सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों व आम जनता पर राजकीय दमन

0
662

जनपक्षधर स्वतंत्र पत्रकार रूपेश कुमार सिंह ने 12 मई 2020 को देश भर में हो रहे पत्रकारों, राजनीतिक-समाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों-नौजवानों, व आम जनता पर किये जा रहे राजकीय दमन पर छात्र संगठन ‘इन्कलाबी छात्र मोर्चा (इलाहाबाद)’ के फेसबुक पेज पर लाइव के जरिये अपनी बातें रखी थी। वर्तमान परिदृश्य में इस वक्तव्य की महत्ता को देखते हुए इसे हुबहू लिखित रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
मालूम हो कि स्वतंत्र पत्रकार रूपेश कुमार सिंह भी अपनी लेखनी के कारण ही राजकीय दमन के शिकार हुए हैं और उन्होंने 6 महीने तक जेल-जीवन को भी भोगा है। इनके उपर काला कानून यूएपीए की आधा दर्जन धाराओं के अलावा आइपीसी व सीआरपीसी की कई धाराओं के तहत न्यायालय में मुकदमा लंबित है। फिलहाल ये जमानत पर बाहर हैं।
इलिका प्रिय
मैं तमाम साथियों को जो लाइव देख व सुन रहे हैं, इंकलाबी सलाम पेश करता हूं। दोस्तों! जैसा कि आप जान रहे हैं देश व्यापी लाॅकडाउन का आज 49 वां दिन है, पूरा देश यातनागृह में तब्दील हो चुका है। पूरे देश में मजदूर सड़क पर हैं, मजदूरों की अपने घर आने की जद्दोजहद में लगातार उनके मौत की खबरें आ रही है। सरकार की तानाशाही चरम पर है और इस लाॅकडाउन के कारण जितनी संख्या में लोग कोरोना महामारी से नहीं मरे हैं, लगभग उतनी ही संख्या में हम कह सकते हैं इस कोरोना महामारी की अव्यवस्था के कारण मर चुके हैं। आज मैंने द वायर में देखा, जिसमें 8 मई की एक डाटा छपी थी, उसमें छपी थी कि 19 मार्च से 8 मई के बीच में कोरोना महामारी में फैली अव्यवस्था के कारण 370 लोगों की मौतें हुई है। इस डाटा को कुछ लोगों ने मिलकर तैयार किया है। मगर मेरा अनुमान है कि यह मौतें और भी ज्यादा हुई है।
मैं झारखंड में रहता हूं और आज की एक खबर जो झारखंड के अंदर की है। गिरिडीह में बेंगाबाद नाम की एक जगह है, जहां के एक व्यक्ति पंचम तुरी अचानक बीमार पड़ते हैं और उनके घरवाले एक आॅटो रिजर्व करके उन्हें गिरिडीह सदर अस्पताल लेकर चलते हैं, बीच में चेक नाका पर पुलिस उनकी गाड़ी को रोकती है और फिर लाॅकडाउन तोड़ने के आरोप में आॅटो में जो बैठे लोग होते हैं, उनकी पिटाई शुरू कर देती हैं, बहुत सारे लोग तो भाग जाते है। बहुत देर बाद किसी तरह से ड्राइवर उन्हें लेकर गिरिडीह सदर अस्पताल पहुंचते हैं, तब डाॅक्टर द्वारा पंचम तुरी को मृतक घोषित कर दिया जाता है। यानी उनकी मौत हो जाती है। यह क्या है? कैसी व्यवस्था है?
एक तरफ पूरे देश के अंदर अव्यवस्था फैली हुई है, लोग अपने घरों से निकल नहीं पा रहे हैं, जब से देश के अंदर लाॅकडाउन शुरू हुआ है तमाम विपक्षी पार्टियों ने, संसदीय वामपंथी पार्टियांे ने भी कहना शुरू किया, ‘स्टे होम, स्टे सेफ।’ लेकिन आप देखिए इन्होंने स्टे होम, स्टे सेफ बोल दिया, लेकिन उसके कारण कितने लोगों को अकाल मृत्यु का सामना करना पड़ा। द वायर के रिपोर्ट के अनुसार, कुल 54 लोग सड़क दुर्घटना में मरे हैं, 73 लोगों ने आत्महत्या की है, भूख और आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण उन्हें आत्महत्या करना पड़ा। आज 12 मई की रामगढ़ की एक खबर है कि एक आदमी ने नदी में छलांग लगाकर आत्महत्या करने की कोशिश की, क्योंकि उनकी आर्थिक स्थिति खराब है। कल 11 मई को ही गुमला जिले के एक किसान ने आत्महत्या कर ली, सिर्फ इसलिए क्योंकि उनका बैंक में कर्ज था और वे कर्ज को चुका नहीं पा रहे थे। आज 12 मई की खबर है दुमका में एक ड्राइवर था-सुभान अंसारी। वह गाड़ी चलाते थे। लाॅकडाउन के कारण उनका काम बंद हो गया, काठीकुंड (दुमका) में लोगों ने उन्हें बकरी चोरी करने के आरोप में पीट-पीट कर, माॅब लीचिंग कर मार दिया।
मेरे कहने का मतलब है सरकार और विपक्षी पार्टियां भी जो कह रही है स्टे होम, स्टे सेफ, लेकिन इस स्टे होम में लोग स्टे सेफ नहीं है, वे सुरक्षित नहीं है। विभिन्न कारणों से वे रोज ब रोज मर रहे हैं। एक तरफ सरकार लोगों को कहती है कि आप सुरक्षित घर में रहिए, सेफ रहिए, घर से निकलिए मत, कारोना महामारी से बचिए और दूसरी तरफ सरकार लगातार समाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर हमले चला रही है, लगातार आदिवासी इलाके में इनकी पुलिस गश्त कर रही है, लगातार आदिवासी इलाके के मिनरल्स को पाने के लिए आॅपरेशन त्रिशूल चलाया जा रहा है। आप जानते हैं कि जब लाॅकडाउन की शुरूआत हुई थी, उसी समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- ‘जेल में भीड़ से बचने के लिए राज्य सरकार को कैदियों को पैरोल पर छोड़ना चाहिए और जमानत भी देनी चाहिए। लेकिन आज जब हम बात कर रहे हैं समाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर राजकीय दमन की तब आप जानते हैं कि किस तरह से भीमा कोरेगांव के मामले में आज 11 लोग जेल के अंदर है। मैं अभी कुछ देर पहले ‘रिलीज द पोयेट’ के फेसबुक पेज में देख रहा था, वरवर राव के बारे में जो एक प्रसिद्ध क्रांतिकारी कवि है, जिन्होंने बहुत सारी किताबें लिखी हैं, जो पूरे देश के अंदर जनवादी आवाज को उठाने में सबसे अग्रिम पंक्ति में खड़े रहते हैं, उस रिपोर्ट में है कि उनका वजन 13 किलो घट गया है। वे मुंबई के तलोजा जेल में बंद है, उनकी स्थिति काफी खराब है, लेकिन उनके लिए उनके वकील ने, उनकी पत्नी ने उनकी रिहाई के लिए, उनके पैरोल के लिए लगातार प्रयास किया, हाईकोर्ट से लेकर वे सभी जगह गये, लेकिन उनके पैरोल को रद्द कर दिया गया। उनकी उम्र 80 साल है। मैं पूछना चाहता हूं, 80 साल के लोग को, एक लेखक को, एक कवि को जिन्होंने बहुत सारी किताबें लिखी हो, जो जनता के आवाज को उठाते रहते हों, ऐसे 80 साल के लोगों को पैरोल नहीं मिलता है, जमानत नहीं मिलता है, तो किसे मिलेगा? दूसरी तरफ जी.एन. साई बाबा को देख लें। वे शारीरिक रूप से 90 प्रतिशत विकलांग हैं, लेकिन उनको भी जेल के अंदर अभी तक बंद करके रखा गया है। उनकी पत्नी ने भी, वकील ने भी लगातार प्रयास किया कि उन्हें जमानत मिले, उन्हें जमानत मिलना चाहिए, पर उन्हें भी न जमानत मिली, न पैरोल पर बेल मिला।
