आदिवासी समुदायों को एक सूत्र में बंधने का अह्वान

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  • विशद कुमार

इस संवाददाता सम्मेलन में मुख्य रूप से राष्ट्रीय आदिवासी धर्म समन्वय समिति के संयोजक सह पूर्व मंत्री देवकुमार धान,अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के अध्यक्ष सह पूर्व मंत्री गीताश्री उराँव, आदिवासी जन परिषद के अध्यक्ष प्रेमशाही मुण्डा सहित आदिवासी लोहरा समाज के महासचिव अभय भुटकुंवर, संयुक्त आदिवासी मोर्चा के संयोजक अंतु तिर्की, आदिवासी सरना महासभा के अध्यक्ष नारायण उराँव, राजी पड़हा सरना प्रार्थना सभा के प्रदेश अध्यक्ष  मघी उरांव, राजी पड़हा बेल दिनेश उरांव, अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के रांची जिला अध्यक्ष कुन्दरसी मुण्डा उपस्थित थे।

राष्ट्रीय आदिवासी धर्म समन्वय समिति एवं विभिन्न आदिवासी संगठनों के संयुक्त तत्वावधान में एक संवाददाता सम्मेलन पाही पैलेस, मोराबादी, राँची में सम्पन्न हुई। इस संवाददाता सम्मेलन में राष्ट्रीय आदिवासी धर्म समन्वय समिति के संयोजक सह पूर्व मंत्री  देवकुमार धान, अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद की अध्यक्ष सह पूर्व मंत्री श्रीमती गीताश्री उराँव, आदिवासी जनपरिषद के अध्यक्ष प्रेमशाही मुण्डा, आदिवासी संयुक्त मोर्चा के अंतु तिर्की, ने संयुक्त रूप से कहा कि झारखंड सरकार द्वारा आदिवासी धर्म कोड को विधानसभा से राजकीय संकल्प पारित कर केन्द्र को भेजने का प्रस्ताव के लिए माननीय मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन एवं माननीय मंत्री झारखंड सरकार रामेश्वर उरांव को  धन्यवाद देते हुए पूरा आदिवासी समाज इनका आभार व्यक्त करता है। इस सम्मेलन में सभी वक्ताओं ने झारखंड के सभी आदिवासी समाज से अनुरोध किया कि वे दिनांक  11 नवंबर 2020 को झारखण्ड के प्रत्येक पंचायत, प्रखण्ड एवं जिला मुख्यालय में जुलूस निकालकर जश्न मनाएं और झारखंड सरकार का आभार व्यक्त करें।

आज आदिवासी समाज के आग्रणी, महान नेता भारत सरकार के पूर्व मंत्री बाबा कार्तिक उरांव एवं पद्मश्री डा. रामदयाल मुण्डा का सपना आज पूरा हो रहा है। आज पूरा आदिवासी समाज आपार हर्ष महसूस कर रहे हैं, क्योंकि बाबा कार्तिक उरांव एवं पद्मश्री डा. रामदयाल मुण्डा जी दोनों आदि धर्म के पक्षधर थे और उन्होंने किताबें भी लिखी थीं, वे कभी भी सरना धर्म की वकालत नहीं की, उनका सोच राष्ट्र व्यापी था, उनके ही कदम पर देश आगे बढ़ रहा है।

