धर्म परिवर्तन से जीवन पद्धति में वैज्ञानिकता नहीं आती है

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नेरेंद्र कुमार
धर्म परिवर्तन से जीवन पद्धति में वैज्ञानिकता नहीं आती है
धर्म परिवर्तन जातीय उत्पीड़न और उपेक्षा से मुक्ति का रास्ता नहीं देता!
धर्म परिवर्तन से जीवन पद्धति में वैज्ञानिकता नहीं आती है, व्यक्ति एक तरह के भाववाद और कर्मकांड से निकलकर दूसरे में फंस जाता है। बुद्ध अपने समय के किसान तथा दस्तकार जैसे उत्पादक शक्तियों के हितों के पक्ष में खड़ा होकर ब्राह्मणवादी कर्मकांडियों का, उनके वैदिक जीवन पद्धति में होने वाले यज्ञों में पशुओं की दी जा रही बली का विरोध किया था। इस कारण बड़े पैमाने पर किसान तथा दस्तकार उनके साथ हो आए थे। बौद्ध धर्म के आम जनमानस में फैलने का यही भौतिक आधार था।
बौद्ध मठ के सन्यासी उत्पादन से कट गये। जबकि ब्राह्मणवादी, जो पहले उत्पादन से कटे हुए थे, मनु के बाद गुप्त काल में उत्पादन के साधनों को अपने नियंत्रण में सीधे लिया। पिछड़े कबीलों तथा शहर के अछूतों को बंधुआ अर्धदास बनाकर खेती की नयी व्यवस्था बनाई। दस्तकारों को अपने गांव की सत्ता के अधीन कर तथा व्यापारियों को तबाह कर नई सामंती उत्पादन व्यवस्था का शासक बना। दूसरी तरफ बौद्ध मठ उत्पादन से कटकर व्यापारियों के व्यभिचार का अड्डा बनता गया।
समाज में हमेशा ही धर्म के फैलाव का भौतिक आधार रहा है। जब इस्लाम धर्म फैल रहा था,तो उसने अपने समय की उत्पादक शक्तियों को अपने साथ लिया और उसके हक में कुरान में जीवन पद्धति को पेश किया। हिंदू धर्म या कहें ब्राह्मणवादी वैदिक धर्म नदी किनारे विकास किया, जहां जल तथा जंगल की प्रचुरता थी। इसलिए इनके कर्मकांडों में स्नान और लकड़ी की उपस्थिति अधिक है, जबकि इस्लाम रेगिस्तान में फैला बढ़ा, इसलिए उस धर्म में के कर्मकांडों में स्नान का महत्व नहीं है। मुंह साफ करने के लिए भी एक ही दातुन का कई दिनों तक प्रयोग करना उचित माना गया।
बुद्ध अपने समय में बौद्ध धर्म का जब विकास कर रहे थे, तब बहुत हद तक वे भौतिकवादी थे। लेकिन उसी धर्म को आज के उत्पादन व्यवस्था में मोक्ष का रास्ता देखना शुद्ध भाववाद है।
अंबेडकर जिस समय में जी रहे थे, धर्म के तमाम स्वरूपों की आलोचना कई सदी से जारी थी तथा धर्म के समाजिक उत्पीड़न के स्वरूप से मुक्ति के लिए मजबूत विकल्प मौजूद थे।
फिर भी दलित उत्पीड़न जातियों को ब्राह्मणवादी उत्पीड़न से निकाल कर ज्यादा विकसित जीवन पद्धति की तरफ ले जाने वाली विचारधारा से जोड़ने में वे असफल रहे। अंबेडकर जब धर्म परिवर्तन की बात कर रहे थे और जब धर्म परिवर्तन किया, तब धर्म के ऊपरी पक्ष को ही देखा, उसके भौतिक आधार को नजरअंदाज कर दिया।
आज अपने सभी स्वरूपों में धर्म जनता के लिए उत्पीड़न ही ला रहा है।क्या अंबेडकर यह नहीं देख रहे थे कि दलाई लामा और तिब्बती बौद्ध शरणार्थी बौद्ध धर्म के जन पक्षीय स्वरूप को तबाह कर उसे प्रतिक्रियावादी स्वरूप में आगे बढ़ा रहे थे? उसी धर्म के खिलाफ वैचारिक संघर्ष कर अभी-अभी चीन की उत्पीड़ित जनता माओ के नेतृत्व में अपने यहां के शासकों तथा जापानी आक्रमणकारियों को पराजित किया था, जबकि यह दोनों शोषक वर्ग तथा बौद्ध धर्म के समर्थक और बढ़ावा देने वाले थे। चीन, जापान तथा दूसरे पूर्वी एशिया के देश के शासक इसी धर्म के आड़ में सामंती उत्पीड़न को कायम रखे थे।
मेहनतकश तथा उत्पीड़ित समाज की उपेक्षा तथा उत्पीड़न से मुक्ति वैज्ञानिक सोच से मिलेगी, उत्पादन के साधनों पर उनके सामाजिक नियंत्रण से मिलेगी, ना कि एक धर्म से निकलकर दूसरे धर्म पद्धति अपनाने से।अंबेडकरवादियों को वर्तमान शोषक सत्ता में हिस्सेदारी चाहिए,इस सत्ता को बदलकर शोषणविहीन समाज नहीं बनाना उनका लक्ष्य नहीं है। इसलिए हमें पूरी ताकत के साथ इनकी विचारों का पर्दाफाश करते हुए जीवन पद्धति के बारे में द्वंदात्मक भौतिकवादी दृष्टिकोण का प्रचार करना होगा

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