साथियों, इसी तरह से भीमा कोरेगांव के मामले में आप जानते हैं कि सुधा भारद्वाज जो कि लाॅ काॅलेज में पढ़ाती थी, शोमा सेन जो महिला नेत्री, महिला अधिकारकार्यकर्ता, मानवाधिकार कार्यकर्ता रही है, डब्लूएसएस से जुड़ी हुई हैं, ये दोनों महिला सुधा भारद्वाज और शोमा सेन मुंबई के बेकुला जेल में है। और इसके साथ ही मैं आपको बताना चाहता हूं, उस जेल में दो दिन पहले ही एक महिला कोरोना पाॅजिटिव पाई गई है। इन दोनों की उम्र भी 60 साल से उपर है। लेकिन इन दोनों को भी पैरोल नहीं मिला। मतलब कि जो लोग पहले से ही जेल में बंद है और सुप्रीम कोर्ट ने कहा भी कि जेल में इस भीड़ को कम करने के लिए पैरोल पर लोगों को छोड़ा जाना चाहिए, इन लोगों को निकालना चाहिए। लेकिन हम देख रहे हैं कि कहीं से भी समाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता जिन्हें सिर्फ और सिर्फ एक आरोप के कारण कि उन्होंने सच बोला और सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाया, उन्हें कहीं से भी पैरोल या जमानत नहीं मिला है।
आप जानते हैं कि भीमा कोरेगांव मामले में कुल 11 लोग जिसमें 9 लोग तो पहले से ही थे, 2 लोगों को हाल-फिलहाल 14 अप्रैल को बाबा साहेब आंबेडकर की जयंती के अवसर पर गिरफ्तार किया गया। जिनमें एक आनंद तेलतुम्बड़े जो प्रसिद्ध शिक्षाविद् रहे हैं, उनका एक शानदार शैक्षणिक रिकार्ड रहा है और लगातार वे जनता के सवाल पर बोलते रहे हैं और दूसरी तरफ जो मानवाधिकार कार्यकर्ता है गौतम नवलखा, इन दोनों को 14 अप्रैल को जेल के अंदर डाल दिया गया। एक तरफ जेल से छोड़ने की बात हो रही है, लेकिन दूसरी तरफ सरकार लोगों को जेल में डाल रही है।
मेरे कहने का मतलब यह है कि एक तरफ सरकार लोगों को बोल रही है आप घर में रहिए, सुऱिक्षत रहिए, घर से बाहर नहीं निकलिये, लेकिन दूसरी तरफ वह अपने मिशन पर है। वे लगातार जनविरोधी नीतियों के खिलाफ जो आवाज उठाने वाले लोग थे, उन्हें जेलों में ठंूस रही है। उनको जेलों में बंद कर रही है, फिर जो पहले से ही जेलों में बंद है उनके निकलने का तो कोई सवाल ही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट कह रही है आप जेल से लोगों को निकालिए, लेकिन आप देखिए यूपी के अंदर हजारों लोगों को लाॅकडाउन तोड़ने के आरोप में जेल में बंद कर दिया गया है।
मैं पूछना चाहता हूं साथियों, आज जो भीमा कोरेगांव के मामले में सुधा भारद्वाज, शोमा सेन, महेश राउत, रोना विल्सन, वरवर राव, सुरेंद्र गाडलिंग, अरूण फरेरा, वरनाॅन गोंजाल्विस, सुधीर ढावाले, ये सारे लोग जेल में बंद है, ये क्यों जेल में बंद है, इनका रिकार्ड क्या है? महेश राउत विस्थापन विरोधी आंदोलन के एक प्रमुख हस्ताक्षर थे, एक प्रमुख कार्यकर्ता थे। उन्होंने पूरे देश के अंदर जो विस्थापन चल रहा था, उसके खिलाफ लगातार आवाज उठाई है। अरूण फरेरा उन्होंने जेल के अंदर ही किताब लिखी थी। वे एक शानदार लेखक और पत्रकार है। वरनाॅन गोंजाल्विस, सुधीर ढावाले को आप जानते हैं कि वे विद्रोही पत्रिका के संपादक रहे हैं। रोना विल्सन वे मानवाधिकार कार्यकर्ता रहे हैं, दिल्ली के अंदर रहे हैं, जेएनयू के अंदर उन्होंने पढ़ाई की है। लेकिन ये लोग आज जेल में रहने को अभिशप्त हैं। उनके साथ ही आप देख रहे हैं कि जी.एन. साई बाबा, प्रशांत राही, हेम मिश्रा के साथ और दो लोग जिनको सजा मिली है, ये लोग भी जेल के अंदर बंद हैं, लेकिन ये लोग को न तो पैरोल मिला, ना ये लोग छुट पाए हैं।
दूसरी तरफ हम देखते हैं कि किस तरह से सरकार ने यह लाॅकडाउन का जो मसला चला उसके पहले पूरे देश के अंदर जो सरकार की जनविरोधी नीति सीएए, एनआरसी, एनपीआर के खिलाफ जबरदस्त जनआंदोलन चल रहा था उसपर दमन किया। पूरे देश में शाहीनबाग बन रहा था। शाहीनबाग की तर्ज पर जगह-जगह लोग खासकर महिलाएं सड़क पर उतरी हुई थी। वे सड़क पर बैठी हुई थी और लगातार लोग सरकार से इन तीनों जनविरोधी कानून जो इन्होंने बनाने की कोशिश की थी सीएए, एनआरसी, एनपीआर उसे वापस लेने की मांग कर रहे थे। और उस आंदोलन में लगातार महिलाएं, छात्र, बुद्धिजीवी खास करके महिलाएं सबसे अग्रिम कतार में शामिल थी। लेकिन जब सरकार ने लाॅकडाउन की घोषणा की, उसके बाद आपने देखा कि इस लाॅकडाउन के कारण किस तरह से विभिन्न-विभिन्न आरोप लगाकर, किसी को तंग-परेशान करके धरना से उठाया गया, किसी को धमका कर उठाया गया, किसी को कोरोना से संक्रमण फैलने की धमकी देकर उठाया गया, सारे जगहों पर उन्होंने आंदोलन को समाप्त करवाया। बहुत लोगों ने उस समय सोशल साइट पर लिखना शुरू किया कि हम लोगों को कोरोना महामारी से जो वैश्विक महामारी है, इससे हमें मिलकर लड़ना चाहिए, हमें सरकार का साथ देना चाहिए मगर सरकार ने क्या किया? सरकार ने जो उनके विरोधी लोग थे, उन्हें जेलों में बंद किया।
जो सरकार के जनविरोधी नीतियों का विरोध करते थे, वे सरकार के विरोधी क्यों हुए? क्योंकि चाहे जो भी सरकार होगी, अगर वे जनविरोधी नीतियां लाएंगी तो हम पत्रकार, छात्र, बुद्धिजीवी या एक लाइन में कहंे तो जिनके अंदर थोड़ी-सी भी न्याय और इंसाफ के लिए ललक होगी, वे जरूर ही इनकी नीतियों का विरोध करेंगे। हम देखते हैं कि जैसे ही शाहीनबाग का आंदोलन कोरोना महामारी के कारण रूकता है, स्थगित होता है, वैसे ही उसके बाद 2 अप्रैल से गिरफ्तारियां शुरू हो जाती है। पहली गिरफ्तारी होती है 2 अप्रैल को मिरान हैदर की। मिरान हैदर कौन थे? मिरान हैदर जामिया मिलिया यूनवर्सिटी के पीएचडी स्टूडेंट थे। वे जामिया कार्डिनेशन कमिटी के एक नेता भी थे। साथ ही वे राष्ट्रीय जनता दल के नेता भी थे। उन्हें पकड़कर अंदर कर दिया गया। उसके बाद 9 अप्रैल को गुलसिफा जो एमबीए की स्टूडेंट रही थी, उनकी सीलमपुरी और जाफराबाद का जो मूवमेंट चल रहा था शाहीन बाग के तर्ज पर, उसमें महत्वपूर्ण भूमिका थी, उनको भी उन्होंने 9 अप्रैल को पकड़कर अंदर कर दिया। 