ज्ञातव्य हो कि 6 अक्टूबर 2015 को सरना धर्म कोड को लेकर माननीय प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री को मांग पत्र सौंपा गया था। 20 नवंबर 2015 को गृहमंत्रालय के निर्देश पर जनगणना महारजिस्ट्रार ने पत्र जारी किया कि जनगणना 2001 में 100 से अधिक जनजातीय धर्मों की जानकारी मिली थी तथा देश की प्रमुख जनजातीय धर्म सरना (झारखंड), सनामही (मणिपुर), डोनिपोलो (अरुणाचल प्रदेश), संथाल, मुण्डा, ओरासन,गोंडी, भील आदि थे। इसके अतिरिक्त इस श्रेणी में अन्य धर्म और धारणाओं के अन्तर्गत सरना सहित कुल मिलाकर 50 धर्म पंजीकृत किए गए थे। इनमें से 20 धर्मों के नाम संबंधित जनजातियों पर हैं, इनमें से प्रत्येक के लिए पृथक श्रेणी व्याहारिक नहीं है। इसके अतिरिक्त जनगणना में सरना को छ: अन्य धर्मों के समान कोड/कालम के आवंटन से बड़ी संख्या में ऐसी ही मांग उठेंगी और इसे रोका जाना चाहिए। इसलिए इनमें से प्रत्येक को कोड संख्या उपलब्ध कराना व्यवाहरिक रूप से संभव नहीं है। उपयुक्त विवरण को ध्यान में रखते हुए जनजातीय धर्म के रूप में सरना के लिए पृथक कोड का आवंटन करने संबंधी याचिका में की गई मांग स्वीकार नहीं है। सभी के लिए कोड/कालम संबंधी मांग तर्क संगत नहीं है। इस प्रकार भारत के गृहमंत्रालय के निर्देश पर जनगणना महारजिस्ट्रार ने सरना धर्म कोड की मांग को खारिज कर दिया।
जिस प्रकार झारखंड सरकार के द्वारा आदिवासी धर्म कोड को विधानसभा से राजकीय संकल्प पारित कर केंद्र सरकार को भेज रही है, उसी प्रकार राष्ट्रीय आदिवासी धर्म समन्वय समिति समेत विभिन्न संगठनों के तत्वावधान में आदिवासी धर्म कोड लागू कराने हेतु राष्ट्रव्यापी आदिवासी धार्मिक जन आंदोलन छेडे़ंगे और देश के विभिन्न राज्यों जैसे – प. बंगाल, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, उडीसा, तामिलनाडु, महाराष्ट्र, असम, मणिपुर, अरूणाचल प्रदेश, मेघालय, उतर प्रदेश, जम्मू कश्मीर इन सभी राज्यों में व्यापक रूप से बैठक कर वहां के विधानसभा से राजकीय संकल्प पारित कर केन्द्र सरकार को भेजने का अनुरोध वहां के मुख्यमंत्री से करेगी।
आज आदिवासी समाज के आग्रणी, महान नेता भारत सरकार के पूर्व मंत्री बाबा कार्तिक उरांव एवं पद्मश्री डा. रामदयाल मुण्डा का सपना आज पूरा हो रहा है। आज पूरा आदिवासी समाज आपार हर्ष महसूस कर रहे हैं, क्योंकि बाबा कार्तिक उरांव एवं पद्मश्री डा. रामदयाल मुण्डा जी दोनों आदि धर्म के पक्षधर थे और उन्होंने किताबें भी लिखी थीं, वे कभी भी सरना धर्म की वकालत नहीं की, उनका सोच राष्ट्र व्यापी था, उनके ही कदम पर देश आगे बढ़ रहा है।
9 सितंबर 2018 को गुजरात एवं 24/25 अगस्त 2019 को अंडमान निकोबार में सर्वसहमति से पूरे देश के आदिवासियों ने राष्ट्रीय सम्मेलन कर आदिवासी धर्म पर निर्णय लिए थे, यही कारण है कि आज पूरे देश के विभिन्न आदिवासी समुदाय आदिवासी धर्म कोड के लिए आंदोलनरत हैं। इसलिए झारखंड के तमाम बुद्धिजीवियों, समाजिक एवं धार्मिक अगुआ, समाजिक संगठन विशेष कर सर्वश्री डा. करमा उरांव, बंधन तिग्गा, डा. प्रवीण उरांव एवं विरेन्द्र भगत से विशेष अनुरोध है कि अभी भी वक्त है कि हमलोग एक मंच पर आकर आदिवासी धर्म कोड का समर्थन हुए आदिवासी समाज का धार्मिक एवं सांस्कृतिक विकास के लिए चट्टानी एकता का परिचय दें। चूंकि सरना स्थल आदिवासियों का पूजनीय स्थल है, जहां धर्मेंश और सिंगबोंगा की पूजा की जाती है। सरना स्थल एक पवित्र पूजा स्थल है और पूजा स्थल के नाम पर धर्म का नाम दुनिया में कहीं भी नहीं है। इसलिए वे पूरे देश के आदिवासियों को ध्यान में रखते हुए आदिवासी धर्म पर सहमति प्रदान करें इससे पूरे देश के आदिवासी समुदाय एक सूत्र में बंध जाएंगे।
8 नवंबर 2020 को रांची में राष्ट्रीय आदिवासी धर्म समाज समिति एवं विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों द्वारा आदिवासी धर्म कोड हेतु एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया है। इस सम्मेलन में विभिन्न राज्यों के जैसे पं बंगाल, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, उडीसा, तामिलनाडु, महाराष्ट्र, असम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, उतरप्रदेश, जम्मू कश्मीर के गोंड, भील, मीणा जैसे बड़े आदिवासी समुदाय समेत झारखंड से सभी आदिवासी समुदायों के प्रतिनिधि संथाल, उरांव, मुण्डा, हो, लोहरा, चीक बड़ाईक, खरवार, चेरो, महली समेत  झारखंड के 32 आदिवासी समुदाय के प्रतिनिधि भाग लेंगे।
2011 के जनगणना मे मात्र तीन राज्यों के आदिवासियों ने सरना धर्म कोड जनगणना प्रपत्र में दर्ज कराया था, जैसे- झारखण्ड में 41,31,282 लोगों ने उड़ीसा में 4,03,350 एवं प. बंगाल में 4,03,250 लोगों ने अपने धर्म का नाम सरना लिखा था। लेकिन कुछ लोगों द्वारा जैसे कि स्वयंभू धर्म गुरु बंधन तिग्गा द्वारा देश के 21 राज्यों में सरना धर्म लिखने का झूठा दावा पेश कर आदिवासी समाज को दिगभ्रमित करने का काम कर रहे हैं।

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