रेटिंग-प्रतियोगी परीक्षाओं का विरोध करने की जमीन

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अनुपम कुमार, संबद्ध बीसीएम
CUCET( सेंट्रल यूनिवर्सिटी कॉमन एंट्रेंस टेस्ट) कॉर्पोरेट्स की नई दुकान है। छात्र-छात्राओं के अलावा बनारस और देश भर सभी पेरेंट्स व माता-पिता को भी इसका मुखर रूप से विरोध करना चाहिए।
ठीक NEET, JEE और IAS/PCS की महंगी कोचिंग की तरह। CUCET की वजह से सेंट्रल यूनिवर्सिटी में प्रवेश लेना भी एक बड़ी उपलब्धि में गिना जाने लगेगा। आने वाले दिनों में इसकी भी फ़ीस लाखों में होगी।
CUCET से शिक्षा और उसके गुणवत्ता में तो कोई बदलाव नहीं आएगा लेक़िन उसकी जगह गरीब,मजदूरों व किसानों के बच्चे बीएचयू और इलाहाबाद जैसे यूनिवर्सिटी में पढ़ने से महरूम हो जाएंगे।
क्योंकि वो महँगी कोचिंग की फ़ीस नहीं भर पाएंगे, जहां प्रवेश परीक्षा की तैयारी कराई जाएगी। ऊपर से बड़े-बड़े कोचिंग माफ़िया इस क्षेत्र में भी कुकुरमुत्ते की तरह उग आएंगे।
पता करिए 25-30 साल पहले NEET, JEE और IAS/PCS के लिए भी क्या कोई कोचिंग नहीं हुआ करती थी, आज की तरह लाखों फ़ीस वाला। या इस तरह के कोचिंग के बिना ही डॉक्टर, इंजीनियर और आईएएस बना करते थे। फिर निजीकरण के तहत पहले इनके एग्जाम पैटर्न को बदलकर ऐसा कर दिया गया कि बिना कोचिंग किए आप इन प्रवेश परीक्षाओं को पास ही नहीं कर सकते हैं।( अपवाद नियम को ही सिद्ध करते हैं)
अब तक आप 12 पास करके बीएचयू का फॉर्म भर देते थे बिना कोई तैयारी के परीक्षा दे देते थे और आपका एडमिशन हो जाता था। ( ज्यादा से ज्यादा एक गाइड या पिछले वर्ष का प्रश्न पत्र पढ़ लेते होंगे)
लेक़िन CUCET होने के बाद एंट्रेस का पैटर्न बदल जायेगा। इस एंट्रेस एग्जाम के ज़रिए आपकी ज्ञान और समझ को नहीं जांचा जाएगा बल्कि आपको नए तरह के फैक्ट्स और ज्ञान की जानकारी लेनी होगी या रटना होगा। इन्ही सभी प्रश्नों का उत्तर देकर ही आपको यूनिवर्सिटी में एंट्री मिलेगी।
सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि जब देश की प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था हीं एक समान नहीं है तो उच्च शिक्षा के लिए कैसे हम एक “कॉमन” प्रवेश परीक्षा की वकालत कर सकते हैं।
जिस देश में दो परती शिक्षा व्यवस्था हो सरकारी( जहाँ गरीबों, दलितों आदि के बच्चे पढ़ते हैं जो संसाधन व गुणवत्ता विहीन है) व दूसरी तरफ प्राइवेट( जहां अमीरों, उच्च वर्ग व जातियों के बच्चे पढ़ते हैं जो संसाधन व गुणवत्ता परिपूर्ण है)। वहां समान प्रवेश परीक्षा को लागू करना या उसके पक्ष में तर्क देना मज़ाक ही लगता है।
देश में जब इतनी विविधता व गैरबराबरी है तब कॉमन एंट्रेस लेना सरासर अन्याय है। पहले प्राथमिक स्तर के विद्यालयों में समानता लाने की जरूरत है तब उच्च शिक्षा के बारे में सोचा जाना चाहिए। परिवर्तन बुनियाद से लाई जाती है।
इस तरह CUCET गरीब विरोधी, कॉर्पोरेट परस्त, उच्च वर्गीय और जातीय आधारित भेदभाव पूर्ण प्रवेश परीक्षा की व्यवस्था है। जिसका मुखरता से विरोध होना चाहिए। यह बीएचयू जैसे विश्विद्यालयो पर एक बड़ा हमला है।

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