आरक्षण समुद्र मंथन से निकला विष हैः आरडी आनंद

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जिस जाति व्यवस्था के लिए ब्राह्मणों ने अपने तरीके से अनेक प्रयास किए और अपने वर्चस्व के लिए वेदों, पुराणों, श्रुतियों, स्मृतियों की रचना करते हुए जाति व्यवस्था को अक्षुण रखा हो, उसने आजादी आंदोलन के दौरान जाति व्यवस्था को टूटते हुए महसूस किया। तत्पश्चात, संविधान निर्माण के समय ब्राह्मणों ने अपनी एकता दिखाते हुए गांधी जी का प्रयोग किया तथा पूना पैक्ट करके डॉ. आम्बेडकर को आरक्षण लेने के लिए बाध्य कर दिया। आरक्षण के बहाने इस देश के जातिवादियों ने संविधान में अनुसूचित जातियों/जनजातियों को जाति प्रमाण-पत्र बनवा कर आरक्षण लेने के लिए प्रस्तुत करने को न सिर्फ बाध्य किया बल्कि जाति प्रमाण-पत्र बनवाने को संवैधानिक और अनिवार्य भी बना दिया। आज दलित स्वयं चमार, पासी, कोरी, धोबी का प्रमाण-पत्र प्रस्तुत कर ब्राह्मणों के जातिप्रथा को मजबूती प्रदान कर रहा है। इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि भारतीय संविधान ने जाति व्यवस्था को मजबूत किया है। हमें जाति प्रमाण-पत्र बनवाने की बाध्यता को खत्म करवाने का भी संघर्ष करना चाहिए।

 

पूना पैक्ट खत्म करो। हमें पृथक निर्वाचन चाहिए। हम जाति प्रमाण-पत्र क्यों दें। 2000 सालों तक ब्राह्मणों ने अपने व्यक्तिगत पुस्तकों में बिना हमारी मर्जी के हमारे विरुद्ध लिखा था लेकिन संविधान तो सर्वमान्य नैतिक और संविधिक दस्तावेज है जिस पर हमारे भी हस्ताक्षर हैं इसलिए इसने हमें सर्वमान्य व स्वयंमान्य शूद-चमार बना दिया।

 

पूना पैक्ट ने डॉ. आम्बेडकर साहब से पृथक निर्वाचन छीनकर आरक्षण का झुनझुना तो पकड़ा ही दिया। आरक्षण की स्थिति में दलितों का जितना फायदा नहीं हुआ उससे कहींअधिक नुकसान हो गया। सबसे अधिक नुकसान तो उनकी नैतिकता का हुआ जो उन्हें बिना किसी जोर-जबरदस्ती के चमार, पासी, कोरी लिखना पड़ रहा है तथा आरक्षण की आवश्यकता के लिए जातिप्रथा को स्वीकार करना पड़ रहा है। यदि पूना पैक्ट न हुआ होता तो दलित कौम पृथक निर्वाचन से अपने सफल और संगठित नेतृत्व को तैयार कर ले गया होता जो हमेशा सवर्ण जातियों को टक्कर देता और जाति प्रमाण-पत्र बनवाकर स्वयं निरीह और ज़लील न होता।

 

इसका अर्थ हुआ कि हमें आरक्षण नहीं पृथक निर्वाचन लेना चाहिए। आरक्षण की वजह से हमें जाति प्रमाण-पत्र बनवाना पड़ता है जो हमें बहुत खलता है। इतना सत्य है कि पृथक निर्वाचन यदि हम हारे न होते तो हमारी बेहतरीन उन्नति हुई होती और हमें न आरक्षण के सहारे जीना पड़ता और न ही चमार, धोबी, कोरी का प्रमाण-पत्र ही बनवाना पड़ता। इस संवैधानिक प्रक्रिया से हम स्वयं ब्राह्मणों के चौथे वर्ण को मानने को मजबूर हैं।

 

होता क्या है, लोग वस्तुगत वैचारिकी के गहराई में न जाकर स्वयं को बाबा साहब का असली अनुयायी और असली हकदार मान लेते हैं तथा सामने वाले को बाबा साहब का निंदक मान बैठते हैं क्योंकि हमारे साथियों में तर्क करने की क्षमता ही विकसित नहीं हो पाई है।

 

