गहन अध्ययन का नतीजा था भगत सिंह का इंकलाबी होनाः डॉ. वंदना चौबे

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बनारस रेल इंजन कारख़ाना, वाराणसी में केक काटकर मनाया गया शहीद ए आजम भगत सिंह का 116वाँ जयंती समारोह

वाराणसी : भारतीय रेल की विश्व प्रसिद्ध उत्पादन इकाई ‘बनारस रेल इंजन कारख़ाना, वाराणसी’  में महान क्रांतिकारी अमर बलिदानी शहीद ए आजम भगत सिंह की 116 वीं जयंती धूमधाम से मनाई गई । केक काटकर बच्चों में वितरित कराया गया । ‘प्रेरणा कला मंच, वाराणसी’ की ओर से दो बेहद ही खूबसूरत नाटक प्रस्तुत किए गए । ‘अमानत’ और ‘एक छोटी सी चिंगारी’ नाटकों के माध्यम से कलाकारों ने दर्शकों का मन मोह लिया । कलाकारों का प्रदर्शन इतना उच्च कोटि का था । कई बार दर्शकों की आँखें अपने आंसुओं को रोक नहीं पाईं और कई बार जमकर ठहाके भी लगे । ‘बनारस रेल इंजन कारख़ाना, वाराणसी’ की धरती पर यह पहला मौका था जिसमें इतनी भारी तादाद में यहाँ कर्मचारी और उनके परिवार के लोग जुटे ।

इस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में चिकित्सा विज्ञान संस्थान, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से प्रो. (डॉ.) बृजेश कुमार और मुख्य वक्ता के रूप में प्रगतिशील लेखक संघ की बनारस की सचिव और आर्य महिला पी. जी. कॉलेज (हिन्दी विभाग) की प्रो. (डॉ.) वंदना चौबे ने शिरकत की ।

शहीद ए आजम भगत सिंह हम सबके आदर्श, हमें उनसे प्रेरणा लेनी होगी और उनकी विचारधारा पर चलकर उनके सपनों का भारत बनाना होगा : डॉ. बृजेश कुमार
इस मौके पर अपने संबोधन में प्रगतिशील लेखक संघ की बनारस की सचिव और आर्य महिला पी. जी. कॉलेज (हिन्दी विभाग) की प्रो. (डॉ.) वंदना चौबे ने कहा कि 28 सितंबर को शहीद शहीद ए आजम भगत सिंह का जन्मदिन है । मौजूदा अँधेरे समय में उन्हें याद करने का हमारे लिए बहुत महत्व है । शहीद भगत सिंह की क़ुर्बानी, बहादुरी, और ख़ुशी-ख़ुशी फाँसी के तख़्ते पर झूल जाने के बारे में कमोबेश देश के ज़्यादातर लोग जानते हैं । शहीद भगत सिंह की शख्सियत की तस्वीर लोगों के दिमाग़ों में एक हथियारबंद क्रांति‍कारी के रूप में उकरी हुई है, जो अपनी ज़िंदगी की परवाह नहीं करते थे और मौत से किलोलें करते थे । लेकिन यह एक त्रासदी ही है कि देश के बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कितने चिंतनशील व्यक्ति थे । जैसा कि शहीद भगत सिंह ने लिखा था – “सिर्फ़ बम और पिस्तौल ही क्रांति नहीं लाते, क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज़ होती है ।” भगत सिंह और उनके साथियों द्वारा लिखे लेखों-दस्तावेज़ों-संस्मरणों में यह बात उभरकर सामने आती है कि उनका इंक़लाबी होना महज़ एक भावना या जवानी का जोश नहीं था, बल्कि मानव इतिहास, वर्तमान और भविष्य, विभिन्न आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्थाओं, विभिन्न राजनीतिक पार्टियों, इंसान के हाथों इंसान की लूट के ख़ात्मे, भगवान, धर्म, जातिवाद, सांप्रदायिकता आदि मुद्दों पर वे साफ़-स्पष्ट, गहरी आलोचनात्मक समझ रखते थे । शहीद भगत सिंह इस मामले में अपने सभी साथियों में अग्रणी थे । पहले संगठन के कामों और बाद में जेल में मुक़दमे के तरीक़ों की तैयारी, भूख-हड़ताल, जेल में साथियों से विचार-विमर्श और बाहर के संपर्कों से चिट्ठी-पत्र आदि व्यस्तताओं के बावजूद वह मेहनत से अध्ययन करते थे । शहीद भगत सिंह की अध्ययन में दिलचस्पी का अंदाज़ा उनके साथी शिव वर्मा द्वारा लिखी गई पुस्तिका ‘ऐसे थे हमारे भगत सिंह’ से लिए गए इस उद्धरण से लगाया जा सकता है – “उसे पढ़ने-लिखने का भी बेहद शौक़ था । वह जब भी कानपुर आता तो अपने साथ दो-चार पुस्तकें अवश्य लाता । बाद में फ़रार जीवन में जब उसके साथ रहने का अवसर मिला, तो देखा कि पिस्तौल और पुस्तक का उसका चैबीस घंटे का साथ था । मुझे एक भी अवसर याद नहीं पड़ता, जब मैंने उसके पास कोई-न-कोई पुस्तक ना देखी हो ।”
शहीद भगतसिंह की किताबें पढ़ने में अथाह दिलचस्पी तो थी ही, लेकिन वे एक सक्षम विचारक और गहरी आलोचनात्मक समझ रखने वाले क्रांतिकारी थे । उनकी अध्ययन की क्षमता, कमाल की समझदारी और दिलचस्पी के विषयों के बारे में किसी को जानना हो, तो हमें उनकी ‘जेल डायरी’ पढ़नी चाहिए । कार्ल मार्क्स, लेनिन, जार्ज बर्नार्ड शा, अप्टन सिंक्लेयर, जैक लंडन आदि अनेकों लेखकों की रचनाओं, फ़्रांसीसी क्रांति से लेकर रूसी क्रांति तक उन्होंने अध्ययन किया । इस अध्ययन से उनमें सामाजिक विकास के बारे में एक वैज्ञानिक समझ पैदा हुई। इस अध्ययन की बदौलत उन्होंने भारत की आज़ादी के आंदोलन के बारे में बहुत ज़रूरी नतीजे निकाले । बहुत से लोग नहीं जानते कि उनका मक़सद सिर्फ़ उपनिवेशवादी-साम्राज्यवादी ग़ुलामी से मुक्ति हासिल करना नहीं था । विदेशी ग़ुलामी से आज़ादी के बाद वह भारत में समाजवादी व्यवस्था का निर्माण चाहते थे । शहादत से दो दिन पहले पंजाब के गवर्नर को लिखे ख़त में शहीद भगत सिंह ने लिखा था – “हम यह ऐलान करते हैं कि एक युद्ध चल रहा है और यह तब तक जारी रहेगा, जब तक कुछ शक्तिशाली व्यक्ति भारतीय मेहनतकश जनता को और उसके आमदनी के साधनों को लूटते रहेंगे । ये लुटेरे भले ही शुद्ध अंग्रेज़ पूँजीपति हों या शुद्ध भारतीय पूँजीपति या दोनों मिले हुए…………… इस सबसे हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।”

