हरिद्वार में आयोजित ‘धर्म’ संसद में भगवा आतंकियों द्वारा मुस्लिम अल्पसंख्यकों के खिलाफ साम्प्रदायिक उन्माद भड़काने के खिलाफ इंक़लाबी छात्र मोर्चा का बयान

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हरिद्वार में आयोजित ‘धर्म’ संसद में भगवा आतंकियों द्वारा मुस्लिम अल्पसंख्यकों के खिलाफ साम्प्रदायिक उन्माद भड़काने के खिलाफ इंक़लाबी छात्र मोर्चा का बयान
साथियों,
17- 19 दिसंबर 2021 को जब पूरा देश काकोरी एक्शन के शहीदों का शहादत दिवस मना रहा था, उसी समय हरिद्वार में कथित धर्म- संसद आयोजित कर भगवा आतंकियों द्वारा मुस्लिम अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरती भाषण दिए जा रहे थे और हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए मरने व मारने की शपथ ली जा रही थी। इंक़लाबी छात्र मोर्चा इस धर्म संसद के मंसूबों की कड़ी निंदा व भर्त्सना करता है।
काकोरी का जिक्र इसलिए कि यह साझी शहादत की विरासत है। यह अशफाक उल्ला खां और रामप्रसाद बिस्मिल की साझी शहादत का इतिहास है, भारत के साम्राज्यवाद विरोधी स्वाधीनता आंदोलन का इतिहास है। जिसमें हिन्दू- मुस्लिम- सिख सब मिलकर देश की आज़ादी के लिए लड़े थे। भगत सिंह ने तो ‘साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज’ लेख लिखकर साम्प्रदायिकता की राजनीति को खोलकर रख दिया था।
लेकिन आज साम्राज्यवाद की दलाल और देशद्रोही संगठन आरएसएस अपने साम्प्रदायिक मंसूबों को जमीन पर उतारने के लिए हिन्दू युवा वाहिनी जैसे अपने सहयोगी संगठनों के माध्यम से हरिद्वार में एक कथित धर्म संसद का आयोजन करती है। इस धर्म संसद में खुलेआम हिंदुओं को ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने, किताब- कॉपी छोड़कर हथियार उठाने और 20 लाख मुस्लिमों के कत्लेआम की बात की जाती है। सरकार सब कुछ जानते हुए भी इस धर्म संसद के आयोजन की अनुमति देती है और भयानक तौर पर नफरती भाषण देने वालों के ऊपर अब तक कोई कानूनी कार्यवायी नहीं करती है। संविधान की रक्षक होने की दावा करने वाली सुप्रीम कोर्ट संविधान की धज्जियां उड़ते हुए देखकर भी कोई स्वतःसंज्ञान नहीं लेती। सुप्रीम कोर्ट का साम्प्रदायिक चरित्र तो बाबरी विध्वंस के मामले में ही स्पष्ट हो चुका है। जहाँ बिना किसी तर्क व तथ्य के बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण की जगह राम मंदिर बनाने का निर्णय दिया जाता है। इतना ही नहीं बाबरी मस्जिद का विध्वंस करने वाले अपराधियों को आज तक कोई सजा नहीं दी जाती है।
यह धर्म संसद हिन्दू राष्ट्र बनाने की बात करती है। हालांकि इंक़लाबी छात्र मोर्चा स्पष्ट तौर पर यह मानता है कि देश में अब सिर्फ हिन्दू राष्ट्र की घोषणा ही बाकी है। तथ्य बताते हैं कि हिन्दू राष्ट्र की नींव तो कांग्रेस के जमाने में ही डाल दी गयी थी। बस इसे संविधान की स्वीकृति मिलना ही बाकी है। अगर ऐसा न होता तो इस तरह के घोर साम्प्रदायिक धर्म संसद के आयोजन की परमिशन कभी नहीं मिलती। और अब तक इस तरह के नफरती भाषण देने वाले जेल के अंदर होते।
आज सत्ताधारी बीजेपी और आरएसएस द्वारा जिस तीव्रता के साथ देश के अल्पसंख्यकों के खिलाफ उन्माद भड़काया जा रहा है वो बहुत खतरनाक है। साम्राज्यवाद की दलाल- देशद्रोही- ब्राह्मणवादी संगठन आरएसएस और बीजेपी आज पूरे देश को देशी- विदेशी पूंजीपतियों को गिरवी रखने पर आमादा हैं। शोषण और गरीबी चरम पर है। ऐसे में यह और जरूरी हो जाता है कि साम्प्रदायिक उन्माद को तेज किया जाए। आरएसएस अपने कैडरों और समर्थकों को लगातार हथियारबंद कर रही है। राजसत्ता पर भी उनका नियंत्रण है। पुलिस, पीएसी, अर्धसैनिक बल, नौकरशाही, न्यायपालिका कमोबेश सबका साम्प्रदायिकरण हो चुका है। ऐसे में आप किससे उम्मीद करेंगे? कांग्रेस, सपा जैसी अवसरवादी पार्टियां का सॉफ्ट हिंदुत्व भी किसी से छुपा नहीं है। इसलिए यह सोचकर सावधान रहने में कोई ज्यादती नहीं है कि अगर सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो देश में 1984 व 2002 को फिर से दुहराया जा सकता है।
ऐसे में इंक़लाबी छात्र मोर्चा का यह स्पष्ट मानना है कि आरएसएस के साम्प्रदायिक मंसूबों को ध्वस्त करने की पूरी जिम्मेदारी देश के प्रगतिशील, जनवादी, धर्मनिरपेक्ष और वामपंथी- क्रांतिकारी संगठनों को ही अपने ऊपर लेनी होगी। मजदूरों- किसानों को उनके वास्तविक मुद्दों के साथ- साथ ब्राह्मणवादी- हिंदुत्व की साम्प्रदायिक राजनीति के खिलाफ भी गोलबंद करना होगा और अपनी अस्मिता के लिए लड़ रहे मुस्लिमों व दलितों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होना होगा। क्योंकि सिर्फ वर्ग चेतना ही है जो साम्प्रदायिक व ब्राह्मणवादी सोच का मुकाबला कर सकती है और उसे ध्वस्त कर सकती है। आरएसएस के ब्राह्मणवादी- हिंदुत्व पर आधारित फासीवादी मंसूबों को अगर ध्वस्त करना है तो सिर्फ धरना- प्रदर्शन से ही काम नहीं चलेगा बल्कि हमें भी हर स्तर की लड़ाई के लिए तैयार होना होगा और जनता को संगठित कर उन्हें उन्हीं की भाषा में जवाब देना होगा।
कार्यकारिणी
इंक़लाबी छात्र मोर्चा(ICM)
इलाहाबाद
दिनांक- 24 दिसंबर 2021

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