लेकिन, उस दबाव ने डॉ. आम्बेडकर साहब से पृथक निर्वाचन छीनकर आरक्षण का झुनझुना तो पकड़ा ही दिया। आरक्षण की स्थिति में दलितों का जितना फायदा नहीं हुआ उससे कहींअधिक नुकसान हो गया। सबसे अधिक नुकसान तो उनकी नैतिकता का हुआ जो उन्हें बिना किसी जोर-जबरदस्ती के चमार, पासी, कोरी लिखना पड़ रहा है तथा आरक्षण की आवश्यकता के लिए जातिप्रथा को स्वीकार करना पड़ रहा है। यदि पूना पैक्ट न हुआ होता तो दलित कौम पृथक निर्वाचन से अपने सफल और संगठित नेतृत्व को तैयार कर ले गया होता जो हमेशा सवर्ण जातियों को टक्कर देता और जाति प्रमाण-पत्र बनवाकर स्वयं निरीह और ज़लील न होता।

 

तर्क में बुरा मानने का कोई स्थान नहीं है। हमें लिखते समय शब्दों पर बहुत ध्यान देना चाहिए कि आप कहना क्या चाहते हैं और लिख क्या रहे हैं। आप लिख रहे हैं कि “जरूरत से ज्यादा मूर्ख” अर्थात मुझे जरूरत भर का मूर्ख समझने की सलाह दे रहे हैं। किसी भी व्यक्ति के विचारों और उपलब्धियों पर विमर्श किया जाना उचित है लेकिन उसको मूर्ख की किसी भी कैटेगरी में नहीं खड़ा किया जाना चाहिए और बाबा साहब जैसे व्यक्ति के बारे में ऐसा सोचना स्वयं में बहुत बड़ा अपराध है। खैर। आप का अर्थ है जगजीवनराम और कोविंद साहब मूर्ख अथवा अनुचित हैं? आप का मत है कि विपरीत परिस्थिति में हुए अहितकर कार्य को अहितकर न कहा जाय? अर्थात विपरीत परिस्थिति में डॉ. आम्बेडकर साहब से गोलमेज कांफ्रेंस के संघर्ष से प्राप्त साइमन कमीशन द्वारा पृथक निर्वाचन पर पूना पैक्ट हो जाना अच्छा कार्य और उचित मान लिया जाय? उसके बदले आरक्षण को प्राप्त कर लेना श्रेष्कर कार्य हो गया? विपरीत परिस्थितियों में डॉ. आम्बेडकर को समझौता करना पड़ा। समझौता बुरा था। वह उनकी हार थी। वह हमारी हार थी लेकिन उससे यह नहीं सिद्ध होता कि वह डॉ. आम्बेडकर की मूर्खता थी। आप लोग तर्क करते-करते इतने अधिक भावुक और असहिष्णु हो उठते हैं कि आपा खो बैठते हैं और जो लेखक का मत नहीं होता है, वह दिखाने की कोशिश करते हैं तथा लेखक के प्रति विष वमन करने के लिए तनिक की इंतजार नहीं करते हैं।

 

आप पृथक निर्वाचन और आरक्षण की भिन्नता के वजन पर यदि ध्यान दे देंगे तो आप स्वयं लज्जित हो उठेंगे कि आरक्षण झुनझुना के बराबर का भी अस्तित्व नहीं रखता है।

 

बाबा साहब को प्रज्ञावान, संघर्षशील, विद्वान महापुरुष ही मानिए, देवता मत बनाइए। किसी भी व्यक्ति को उचित सम्मान देना बहुत पुनीत कार्य है लेकिन त्रुटिरहित, परमपुनीत और अद्वितीय मान लेना विकास और विज्ञान को गाली देना और न मानना हो जाएगा। बुद्ध की बात हमेशा याद रखिए, किसी भी बात को इसलिए नहीं मान केना चाहिए कि उस बात को किसी बहुत बड़े विद्वान ने कहा है। किसी बास्त को इसलिए नहीं मान लेना चाहिए कि वह बहुत बड़ी कितबमें लिखी गई है। किसी भी बात तो तब मानना चाहिए जब वह तर्क की कसौटी पर खरी उतरे। मान और सम्मान किसी बात के पुरातन हो जाने अथवा विज्ञान के तराजू पर खरा न उतरने के कारण खत्म नहीं हो जाता है बल्कि किसी महान आदमी की महत्ता उसके मंतव्यों के वैज्ञानिक तरीके से विकसित होने अथवा किए जाने पर निर्भर करता है। बाबा साहब व बुद्ध को ‘एज इट इज’ मानकर सम्मान देना उनके महत्व को कम करके महत्व देना है बल्कि जब हम उनके असली मकसद को प्राप्त करने के लिए उचित व क्रांतिकारी रास्ता ढूढ़ लेंगे, वह उचित सम्मान होगा।