यह उनके अध्ययन और चिंतन का ही नतीजा था कि उन्होंने कुछ क्रांतिकारियों की दुस्साहसवादी कार्रवाइयों द्वारा आज़ादी हासिल करने की ग़लत समझ की जगह जनक्रांति की समझदारी हासिल की। भगतसिंह की विकसित हुई यह समझदारी उनके इस कथन से साफ़ झलकती है – “इस समय हम नौजवानों से यह नहीं कह सकते कि वे बम और पिस्तौल उठाएँ। आज विद्यार्थियों के सामने इससे भी अधिक महत्वपूर्ण काम हैं।………… नौजवानों को क्रांति का यह संदेश देश के कोने-कोने में पहुँचाना है, फै़क्टरी कारख़ानों के क्षेत्रों में, गंदी बस्तियों और गाँवों की जर्जर झोपड़ियों में रहने वाले करोड़ों लोगों में इस क्रांति की अलख जगानी है, जिससे आज़ादी आएगी और तब एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण असंभव हो जाएगा।”
शहीद भगतसिंह में ना सिर्फ़ अध्ययन की अथाह क्षमता थी, बल्कि वह एक सक्षम लेखक भी थे । घर से भागकर कानपुर आने और पत्रकार के रूप में ‘प्रताप’ (कानपुर), ‘महारथी’ (दिल्ली), ‘चांद’ (इलाहाबाद), ‘अर्जुन’ (दिल्ली), और ‘मतवाला’ आदि कई हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में उन्होंने कई नक़ली नामों से लेख लिखे । ‘किरती’ में वे ‘विद्रोही’ उपनाम से पंजाबी में लिखते थे । इस अख़बार के कई संपादकीय लेख भी उन्होंने ही लिखे । उर्दू में भी वे बढ़िया लिखते थे । उन्होंने जितना लिखा उसमें से कुछ मिल चुका है जो पंजाबी, हिंदी, अंग्रेज़ी और भारत की कुछ अन्य भाषाओं में छप चुका है, जिसका हर किसी हो ज़रूर अध्ययन करना चाहिए । उनकी और भी रचनाएँ मिल पाने की संभावनाएँ हैं । शहीद भगत सिंह द्वारा लिखी किताबों की पांडुलिपियाँ गुम हैं । ये किताबें हैं – (1) आत्मकथा (2) समाजवाद का आदर्श (3) भारत में क्रांतिकारी आंदोलन (4) मौत के दरवाज़े पर । हो सकता है कि भविष्य में ये किताबें और अन्य रचनाएँ भी मिल जाएँ लेकिन उपलब्ध रचनाएँ शहीद भगत सिंह के विचारों, उनके पढ़ने-समझने-लिखने की क्षमता के बारे में काफ़ी कुछ बताती हैं । अपने सभी साथियों में से शहीद भगत सिंह की विचारक क्षमता सबसे अधिक थी, लेकिन अन्य साथी जैसे भगवतीचरण वोहरा, सुखदेव, बुटकेश्वर दत्त, शिव वर्मा, विजय कुमार सिन्हा आदि भी अच्छी विचारक क्षमता वाले क्रांतिकारी थे ।
हिंदुत्वी कट्टरपंथी और सिख कट्टरपंथी भगत सिंह को बेहद कमीनगी भरे ढंग से अपने-अपने हिसाब से पेश करने में लगे हुए हैं । हिंदुत्वी कट्टरपंथी भगतसिंह को हिंदु राष्ट्रवादी के तौर पर और सिख कट्टरपंथियों का एक हिस्सा भगत सिंह को सिख साबित करने में लगा हुआ है। जबकि भगतसिंह ना सिर्फ़ धार्मिक कट्टरता और जनता को धर्म के नाम पर बाँटने के सख़्त विरोधी थे, बल्कि वे तो नास्तिक थे । ईश्वर और धर्म संबंधी उनके स्पष्ट विचार ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ ?’ और ‘ड्रीमलैंड की भूमिका’ लेखों में दर्ज हैं । गहरे अध्ययन और चिंतन से उनका मानना था कि “ब्रह्मांड के सृजनकर्ता, पालनहार और सर्वशक्तिमान के अस्तित्व का सिद्धांत बेबुनियाद है ।” और “प्रकृति को चलाने वाला कोई ईश्वर या सचेतन सत्ता नहीं है।” पाप-पुण्य, जन्म-कर्म, क़ि‍स्मत के सिद्धांतों का विरोध करते हुए भगत सिंह ने साफ़ लिखा था – “मेरे प्यारे दोस्तो, ये सिद्धांत विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के मनगढ़ंत सिद्धांत हैं। वे इन सिद्धांतों के ज़रिए ज़बरदस्ती हथियाई हुई अपनी शक्ति संपन्नता और श्रेष्ठता को जायज ठहराते हैं।”
भगत सिंह ईश्वर को मानने या ना मानने को, किसी भी धर्म को अपनाने को व्यक्तिगत मसला मानते थे । इस आधार पर किसी से नफ़रत नहीं की जानी चाहिए, किसी को दबाया नहीं जाना चाहिए, इस आधार पर नफ़रत फैलाने वालों से ख़बरदार रहना चाहिए और वर्गीय एकता कायम करनी चाहिए । उन्होंने लिखा था – “जनता को आपस में लड़ने से रोकने के लिए वर्गीय चेतना की ज़रूरत है। ग़रीब मेहनतकशों और किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं, इसलिए तुम्हें इनके हथकंडों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ ना करना चाहिए । दुनिया के सारे ग़रीबों के, चाहे वो किसी भी जाति, नस्ल, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता और देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताक़त अपने हाथ में लेने का यत्न करो । इन यत्नों से तुम्हारा कुछ नुक़सान ना होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी ज़ंजीरें कट जाएँगी और तुम्हें आर्थिक स्वतंत्रता मिलेगी।”

शोषक वर्ग जब जनता के दिमाग़ों से उनके नायकों की याद मिटा पाने में नाकाम होते हैं, तो वे जन-नायकों की शख़्सियतों को महज़ बुतों में बदल देने की कोशिश करते हैं । यही शहीद भगत सिंह और उनके साथियों की शख़्सियतों के साथ हुआ है । अगस्त 1947 में अंग्रेज़ों के साथ हुए शर्मनाक समझौते के ज़रिए जिन्होंने राजकाज पर क़ब्ज़ा किया । वे देश के करोड़ों मज़दूरों-मेहनतकशों की नुमाइंदगी करने वाले हरगिज नहीं थे । उन्होंने पूँजीपति वर्ग के हितों के मुताबिक़ देश की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक व्यवस्था का रूपांतरण किया । शहीद भगत सिंह की रचनाएँ आज हमारे पास इस बात का सबूत हैं कि आज़ादी के बाद जिस पूँजीवादी व्यवस्था का निर्माण देश में हुआ है, वे उसके सख़्त ख़िलाफ़ थे। शहीद भगतसिंह के विचारक पहलू से लोगों के परिचित कराने का अर्थ है मौजूदा शोषक व्यवस्था के ख़िलाफ़ जनता को जागृत करना । पूँजीपति वर्ग, उसकी सेवक सरकार, विभिन्न पूँजीवादी-धार्मिक कट्टरपंथी-जातिवादी पार्टियाँ-संगठन-संस्थाएँ, भाड़े के कलम घसीट बुद्धिजीवी, पूँजीवादी शिक्षा व्यवस्था, पूँजीवादी मीडिया आदि जनता को शहीद भगत सिंह के विचारों से परिचित कराने का काम नहीं करेंगे । यह उनके हितों के ख़िलाफ़ है । बल्कि उन्होंने तो क्रांतिकारी शहीदों के विचारों को दबाने की पुरज़ोर कोशिशें की हैं । उन्होंने जनता के मनों में शहीद भगत सिंह की असल शख़्सियत की जगह बम-पिस्तौलों के शौक़ीन, अंग्रेज़ों के ख़ून के प्यासे नौजवान की शख़्सियत बिठा दी । असल में शोषक वर्ग चंद जोशीले दुस्साहसवादी व्यक्तियों की कार्रवाइयों के नहीं बल्कि जनसंघर्षों से डरते हैं।