10 अप्रैल को सफूरा जरगर जो जामिया कोर्डिनेशन कमिटी की प्रवक्ता थी। जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी की एमफिल की छात्रा थी, उन्हें गर्भवती अवस्था में ही सरकार ने पकड़कर अंदर कर दिया। पहले सफूरा के खिलाफ 24 फरवरी को एक मुकदमा जाफराबाद थाना में हुआ था, उस मुकदमा के तहत उनको बुलाया गया, उन्हें गिरफ्तार किया गया। यह जाफराबाद थाना जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी से 20 किलोमीटर की दूरी पर है। इस केस में उनको जमानत मिल जाती है 13 अप्रैल को, लेकिन उन्हें जेल से छोड़ने के बजाय 6 मार्च के एक मुकदमे, एक एफआईआर में, जिसमें उनका नाम भी नहीं था, फिर से उनकी गिरफ्तारी होती है और बाद में पता चलता है कि उनके उपर 20 अप्रैल को यूएपीए जो अभी सबसे क्रूर कानून है, सबसे काला कानून है, ‘अनलाॅफुल एक्टिविटिज (प्रिवेंसन) एक्ट’ उसके तहत उनपर मुकदमा दर्ज होता है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 6 मार्च को जो एफआईआर हुआ था, जिसके तहत इनकी गिरफ्तारी हुई है, वे दिल्ली के क्रांइम ब्रांच के जो एक सिपाही थे अरविंद कुमार उन्होंने एफआईआर किया था। शुरूआत में उसमें मात्र तीन-चार धाराएं थी और चारांे धाराएं बेलेबल थी, लेकिन बाद में 20 अप्रैल को उसमें यू.ए.पी.ए. जोड़ा जाता है, और भी देशद्रोह की धाराएं, बहुत सी अनबेलेबल धाराएं जोड़ी जाती है, ताकि ये लोग जेल से बाहर नहीं निकले। 6 मार्च को जो एफआईआर होती है, उसमें सिर्फ दो आदमी का नाम होता है। एक उमर खालिद का जो जेएनयू के प्रसिद्ध छात्र नेता रहे हैं, और वर्तमान में यूनाईटेड अगेन्स्ट हेट से जुड़े हुए हैं, दूसरा दानिश जो पीएफआई से जुड़े हुए है। दानिश की गिरफ्तारी भी होती है दो साथियों के साथ और उस मुकदमे में ही सफूरा की, गुलसिफा की गिरफ्तारी होती है, और मिरान पर भी उसी मुकदमें के अंदर में यूएपीए के तहत मुकदमा चलाया जाता है। ं
साथियों, तो हम कहना चाहते हैं कि लगातार सरकार के जरिये इस तरह की चीजें, अपने विरोधियों का खास करके उनके जनविरोधी नीतियों का पर्दाफाश करने वाले लोगों का इस कोरोना काल में भी जब कोरोना महामारी से पूरा विश्व एक होकर लड़ रहा है, सरकार के कहे अनुसार, लेकिन दूसरी तरफ ये लगातार ऐसे लोगों को जो लोग इनकी नीतियों के खिलाफ आवाज उठा रहे थे, उन्हंे पकड़कर जेल में भर रहे हैं। एक भी समाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता को तो छोड़ने की बात ही नहीं है। आप जानते हैं कि सरजील इमाम जो जामिया के ही छात्र रहे थे, और लगातार सीएए, एनआरसी, एनपीआर में उनकी एक भूमिका बनते जा रही थी, वे लगातार लोगो को गोलबंद कर रहे थे, उनके खिलाफ भी उनको भी इस लाॅकडाउन के पहले जेल में बंद किया जाता है। और बाद में लाॅकडाउन के दौरान उनके उपर यूएपीए के चार्ज भी लगाए जाते हैं।
मतलब सरकार आम लोगों को कह रही है कि आप घर में रहिए, सुऱिक्षत रहिए, लेकिन इन्होंने अपनी पूरी ताकत के साथ इनके जो विरोधी लोग हैं उनके उपर हमला चला रखा है। उनके उपर घोषित रूप से हम कह सकते हैं कि युद्ध छेड़ रखा है। कश्मीर में जब 370 धारा हटाया गया 5 अगस्त 2019 को, उसके बाद से ही किस तरह से पूरे कश्मीर को कंसनट्रेशन कैंप में तब्दील कर दिया गया, यातना गृह में तब्दील कर दिया गया और अभी हाल में वहां पर 20 अप्रैल को मसरत जहरा जो एक फोटो जर्नलिस्ट है, जो कि बहुत सारे समाचारपत्रों, बहुत सारे चैनलों में उनके फोटो दिखाए गये हैं, उनके उपर एक झूठी कहानी गढ़कर फेसबुक में इनके पोस्ट के आधार पर इनके उपर यूएपीए का चार्ज लगाया जाता है, वहीं कश्मीर के द हिन्दू के पत्रकार हैं आशिक पीरजादा उनके उपर भी यूएपीए का चार्ज लगाया जाता है। गौहर गिलानी पर वह भी एक अच्छे पत्रकार रहे हैं कश्मीर के, उनके उपर भी यूएपीए के तहत मुकदमा चलाया जाता है।
साथियों, आप जानते हैं, ये यूएपीए है क्या? यह यूएपीए अनलाॅॅफुल एक्टिविटि (प्रिवेंशन) एक्ट 1967 से हमारे देश में है, लेकिन पिछले साल अगस्त 2019 में उन्होंने इसमें छठा संशोधन किया। इसके पहले भी इसमें ये पांच संशोधन कर चुके थे। लेकिन इनका जो छठा संशोधन था, वह छठा संशोधन सबसे अधिक क्रूर सबसे अधिक घातक था। उस छठे संशोधन में इन्होंने साफ-साफ घोषित किया कि ये अब किसी भी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित कर सकता है। इससे पहले इनके द्वारा किसी भी व्यक्ति को यूएपीए लगाने से पहले उन्हें किसी न किसी प्रतिबंधित संगठन से जोड़ा जाता था, मेरे उपर भी मेरी जब गिरफ्तारी हुई थी चार जून 2019 को, उस समय तक कानून में संशोधन नहीं हुआ था, इसलिए मेरे उपर भी जब इन्होंने यूएपीए लगाया, तो मुझे इनको भाकपा (माओवादी) का बड़ा नेता बताना पड़ा। भाकपा (माओवादी) का बिहार-झारखंड स्पेशल एरिया कमेटी का मेंबर बताना पड़ा। लेकिन अगस्त के बाद से जो छठा संशोधन हुआ, उस संशोधन के बाद से ये अब किसी भी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित कर सकते है। छठे संशोधन में जो इसकी 35 व 36 धारा है उसमें साफ कहा गया है कि अब बिना किसी दिशा-निर्देश के, बिना किसी तयशुदा प्रक्रिया का पालन किये हुए, किसी व्यक्ति को आतंकवादी करार दे सकती है। सुरक्षा एजेंसी बिना कोई चार्जसीट दाखिल किये, छः महीने तक हिरासत में रख सकती है। इस दौरान कोर्ट में पेश करना भी अनिवार्य नहीं है। यह अवधि बढ़ भी सकती है। मतलब यकीन के बुनियाद पर न कोई सबूत न कोई गवाह। यदि आपको उन्होंने आतंकवादी घोषित कर दिया, आप पर यूएपीए लगा सकते हैं। सरकार ने कह दिया कि आपकी इस लेखनी की वजह से देश की सुरक्षा, अखंडता, एकता को खतरा है, जो यूएपीए सेक्शन 15 में कहा गया है कि भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा आर्थिक सुरक्षा या संप्रभुता को संकट में डालने की संभावना के इरादे से भारत में या विदेश में जनता या जनता के किसी तबके में आतंक फैलाने या आतंक फैलाने की संभावना के इरादे से किया गया कार्य आतंकवाद है। इसका मतलब है अगर आप कविता लिखते हैं, अगर आप लेख लिखते हैं, अगर आप कहीं भाषण देते हैं और सरकार को यह लग जाए, सरकार को सिर्फ यकीन हो जाए, उनके लोगों को एनआईए को, आईबी को यदि यकीन हो जाए कि ये जो बंदा बोल रहा है, मैं अभी जो बैठकर बोल रहा हूं, अगर उनको लग जाए कि रूपेश कुमार सिंह जो बात बोल रहे हैं उससे देश को खतरा है तो कोई गवाह नहीं, कोई सबूत नहीं, उसके बुनियाद पर आप आरोपी हो गये। पहले था कि जब तक लोग जेल में रहते थे, तब आरोपी रहे। हमलोग भी बोलते थे, छः महीने जेल में रहे, मैं भी बोलता रहा कि मैं अभी आरोपी हूं। लेकिन अब आप आरोपी नहीं है। अब जो यह संशोधन हुआ है इससे आप आतंकवादी हो। आप पर लगा दिया गया ठप्पा कि आप आतंकवादी हैं।