 

मैं आप के चिंतन के भिन्न कहाँ लिखा हूँ। मैंने सिर्फ एक बात पर फोकस किया कि संविधान एक तरह से जातिप्रथा को मजबूत ही करता है, और आप ने न जाने क्या-क्या और कितना कह डाला? क्या यह संविधान हमें जाति प्रमाण-पत्र बनवाने के लिए बाध्य नहीं करता है?

 

इसका अर्थ है कि पूना पैक्ट ठीक हुआ? यदि पूना पैक्ट न हुआ होता तो आरक्षण न मिलता, फिर क्या होता? फिर हमें पृथक निर्वाचन प्राप्त हो जाता और हम इससे अधिक सम्पन्न होते तथा जाति प्रमाण-पत्र न बनवाना पड़ता। सोचिए।

 

मैं कब कह रहा हूँ कि कोई आरक्षण न ले, लीजिए न लेकिन जाति प्रमाण पत्र बनवाइए और मानिए कि यह संविधान की देन है। यदि आरक्षण संविधान की वजह से मिल रहा है तो जाति प्रमाण पत्र भी संविधान की वजह से बनवाना पड़ रहा है।

 

आप यह क्यों भूल जाते हैं कि जब हमें जाति प्रमाण-पत्र न बनवाना पड़ता और पृथक निर्वाचन मिल गया होता, बाबा साहब को पूना पैक्ट न करना पड़ा होता, तो कितना विकास हो गया होता। आरक्षण देकर हमारे वास्तविक और तेज विकास को रोक दिया गया।

 

यदि आप मुझसे सहमत नहीं हैं तो इसका अर्थ है कि आप जाति प्रमाण-पत्र बनवाए जाने के पक्ष में हैं। ब्राह्मण तो चाहता है कि दलित स्वयं अपनी जाति बताए और प्रसाद ले जाए। जब तक दलित अपनी जाति नहीं बताएगा तब तक संविधान उसे किसी भी प्रकार का आरक्षण नहीं देगा। जाति प्रमाण-पत्र बनवाने की वैधानिक जरूरत न मुगलों के संविधान में था और न अंग्रेजों के संविधान में था। जब देश आजाद हो गया तब ब्राह्मणों ने बड़ी चालाकी से संविधान में जाति प्रमाण-पत्र बनवाने की संवैधानिक जरूरत को विहित करवा दिया।

 

यह सब तो है ही, इन्होंने जाति प्रमाण पत्र बनवाना संवैधानिक करवा लिया। आज हम स्वयं कहते हैं कि हम चमार हैं।

 

आरक्षण के दबाव में दलित जातिप्रथा उन्मूलन के अहम और मूल सवाल को नजरअंदाज कर देता है। उसे लगता है आरक्षण ही एकमात्र दलित उत्थान और विकास का एकमात्र रास्ता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि दलित योद्धा तो बनता है लेकिन क्रांति नहीं करना चाहता है। यह शोध का विषय है कि क्या दलितों के डीएनए में भीरूपन है जिससे वह नए चीज को पाने के लिए रिस्क नहीं लेना चाहता है अथवा भौतिक परिस्थितियों ने दलितों में जुझारूपन नहीं पैदा होने दिया है? आम्बेडकर साहब का फाइनल गोल समाजवाद को प्राप्त करना था लेकिन दलित बीच में ही आरक्षण-आरक्षण खेल रहा है। जातिप्रथा उन्मूलन और समाजवाद को लागू करना आम्बेडकर साहब के अनुयायियों का नैतिक और भौतिक लक्ष्य होना चाहिए लेकिन दलित पाने में उतना विश्वास नहीं रखता है जितना खोने से डरता है। आम्बेडकर साहब का आध्यात्मिक भूख बौद्ध धर्म था लेकिन सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक भूख की संतुष्टि के लिए संसदीय लोकतंत्र प्लस राजकीय समाजवाद था।