मौजूदा हालातों के समझने और बदलने के लिए अपनी क्रांतिकारी विरासत से जुड़ना, शहीद भगत सिंह और उनके साथियों के जीवन और विचारों का जानना-समझना बहुत ज़रूरी है । हमें ना सिर्फ़ उत्पीड़ित जनता से प्यार, उसके लिए संघर्ष करने, उसकी बेहतरी के लिए अपनी ज़िंदगी लगाने, जान क़ुर्बान करने की भावना को अपनाना चाहिए बल्कि जिस दिलचस्पी और मेहनत से शहीद भगत सिंह और उनके अन्य साथियों ने देश-दुनियाँ के साहित्य का अध्ययन किया, उसी ढंग से हमें भी अध्ययन करना होगा । बिना अध्ययन किए हम ना तो समाज के मौजूदा हालातों की सही समझ हासिल कर सकते हैं और ना ही समाज को बदलने का सही रास्ता अपना सकते हैं । समाज को समझने और बदलने का विज्ञान अध्ययन से ही हासिल हो सकता है । हमें ना सिर्फ़ ख़ुद शहीद भगत सिंह और उनके साथियों के जीवन और विचारों के बारे में जानना चाहिए और वैज्ञानिक-प्रगतिशील-क्रांतिकारी साहित्य से जुड़ना चाहिए बल्कि व्यापक जनता तक इसे पहुँचाने के काम में शामिल होना चाहिए । हमें वॉलंटीयर बनकर घर-घर, स्कूलों, कॉलजों, यूनिवर्सिटियों तक ऐसी किताबें लेकर जानी होगा । जगह-जगह पुस्तकालय स्थापित करने होंगे । सामूहिक अध्ययन, गोष्ठियाँ, अध्ययन मंडल जैसी गतिविधियाँ चलानी होंगी और रचनात्मक ढंग से ऐसा और भी बहुत कुछ करना होगा। हमारी ऐसी कोशिशें एक बेहतर समाज के निर्माण की तरफ़ बेहद महत्वपूर्ण क़दम होंगी ।

अपने भाषण की शुरूआत करते हुए समारोह के मुख्य अतिथि प्रो. (डॉ.) बृजेश कुमार ने कहा कि मुझसे पहले अभी हमारी मुख्य वक्ता प्रो. (डॉ.) वंदना चौबे जी अपने संबोधन में लगभग सब कुछ कह दिया है, जो कुछ बचा था ‘अमानत’ और ‘एक छोटी सी चिंगारी’ के कलाकार अपने नाटकों के माध्यम से कह गए हैं इसलिए मुझे लगता है कि शायद अब कुछ कहने को बचा नहीं है लेकिन फिर भी इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि / अध्यक्ष होने के नाते मैं सिर्फ यही कहना चाहूँगा कि शहीद ए आजम भगत सिंह हम सबके आदर्श हैं, हमें उनसे प्रेरणा लेनी होगी और उनकी विचारधारा पर चलकर उनके सपनों का भारत बनाना होगा । भगत सिंह के सपनों का भारत कैसा हो ? जिसमें किसी भी छुआछूत, आपसी भेदभाव और नफरत के लिए कोई जगह न हो । हर मनुष्य एक मनुष्य के मनुष्य के रूप में देखे । उसे सम्मान दे । भगत सिंह छुआछूत और जातिवाद के प्रबल विरोधी थे । उन्होंने एक मनुष्य को मनुष्य के रूप में जाना और समझा । शहीद भगत सिंह की बैरक की साफ-सफाई करने वाले ‘भंगी’ का नाम बोघा था । भगत सिंह उसको बेबे (मां) कहकर बुलाते थे । जब कोई उनसे पूछता कि भगत सिंह ! ये भंगी बोघा तेरी बेबे यानी माँ कैसे हुआ ? तब भगत सिंह कहते, ” मेरा मल-मूत्र या तो मेरी बेबे (माँ) ने उठाया था , या इस भले पुरूष बोघे ने । बोघे में मैं अपनी बेबे (माँ) देखता हूँ । ये मेरी बेबे यानी माँ ही है ।” यह कहकर भगत सिंह बोघे को अपनी बाँहों में भर लेते । शहीद भगत सिंह अक्सर बोघा से कहते, “बेबे ! मैं तेरे हाथों की रोटी खाना चाहता हूँ ।” पर बोघा अपनी जाति को याद करके झिझक जाता और कहता – “भगत सिंह ! तू ऊँची जात का सरदार और मैं एक अदना सा भंगी……..भगतां तू रहने दे, ज़िद न कर।” लेकिन सरदार भगत सिंह भी अपनी ज़िद के पक्के थे ।, फांसी से कुछ दिन पहले जिद करके उन्होंने बोघे को कहा “बेबे ! अब तो हम चन्द दिन के मेहमान हैं, अब तो मेरी इच्छा पूरी कर दे !” बोघे की आँखों से आँसू बहने लगे । उस दिन बोघे ने रोते हुए खुद अपने हाथों से शहीद भगत सिंह के लिए रोटियाँ बनाईं और अपने हाथों से ही भगत सिंह को अपने हाथ की बनीं रोटियाँ खिलाईं । जैसे ही बोघा ने शहीद भगत सिह के मुँह में रोटी का गास डाला, बोघे की रुलाई फूट पड़ी । “ओए भगतां, ओए मेरे शेरा, धन्य है तेरी मां, जिसने तुझे जन्म दिया । शहीद भगत सिंह ने बोघे को अपनी बाँहों में भर लिया । ऐसी सोच के मालिक थे अमर बलिदानी शहीद ए आजम सरदार भगत सिंह ।…………..हमें उनसे प्रेरणा लेनी होगी ।

शहीद ए आजम भगत सिंह जब ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अपनी लड़ाई लड़ रहे थे । उसी दौरान उनके जीवन में एक घटना घटी जब शहीद ए आजम भगत सिंह रेलगाड़ी से कहीं जा रहे थे और जब रेलगाड़ी एक स्टेशन पर रुकी तो वहाँ भगत सिंह पानी पीने के लिए उतरे और पानी पिया । तभी उनकी नजर कुछ दूरी पर खड़े एक शख्स पर पड़ी जो धूप में नंगे बदन खड़ा था और बहुत भारी वजन उसके कंदे पर रखा था । तरसती हुई आँखों से पानी की ओर देख रहा था । मन में सोच रहा था कि मुझे भी थोड़ा पानी पीने को मिल जाता । शहीद ए आजम भगत सिंह उसके पास गए और उससे पूछने लगे । आप कौन हो ? और इतने भारी वजन को इतनी कड़ी धूप में अपने सिर पर क्यों उठाए हुए हो ? इसे उतार क्यों नहीं लेते । उस आदमी ने  डरते हुए कहा, साब ! आप मुझसे दूर रहें, नहीं तो आप अछूत हो जाएँगे क्योंकि मैं एक बदनसीब अछूत हूँ । मुझे कोई छू नहीं सकता और न ही मैं किसी को छू सकता हूँ । शाही ए आजम भगत सिंह की आँखें भर आईं । शहीद भगत सिंह ने उस आदमी से कहा, आपको प्यास लगी होगी । पहले इस वजन को उतारो और मैं आपके लिए पानी लेकर आता हूँ । आप पानी पी लीजिए । वो शख्स शहीद भगत सिंह के इस व्यवहार से वह बहुत खुश हुआ । उसकी आँखों में एक अलग ही चमक थी ।