साथियों, यह जो यूएपीए है और इस यूएपीए का बेजा इस्तेमाल आज से ही नहीं एक लम्बे समय से सरकार कर रही है। यूएपीए अकेला नहीं, इससे पहले आप जानते हैं कि पीएसए था, जम्मू एंड कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट 1978 से ही है, एनएसए (नेशनल सेक्यिुरिटी एक्ट) 1980 से ही है, इससे पहले टाडा-पोटा था, जो अभी अस्तित्व में नहीं है। टाडा-पोटा, मकोका जो महाराष्ट्र सरकार द्वारा लाया गया था। गुजरात सरकार के द्वारा लाया गया गुजकोका, तमाम कानूनें पहले से ही अस्तित्व में रही हैं। और तमाम कानून का एक मात्र उद्देश्य रहा है कि जो भी सरकार के खिलाफ आवाज उठाए, सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाए, उसे जेल के अंदर बंद कर दो। इसके अलावा इन काले कानूनों का कोई रोल नहीं रहा।
दोस्तों, एक तरफ सरकार ने कहा कि आप घर में रहिए, सेफ रहिए, घर से बाहर मत निकलिए लेकिन दूसरी तरफ इन्होंने अपनी पूरी ताकत के साथ जो इनके विरोधी लोग थे, चाहे वे कोई भी हो, यहां तक कि आपने सुना होगा कि दिल्ली सरकार अल्पसंख्यक आयोग के जो अध्यक्ष है, जफरूल इस्लाम खान उनके भी सोशल साइट के एक पोस्ट के बहाने उनको जेल के अंदर डालने की साजिश हो रही है। अभी जामिया एलुमनाई एसोसिएशन के अध्यक्ष है, शिफा-उर-रहमान, उनको 26 अप्रैल को अंदर कर दिया गया यूएपीए के तहत। कंवलप्रीत कौर, आॅल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन की दिल्ली यूनिट की अध्यक्ष है, उन्हें उसी 6 मार्च के मामले में फंसाने के लिए उनके घर पर पुलिस की रेड पड़ती है , वे आंटी के यहां रहती हैं। उनके घर पर उनका मोबाईल जब्त किया जाता है। उनके मोबाईल को सीज किया जाता है, जबकि उनका इस केस में नाम भी नहीं है। तो कह सकते हैं यह एक तरह से पूरी साजिश चल रही है। पूरे देश के अंदर कि लोग घर पर रहे और उनपर हमले होते रहे।
आप अभी देखिए कि किस तरह से उत्तर प्रदेश की सरकार ने, राजस्थान की सरकार ने, मध्यप्रदेश की सरकार ने, गुजरात की सरकार ने इन तमाम सरकारों ने श्रम कानून में संशोधन किया, कहें तो संशोधन नहीं बल्कि बहुत से श्रम कानूनों को उन्होंने खत्म कर दिया। अब वहां के श्रमिकों के पास कोई भी अधिकार नहीं है, न हड़ताल का अधिकार रहा, न उन्हें यूनियन बनाने का अधिकार है। उनसे जो एक लम्बे संघर्ष के बाद दुनिया के मजदूरों ने एक जीत हासिल की थी आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम, आठ घंटे मनोरंजन, वह अधिकार भी छीन लिया गया, अब उन्हें 12 घंटे काम करने पड़ेंगे। इसमें सिर्फ भाजपा की ही सरकार नहीं हैं, कांग्रेस की सरकार भी है। राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है, वहां भी 15 अप्रैल को एक अध्यादेश पारित हुआ, एक आदेश दिया गया कि अब तीन महीने के लिए आपलोगों को आठ घंटे के बजाय 12 घंटे काम करने होंगे क्योंकि उत्पादन बहुत पीछे चला गया है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में तीन साल के लिए बहुत सारे श्रम कानूनों को खत्म कर दिया गया है। गुजरात में सवा तीन साल के लिए यानी कि 1200 दिन के लिए श्रमकानून को खत्म कर दिया गया।
साथियों, मैं दूसरी बात पर आना चाहता हूं कि आज यूएपीए शब्द बहुत ज्यादा पोपुलर हुआ है, पूरे देश के अंदर जब बहुत सारे बुद्धिजीवियों, छात्रों आदि पर यह आरोप लगाए जा रहे हैं, और इन आरोपों के तहत जेल में ठूंसा जा रहा हैं, बंद किया जा रहा है। मैं जब शेरघाटी जेल में था, जून 2019 में जब मैं गया तो मुझे आश्चर्य लगा कि वहां पर मात्र दो सौ बंदी थे, लेकिन उस दो सौ बंदी में 50 विचाराधीन कैदी पर यूएपीए लगा हुआ था। वे कौन थे? वे सारे गया जिला के जो पहाड़ के इलाके हैं उसके नीचे के जो रहने वाले लोग हैं, जो गरीब हैं, दलित हैं, जो भोक्ता जाति से, हरिजन जाति से, यादव जाति से, जो समाज के सबसे निचले दबे-कुचले लोग हैं, जिन्हें यूएपीए का पूरा नाम भी पता नहीं है, लेकिन उनको यूएपीए के अंदर जेल में डाल दिया गया था। ऐसे वे लोग भी नहीं जानते थे कि हमारे उपर यूएपीए लगा है, वे अपने आपको 17 सीएलए बोलते थे, लेकिन उस समय चूंकि छठा संशोधन हुआ नहीं था इसलिए उन तमाम लोगों को माओवादी से किसी न किसी तरह से लिंक कर दिया गया था। और उन लोगों के उपर यूएपीए के तहत मुकदमा चलाया गया था। जब मेरा शेरघाटी जेल से गया सेंट्रल जेल में ट्रांसफर हुआ, क्योंकि हमलोगों ने शेरघाटी जेल के अंदर जहां मूलभूत जरूरतों का घोर अभाव था, उसके खिलाफ अनशन किया था और उस अनशन से सरकार को, जेल प्रशासन को पीछे जाना पड़ा था, हमारी बहुत सारी मांगों को मानना पड़ा था, तब हमलोगांें को गया सेंट्रल जेल भेज दिया गया। गया सेंट्रल जेल जब गये, तो देखा वहां पर एक अलग ही नियम था। घुसते के साथ ही स्लेट में हमपर प्रमुख कौन-सी धारा है, उसको लिखकर एक फोटो सेशन होना था। जब वो फोटो सेशन चल रहा था, तो मुझे एक स्लेट दिया गया, उसपर 17 सीएलए लिख दिया गया। मैंने जो वहां पर लोग थे, उनसे कहा कि 17 सीएलए मेरे उपर लगा हुआ नहीं है भाई! मेरे उपर यूएपीए लगा है। तो उन्होंने कहा ‘यूएपीए क्या होता है? यहां अगर कोई माओवादी केस में आया है तो 17 सीएलए ही होता है।’ मेरे कहने का मतलब है कि जेल के अंदर भी उस समय तक यूएपीए का उतना प्रचार नहीं था। लोगों को लगता था कि यूएपीए कोई छोटा-मोटा कानून है और 17 सीएलए ही प्रमुख है। इसलिए लोग गया सेंट्रल जेल जहां लगभग 2200 बंदी थे, उनमें लगभग 250 बंदियों पर यूएपीए के तहत ही मुकदमा चल रहा था। तो लोगों को वहां पर यह भी पता नहीं था कि यूएपीए इतना कठोर कानून है। लेकिन जब वहां रहते हुए छठा संशोधन हुआ, तो अखबारों में लगातार यूएपीए की बातें आने लगी। उसी समय बिहार के एक बाहुबली विधायक थे अनंत सिंह, उनकी गिरफ्तारी होती है उनके उपर जो चार्ज लगते हैं यूएपीए के और विस्फोटक के, लगभग ही नहीं बल्कि बिल्कुल वही चार्ज मेरे उपर भी था। उन्हीं सब धाराओं के उपर ही मेरे उपर भी मुकदमा किया गया था। तब लोगों को लगा कि अरे यह यूएपीए तो बहुत बड़ा मामला है।