 

इसका अर्थ हुआ गाँधी ने बहुत अच्छा किया क्योंकि आरक्षण का प्रस्ताव गाँधी का था आम्बेडकर साहब का नहीं। आम्बेडकर साहब ने तो मजबूरी में आरक्षण को स्वीकार किया था। आम्बेडकर साहब आरक्षण नहीं चाहते थे बल्कि वे पृथक निर्वाचन ही चाहते थे। अगर गाँधी आमरण अनशन न किए होते और आम्बेडकर साहब को पूना पैक्ट न करना पड़ा होता तब तो दलितों को आरक्षण न मिलता। तब क्या होता दलितों का?

 

गाँधी के आमरण अनशन से आम्बेडकर साहब को पूना पैक्ट करना पड़ा। पूना पैक्ट की वजह से दलितों के हिस्से में आरक्षण आया। दलित साथियों की बुद्धि न जाने कहाँ चली जाती है, वे आरक्षण को अपना सर्वस्व मान बैठते हैं। आरक्षण की बुराई अथवा मूल्यांकन प्रारम्भ करते ही दलित बौखलौ उठता है। उसे लगता है जैसे आरक्षण का मूल्यांकन करके हमने आम्बेडकर साहब की निंदा कर दी है। दलित-मित्रों! पृथक निर्वाचन खरा सोना था और आरक्षण गिलन्ट है। आप से सोना लेकर गिलन्ट पकड़ा दिया गया। आप हैं कि गिलन्ट से खुश हैं।

 

यदि दलितों को पृथक निर्वाचन का अधिकार प्राप्त हो गया होता तो आज दलितों का सर्वांगीड़ विकास हो गया होता। पृथक निर्वाचन से जहाँ 100 प्रतिशत विकास संभव था वहाँ दलित आरक्षण से हुए 10 प्रतिशत के इकहरे विकास से खुश है। दलितों को यदि पृथक निर्वाचन का अधिकार मिल गया होता तो आज उन्हें मल्टीनेशनल्स से न डरना पड़ता कि वे नौकरियों में आरक्षण नहीं देंगे।

 

सोचो मित्र सोचो। चिंतन करो। विमर्श का अर्थ तौहीन नहीं है।

 

आरक्षण पूना पैक्ट से निकला हुआ धोखे का बहुत बड़ा जिन है। आरक्षण समुद्र मंथन से निकला हुआ विष है जिसे गाँधी ने आमरण अनशन करके डॉ. आम्बेडकर को पकड़ा दिया और दलितों को अमृत के बदले विष पीना पड़ रहा है।

 

आप के बेहद प्यार और तात्कालिक गुस्से के लिए आभार। मैं अपने बाद जब भी कुछ बेहतर व्यक्तियों के बारे में सोचता हूँ तो आप उन टॉप टेन में होते हैं। मीमांसा के अतिरिक्त आप में आत्मानुभूति (Realization) का विशेष गुण है। आप एक अच्छे व्यक्ति हैं और अच्छे क्रांतिकारी बनने की प्रक्रिया में हैं।

 