शहीद भगत सिंह ने उसे पानी पिलाया और फिर पूछा ! आप अपने आपको अछूत क्यों कहते हो ? तो उसने जबाब दिया कि साब ! अछूत मैं नहीं कहता अछूत तो मुझे एक वर्ग विशेष के लोग कहते हैं और वे मुझसे कहते हैं कि तुम लोग अछूत हो, तुम्हारी परछाईं भी हम अपवित्र हो जाते हैं । हमारा धर्म नष्ट हो जाता है । वे हमारे साथ जानवरों जैसा सलूक करते हैं । जिन तालाबों, पोखरों में कुत्ते और बिल्ली पानी पी सकते हैं । उस तालाब के पानी को हम छू नहीं सकते । साब ! आपने मुझे पानी पिला दिया । यह आपका मेरे ऊपर बहुत बड़ा एहसान है । मुझे तो इस कुएँ से पानी पीने का अधिकार नहीं है और किसी पेड़ की छाया में खड़े होने का । अगर आप न आए होते तो मैं प्यासा ही रह जाता……मैं आपका यह आसान कभी नहीं भूलूँगा । शहीद ए आजम भगत सिंह की आँखों से आँसू बह रहे थे और मन ही मन सोच रहे थे कि मैं कौन सी आजादी की लड़ाई लड़ रहा हूँ ?

तब शहीद ए आजम भगत सिंह को आभास हुआ कि मुझको तो बचपन से यही बताया गया था  कि मेरा देश अंग्रेजों का गुलाम हैं लेकिन आज की ये तस्वीर तो कुछ और ही बयां करती है । मेरा देश तो एक वर्ग विशेष से गुलाम है जो धर्म के नाम नफरत के बीज बोए हुए है । एक मनुष्य को मनुष्य मानने को तैयार नहीं है । इससे बड़ी गुलामी और क्या हो सकती है ? तब शहीद ए आजम भगत सिंह मन ही मन सोचने लगे कि मेरा यह देश अंग्रेजों से आजाद भी हो गया तो भी गुलाम ही रहेगा, क्योंकि इन अछूतों को कौन आजाद कराएगा ? अगर यह देश हुआ तो भी यह आजादी केवल कुछ लोगों तक ही होगी ।

तब भगत सिंह ने बाबासाहेब के बारे में जाना (उस समय बाबासाहेब विदेश में थे) । फिर भगत सिंह ने इस बात को लेकर गहन अध्ययन किया और फिर सोचने लगे कि इनकी ऐसी हालत कैसे हुई ? शहीद ए आजम भगत सिंह ने अपने लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ ?’ में लिखा कि मैं तो अब अपने नकली दुश्मनों से लड़ रहा था, असली दुश्मन तो मेरे देश में हैं । जिनसे बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर लड़ रहे हैं । अगर मैं जेल से छूटा तो आजीवन बाबासाहेब के साथ रहते हुए, इन अछूत अस्पृश्य भारतीयों की आजादी के लिए लड़ूँगा ।

संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर और शहीद ए आजम भगत सिंह की लड़ाई के तरीके भले ही अलग – अलग थे लेकिन अंतिम लक्ष्य दोनों का एक ही था । वैसे तो बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर से शहीद ए आजम भगत सिंह करीब 16 ½ छोटे थे लेकिन दोनों के विचारों में बहुत सी समानताएँ थीं ।

फर्क सिर्फ इतना था कि बाबासाहेब मानते थे कि ‘आजादी मुझे प्यारी है, लेकिन पहले हमें सामाजिक आजादी चाहिए । मैं इस देश की राजनीतिक आजादी से ज्यादा जरुरी अपने करोड़ों अछूत भाइयों की सामाजिक आजादी समझता हूँ । हम भी इंसान हैं, एक इंसान होने के नाते सभी नागरिक अधिकारों के हकदार हैं और जब तक हम सारे अधिकार हासिल नहीं कर लेते हैं, तब तक हमें चैन से नहीं बैठना चाहिए । हम अपने मानवीय अधिकारों को खुद हासिल करेंगे, यही हमारा मकसद होना चाहिए ।(दिनांक 28.06.1931 को बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर द्वारा अहमदाबाद की सभा में दिए गए एक भाषण का अंश) बाबासाहेब का मानना यह भी था कि ‘Man is mortal. Everyone has to die some day or the other. But one must resolve to lay down one’s life in enriching the noble ideals of self-respect and in bettering one’s human life. We are not slaves. Nothing is more disgraceful for a brave man than to live life devoid of self-respect’ यानि ‘मनुष्य नश्वर है । हर किसी को कभी न कभी मरना है लेकिन मनुष्य को अपने जीवन में आत्म-सम्मान के महान आदर्शों को समृद्ध बनाने और स्वयं के जीवन को बेहतर बनाने का फैसला करना होगा । हम दास नहीं हैं । एक बहादुर व्यक्ति के लिए आत्म-सम्मान से रहित जीवन जीने की तुलना में और अधिक शर्मनाक कुछ नहीं है ।’

‘What we must do is not to content ourselves with mere political democracy. We must make our political democracy a social democracy as well. Political democracy cannot last unless there is at the base of it, a social democracy. What does social democracy mean? It means a way of life which recognizes liberty, equality and fraternity as the principles of life. These principles of liberty, equality and fraternity are not to be treated as separate items. They form a union in the sense that, to divorce one from the other is to defeat the very purpose of democracy. Liberty cannot be divorced from equality, nor can liberty and equality be divorced from fraternity.’ यानि ‘हमें मात्र राजनीतिक लोकतंत्र से संतुष्ट नहीं होना है । हमें हमारे राजनीतिक लोकतंत्र को एक सामाजिक लोकतंत्र बनाना है । राजनीतिक लोकतंत्र तब तक नहीं रह सकता जब तक यह एक सामाजिक लोकतंत्र पर ना टिका हो । सामाजिक लोकतंत्र का क्या अर्थ है ? इसका अर्थ जीवन का एक तरीका है जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के सिद्धांतों को पहचानता है । स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के इन सिद्धांतों को अलग वस्तुओं के रूप में नहीं देख सकते । ये इस तरह से एक संघ के रूप में हैं कि एक का दूसरे से तलाक लोकतंत्र के उद्देश्य को समाप्त कर देगा । स्वतंत्रता का समानता से तलाक नहीं किया जा सकता, और न ही स्वतंत्रता और समानता का भाईचारे से तलाक किया जा सकता है ।

बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर मिल के सिद्धान्तों का जिक्र करते हुए कहते हैं कि Every man who repeats the dogma of Mill that one country is no fit to rule another country must admit that one class is not fit to rule another class.’ यानि हर व्यक्ति जो मिल के सिद्धांत कि एक देश दूसरे देश पर शासन नहीं कर सकता, को दोहराता है । उसे ये भी स्वीकार करना चाहिए कि एक वर्ग, दूसरे वर्ग पर शासन नहीं कर  सकता ।

जबकि शहीद भगत सिंह मानते थे कि  “I am a man and all that affects mankind concerns me. यानि मैं एक इन्सान हूँ और जो भी चीजें  इंसानियत पर प्रभाव डालती हैं, मुझे उनसे फर्क पड़ता है ।’

‘The person who stands in the way of progress will have to criticize and oppose the traditional stage.  Also, he has to challenge यानि जो व्यक्ति उन्नति के लिए राह में खड़ा होता है, उसे परंपरागत चरण की आलोचनाएं व विरोध करना होगा । साथ ही उसे चुनौती देनी होगी ।’