मेरे कहने का मतलब यह है कि अभी मैं जो दो जेलों का उदाहरण दे रहा था, यूएपीए के बारे में बताने के लिए दे रहा था। ये बहुत अच्छी बात है कि पूरे देश मे ये यूएपीए चर्चा का विषय बना है, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों व छात्रों पर जब ये लगाए जा रहे हैं। लेकिन बिहार के, उड़ीसा के, झारखंड के, छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में आदिवासियों के उपर, यहां के दलित समुदाय के उपर मुझे लगता है जो बताया था उनलोगों ने 2017-18 से लगातार इनके उपर जो भी जेल के अंदर आते हैं, जिनके ऊपर माओवादी लिंक का आरोप होता है, उनके उपर यूएपीए ही लगाया जाता है।
साथियों, मेरे कहने का मतलब यह था कि जब हम यूएपीए की बात करें, यूएपीए खत्म करने की बात करते हैं, यूएपीए हटाने की बात करते हैं, तो हमें उन मजदूरों का, उन आदिवासियों का, उन किसानों का भी ख्याल करना होगा जो कि गाय-भैंस चराने वाले लोग हैं, जो जंगल में गाय-भैंस चराने जाते है और उनको भी सीआरपीएफ वाले पकड़कर अंदर कर देते हैं, बोलते हैं कि माओवादियों को खाना पहुंचाने गया था, इनके उपर यूएपीए लगाओ। मैं कहता हूं यूएपीए आज सिर्फ देश में पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, छात्रों पर ही नहीं लगाए गये हैं, एंटी सीएए, एनआरसी, एनपीआर एक्टिविस्ट के उपर ही नहीं लगाए गये हैं, बल्कि हमारे देश के हजारों मजदूरों, किसानों, आदिवासियों पर भी लगाए गये हैं। साथियों आपको याद होगा कि झारखंड के अंदर एक संगठन हुआ करता था ‘मजदूर संगठन समिति’ यह 1989 से ही रजिस्टर्ड था। इनके उपर जब भाजपा की रघुवर सरकार ने बैन लगाया, इसे प्रतिबंधित किया 22 दिसंबर 2017 को, तो इनके जितने भी नेताओं पर मुकदमे हुए उन सबके के उपर आरोप लगे यूएपीए के। सबके उपर यूएपीए के ही मुकदमे दर्ज हुए। तो दोस्तों, यह यूएपीए झारखंड के अंदर ‘मजदूर संगठन समिति’ के लगभग दो दर्जन कार्यकर्ताओं के उपर लगाए गये और लोगों को जेल के अंदर डाला गया। लेकिन उस समय यूएपीए थोड़ा-सा आसान था क्योंकि लोगों को जमानत मिल जाती थी संशोधन से पहले, तो उनको जमानत मिल गयी, जेल से रिहा हो गये, सभी जेल से जमानत पर रिहा हुए हैं, और अभी बाहर हैं।
साथियों मेरे कहने का मतलब यही है कि देश के अंदर यूएपीए हो, टाडा, हो, पोटा हो तमाम काले कानून हो, इन काले कानून का सबसे ज्यादा जो भुक्तभोगी है वह हमारे देश का आदिवासी समुदाय है, हमारे देश का दलित समुदाय है और उसके साथ-साथ जो इनकी हक की आवाज को बुलंद करते हैं, जो इनके पक्ष में खड़े होते हैं, जो इनके जल-जंगल-जमीन बचाने की लड़ाई को बुलंद करते हैं, इनके पक्ष में आवाज उठाते हैं कि जो जल जंगल-जमीन की लूट हो रही है, उसकी खिलाफत होनी चाहिए, तो उनके उपर भी ये आरोप लगते है। और अब तो यूएपीए को जनरलाइज कर दिया है इसका सामान्यीकरण कर दिया गया है कि जो सरकार के खिलाफ चाहे वो एन्टी सीएए-एनआरसी-एनपीआर वाले हो, चाहे पोलिटिकल विरोधी हो, चाहे गौतम नवलखा जैसे मानवाधिकार कार्यकर्ता हो या आनंद तेलतुम्बडे जैसा शिक्षाविद् हो, उन तमाम के उपर ऐसे मुकदमे लगाए जाएं, अब जाकर इन्होंने इसका ऐसा सामान्यीकरण कर दिया है।
कश्मीर में ही एक पत्रकार है आशिफ सुल्तान जो कि यूएपीए के तहत जेल में लगभग दो साल से बंद है, वहां से जो रिपोर्टें आ रही है, उसके अनुसार सबसे पहले पुलिस ने उनसे कहा कि आप हमारी मुखबिरी कीजिए, जब उन्होंने मुखबिरी करने से इंकार कर दिया तो उनको घिसी-पिटी जो एक पुलिस की लाइन है, कि इनका आतंकवादियों से लिंक है, उसके तहत उनको अंदर कर दिया गया। आप जानते हैं कि डाॅ कफील को गोरखपुर हाॅस्पिटल में बलि का बकरा बनाया गया था और उसके बाद जब केरल में निपाय वायरस आया, बिहार में जब चमकी बुखार आया, बिहार में जब बाढ़ की विभीषिका आई, तब डाॅ कफिल खां ने वहां आकर उन लोगों का फ्री में इलाज किया और डाॅ0 का, इंसानियत का जो परिचय देना होता है, डाॅक्टर की जो भूमिका होती है, उन्होंने वह भूमिका अदा की थी, आज वे जेल के अंदर बंद है। उनकी पत्नी ने लगातार यूपी सरकार को, लगातार सबको आवेदन दिया कि इनको जेल से बाहर निकाला जाए और कफील खां ने भी कहा कि मुझे बाहर निकालिए मैं जनता की सेवा करना चाहता हूं, यह जो वैश्विक कोरोना का संकट है, इसमें लोगों की मदद करना चाहते हैं, लेकिन आज भी वे डाॅक्टर जेल के अंदर बंद है।
दोस्तों, आज पूरे देश के अंदर में चाहे वह दिल्ली हो, बिहार हो, झारखंड हो, छत्तीसगढ़ हो, तमाम जगहों पर सरकार अपनी घोषित नीति के तहत युद्ध चला रही है। वे तमाम ऐसे लोगों को यूएपीए के तहत जेल के अंदर ठूंस रही है। और हम लोग है, विरोध तो कर रहे हैं, लेकिन ये विरोध की आवाज इस सरकार के कानों तक पहुंच नहीं पा रही है। हम एक बात जानते हंै और जाननी चाहिए कि यह जो टाडा था, पोटा था, ये यूएपीए हैं, इनमें जो आरोप लगाए जाते हैं और उसमें उनकी जिंदगी को जब बर्बाद कर दिया जाता है, बहुत सारे लोगों के बारे में आपने सुना होगा वे 20-25 साल जेलों के अंदर बंद रहे और उसके बाद वे बाइज्जत बरी होकर बाहर निकलते हैं। मैंने एक डाटा निकाला कि कितने लोगांें के उपर टाडा और कितने लोगों के उपर यूएपीए लगाया गया था, 76036 लोग टाडा के आरोप में अरेस्ट हुए थे, गिरफ्तार हुए थे, लेकिन ये कितने लोगों पर आरोप साबित कर पाये मात्र एक प्रतिशत। उसी तरह पोटा के तहत 1031 लोगों को इन्होंने गिरफ्तार किया था, लेकिन मात्र 18 लोगों की सुनवाई पूरी हुई और उसमें मात्र 13 लोग दोषी पाए गये। इसी तरह एनसीआरबी का आंकड़ा कहता है कि 2016 में यूएपीए के मामले मे 33 लोगों में 22 लोग बरी हुए और 2015 में तो 76 लोग में 65 लोग बरी हो गये।