हम जातिवाद के युग में हैं। हम किसी न किसी जाति में पैदा हुए हैं। हर जातियों के सिद्धांत हैं। हर जातियों के मसीहा हैं। जातिवाद का विरोध करते हुए हम जातीय विमोह में फँसे हुए हैं। इस जातीय विमोह के चक्कर में हम अपने मनीषी-मसीहा को जाति में बाँध कर रखे हुए हैं। आम्बेडकर परम विद्वान हैं। आम्बेडकर मेरे हैं। आम्बेडकर को सम्मान देना सिर्फ मेरा काम है। हम उनकी तौहीन नहीं होने देंगे। आम्बेडकर दलित हैं। आम्बेडकर महार हैं। अजीब सी विडम्बना है। हम जातिवाद का विरोध करते हुए जाति जे खूँटे को पकड़े बैठे हैं और उस महान व्यक्ति को भी जाति के घरौंदे से बाहर नहीं निकलने देना चाहते हैं जिसने स्वयं के 13 अक्टूबर 1935 के सपथ को 14 अक्टूबर 1956 को बौद्ध धर्म स्वीकार कर पूरा किया कि मैं हिन्दू धर्म में पैदा तो जरूर हुआ हूँ, वह मेरी मरजी नहीं विवशता थी लेकिन मैं हिन्दू धर्म में रहकर मरूँगा नहीं। दलित साथी यह नहीं सोचते और न मानना चाहते हैं कि जब डॉ. आम्बेडकर हिन्दू नहीं रहे तो वे भला दलित और महार कहाँ रहे लेकिन नहीं दलित अपने हित में उन्हें महार व दलित ही बनाए रखना चाहता है। जन्मना दलित को व्यवहारतः जाति से डिकास्ट हो जाना चाहिए। यहाँ तक डिकास्ट करिए कि कोई चमार कहकर गाली दे तब भी आप को प्रभावित नहीं होना चाहिए। जब कोई चमार कहे और आप प्रभावित हो उठें, तो इसका अर्थ है वह जातीय व्यवस्था को मानता है। जहाँ हमें जाति को त्याग देना चाहिए वहाँ हम गुह की तरह चूतर में लगाए हुए गंधा रहे हैं और कहते फिरते हैं कि हमीं सब से बड़े ब्राह्मणवाद विरोधी हैं। अरे! किस तरह के ब्राह्मणवाद विरोधी जब हम स्वयं उनके द्वारा प्रदत्त जातीय अहसास को हमेशा अपने दिल-दिमाग़ में लिए टहल रहे हैं बल्कि जब कोई चमार को गाली देता है तो उसे खट से अपना मान लेते हैं, अपना लेते हैं। मेरा यह मनोविज्ञान तत्काल आत्मसात कर पाना मुश्किल है लेकिन फ्रायड के मनोविज्ञान की तरह सोलह आने सच है। जो व्यक्ति मेरी जाति पराई जाति से विमुक्त नहीं हुआ हो वह जातिवादी है, घोर जातिवादी है। हम मूर्खता की हद तक दूसरों की जाति तोडना चाहते हैं और अपनी जाति बनाए रखना चाहते हैं। न जाति अपनी है और न मसीहा अपना है। इन दोनों तत्वों के मनोविज्ञान को समझिए और जातीय विमोह से दूर होकर जातिप्रथा को तोड़ने के लिए समाजवादी क्रांति में सहयोग करिए। दलित महकमें नें समाजवाद को लेकर विमर्श पैदा करिए।

 

अभी तक दलित समाजवाद के नाम पर भड़कता है। समाजवाद के नाम पर दलित इस कारण भड़कता है क्योंकि उसे लगता है उसे मार्क्सवादी बनाया जा रहा है। दलित मार्क्सवाद से इसलिए चिढ़ता है क्योंकि उसे लगता है कि उसके मसीहा डॉ. आम्बेडकर को मार्क्स से रिप्लेस किए जाने का कुचक्र किया जा रहा है। दलितों को मसीहावाद में फँसा कर हमेशा क्रांति के मार्ग से विचलित किया जाता रहा है। विचारों की बपौती नहीं है। महान व्यक्तित्व व नेतृत्व की भी बपौती नहीं है। क्रांतिकारी सिद्धांत को ग्रहण करने से डॉ. आम्बेडकर की कोई तौहीन नहीं होने जा रही है बल्कि उनके सपनों को अतिशीघ्र पूरा करने के लिए हम कुछ नई टेकनीकी और नए विचारों से आम्बेडकरवाद को इनरिच कर रहे हैं। वैसे भी हमें व्यवस्था परिवर्तन करना है न कि मसीहावाद लेकर ढोना है। दलितों का मसीहावाद एक प्रकार से पहचान की राजनीति है जो प्रकारांतर ब्राह्मणवाद ही है।

 