‘The birth right of every human being in this world is his own freedom. which no one can eliminate. यानि इस संसार में हर इंसान का जन्म सिद्ध अधिकार है उसकी खुद की स्वतंत्रता, जिसे कोई खत्म नहीं कर सकता ।’

हालांकि, जब दिनांक 23.03.1931 को शाम 07.00 बजे लाहौर सेन्ट्रल जेल में शहीद ए आजम भगत सिंह को फांसी दी गई थी, उस समय पहला गोलमेज़ सम्मेलन (12.11.1930 – 19.01.1931) सम्पन्न हो चुका था, शहीद ए आजम भगत सिंह की फांसी के करीब 06 माह बाद दूसरा गोलमेज़ सम्मेलन (07.09.1931 – 01.12.1931) शुरू होने वाला था । तीसरा गोलमेज़ सम्मेलन 17.11.1932 से 24.12.1932 तक चला । बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर तीनों गोलमेज़ सम्मेलनों में शामिल हुए ।

दिनांक 23.03.1931 को, जब शहीद ए आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फाँसी दे दी गई । इससे बाबासाहेब काफी दुखी हुए और उन्हें अपने अखवार ‘जनता’ में दिनांक 13.04.1931 को ‘तीन शहीद’ शीर्षक से एक संपादकीय लेख लिखा जिसे मैं आपके समक्ष हूबहू प्रस्तुत कर रहा हूँ  । ‘भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु इन तीनों को अन्ततः फांसी पर लटका दिया गया । इन तीनों पर यह आरोप लगाया गया कि उन्होंने सान्डर्स नामक अंग्रेजी अफसर और चमन सिंह नामक सिख पुलिस अधिकारी की लाहौर में हत्या की । इसके अलावा बनारस में किसी पुलिस अधिकारी की हत्या का आरोप, असेम्बली में बम फेंकने का आरोप और मौलमिया नामक गांव में एक मकान पर डकैती डाल कर वहां लूटपाट एवं मकान मालिक की हत्या करने जैसे तीन चार आरोप भी उन पर लगाये गए । इनमें से असेम्बली में बम फेंकने का आरोप भगत सिंह ने खुद कबूल किया था और इसके लिए उन्हें और बटुकेश्वर दत्त नामक उनके एक सहयोगी दोस्त को उमर कैद के तौर पर काला पानी की सज़ा सुनायी गयी । साण्डर्स की हत्या भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों ने की, ऐसी स्वीकारोक्ति जयगोपाल नामक भगत सिंह के दूसरे सहयोगी ने भी की थी और उसी बुनियाद पर सरकार ने भगत सिंह के खिलाफ मुकदमा कायम किया था ।

इस मुकदमे की कार्रवाई में तीनों ने भाग नहीं लिया था । हाईकोर्ट के तीन न्यायाधीशों के स्पेशल ट्रिब्युनल का गठन करके, उनके सामने 05 मई 1930 से शुरू होकर 07 अक्टूबर 1930 तक यह मुकदमा चला और उन तीनों ने इन्हें दोषी घोषित किया और उन्हें फांसी की सज़ा सुना दी । इस सज़ा पर अमल न हो और फांसी के बजाए उन्हें अधिक से अधिक काला पानी की सज़ा सुनायी जाए, ऐसी गुजारिश के साथ भगत सिंह के पिता ने राजा और वायसराय के यहां दरखास्त भी की ।

अनेक बड़े – बड़े नेताओं ने और तमाम अन्य लोगों ने भगत सिंह को इस तरह सज़ा न दी जाए । इसे लेकर सरकार से अपील भी की । गांधीजी और लॉर्ड इरविन के बीच चली आपसी चर्चाओं में भी भगत सिंह की फांसी की सज़ा का मसला अवश्य उठा होगा और लार्ड इरविन ने भले ही मैं भगत सिंह की जान बचाऊंगा, ऐसा ठोस वायदा गांधीजी से न किया हो, मगर लार्ड इरविन इस सन्दर्भ में पूरी कोशिश करेंगे और अपने अधिकारों के दायरे में इन तीनों की जान बचाएंगे । ऐसी उम्मीद गांधीजी के भाषण से पैदा हुई थी। मगर यह सभी उम्मीदें, अनुमान और गुजारिशें गलत साबित हुईं  और बीते 23 मार्च 1931 को शाम 7 बजे इन तीनों को लाहौर सेन्ट्रल जेल में फांसी दी गयी। ‘हमारी जान बकश दें’ ऐसी दया की अपील इन तीनों में से किसी ने भी नहीं की थी; हाँ, फाँसी की सूली पर चढ़ाने के बजाए हमें गोलियों से उड़ा दिया जाए । ऐसी इच्छा भगत सिंह ने प्रगट की थी, ऐसी ख़बरें अवश्य आयी हैं । मगर उनकी इस आखिरी इच्छा का भी सम्मान नहीं किया गया । न्यायाधीश के आदेश पर हुबहू अमल किया गया ! ‘अंतिम सांस तक फांसी पर लटका दें’ यही निर्णय जज ने सुनाया था । अगर गोलियों से उड़ा दिया जाता तो इस निर्णय पर शाब्दिक अमल नहीं माना जाता । न्याय देवता के निर्णय पर बिल्कुल शाब्दिक अर्थों में हूबहू अमल किया गया और उसके कथनानुसार ही इन तीनों को शिकार बनाया गया ।

यह बलिदान किसके लिए ?

अगर सरकार को यह उम्मीद हो कि इस घटना से ‘अंग्रेजी सरकार बिल्कुल न्यायप्रिय है – न्यायपालिका के आदेश पर हुबहू अमल करती है’ ऐसी समझदारी लोगों के बीच मजबूत होगी और सरकार की इसी ‘न्यायप्रियता’ के चलते लोग उसका समर्थन करेंगे तो यह सरकार की नादानी समझी जा सकती है क्योंकि यह बलिदान ब्रिटिश न्यायदेवता की शोहरत को अधिक धवल और पारदर्शी बनाने के इरादे से किया गया है, इस बात पर किसी को भी यकीन नहीं है । खुद सरकार भी इसी समझदारी के आधार पर अपने आप को सन्तुष्ट नहीं कर सकती है । फिर बाकियों को भी इसी  न्यायप्रियता के आवरण में वह किस तरह सन्तुष्ट कर सकती है ? न्यायदेवता की भक्ति के तौर पर नहीं बल्कि विलायत के कान्जर्वेटिव/राजनीतिक रूढिवादी/पार्टी और जनमत के डर से इस बलिदान को अंजाम दिया गया है, इस बात को सरकार के साथ – साथ पूरी दुनियाँ भी जानती है । गांधी जैसे राजनीतिक बन्दियों को बिना शर्त रिहा करने और गांधी खेमे से समझौता करने से ब्रिटिश साम्राज्य की बदनामी हुई है और जिसके लिए लेबर पार्टी की मौजूदा सरकार और उनके इशारे पर चलने वाला वायसराय हैं, ऐसा शोरगुल विलायत के राजनीतिक रूढिवादी पार्टी के कुछ कटटरपंथी नेताओं ने चला रखा है और ऐसे समय में एक अंग्रेज व्यक्ति और अधिकारी की हत्या करने का आरोप जिस पर लगा हो और वह साबित भी हो चुका हो, ऐसे राजनीतिक क्रांतिकारी अपराधी को अगर इरविन ने माफी दी होती तो इन राजनीतिक रूढिवादियों के हाथों बना बनाया मुददा मिल जाता । पहले से ही ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार डांवाडोल चल रही है और उसी परिस्थिति में अगर यह मसला राजनीतिक रूढिवादियों को मिलता कि वह अंग्रेज व्यक्ति और अधिकारी के हिन्दुस्तानी हत्यारे को भी माफ करती है तो यह अच्छा बहाना वहाँ के राजनीतिक रूढिवादियों को मिलता और इंग्लैण्ड का लोकमत लेबर पार्टी के खिलाफ बनाने में उन्हें सहूलियत प्रदान होती । इस संकट से बचने के लिए और रूढिवादियों के गुस्से की आग न भड़के इसलिए फांसी की इन सज़ा को अंजाम दिया गया है । यह कदम ब्रिटिश न्यायपालिका को खुश करने के लिए नहीं बल्कि ब्रिटिश लोकमत को खुश करने के लिए उठाया गया है ।