मतलब कि ये जो तमाम काले कानून के तहत जो धारा लगता है, वह जो धारा लगाया जाता है, बाद में वे बरी हो जाते हैं, उनको जमानत मिल जाती है, लेकिन उनकी जिंदगी बर्बाद हो जाती है। जब मैं गया सेंट्रल जेल में था, तो वहां पर एक आदमी थे-वीरकंुवर पासवान, लगभग उनकी उम्र 70-75 की थी। वे 1992 से जेल के अंदर बंद थे, 28 साल। पूरे 28 साल वे टाडा के आरोप में जेल में बंद थे और उनके साथ ही चार लोग थे वहां पर! वीरकुंवर पासवान, नन्हे लाल मोची, कृष्णा मोची और धर्मेंदर सिंह जिनको फांसी की सजा हुई थी, बाद में राष्ट्रपति ने उनकी 2017 में फांसी की सजा को ताउम्र जेल (उम्रकैद) में तब्दील कर दिया था। इनलोगों के उपर टाडा के उपर चार्ज था। इसमें कुछ भाकपा माले लिबरेशन के भी लोग थे। जगदीश जी, त्रिभूवन शर्मा, और भी बहुत सारे लोग थे। त्रिभूवन शर्मा बाद में जेल से बाहर आ गये। बहुत सारे लोग टाडा के तहत जेल के अंदर थे, वे लोग कहते हैं कि बहुत सारे लोग टाडा के अंदर जेल में आए लेकिन वे जेल से बाहर हो गये। वीरकुंवर पासवान कहते थे कि मैं जेल से बाहर नहीं आ पाया, सिर्फ इसलिए कि मैं एक दलित था। मैं एक गरीब था, मैं पासवान जाति से हूं और हमलोग के साथ दो लोग थे वे मोची समुदाय से थे, यानी हरिजन समुदाय से थे, इसलिए हमलोग को फांसी की सजा हुई और बाकि लोग बाहर हो गये। आपको बता दूं कि ये लोग बारा कांड में, बारा में एक उच्च जाति के लोगों का जनसंहार हुआ था, आप कह सकते हैं कि 35 लोगों की उसमें हत्या की गयी थी और उसका आरोप ही उन लोगों पर लगाया गया था। जबकि उस समय ‘एमसीसी’ माओईस्ट कम्युनिस्ट सेंटर ने खुले आम जिम्मेदारी ली थी कि ये मैंने किया था, लेकिन गांव के जो गरीब लोग थे, उनको पकड़कर इस केस में अंदर कर दिया गया और उनको फांसी की सजा भी हो गयी। उसी तरह सेनारी में एमसीसी के जरिये लोगों को मारा जाता है। उसे बाथे, बथानी के प्रतिक्रिया के स्वरूप में, उनलोगों के नेताओं का बयान आया था कि बाथे में जो घटना घटी थी जिसमें 58 गरीब-दलित लोगों कोे मार दिया गया था, पेट में अजन्में बच्चे की भी हत्या की गई थी, उनलोगों को मारा गया था, उनलोगों की हत्या के प्रतिक्रिया के स्वरूप हमने हमला किया है। सेनारी मामले 11 लोग जिन्हें फांसी की सजा हुई है, वे सारे लोग भी समाज के जो सबसे नीचे तबके के होते है दलित और अति पिछड़ी जाति के लोग ही हैं।
दोस्तों, मेरे कहने का मतलब यह था चाहे टाडा हो, पोटा हो, यूएपीए हो, एनएसए हो, पीएसए हो, मकोका हो, चाहे गुजकोका हो तमाम कानूनों के अंदर जो लोग जेल के अंदर हुए, जिनको सजा हुई, वे सारे लोग गरीब थे, दलित थे, या जनपक्षीय लोग थे। उन्हीं लोगों को इसके तहत सजा मिली है या इसके तहत आरोप लगाया गया है और जेल के अंदर ठूंसा गया है। आज देख लिजिए भीमा कोरेगांव मामले में ही 11 बुद्धिजीवियों को, देश के सबसे होनहार बेटे-बेटियों को इन्होंने जेल के अंदर में बंद कर दिया है। लेकिन भीमा कारेगांव में जो मेन मास्टरमाइंड थे, जिन्होंने दलितों पर हिंसा किया, कौन थे दलितों पर हिंसा करने वाले? वे थे मिलिंद एकबोटे, वे थे संभाजी भिंडे़। ये दोनों कौन हैं, ये आरएसस से जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक से जुड़े हुए हैं। मिलिंद एकबोटे अभी हिन्दू एकता मंच चलाते हैं और संभाजी भिंड़े अभी शिव प्रतिष्ठान हिन्दुस्तान नामक संगठन चलाते हैं, इनलोगों को जेल नहीं हुआ, ये लोग बाहर है लेकिन जिन्होंने वहां पर सच के लिए आवाज उठाई, उन लोगों को जेल के अंदर में बंद कर दिया गया है। उनको जमानत नहीं मिल रही है आप देखिए दिल्ली में हिंसा भड़काने के आरोप में जो सफूरा जरगर, मिरान हैदर, सरजील ईमाम जो पहले गिरफ्तार हो गये थे, उसके बाद जो लोग गिरफ्तार हो रहे है गूलसिफा, सिफाउर रहमान, उमर खालिद पर मुकदमा हुआ है, दानिश जेल के अंदर है। कंवलप्रीत कौर को मोबाइल लिया गया है। ये लोग एन्टी सीएए, एन्टी एनआरसी, एन्टी एनपीआर के एक्टिविस्ट लोग थे। लेकिन जिन्होंने वास्तव में हिंसा भड़काया, प्रवेश वर्मा, अनुराग सिंह ठाकुर जिन्होंने खुले आम बोला ‘गोली मारो सालों को देश के गद्दारों को’, कपिल मिश्रा इन्होंने खुलेआम धमकी दी इनको मजा चखाने की, सबक सिखाने की, लेकिन उनके उपर मुकदमा नहीं होता है, वे खुले आम घूम रहे होते हैं। तो यह आरोप किनके उपर लगते है? किनके उपर मुकदमे होते हैं? यह साफ-सी बात है कि आज जो भी लोग सरकार की जनविरोधी नीतियों का पर्दाफाश करेंगे, सरकार के जनविरोधी नीतियों के खिलाफ खड़े होंगे या फिर जो लोग देश में जो जल-जंगल-जमीन की लड़ाई चल रही है, एक तरफ लूटेरे हैं, साम्राज्यवादी लोग है, मल्टी नेशनल कम्पनी है, उसके पक्ष में सरकार है, उसके पक्ष में सीआरपीएफ है, उसके पक्ष में फौज है, जो उसके खिलाफ बोलेंगे, जो कहेंगे कि आदिवासियों का हक है जल-जंगल-जमीन पर! उनका हक मत छीनो, उनको जेल के अंदर ठूंस दिया जाएगा, झूठे एनकाउंटर में उनकी हत्या हो जाएगी, उनको जेल में सड़ा दिया जाएगा, हो सकता है कुछ लोगों को फांसी की सजा भी हो, इसमें कोई दो राय नहीं है।
दोस्तों, मेरे कहने का मतलब यही है, मैं यही कहना चाहता हूं कि आज पूरे देश के अंदर इन्होंने युद्ध छेड़ रखा है। एक लड़ाई चल रही है। एक छोटी-सी घटना बताता हूं, मैं फेसबुक सोशल साइट पर हूं तो लगातार चीजों को देखता हूं, 21 मार्च को माओवादी और सुरक्षा बलों में छत्तीसगढ़ में मुठभेड़ होती है। इसमें 17 सुरक्षा बलों के जवान मारे जाते हैं, उसके बाद पूरे देश में बहुत सारे बुद्धिजीवी, बहुत सारे लोगों ने आवाज उठाई कि भाई! अभी माओवादियों को इस तरह की लड़ाई बंद कर देनी चाहिए, लड़ाई नहीं होनी चाहिए, क्योंकि अभी कोरोना का समय है। कोरोना में अभी सबको साथ में मिलकर लड़ना चाहिए, लेकिन दूसरी तरफ 4 अप्रैल को झारखंड के कोल्हान में, चाईबासा के जंगलों में 3 माओवादी महिला कहा गया था कि ये माओवादी थी, इनकी वर्दी भी थी, हथियार भी था, तीन माओवादी महिला की हत्या होती है, लेकिन उसपर ये लोग कुछ नहीं बोलते, उसपर नहीं कहते कि हत्या क्यों? अभी पूरे बिहार झारखंड में, उड़ीसा में, छत्तीसगढ़ में आॅपरेशन त्रिशूल चल रहा है, लोगों को घेरो मारो, पूरे जंगल में। एक तरफ कहा जा रहा कि आप निकलो मत लेकिन दूसरी तरफ जो वहां आदिवासियों का हक अधिकार है, उनको छिनने की लगातार साजिश चल रही है। उनके उपर लगातार हमले हो रहे हैं, घेर कर लगातार आॅपरेशन त्रिशूल चलाए जा रहे हैं। आप अभी बोल रहे हैं सबको घर में रहो, फिर आप सीआरपीएफ को जंगलों में क्यों भेज रहे हैं? आप पुलिस को क्यों भेज रहे हैं?