बिना समाजवादी व्यवस्था को स्थापित किए ब्राह्मणवाद किसी भी हालत में खत्म नहीं किया जा सकता है। जो लोग इस गफलत में हैं कि इसी संविधान द्वारा जातिप्रथा व ब्राह्मणवाद खत्म कर लिया जाएगा वे मेडक्स खाकर चिंतन कर रहे हैं। वे इतना भी जहमत नहीं उठाना चाहते हैं कि ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ पढ़ तो लिया जाय कि डॉ. आम्बेडकर ने जो ड्राफ्ट बनाया था, आखिर उसमें उस संविधान के अतिरिक्त इससे बढ़िया क्या है। वैसे परिवर्तन के लिए बेताब इन दलित साथियों को चाहिए कि हर हालत में ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ में वर्णित ड्राफ्ट के अनुसार नए संविधान की रचना करें तथा देश भर के दलित और प्रगतिशील क्रांतिकारी मिलकर उस पर बहस चलाएँ तथा उसे संसोधित संविधान के रूप में प्रस्तुत करें, संघर्ष करें, लड़ें और लागू करें। जो परिवर्तित संविधान का विरोध करे उसको शत्रु के समान ट्रीट करें।

 

वैसे एक बिंदु को चर्चा में और डालना चाहता हूँ कि जब हम समाजवाद की चर्चा कर रहे हैं तो क्यों न मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन और स्तालिन के समाजवाद की भी चर्चा करें। यदि हम ऐसी चर्चा करेंगे तो हमारे दिमाग से गलतफहमी तो दूर हो जाएगी कि यह समाजवाद आम्बेडकर के समाजवाद के विपरीत नहीं है और न ही दलितों के विरुद्ध तथा ब्राह्मणों के पक्ष में है।

 

समाजवाद वह व्यवस्था है जहाँ मनुष्य के द्वारा मनुष्य का किसी भी तरह का शोषण खत्म हो जाता है। उत्पादन का उद्देश्य लोकहित होता है। उत्पादन के संसाधन व्यक्तिगत हाथों से छीनकर सामूहिक हाथों में चला जाता है। धर्म को बिल्कुल व्यक्तिगत बना कर घरों तक कैद कर दिया जाता है। सब को शिक्षा सब को काम की गारंटी कर दी जाती है। और भी बहुत कुछ है। पहले विमर्श तो शुरू करिए जनाब।

 

आरक्षण डॉ. आम्बेडकर का वांक्षित उत्पाद नहीं है। उनका वांक्षित उत्पाद पृथक निर्वाचन था जिसे आमरण अनशन पर बैठकर पूना पैक्ट में बैरिस्टर गाँधी ने आम्बेडकर साहब से छीन लिया और उसके बदले गाँधी एण्ड कंपनी ने आरक्षण का प्रस्ताव रख दिया। डॉ. आम्बेडकर को अपनी असफलता पर दुख तो हुआ लेकिन उन्होंने इस आशा और विश्वास के साथ आरक्षण को स्वीकार कर लिया कि उनकी कौम लगभग 10 वर्षों में संघर्ष करने लायक शक्ति हासिल कर लेगी और जैसा मैं चाहता हूँ, उम्मीद है उससे बढ़िया ले लेने का माद्दा पैदाकर ले लेकिन हुआ इसका उल्टा। दलित जातियाँ आरक्षण से चिपक गईं बल्कि कायरता के हद तक चिपक गईं। दलित सिर्फ आरक्षण के सहारे जीवित रहना चाहता है, संघर्ष कर डॉ. आम्बेडकर के राजकीय समाजवाद प्लस संसदीय लोकतंत्र को लागू करने का साहस नहीं कर रहा है। कुछ लोगों को मुफ्त में खाने को मिल गया है इसलिए वे डॉ. आम्बेडकर के सपनों को तिलांजलि दे दिए हैं।

 

वैसे तो इसका जवाब कम्युनिस्ट पार्टियों के इतिहास को पढ़कर स्वयं जानना चाहिए। फिर भी, मैं कुछ मदद करता हूँ।

 