अगर निजी तौर पर यह मामला लार्ड इरविन की पसंदगी -नापसंदगी से जुड़ा होता तो उन्होंने अपने अधिकारों का इस्तेमाल करके फांसी की सज़ा रदद करके उसके स्थान पर उमर कैद की सज़ा भगत सिंह आदि को सुनायी होती । विलायत की लेबर पार्टी के मंत्रिमंडल ने भी लार्ड इरविन को इसके लिए समर्थन प्रदान किया होता, गांधी इरविन करार के बहाने से इसे अंजाम देकर भारत के जनमत को राजी करना जरूरी था । जाते-जाते लार्ड इरविन भी जनता का दिल जीत लेते। मगर इंग्लैण्ड की अपने रूढिवादी बिरादरों और यहां के उसी मनोव्रत्ती नौकरशाही के गुस्से का वह शिकार होते । इसलिए जनमत की परवाह किए बगैर लार्ड इरविन की सरकार ने भगत सिंह आदि को फांसी पर चढ़ा दिया और वह भी कराची कांग्रेस के तीन-चार दिन पहले । गांधी-इरविन करार को मटियामेट करने व समझौते की गांधी की कोशिशों को विफल करने के लिए भगत सिंह को फांसी और फांसी के लिए मुकरर किया समय , यह दोनों बातें काफी थी । अगर इस समझौते को समाप्त करने का ही इरादा लार्ड इरविन सरकार का था तो इस कार्रवाई के अलावा और कोई मजबूत मसला उसे ढूंढने से भी नहीं मिलता ।

इस नज़रिये से भी देखें तो गांधीजी के कथनानुसार सरकार ने यह बड़ी भूल/ब्लंडर/की है, यह कहना अनुचित नहीं होगा । लुब्बोलुआब यही कि जनमत की परवाह किए बगैर, गांधी-इरविन समझौते का क्या होगा इसकी चिन्ता किए बिना विलायत के रूढिवादियों के गुस्से का शिकार होने से अपने आप को बचाने के लिए, भगत सिंह आदि की बलि चढ़ायी गयी । यह बात अब छिप नहीं सकेगी यह बात सरकार को पक्के तौर पर मान लेनी चाहिए ।

(हम आपको यह बताना चाहेंगे कि यह संपादकीय बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के संपादन में निकलने वाले पाक्षिक अख़बार ‘जनता’ से लिया गया है । मालूम हो कि बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर के ‘जनता’ पाक्षिक का पहला अंक 24 नवम्बर 1930 को प्रकाशित हुआ था । लगातार बाईस अंकों के प्रकाशन के बाद 23 वां और 24 वां अंक ‘संयुक्तांक’ के तौर पर प्रकाशित हुआ । बाद में ‘जनता’ को साप्ताहिक में रूपांतरित किया गया । ‘मूकनायक,’ ‘बहिष्कृत भारत’, ‘समता’ जैसे पत्र निकालने के बाद बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने यह ‘जनता’ नामक यह अखबार निकाला था ।)

यह लेख मूल रूप में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने मराठी में लिखा था । मराठी से इसका हिंदी अनुवाद सुभाष गताड़े ने किया है । 

अमर बलिदानी शहीद ए आजम भगत सिंह की फांसी के 6 छठें दिन यानि दिनांक 29 मार्च 1931 को पेरियार ने अपने समाचार-पत्र ‘कुदी अरासु’ में इस विषय पर ‘भगत सिंह’ शीर्षक से संपादकीय लिखा । पेरियार की यह पत्रिका तमिल भाषा में निकलती थी ।

शहीद ए आजम भगत सिंह के विचारों को हम उनके लेख ‘अछूत का सवाल’ और ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ ?’ से समझ सकते हैं ।

शहीद ए आजम भगतसिंह का यह लेख जून, 1928 के ‘किरती’ में ‘विद्रोही’ नाम से प्रकाशित हुआ था । जिसमें उन्होंने लिखा है कि ‘हमारे देश- जैसे बुरे हालात किसी दूसरे देश के नहीं हुए । यहाँ अजब-अजब सवाल उठते रहते हैं । एक अहम सवाल अछूत-समस्या है । समस्या यह है कि 30 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में जो 6 करोड़ लोग अछूत कहलाते हैं, उनके स्पर्श मात्र से धर्म भ्रष्ट हो जाएगा ! उनके मन्दिरों में प्रवेश से देवगण नाराज हो उठेंगे ! कुएं से उनके द्वारा पानी निकालने से कुआँ अपवित्र हो जाएगा ! ये सवाल बीसवीं सदी में किए जा रहे हैं, जिन्हें कि सुनते ही शर्म आती है ।

हमारा देश बहुत अध्यात्मवादी है, लेकिन हम मनुष्य को मनुष्य का दर्जा देते हुए भी झिझकते हैं जबकि पूर्णतया भौतिकवादी कहलाने वाला यूरोप कई सदियों से इन्कलाब की आवाज उठा रहा है । उन्होंने अमेरिका और फ्रांस की क्रांतियों के दौरान ही समानता की घोषणा कर दी थी । आज रूस ने भी हर प्रकार का भेदभाव मिटा कर क्रांति के लिए कमर कसी हुई है । हम सदा ही आत्मा-परमात्मा के वजूद को लेकर चिन्तित होने तथा इस जोरदार बहस में उलझे हुए हैं कि क्या अछूत को जनेऊ दे दिया जाएगा ? वे वेद-शास्त्र पढ़ने के अधिकारी हैं अथवा नहीं ? हम उलाहना देते हैं कि हमारे साथ विदेशों में अच्छा सलूक नहीं होता । अंग्रेजी शासन हमें अंग्रजों के समान नहीं समझता लेकिन क्या हमें यह शिकायत करने का अधिकार है ?’

सिन्ध के एक मुस्लिम सज्जन श्री नूर मुहम्मद ने, जो बम्बई कौंसिल के सदस्य हैं, इस विषय पर 1926 में खूब कहा-

“If the Hindu society refuses to allow other human beings, fellow creatures so that to attend public schools, and if……….The president of local board representing so many lakhs of people in this house refuses to allow his fellows and brothers the elementary human right of having water to drink, what right have they to ask for more rights from the bureaucracy ? Before we accuse people coming from other lands, we should see how we ourselves behave toward our own people……How can we ask for greater political rights when we ourselves deny elementary rights of human beings.”

वे कहते हैं कि जब तुम एक इन्सान को पीने के लिए पानी देने से भी इनकार करते हो, जब तुम उन्हें स्कूल में भी पढ़ने नहीं देते तो तुम्हें क्या अधिकार है कि अपने लिए अधिक अधिकारों की माँग करो ? जब तुम एक इन्सान को समान अधिकार देने से भी इनकार करते हो तो तुम अधिक राजनीतिक अधिकार माँगने के अधिकारी कैसे बन गए ?

