जन संगठनों ने दी झारखण्ड के जनयोद्धा कॉ. त्रिदिब घोष को भावभिनी श्रद्धांजलि

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रांची : विस्थापन विरोधी जनविकास आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक कॉ. त्रिदिब घोष की याद में 19 दिसंबर को एस.डी.सी. हॉल, रांची में श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई। श्रद्धांजलि सभा में  विभिन्न वाम दलों, जन संगठनों के प्रतिनिधि, राज्य के विभिन्न जिलों से सामाजिक कार्यकर्त्ता उपस्थित रहे।

कॉ. त्रिदिब घोष विस्थापन विरोधी जनविकास आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक के साथ साथ वामपंथी विचारधारा से हमेशा जुड़े रहे और आंदोलनों में निर्णायक भूमिका निभाई। वे 82 साल के थे, पिछले 15 दिसंबर को कोरोना संक्रमण से उनकी मौत हो गयी। आज की श्रद्धांजलि सभा में सभी ने उनको आखिरी सलाम दिया।

बता दें कि दिवंगत कॉ. त्रिदिब घोष विस्थापन विरोधी जनविकास आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक के साथ साथ वामपंथी विचारधारा से हमेशा जुड़े रहे और आंदोलनों में निर्णायक भूमिका निभाई। वे 82 साल के थे, पिछले 15 दिसंबर को कोरोना संक्रमण से उनकी मौत हो गयी। आज की श्रद्धांजलि सभा में सभी ने उनको आखिरी सलाम दिया।
विस्थापन विरोधी जनविकास आंदोलन के झारखण्ड राज्य संयोजक दामोदर तुरी ने सभी का स्वागत किया। त्रिदिब जी के घर से स्वास्थ्य सम्बंधित रोक टोक की वजह से कोई भी श्रद्धांजलि सभा शामिल नहीं हो पाया। त्रिदिब घोष की पत्नी सेवा निवृत्त प्रोफेसर मालंच घोष भी कोरोना पोजेटीव हो गई हैं और वे अस्पताल में भर्ती हैं। श्रद्धांजलि सभा के अध्यक्ष मंडल में सामाजिक कार्यकर्त्ता वासवी कीड़ो, दयामनी बारला, पत्रकार रुपेश कु. सिंह, माले नेता भुवनेश्वर केवट, पी.यू.सी.एल के अशोक झा, माकपा के प्रकाश विप्लब, एम.एस.एस. के सुशांतो तथा कई अन्य साथी रहे। श्रद्धांजलि सभा 8 जिलों से साथी मौजूद रहे। खरसावाँ से नजीर मुंडा, गुमला से केश्वर सिंह, रामगढ़ से रुपेश कुमार सिंह, सिमडेगा से जन जागरण वनाधिकार संघर्ष समिति के साथी, गिरिडीह से धरम गढ़ रक्षा समिति से भगवान किस्कू, धनबाद डब्लू.एस.एस. से बेबी तुरी, बोकारो से झारखण्ड के क्रांतिकारी मजदूर यूनियन के संजय तुरी, रांची से अलोका कुजूर, ट्राइबल इंस्टिट्यूट के डायरेक्टर डा. रणेंद्र, विस्थापन विरोधी जनविकास आंदोलन के संस्थापक अरुण ज्योति, प्रताप चौधरी, युवा साथी गरिमा और रिषित मौजूद रहे।
दयामनी बारला ने माल्यार्पण के साथ सभा की शुरुआत की। दो मिनट के मौन के बाद सभी ने त्रिदिब दा के साथ जुड़ी स्मृतियों और अनुभवओं को सामने रखा। दामोदर तुरी ने त्रिदिब दा के संघर्षों के बारे में लोगों को अवगत कराया।
उन्होंने बताया कि त्रिदिब दादा ने जर्मनी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। जब 15 नवंबर 2000 को झारखंड अलग राज्य बना और झारखंड सरकार ने जल, जंगल, जमीन व समस्त प्राकृतिक संपदाओं को पूंजीपतियों के हाथों बेचने के लिए समझौता पत्र (एम.ओ.यू) पर हस्ताक्षर करने लगी व धरातल पर लागू करने के लिए पोटा जैसे जन विरोधी काला कानून लाया गया था, तब दादा व अन्य सदस्यों की मदद से झारखंड विस्थापन विरोधी समन्वय समिति नामक संगठन बना कर विरोध किया गया था। 22—23 मार्च 2007 में विस्थापन विरोधी जन विकास आंदोलन का स्थापना सम्मलेन पटेल भवन, लालपुर, रांची में अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित किया गया था। इस मोर्चा को बनाने में त्रिदिब घोष की सक्रिय भूमिका  थी। विस्थापन विरोधी जन विकास आंदोलन का दूसरा केन्द्रीय सम्मलेन हैदराबाद में 9-10 फरवरी 2016 को आयोजित किया गया था। इसमें त्रिदिब घोष को केन्द्रीय संयोजक चुना गया था और इसी रूप में कार्य कर रहे थे। वे आपरेशन ग्रीन हंट विरोधी नागरिक मंच के संयोजक थे। महान नक्सल बाड़ी के 50वीं वर्ष गांठ के अवसर पर महान नक्सल बाड़ी समारोह समिति, झारखंड के संयोजक के नेतृत्व में 16 जिले में कार्यक्रम आयोजित किया गया था। झारखंड लोक स्वतंत्र संगठन (पी यू सी एल) का निर्माण करने में भी इनकी अहम भूमिका थी।

