अर्नब की गिरफ्तारी को अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला न मानने वाले पत्रकारों से बार बार पूछे जा रहे हैं कुछ सवाल

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प्रणव प्रियदर्शी की फेसबुक वॉल से
अर्नब की गिरफ्तारी को अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला न मानने वाले पत्रकारों से कुछ सवाल बार बार पूछे जा रहे हैं:
1 अभी आप अर्नब का साथ नहीं दे रहे, कल को आपके साथ कुछ हुआ तो अन्य पत्रकार क्यों आपके साथ खड़े होंगे?
2 अगर शैली से असहमति के आधार पर पत्रकारिता को परिभाषित किया जाने लगा तो देश में एक से ज्यादा पत्रकार बचे ही नहीं. हर पत्रकार अपने अलावा बाकी सबकी पत्रकारिता को खारिज करता नजर आएगा.
3 पत्रकारिता का मकसद अगर सत्ता से सवाल करना है, तो अर्नब प्रदेश सरकार और मुंबई पुलिस को ललकारते हुए ठीक यही कर रहे थे, जिसका खामियाजा भुगत रहे हैं. ऐसे में क्या आप दोहरा रवैया नहीं अपना रहे?
4 सवाल पुलिस कार्रवाई पर नहीं, बल्कि कार्रवाई के अंदाज पर है. घर में मारपीट का विडियो फर्जी निकला, इसलिए उसकी बात नहीं करेंगे, सवाल यह है कि क्या पहले स्टेज में ही गिरफ्तारी जरूरी थी? अभी तो सम्मन भेजकर उनसे पूछताछ की जानी चाहिए थी.
सवालों- एतराजों की सूची लंबी हो सकती है, लेकिन मेरा ख्याल है मुख्य बिंदु सारे आ गये हैं.
1 जो अर्नब के साथ खुल कर खड़े हैं वे पत्रकार हों या गैर पत्रकार, यूपी समेत तमाम राज्यों में पत्रकारों (कलाकारों, कार्यकर्ताओं की बात फिलहाल छोड़ देते हैं) के खिलाफ हुई पुलिसिया कार्रवाई के खिलाफ उबलते नहीं दिखे. हालांकि इस आधार पर अर्नब मसले पर उनकी प्रतिक्रिया को सही या गलत करार देना ठीक नहीं है, पर इससे उनका यह दावा तो संदिग्ध हो ही जाता है कि वे अर्नब की ही तरह अन्य पत्रकारों के साथ भी खड़े होंगे. दूसरी और मेरे ख्याल से ज्यादा जरूरी बात यह है कि चाहे अभिव्यक्ति की आजादी हो या कोई भी अन्य मसला, विवेक को तिलांजलि देकर उसूलों की कोई लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती. आप मेरा पक्ष लो और मैं आपका लूंगा, ऐसा करार स्वार्थों का तात्कालिक गठबंधन हो सकता है, मूल्यों की लंबी लड़ाई का आधार नहीं हो सकता.
2 यहां दो बिंदु हैं विचार के. पहला यह कि शैली जो भी हो, पत्रकारिता की मूल कसौटी है सचाई और इंसाफ. बाकी बातें इन्हीं से निकलती हैं. इन्हीं दोनों कसौटियों के आधार पर कहा जाता है रिपोर्टिंग फैक्ट्स बेस्ड होनी चाहिए और उसके लिए हमेशा रिप्रेजेंटेटिव फैक्ट्स चुने जाने चाहिए. रिप्रेजेंटेटिव फैक्ट्स यानी ऐसे तथ्य जो हकीकत की नुमाइंदगी करते हों. उदाहरण के लिए मारपीट के बाद किसी के सिर पर चोट लगी हो, वहां से खून बह रहा हो और आप अपनी रिपोर्ट में कहें कि वह अपने पैरों पर चल रहा था, पूरी तरह होश में था, बातचीत कर रहा था… तो ये फैक्ट्स तो हैं, रिप्रेजेंटेटिव फैक्ट्स नहीं हैं. सिर्फ इन तथ्यों के आधार पर बनाई गई रिपोर्ट तथ्यपरक कही जा सकती है, सच्ची तस्वीर पेश करने वाली नहीं. यह पाठकों, दर्शकों, श्रोताओं से छल करने वाली रिपोर्ट है जिसे पत्रकारिता नहीं कहा जा सकता. अर्नब जैसी पत्रकारिता पिछले कई वर्षों से कर रहे हैं, वह सिर्फ शैली के कारण नहीं, अपनी अंतर्वस्तु के कारण भी पत्रकारिता नहीं मानी जा सकती.
बहरहाल, दूसरा बिंदु यह है कि यहां मसला अर्नब की पत्रकारिता का नहीं, उनके खिलाफ एक आपराधिक मामले की जांच का है जिसमें किसी को भी आड़े नहीं आना चाहिए.
3, इससे जुड़े पहलुओं पर ऊपर बात हो चुकी है.
4 विडियो फर्जी निकला, जहां तक गिरफ्तारी की बात है, तो उसे उचित साबित करना पुलिस का काम है जो उसे, कोर्ट के सामने करना होगा. पर एक नागरिक के रूप में हम यह लगातार देख रहे हैं कि अपने खिलाफ आने वाले किसी भी मामले में अर्नब का व्यवहार कानून व्यवस्था की एजेंसियों से सहयोग करने का नहीं, बल्कि खुद को सबसे ताकतवर बताते हुए उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश करने वाला रहा है. स्वाभाविक रूप से कानून के सामने खुद को प्रभावी साबित करने की चुनौती आ गयी थी और पुलिस प्रशासन ने कानून के दायरे में रहते हुए जो सबसे सख्त और असरदार तरीका हो सकता था वह चुना.

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