बात बिल्कुल खरी है लेकिन यह क्योंकि एक मुस्लिम ने कही है इसलिए हिन्दू कहेंगे कि देखो, वह उन अछूतों को मुसलमान बना कर अपने में शामिल करना चाहते हैं ।

जब तुम उन्हें इस तरह पशुओं से भी गया-बीता समझोगे तो वह जरूर ही दूसरे धर्मों में शामिल हो जाएंगे, जिनमें उन्हें अधिक अधिकार मिलेंगे, जहाँ उनसे इन्सानों-जैसा व्यवहार किया जाएगा । फिर यह कहना कि देखो जी, ईसाई और मुसलमान हिन्दू कौम को नुकसान पहुँचा रहे हैं, व्यर्थ होगा ।

कितना स्पष्ट कथन है, लेकिन यह सुन कर सभी तिलमिला उठते हैं । ठीक इसी तरह की चिन्ता हिन्दुओं को भी हुई । सनातनी पण्डित भी कुछ-न-कुछ इस मसले पर सोचने लगे । बीच-बीच में बड़े ‘युगांतरकारी’ कहे जाने वाले भी शामिल हुए । पटना में हिन्दू महासभा का सम्मेलन लाला लाजपतराय – जोकि अछूतों के बहुत पुराने समर्थक चले आ रहे हैं – की अध्यक्षता में हुआ, तो जोरदार बहस छिड़ी । अच्छी नोंक-झोंक हुई । समस्या यह थी कि अछूतों को यज्ञोपवीत धारण करने का हक है अथवा नहीं ? तथा क्या उन्हें वेद-शास्त्रों का अध्ययन करने का अधिकार है ? बड़े-बड़े समाज-सुधारक तमतमा गये, लेकिन लालाजी ने सबको सहमत कर दिया तथा यह दो बातें स्वीकृत कर हिन्दू धर्म की लाज रख ली । वरना जरा सोचो, कितनी शर्म की बात होती । कुत्ता हमारी गोद में बैठ सकता है । हमारी रसोई में निःसंग फिरता है, लेकिन एक इन्सान का हमसे स्पर्श हो जाए तो बस धर्म भ्रष्ट हो जाता है । इस समय मालवीय जी जैसे बड़े समाज-सुधारक, अछूतों के बड़े प्रेमी और न जाने क्या-क्या पहले एक मेहतर के हाथों गले में हार डलवा लेते हैं, लेकिन कपड़ों सहित स्नान किये बिना स्वयं को अशुद्ध समझते हैं ! क्या खूब यह चाल है ! सबको प्यार करने वाले भगवान की पूजा करने के लिए मन्दिर बना है लेकिन वहाँ अछूत जा घुसे तो वह मन्दिर अपवित्र हो जाता है ! भगवान रुष्ट हो जाता है ! घर की जब यह स्थिति हो तो बाहर हम बराबरी के नाम पर झगड़ते अच्छे लगते हैं ? तब हमारे इस रवैये में कृतघ्नता की भी हद पाई जाती है जो निम्नतम काम करके हमारे लिए सुविधाओं को उपलब्ध कराते हैं, उन्हें ही हम दुरदुराते हैं । पशुओं की हम पूजा कर सकते हैं, लेकिन इन्सान को पास नहीं बिठा सकते !

आज इस सवाल पर बहुत शोर हो रहा है । उन विचारों पर आजकल विशेष ध्यान दिया जा रहा है । देश में मुक्ति कामना जिस तरह बढ़ रही है, उसमें साम्प्रदायिक भावना ने और कोई लाभ पहुँचाया हो अथवा नहीं लेकिन एक लाभ जरूर पहुँचाया है । अधिक अधिकारों की माँग के लिए अपनी-अपनी कौमों की संख्या बढ़ाने की चिन्ता सबको हुई । मुस्लिमों ने जरा ज्यादा जोर दिया । उन्होंने अछूतों को मुसलमान बना कर अपने बराबर अधिकार देने शुरू कर दिए । इससे हिन्दुओं के अहम को चोट पहुँची । स्पर्धा बढ़ी । फसाद भी हुए । धीरे-धीरे सिखों ने भी सोचा कि हम पीछे न रह जायें । उन्होंने भी अमृत छकाना आरम्भ कर दिया । हिंदू-सिखों के बीच अछूतों के जनेऊ उतारने या केश कटवाने के सवालों पर झगड़े हुए । अब तीनों कौमें अछूतों को अपनी-अपनी ओर खींच रही हैं । इसका बहुत शोर-शराबा है । उधर ईसाई चुपचाप उनका रुतबा बढ़ा रहे हैं । चलो, इस सारी हलचल से ही देश के दुर्भाग्य की लानत दूर हो रही है ।

इधर जब अछूतों ने देखा कि उनकी वजह से इनमें फसाद हो रहे हैं तथा उन्हें हर कोई अपनी-अपनी खुराक समझ रहा है तो वे अलग ही क्यों न संगठित हो जाएं ? इस विचार के अमल में अंग्रेजी सरकार का कोई हाथ हो अथवा न हो लेकिन इतना अवश्य है कि इस प्रचार में सरकारी मशीनरी का काफी हाथ था । ‘आदि धर्म मण्डल` जैसे संगठन उस विचार के प्रचार का परिणाम हैं ।

अब एक सवाल और उठता है कि इस समस्या का सही निदान क्या हो ? इसका जबाब बड़ा अहम है । सबसे पहले यह निर्णय कर लेना चाहिए कि सब इन्सान समान हैं तथा न तो जन्म से कोई भिन्न पैदा हुआ और न कार्य – विभाजन से अर्थात् क्योंकि एक आदमी गरीब मेहतर के घर पैदा हो गया है, इसलिए जीवन भर मैला ही साफ करेगा और दुनियाँ में किसी तरह के विकास का काम पाने का उसे कोई हक नहीं है, ये बातें फिजूल हैं । इस तरह हमारे पूर्वज आर्यों ने इनके साथ ऐसा अन्यायपूर्ण व्यवहार किया तथा उन्हें नीच कह कर दुत्कार दिया एवं निम्नकोटि के कार्य करवाने लगे । साथ ही यह भी चिन्ता हुई कि कहीं ये विद्रोह न कर दें, तब पुनर्जन्म के दर्शन का प्रचार कर दिया कि यह तुम्हारे पूर्व जन्म के पापों का फल है । अब क्या हो सकता है ? चुपचाप दिन गुजारो ! इस तरह उन्हें धैर्य का उपदेश देकर वे लोग उन्हें लम्बे समय तक के लिए शान्त करा गए । लेकिन उन्होंने बड़ा पाप किया । मानव के भीतर की मानवीयता को समाप्त कर दिया । आत्मविश्वास एवं स्वावलम्बन की भावनाओं को समाप्त कर दिया । बहुत दमन और अन्याय किया गया । आज उस सबके प्रायश्चित का वक्त है ।

इसके साथ एक दूसरी गड़बड़ी हो गयी । लोगों के मनों में आवश्यक कार्यों के प्रति घृणा पैदा हो गई । हमने जुलाहे को भी दुत्कारा । आज कपड़ा बुनने वाले भी अछूत समझे जाते हैं । यू. पी. की तरफ कहार को भी अछूत समझा जाता है । इससे बड़ी गड़बड़ी पैदा हुई । ऐसे में विकास की प्रक्रिया में रुकावटें पैदा हो रही हैं ।