वासवी कीड़ो ने बताया कि वे अपने कॉलेज के समय से त्रिदिब घोष और उनकी जीवन साथी मालंच दी से प्रेरित रही हैं। जेंडर से जुड़े मामलों में त्रिदिब दा हमेशा ही संवेदनशील और प्रेरणाशील रहे। आदिवासी मुद्दों से भी दोनों का गहरा सरोकार रहा। आज के ज्वलंत मुद्दों में, जैसे किसान आन्दोलन और हाथरस कांड में त्रिदिब दा के विचारों की प्रासंगिकता बरक़रार है। शिव प्रकाश जो की एक फिल्म मेकर हैं, त्रिदिब दा से नेतरहाट और कोयल कारो आन्दोलन के समय मिले। उन्होंने बताया की त्रिदिब दा सिर्फ सोयी हुई जनता को उठाने की बात नहीं करते थे, बल्कि जो महज सोने का ढोंग कर रहे हैं उन्हें भी उठाने की आवश्यकता पर जोर देते थे। कई साथियों ने त्रिदिब दा के व्यक्तित्व के बारे में बात रखी जो सही मायनों में सराहनीय थी। प्रेरणादायक तो वो रहे ही, साथ में उनकी सौम्यता और उनका अनुशासन भी कई बार आन्दोलन के तीव्र मौकों पर काम आई। तार्किक दृष्टिकोण से उन्होंने समाज के हर उतार चढाव को समझा और सहनशीलता पूर्वक संवाद के साथ आगे बढ़ते रहे और जन आन्दोलन को दृढ़ बनाया।

माले के भुवनेश्वर केवट ने त्रिदिब दा में संसदीय और असंसदीय वामपंथ का एक मेल देखा। अधिवक्ता साथी श्याम ने अपने उभरते राजीतिक जीवन में फादर स्टेन और त्रिदिब जी के योगदान को महत्वपूर्ण बताया। नरेंद्र जी ने त्रिदिब दा की तुलना ए.के. रॉय और शंकर गुहा नियोगी जैसे महान नेताओं से की। उन्होंने हाल ही में दिवंगत कवि मंगलेश डबराल जी की कविता ‘स्मृति भी एक जगह है’ को याद किया।
सभी साथियों ने यह स्वीकार किया की आन्दोलन को आगे ले जाना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी। कार्यक्रम में दयामनी बारला, सुशांतो, प्रकाश और अन्य लोगों ने कुछ प्रस्ताव दिए, जैसे विस्थापन के सवाल पर व्याख्यान का आयोजन, आन्दोलन के वरिष्ठ साथियों से नियमित रूप से मिलना एवं संवाद रखना, कृषि सम्बन्धी सवालों पर कृषि मंत्री के साथ डेलीगेशन। पत्रकार रुपेश कुमार सिंह ने भी विभिन्न वाम दलों के समक्ष कुछ महत्वपूर्ण सवाल रखे जैसे की विस्थापन, दमन, फर्जी एनकाउंटर, अधिग्रहण इत्यादि। उन्होंने एक प्रस्ताव रखा कि एक व्यापक संयुक्त मोर्चा का निर्माण होना चाहिए।

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