तो दोस्तों सवाल बहुत है और उनका जवाब भी है। लेकिन दोस्तों मैं केवल यही कहना चाहता हूं कि आज पूरे देश में जो भी जनपक्षीय लोग है, जो भी लोकतंत्र पसंद लोग हैं, जो भी जनवाद पसंद लोग हैं, जो चाहते हैं कि इस तरह की चीजें रूके, जो सच की आवाज उठाते हैं, उन्हें जेल के अंदर बंद नहीं होना पड़े, जो चाहते हैं झूठे एनकाउंटर रूक जाए, जो चाहते हैं, कि एक शोषण रहित समाज की स्थापना हो, जो चाहते हैं, कि वास्तव में एक अच्छी दुनिया आए, एक प्रेममयी दुनिया आए, उन्हें मिलकर इन तमाम चीजों के खिलाफ सिर्फ बुद्धिजीवियों, छात्रों और पत्रकारों पर हमले होते हैं, सिर्फ तभी आवाज नहीं उठाए बल्कि जब छत्तीसगढ़ से लेकर झारखंड, उड़ीसा, बिहार और तमाम जगह पर जो जल-जंगल-जमीन की लड़ाई चल रही है, मजदूरों के श्रम कानून को जो खत्म कर दिया गया है, उस तरह का जो हमला चलाया जा रहा है, उन तमाम चीजों के खिलाफ भी बोलें। आपको झूठे एनकाउंटरों के बारे में भी बोलना होगा, आपको बोलना होगा, ये झूठ है, ये गलत है। आप जंगलों में जाते हो पूंजीपतियों को, मल्टीनेशनल कम्पनियों को, सस्ते मिनरल्स उपलब्ध कराने के लिए, वहां आदिवासी लोग आपसे बाहर आकर नहीं लड़ रहे हैं, वे लोग तो सिर्फ कह रहे हैं कि हमारे घर में नहीं आइए, आपने पांचवीं-छठी अनुसूची में उनको कहा भी है, उनको अधिकार भी दिया है संविधान के तहत कि जो भी होगा ग्राम सभा के फैसले के तहत ही होगा। लेकिन आपका यह अनुसूची कहीं लागू नहीं है साहब! हमें इसके लिए भी आवाज उठानी होगी, हम लोगों को तमाम चीजों के साथ आवाज उठानी होगी।
हमारा कहने का मतलब था, यूएपीए आज सिर्फ बुद्धिजीवियों, छात्रों व पत्रकारों पर ही नहीं लगाए जा रहे हैं बल्कि मजदूरों पर, किसानों पर और तमाम वैसे लोगों पर खास करके आदिवासियों पर, मुस्लिम अल्पसंख्यक टार्गेट अभी है ही, इस तरह के लोग के उपर थोक भाव में यूएपीए लगाए गये हैं और वे लोग जेल में बंद है। जो लोग जानते भी नहीं है कि यूएपीए का मतलब क्या है? और एक लम्बे समय से जेल में बंद पड़े हुए है। हमें जरूरत है इन तमाम लोगों को, तमाम लोगों के पक्ष में, इन तमाम लोगों के साथ मिलकर लड़ाई को लड़ने की ताकि इन लोगों को भी लगे कि हां हमारे पक्ष में ये सारे लोग भी खड़े हैं। आप जानते हैं जितनी भी खास करके बिहार के अंदर जो कुछ उच्च जातियों के द्वारा, मैनें अभी वीरकुंवर पासवान या सेनारी कांड के बारे में बताया, उससे पहले बहुत सारे जनसंहार वहां पर हुए, बाथे में, बथानी में, लक्ष्मीपुर में, मियांपुर में, लेकिन वे तमाम लोग जो नरसंहार करने वाले थे, वे उच्च जाति भूमिहारों की सेना थी, रणवीर सेना थी, उन्होंने वे नरसंहार किये थे, इसलिए उन तमाम लोगों को बिहार की नीतिश-सुशील मोदी की सरकार ने जेल से बाहर निकाल दिया और छुट्टा छोड़ दिया और दूसरी तरफ जो बारा जैसे कांडों में फंसाए गये थे, वे आज फांसी की सजा के तहत जेल के अंदर बंद हैं और जेल के अंदर रहने को विवश है।
दोस्तों, मैं अपने वक्तव्य में, पूरे चर्चा के दौरान इसी बात को लाना चाह रहा था कि आज किस तरह से जो छठा संशोधन अगस्त 2019 में हुआ है, उसके बाद किस तरह से यूएपीए का बेजा इस्तेमाल हो रहा है। किस तरह से ये यूएपीए देश के तमाम जगहों पर, तमाम राज्यों में ऐसे लोगों पर लगाए जा रहे हैं, जहां के लोग अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। लगातार लड़ रहे हैं, इसलिए उनके उपर लगातार यह थोपा जा रहा है। उनपर इस तरह के काले कानून के तहत मुकदमे थोपे जा रहे हैं। खास करके आज के संदर्भ में मेरे कहने का मतलब यही था।
आप तो जानते ही है कि मेरे उपर भी यूएपीए की आधा दर्जन धाराओं के तहत मुकदमा लम्बित है, आईपीसी की भी धाराएं हैं और सीआरपीसी की भी धाराएं हैं। मेरा भी जुर्म यही था कि मैंने झारखंड के अंदर जो लूट चल रही थी, मिनरल्स की लूट, झारखंड के अंदर जो फर्जी मुठभेड़ हो रहे थे, उसके खिलाफ मैंने आवाज उठाई थी, कलम से लिखा था, मुझे भी उनलोगों ने उसी तरह से फंसाया और अभी डीफाॅल्ट बेल के आधार पर जेल से बाहर हुए हैं। वे मुझे छः महीने जेल के अंदर रखे, लेकिन उन छः महीनों में भी ये चार्जशीट भी फाइल नहीं कर पाए, क्योंकि इनके पास चार्जशीट फाइल करने के लिए कुछ नहीं था। मैं इस वक्तव्य के अंतिम में उन तमाम लोगों के साथ एकजुटता जाहिर करता हूं, भीमा कारेगांव से लेकर एंटी सीएए, एन्टी एनसीआर, एन्टी एनपीआर के एक्टिविस्ट, जो जेल के अंदर बंद हैं और जो लोग, जो आदिवासी, जो मजदूर, जो किसान जिसपर यूएपीए लगाए गये हैं जो जेल के अंदर बंद हैं, उन लोगोें के साथ भी एकता का इजहार करते हैं और इस मनुवादी-ब्राह्मणवादी, फासीवादी सरकार से मांग करते हैं कि उन तमाम लोगों को बिना किसी शर्त उनकी रिहाई होनी चाहिए, उनको छोड़ा जाना चाहिए। खास करके वरवर राव जैसे कवि को जो 80 साल के हैं, आज 13 किलो वजन उनका घट गया है और सोमा सेन, सुधा भारद्वाज जैसे लोगों को जिनके जेल में कोरोना पाॅजिटिव मरीज पाए गये हैं, इन तमाम लोगों को छोड़ना चाहिए और काले कानून को समाप्त करना चाहिए, जिसमें कि बहुत ही कम प्रतिशत है सजा पाने का।
अंतिम में मैं आपको एक आंकड़ा बताना चाहूंगा जो काफी इंट्रेस्टेड है। यह मैं जब जेल में था उस समय पढ़ा था 8 अगस्त 2019 को टाइम्स आॅफ इंडिया में छपा था कि पूरे देश के अंदर जेल में जो लोग बंद हैं, उसमें 73.5 प्रतिशत लोग विचाराधीन बंदी है, यानी की अंडरट्रायल है। बिहार में यह आंकड़ा 84.4 प्रतिशत है। तो दोस्तों यह स्थिति है अंडरट्रायल बंदियों की जेल की पूरे देश के अंदर में। इसलिए ऐसे तमाम लोगों को जरूर ही जमानत पर छोड़ना चाहिए।
मेरी बात को आपलोगों ने इतनी देर तक सुना इसके लिए तमाम साथियों का बहुत बहुत शुक्रिया! मैं इंकलाबी छात्र मोर्चा के साथियों को बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहता हूं।् बहुत बहुत धन्यवाद, सलाम, इंकलाबी सलाम, लाल सलाम्!
इस कार्यक्रम के अंत में कुछ साथियों ने कुछ सवाल किया था, जिसका जवाब रूपेश कुमार सिंह द्वारा निम्न शब्दों में दिया गया हैः-
सवालः-जो जल-जंगल-जमीन की लड़ाई मध्य भारत में लड़ रहे हैं उनको शहर में रहने वाले छात्र संगठन, बुद्धिजीवी, नागरिक समाज किस तरह से सहयोग कर सकते हैं?
जवाब- उन्हें सहयोग की जरूरत भी है और यह सहयोग इसी तरह से होगा कि जो जल-जंगल-जमीन की लड़ाई है उनको उसके सही प्रचार का कि लड़ाई किस स्टेज में हैं, किस तरह से उनके उपर दमन हो रहा है, किस तरह से उनके उपर राजकीय दमन थोपा जा रहा है, इससे पूरी दुनिया अनजान है, लोग लड़ किस लिए रहे है? लोगों को लग रहा है कि कुछ लोग आए हैं, हथियार लेकर लड़ रहे हैैं। लेकिन हकिकत यह नहीं है, मैं झारखंड में पांच-छः सालों से रह रहा हूं मैं देख रहा हूं, कि यह आदिवासियों की लड़ाई है, ये वहां के जल-जंगल जमीन के रखवालों की लड़ाई है, वे उस लड़ाई को लड़ रहे है। लेकिन बाहर में, पूरे देश में, पूरे विश्व में प्रचार है कि ये सिर्फ कुछ लोग हैं जो आए हैं, हथियार लेकर और लड़ाई लड़ रहे हैं।

जो सही बात नहीं है। हमने पढ़ा है कि किस तरह से ‘भारत के आसमान में लाल तारा’ हो, या अरूंधति राय की ‘आहत देश’ किताब हो, वह एक मध्य भारत में नये समाज की बात करते हैं, वे एक जनताना सरकार के जरिये बेहतर समाज का जो उन्होंने लिखा है अपने किताब में, निर्माण की ओर अग्रसर हैं। तो मुझे लगता है, कि जो बाहर के लोग हैं, बुद्धिजीवी हैं, उन लोगों को जरूर ही ऐसी जगहों पर जाना चाहिए, विजीट करना चाहिए और वहां की असलियत को दुनिया के सामने रखना चाहिए कि ये लड़ाई किसलिए चल रही है और ये लड़ाई क्यों हो रही है? वहां किस तरह से राजकीय दमन है? वहां किस तरह से संगठित मल्टीनेशनल कम्पनी सरकार और फोर्सेस का मिलकर एक लूट चल रहा है? इन चीजों को जाकर पर्दाफाश करना चाहिए।
सवाल-दिल्ली में बेगुनाह लोगों को धर्म के आधार पर गिरफ्तार किया जा रहा है, कोर्ट जनता के खिलाफ फैसला दे रहा है, क्या करना चाहिए?
