुल फूंक दिया था। और अपनी जमीन, जीवन और आजादी के लिए खूनी क्रांति कर बलिदान दिया था। तब मजबूर होकर अंग्रेजों ने संताल आदिवासियों को एक प्रकार से आजाद कर दिया था। जबकि भारत देश को अंग्रेजों ने लगभग 100 साल बाद 1947 में आजाद किया।

सालखन मुर्मू , जदयू प्रदेश अध्यक्ष, झारखंड

22 दिसंबर 1855  को अंग्रेजों ने संताल आदिवासियों को उनका देश- “संताल परगना ” और “संथाल परगना टेनेंसी कानून” बनाकर आजादी प्रदान किया था। क्योंकि झारखंड के भोगनाडीह गांव में 30 जून 1855 को महान वीर शहीद सिदो मुर्मू के नेतृत्व में 10,000 संताल आदिवासी लड़ाकूओं ने अंग्रेजो के खिलाफ संताल हूल या संताल विद्रोह का बिगुल फूंक दिया था। और अपनी जमीन, जीवन और आजादी के लिए खूनी क्रांति कर बलिदान दिया था। तब मजबूर होकर अंग्रेजों ने संताल आदिवासियों को एक प्रकार से आजाद कर दिया था।

उसी प्रकार 22 दिसंबर 2003 को भारत और दुनिया की एकमात्र  बड़ी आदिवासी भाषा – संताली भाषा को राष्ट्रीय मान्यता मिली। आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया। यह भाषा सम्मान दुनिया भर के आदिवासियों के लिए एक महान भाषा सम्मान है। क्योंकि आज भारत और दुनिया की लगभग सभी आदिवासी भाषाएं विलुप्त होने की कगार पर खड़ी हैं।
अतएव हम भारत के मान्य राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से मांग करते हैं कि 22 दिसंबर को राष्ट्रीय अवकाश और उत्सव दिवस के रुप में मनाया जाए। तथा भारतीय इतिहास में दर्ज 1857  के सिपाही विद्रोह की जगह 1855 के संताल हूल को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का दर्जा प्रदान किया जाए। चूंकि 1857 का सिपाही विद्रोह एक कारतूस या गोली में गाय/ सूअर की चरबी के खिलाफ विरोध था। जबकि 1855 का संताल विद्रोह सीधे-सीधे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता का संग्राम था।
हम संयुक्त राष्ट्र या UN से भी मांग करते हैं कि जिस प्रकार पश्चिमी पाकिस्तान द्वारा पूर्वी पाकिस्तान ( अब बांग्लादेश) में उर्दू भाषा थोपने के खिलाफ बंगला भाषा के लिए  21 फरवरी 1952 को  ढाका विश्वविद्यालय में छात्रों ने विद्रोह किया था। तब गोली चली, 16 छात्र मारे गए और यूनेस्को ने उनकी याद में 21 फरवरी 1999 से “अंतरराष्ट्रीय भाषा दिवस” के अनुपालन की घोषणा किया। उसी तर्ज पर हमारी मांग है 22 दिसंबर को “हासा ( मातृभूमि ) –  भाषा (मातृभाषा) विजय दिवस” अनुपालन की घोषणा करें।  यह भारत ही नहीं विश्व के आदिवासियों के लाइफलाइन अर्थात जल,जंगल, जमीन, जीवन और भाषा- संस्कृति की सुरक्षा और संवर्धन का  संदेश दुनिया भर में प्रदान करेगा।

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