इन तबकों को अपने समक्ष रखते हुए हमें चाहिए कि हम न इन्हें अछूत कहें और न समझें । बस, समस्या हल हो जाती है । नौजवान भारत सभा तथा नौजवान कांग्रेस ने जो ढंग अपनाया है, वह काफी अच्छा है । जिन्हें आज तक अछूत कहा जाता रहा उनसे अपने इन पापों के लिए क्षमायाचना करनी चाहिए तथा उन्हें अपने जैसा इन्सान समझना, बिना अमृत छकाए, बिना कलमा पढ़ाए या शुद्धि किए उन्हें अपने में शामिल करके उनके हाथ से पानी पीना, यही उचित ढंग है और आपस में खींचतान करना और व्यवहार में कोई भी हक न देना, कोई ठीक बात नहीं है ।

जब गाँवों में मजदूर – प्रचार शुरू हुआ उस समय किसानों को सरकारी आदमी यह बात समझा कर भड़काते थे कि देखो, यह भंगी-चमारों को सिर पर चढ़ा रहे हैं और तुम्हारा काम बंद करवाएंगे । बस किसान इतने में ही भड़क गए । उन्हें याद रहना चाहिए कि उनकी हालत तब तक नहीं सुधर सकती जब तक कि वे इन गरीबों को नीच और कमीन कह कर अपनी जूती के नीचे दबाए रखना चाहते हैं । अक्सर कहा जाता है कि वह साफ नहीं रहते । इसका उत्तर साफ है – वे गरीब हैं । गरीबी का इलाज करो । ऊँचे-ऊँचे कुलों के गरीब लोग भी कोई कम गन्दे नहीं रहते । गन्दे काम करने का बहाना भी नहीं चल सकता, क्योंकि माताएँ बच्चों का मैला साफ करने से मेहतर तथा अछूत तो नहीं हो जातीं ।

लेकिन यह काम उतने समय तक नहीं हो सकता जितने समय तक कि अछूत कौमें अपने आपको संगठित न कर लें । हम तो समझते हैं कि उनका स्वयं को अलग संगठनबद्ध करना तथा मुस्लिमों के बराबर गिनती में होने के कारण उनके बराबर अधिकारों की माँग करना बहुत आशाजनक संकेत हैं या तो साम्प्रदायिक भेद को झंझट ही खत्म करो, नहीं तो उनके अलग अधिकार उन्हें दे दो । कौंसिलों और असेम्बलियों का कर्तव्य है कि वे स्कूल-कालेज, कुएँ तथा सड़क के उपयोग की पूरी स्वतन्त्रता उन्हें दिलाएं । जबानी तौर पर ही नहीं, वरन साथ ले जाकर उन्हें कुओं पर चढ़ाएं । उनके बच्चों को स्कूलों में प्रवेश दिलाएं लेकिन जिस लेजिस्लेटिव में बालविवाह के विरुद्ध पेश किए बिल तथा मजहब के बहाने हाय-तौबा मचाई जाती है, वहाँ वे अछूतों को अपने साथ शामिल करने का साहस कैसे कर सकते हैं ?

इसलिए हम मानते हैं कि उनके अपने जन-प्रतिनिधि हों । वे अपने लिए अधिक अधिकार माँगें । हम तो साफ कहते हैं कि उठो, अछूत कहलाने वाले असली जनसेवको तथा भाइयो ! उठो ! अपना इतिहास देखो । गुरु गोविन्दसिंह की फौज की असली शक्ति तुम्हीं थे ! शिवाजी तुम्हारे भरोसे पर ही सब कुछ कर सके, जिस कारण उनका नाम आज भी जिन्दा है । तुम्हारी कुर्बानियां स्वर्णाक्षरों में लिखी हुई हैं । तुम जो नित्यप्रति सेवा करके जनता के सुखों में बढ़ोतरी करके और जिन्दगी संभव बना कर यह बड़ा भारी अहसान कर रहे हो, उसे हम लोग नहीं समझते । लैण्ड-एलियेनेशन एक्ट के अनुसार तुम धन एकत्र कर भी जमीन नहीं खरीद सकते । तुम पर इतना जुल्म हो रहा है कि मिस मेयो मनुष्यों से भी कहती हैं – उठो, अपनी शक्ति पहचानो । संगठनबद्ध हो जाओ । असल में स्वयं कोशिश किए बिना कुछ भी न मिल सकेगा । (Those who would be free must themselves strike the blow.) स्वतन्त्रता के लिए स्वाधीनता चाहने वालों को यत्न करना चाहिए । इन्सान की धीरे-धीरे कुछ ऐसी आदतें हो गई हैं कि वह अपने लिए तो अधिक अधिकार चाहता है, लेकिन जो उनके मातहत हैं उन्हें वह अपनी जूती के नीचे ही दबाए रखना चाहता है । कहावत है – ‘लातों के भूत बातों से नहीं मानते’। अर्थात् संगठनबद्ध हो अपने पैरों पर खड़े होकर पूरे समाज को चुनौती दे दो । तब देखना, कोई भी तुम्हें तुम्हारे अधिकार देने से इन्कार करने की जुर्रत न कर सकेगा । तुम दूसरों की खुराक मत बनो । दूसरों के मुँह की ओर न ताको । लेकिन ध्यान रहे, नौकरशाही के झाँसे में मत फँसना । यह तुम्हारी कोई सहायता नहीं करना चाहती, बल्कि तुम्हें अपना मोहरा बनाना चाहती है । यही पूँजीवादी नौकरशाही तुम्हारी गुलामी और गरीबी का असली कारण है । इसलिए तुम उसके साथ कभी न मिलना । उसकी चालों से बचना । तब सब कुछ ठीक हो जायेगा । तुम असली सर्वहारा हो… संगठनबद्ध हो जाओ । तुम्हारी कुछ भी हानि न होगी । बस गुलामी की जंजीरें कट जाएंगी । उठो, और वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध बगावत खड़ी कर दो । धीरे-धीरे होने वाले सुधारों से कुछ नहीं बन सकेगा । सामाजिक आन्दोलन से क्रांति पैदा कर दो तथा राजनीतिक और आर्थिक क्रांति के लिए कमर कस लो । तुम ही तो देश का मुख्य आधार हो, वास्तविक शक्ति हो । सोए हुए शेरो ! उठो और बगावत खड़ी कर दो ।

इस कार्यक्रम को बी. एल. डब्ल्यू. इंटर कॉलेज के प्राचार्य श्री आर. के. सैनी, प्रवक्ता श्री शिवधर राम ने भी संबोधित किया ।

‘शहीद भगत सिंह विचार मंच, वाराणसी’ के बैनर तले आयोजित इस कार्यक्रम में बरेका परिवार के हजारों कर्मचारियों और उनके परिवार के सदस्यों ने भाग लिया । इस कार्यक्रम का संचालन इन्द्रेश कुमार ने किया और धन्यवाद ज्ञापन बनारस रेल इंजन कारखाना, वाराणसी की कर्मचारी परिषद के पूर्व संयुक्त सचिव श्री अमर सिंह ने किया । इस कार्यक्रम के कार्यक्रम के आयोजन में श्री अजय कुमार आर, कमलेश कुमार सिंह, सन्तोष प्रकाश शुक्ला, संजय कुमार, अमित कुमार यादव, नीलेश कुमार, संजय कुमार चौधरी, संजय कुमार भारती, मनोज कुमार, रूद्र प्रसाद, रविन्द्र कुमार, उमाशंकर यादव, अजय कुमार यादव, राकेश कुमार यादव, राम प्रवेश यादव, सुनील कुमार आदि का विशेष योगदान रहा ।

 

 

 

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