जवाब- दोस्तों! बात साफ है यह सिर्फ दिल्ली में ही नहीं बहुत जगहों पर हुआ है। आप जानते हैं कि जब ये कोरोना का शुरूआत हुआ, उसके बाद किस तरह से जमात के नाम पर पूरे देश के अंदर में, झारखंड के अंदर में भी जहां मैं रहता हूं यहां भी मुस्लिमों के खिलाफ एक बड़ा माहौल क्रिएट किया गया, यहां मेरे बगल में रांची है, यहां पर हिन्दपीढ़ी नाम का एक मोहल्ला है, वहां भी हमने देखा कि किस तरह से जमात के नाम पर, मुसलमानों के नाम पर, धर्म के नाम पर ही वहां के लोगो ंको आइसोलेट करना शुरू किया, लोगों को तंग-तबाह करना शुरू किया और उन लोगों को एक तरह से कहा जाए तो जनता का दुश्मन घोषित कर दिया गया। कोर्ट जनता के खिलाफ फैसला दे रही है यह कोई आज की बात नहीं है, एक लम्बे समय से यही हो रहा है। मैं कहूंगा तो लोग कहेंगे कि कोर्ट का अवमानना हो रहा है, लेकिन हकीकत यही है। अगर कोर्ट फैसला सही देता, तो फिर आज तमाम भीमा कारेगांव के लोग जो जेल के बंदी हैं, वे आज जेल से बाहर रहते और मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिंडे़ जैसे लोग जो हैं, वो जेल के अंदर होते। अनुराग सिंह ठाकुर अंदर होते और कपिल मिश्रा भी अंदर होते। खास तौर पर ऐसे समय में हम लोगों को धर्म के नाम पर जो राजनीति है, उसके खिलाफ खड़े होना चाहिए। खासतौर पर अल्पसंख्यक समुदाय को जिसको सभी लोगों द्वारा मिलकर इस व्यवस्था में आईसोलेट करने का काम किया जा रहा है, किया गया है, उसके साथ हम लोगों को जो जनवादी हैं, बुद्धिजीवी हैं, जो लोकतंत्र पसंद लोग है उन लोगोें को उनके साथ एकता स्थापित करनी चाहिए। उन लोगांे के साथ मिलकर यह कहना चाहिए कि देश हम सभी लोगों का है, हम लोग मिलकर लड़ेंगे और ऐसे सभी साजिशों का हमें मिलकर भंडाफोड़ करना चाहिए।
सवाल-जनता को ज्यादा से ज्यादा कैसे जागरूक करें, इन काले कानून की सच्चाई से?
जवाब-सभी लोग अपने-अपने स्तर से कर रहे हैं। इस काले कानून की पूरी सच्चाई को और इसके तहत जो मैंने बताया किस तरह से लोगों को, किस तरह से टाडा-पोटा में इतने लोगों की गिरफतारी हुई लेकिन एक प्रतिशत पर ही आरोप साबित हुआ, तो ऐसे चीजों को लोगों के सामने लाना होगा, इन काले कानून का जो विभत्स रूप है, उसको जनता को दिखाना होगा, उनको दिखाना होगा कि किस तरह से लोग जेल के अंदर, किस तरह से आज मुस्लिम धर्म के लोगों को, आदिवासियों को टारगेट किया गया है, कल आपको भी टारगेट किया जाएगा। बगल के घर में आग लगी, आप चुप हैं तो कल आपके घर में भी आग लगेगी, कोई बचाने वाला नहीं रहेगा। इसलिए हमें तमाम लोगों को इस लहजे से भी, नजरिये से भी जागरूक करने की जरूरत है कि इसकी पूरी सच्चाई को अपने लेख के जरिये, अपने कविता के जरिये, उनलोगों के पास जाकर मीटिंग के जरिये, सभा के जरिये काले कानून की सच्चाई को बताने की जरूरत है।
सवाल-जल-जंगल-जमीन की लड़ाई को हम युवा कैसे लड़े?
जवाब- जल-जंगल-जमीन की लड़ाई वास्तव में कहा जाए तो युवा ही लड़ रहे हैं। आज जो लड़ाई चल रही है पूरे देश में, जल-जंगल-जमीन को बचाने की, उसमें युवा वर्ग ही सबसे आगे हैं। हां उसमें जो मिडिल क्लास के लोग हैं, जो हायर क्लास के युवा हैं, उसकी संख्या नगण्य है, यह बात जरूर है। लेकिन आदिवासी और दलित वर्ग के युवा ही उस लड़ाई में सबसे अग्रिम कतार में है। उन्हीं की जान जा रही है, उन्हीं की मौत हो रही है, वही लोग इस कतार में सबसे ज्यादा है। अब यह है कि बाहर के लोग इस लड़ाई में क्या मदद कर सकते हैं? तो इस लड़ाई में मदद करने की भी जरूरत है और इस लड़ाई में पूरे समय के लिए खुलकर शामिल होने की भी जरूरत है और उसके लिए कोई समस्या नहीं है कि हम उसमें कैसे शामिल हो? जल-जंगल-जमीन की लड़ाई चल रही है, आप जाइए उसमें पार्टिसिपेट कीजिए। जो आप बाहर से कर रहे हैं वह तो हैं ही उसके अंदर भी जाकर लड़ाई लड़ने की जरूरत है।
सवाल- एक तरफ सरकार सेना के नाम पर राजनीति कर रही है, वहीं दूसरी तरफ सबसे ज्यादा सीआरपीएफ के जवान अपनी नौकरी से इस्तीफा दे रहे हैं, सरकार इसके आंकड़े क्यों नहीं सामने ला रही है?
उत्तर-वे आंकड़े सामने क्यों लाएगी? वे अगर आंकड़े सामने लाएंगी, तो जिसको उन्होंने इस युद्ध में अपना मजबूत हाथ बनाया हुआ है, दाहिना हाथ बनाया हुआ है, उनकी बंदूक की नली जो आदिवासियों के तरफ मुड़ी हुई है, वह इस सरकार की तरफ मुड़ जाएगी। इस डर से और सिर्फ व सिर्फ इसी डर से कि इनके अंदर भी वह मानवता, वह इंसानियत, वह सही चीजों को समझने की शक्ति न आ जाए, कि क्यों लोग इस्तिफा दे रहे हैं, इतने-इतने लोग जा रहे हैं ये और लोग भी जानेंगे और पूरे देश में जो माहौल बनेगा, उसको ये संभाल नहीं पाएंगे, सिर्फ और सिर्फ इसलिए सीआरपीएफ में चाहे नौकरी से इस्तीफा देने की बात हो, या फिर बीमारी से मरने की बात हो, मलेरिया से मरने की बात हो, एक आंकड़ा आया था मलेरिया से मरने वाले सीआरपीएफ के लोगों का जितने लोग माओवादी हमला या आतंकवादी हमला में नहीं मारे जा रहे हैं, उससे अधिक लोग बीमारी से मर रहे हैं। तो उस आंकड़ा को भी छुपाती है। बहुत जगह यह भी आता है कि जो सीआरपीएफ के लोग मरते भी हैं, उनके मौत के आंकड़े भी छुपा लिए जाते हैं। इसके पीछे ठोस जो मुझे कारण नजर आता है वह यही है कि इससे एक तो सीआरपीएफ के लोगोें का मनोबल कमजोर होगा और दूसरी तरफ इनकी बंदूक की नली सरकार के तरफ भी मुड़ सकती है। सीआरपीएफ के पक्ष में भी पूरे देश के लोग भी खड़े हो सकते हैं और इसके पक्ष में भी एक पूरा माहौल बन सकता है। इसलिए ये इस तरह के आंकड़े को सामने नहीं लाना चाहते हैं।
सवाल-यूएपीए सहित और भी काले कानूनों की जानकारी ग्रामीण आबादी तथा आम जनता तक कैसे पहुंचाया जाए?
जवाब- दोस्तों ऐसे बहुत सारे संगठन हैं, इन संगठन के जरिये आप जहां भी हैं जहां भी रह रहे हैं, जिस भी संगठन में काम कर रहे हैं, उस संगठन के तरफ से भी गांव चलो अभियान के जरिये या विभिन्न-विभिन्न तरह से गांव में जाकर, इस पूरे काले कानून की सच्चाई को बताया जा सकता है और बताया जा भी रहा है इसलिए यह किया जा सकता है। बहुत लोग कर भी रहे हैं। इसलिए गांव जाया जा सकता है, गांव चलो अभियान लिया जा सकता है। उससे जुड़िये, यूएपीए कानून के बारे में बताईये और इसके खिलाफ लोगों को खड़ा कीजिए ताकि सरकार इस तरह के कानून में पीछे हटने पर मजबूर हो, सरकार को पीछे हटना पड़े।


प्रस्तुतिः इलिका प्रिय

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here