संक्षिप्त में, सीपीआई, सीपीआई-एम दोनों ही कम्युनिस्ट पार्टी नामधारी कांग्रेस और बीजेपी की तरह संसदीय लोकतंत्र की पार्टियां हैं। ये क्रांति नहीं चाहती हैं। सीपीआई-एमएल कुछ ठीक है लेकिन सांस्कृतिक आंदोलन न कर सकने की वजह सेयह भी क्रांतिकारी नहीं है। फिर आप या कोई बिना उचित अध्ययन के इनका सदस्य क्यों बन जाता है? दूसरी महत्वपूर्ण बात, जब आप को मार्क्सवाद का अता-पता नहीं है तो आप कम्युनिज्म से मोह और नाता क्यों बनाए रखना चाहते हैं? तीसरी बात, अँगुली पर गिनकर बताइए कि भारत में कितने दलित हैं जिसने मार्क्सवाद को पढ़ा है, ठीक से पढ़ा है, समझा है, ठीक से समझा है और किसी भी सवर्ण कम्युनिस्ट से पंगा ले सकने भर को पढ़ा है? कितने दलित कम्युनिस्ट हैं जो सवर्णों को कम्युनिज्म पढ़ा सकते गेन? हम किसी की बनी हुई गंधाउर पार्टी के सदस्य क्यों बन जाते हैं क्योंकि हममें नेतृत्व का ज्ञान और नेतृत्व की क्षमता ही नहीं है। यदि हममें क्रांतिकारी सिद्धांत और व्यवहार का भरपूर ज्ञान हो जाएगा तो हम किसी धूर्त के नेतृत्वमें क्यों झख मारेंगे, क्योंनहीं हम क्रांतिकारी पार्टी बनाकर ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद विरोधी समाजवादी क्रांति कर देंगे? ज्ञान और बूता पैदा करो। सारे प्रश्न और सारे कार्य हल।

 

आज हम डॉ. आम्बेडकर को पथ प्रदर्शक नहीं, मसीहा समझने लगे हैं। किसी की असहमतियों पर हम तिलमिला उठते हैं क्योंकि हम बाबा साहब को त्रुटिहीन मान बैठते हैं अर्थात देवता बना देते हैं। ईश्वर को न मानते हुए भी हम आस्थावान हो उठते हैं।

 

कुछ चीजों पर हमेशा स्पष्ट रहिए:-

यह कि विमर्श करते समय मैं किसी भी व्यक्ति को आरक्षण लेने से रोकता नहीं हूँ और न ही मैं आरक्षण का विरोध करता हूँ। मैं सिर्फ भौतिक परिस्थितियों का जिक्र करता हूँ। मैं कौन होता हूँ यह कहने वाला कि आरक्षण न लीजिए अथवा आरक्षण खत्म कर दिया जाना चाहिए।

 

जब डॉ. आम्बेडकर ने वाल्मीकि जातियों से कहा कि आप सभी को टट्टी साफ करने का कार्य छोड़ना होगा, तब जाकर हम सामाजिक उन्नयन का कार्य कर पाएँगे। साथियों ने कहा, फिर हम करेंगे क्या, हमें रोजगार कैसे मिलेगा? सफाई ही तो हमारा पेशा है। इसके अलावा हमें कौन सा काम मिलेगा और कौन काम देगा? नहीं बाबा साहब, हम बिना किसी विकल्प के इस कार्य को नहीं छोड़ सकेंगे। तह सच है कि बिना विकल्प के कोई भी रोजगार नहीं त्यागा जा सकता है लेकिन उस कार्य को करते हुए विकल्प तैयार करके उस कार्य को तो छोड़ा जा ही सकता है? बिना गंदे कार्य को छोड़े हमें सामाजिक सम्मान कदापि नहीं मिलेगा। अगर लड़ने की कूबत नहीं है तो हमें कुछ भी नहीं मिलेगा। यदि हमारे अंदर विजन नहीं है, विजन के अनुसार संगठन नहीं है, अगर हम संगठित होकर लक्ष्य के लिए लड़ेंगे-मरेंगे नहीं तो हमें कभी कुछ नहीं मिलेगा। होंठ चाटने से प्यास नहीं जाएगी। आरक्षण मात्र होंठ चाटने जैसा है, वह भी .3% लोगों के लिए।

 

अक्सर दलितों को यह डर सताता है कि आरक्षण न होता, तो क्या होता? यदि आरक्षण खत्म हो जाय, तो क्या होगा?

 

यदि कोई हमारा दस बीघा जमीन छीन ले और बाद में  दो बीघा रेहड़ या बटाई पर दे दे, तो हमारा काम तो चलेगा ही। फिर क्या हम रेहड़ और बटाई से संतुष्ट हो जाँय तथा अपना दस बीघा छीनने की योजना त्याग दें?

 

आरक्षण हमारे हाथ में झुनझुना है। इस झुनझुने को कितने प्रतिशत लोग बजा पा रहे हैं? 135 करोड़ में से 22.5 प्रतिशत अर्थात 30 करोड़ दलित हैं। इस तीस करोड़ दलितों में मान लिया जाय कि 50 लाख लोग नौकरी कर रहे हैं तो टोटल का .30 प्रतिशत लोग आरक्षण का फायदा के रहे हैं। 29 करोड़ 50 लाख भूखे-नंगे हैं। इसमें से 27 करोड़ दलित भूमिहीन, खेत मजदूर और निरक्षर हैं। हम-आप भारत के संपन्न 3 करोड़ दलितों में से हैं। खैर, फिर भी मैं आरक्षण छोड़ने की सलाह नहीं दूँगा लेकिन यह तो अपील कर ही सकता हूँ कि आरक्षण हमारे जीवन का विकल्प नहीं है। आरक्षण पूँजीवाद का पुछल्ला है। आरक्षण रोटी नहीं, रोटी का टुकड़ा है। मैं यह अपील तो कर ही सकता हूँ कि टुकड़े के स्थान पर पूरी रोटी छीन लो। यदि आम्बेडकर के मजबूरी से इतना प्यार है तो आम्बेडकर के सपनों से प्यार करो। आम्बेडकर का सपना राजकीय समाजवाद है। आम्बेडकर का सपना जातिविहीन और वर्गविहीन समाज का निर्माण है। यहाँ तो 27 करोड़ दलित निरक्षर, भूमिहीन और भूखों मर रहा है। कुछ लोग सिर्फ पेट भर रहे हैं। आम्बेडकर सहबक सपना सुअरों की तरह पेट भरना नहीं था। आम्बेडकर का सपना आरक्षण भी नहीं था। आम्बेडकर जा सपना लोकहित में उत्पादन तथा जन (राष्ट्र) के हाथों में उत्पादन के संसाधन को लिया जाना था। आम्बेडकर का मुख्य सपना व्यक्तिगत सम्पत्ति का उन्मूलन था। जिसको भी आरक्षण से प्यार है उन्हें आम्बेडकर के सपनों से प्यार क्यों नहीं है?

 

यह सच है कि आरक्षण से दलितों के एक तपके का शैक्षिक और आर्थिक विकास हुआ है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि 90 प्रतिशत दलितों तक आरक्षण की कोई पहुँच नहीं है। 90 प्रतिशत दलित आज भी भूमिहीन खेत मजदूर हैं। इन भूमिहीनों के लिए यह आरक्षण का फायदा उठा चुका दलित कुछ नहीं कर रहा है बल्कि उल्टे बहुसंख्य भूमिहीन खेत मजदूरों को अपने आरक्षण बचाओ आंदोलन में ट्रक भर-भर कर आंदोलन के मैदानों में ले जाता है। उनके विहाफ़ पर उच्च कुलीन दलित फायदा लेता है लेकिन उन गरीब भूमिहीन निरक्षर दलितों के लिए कुछ नहीं करता है बल्कि सवर्णों की ही तरह उनसे व्यवहार करता है।

 

बिना लड़े कुछ नहीं मिलेगा बल्कि जो है वह भी खो जाएगा। आरक्षण पर बहस का अर्थ अथवा आरक्षण की कमियाँ गिनाने का अर्थ आरक्षण का त्याग करने का सलाह नहीं है बल्कि व्यवस्था परिवर्तन के क्रमिक और बेहतर उपायों की चर्चा करना है। दो तरह के दलित हैं; एक, वह जो इसी व्यवस्था में जीवित रहना चाहता है अथवा मात्र इतना ही समझता है कि इससे बेहतर और कोई व्यवस्था, सत्ता और संविधान हो ही नहीं सकता है। ऐसे लोग आरक्षण और इस संविधान को अंतिम विकल्प समझते हैं। दूसरा, वह जो आरक्षण और इस संविधान को क्रमिक विकास में पहला पायदान समझते हैं। वे मानते हैं आरक्षण और वर्तमान संविधान से दलितों, गरीबों, मजदूरों, मजलूमों का भला होने वाला नहीं है। ऐसे लोग वर्तमान उपलब्धियों का प्रयोग करते हुए बेहतर उपाय, संसाधनों और उपलब्धियों को अर्जित करने के लुई कठिन से कठिन संघर्ष करने को तैयार रखते हैं।

 

आप सुनिश्चित करिए कि आप कहाँ हैं?

 

आर डी आनंद

25.09.2021

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