राष्ट्रीय प्रश्न और मार्क्सवाद – सुखविन्दर

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मानव समाज, आदिम साम्यवाद, ग़ुलामदारी और सामंतवाद से होता हुआ अपने वर्तमान पूँजीवादी दौर में दाख़िल हुआ है। आदिम साम्यवाद के बाद वर्ग संघर्ष सामाजिक विकास की धुरी, इंजन रहा है। जब मानव समाज अपने पूँजीवादी दौर में दाख़िल हुआ, तब राष्ट्र अस्तित्व में आते हैं, और अलग-अलग तरह के राष्ट्रीय उत्पीड़न, राष्ट्रीय आंदोलन भी अस्तित्व में आते हैं। पूँजीवाद के आगमन से राष्ट्रीय राज्यों (राष्ट्र आधारित राज्यों) का भी आगमन होता है। सबसे पहले पश्चिमी यूरोप में राष्ट्र राज्य बनने लगे, बाद में यह परिघटना संसार के अन्य क्षेत्रों में फैल गई। संसार में राष्ट्र राज्‍य बनने की प्रक्रिया अभी भी मुकम्‍मल नहीं हुई है। यह प्रक्रिया आज भी जारी है। 1940 के दशक (1940-1949) में संसार में 106 देश थे, जो कि अब 195 हैं। पिछले 70 सालों में ही दुनिया में 70 नए देश अस्तित्व में आए हैं। लेकिन ये सारे नए बने देश राष्ट्र राज्य नहीं हैं। इनमें से कई बहु-राष्ट्रीय देश भी हैं। संसार में आज भी अनेकों राष्ट्र (विशेषकर बहु-राष्ट्रीय देशों में) अपनी आज़ादी, अपने अलग राष्ट्र राज्य के लिए जूझ रहे हैं। राष्ट्रीय मुक्ति की यह लड़ाई भी सीधी रेखा में नहीं चलती, यह कभी तेज़ तो कभी धीमी होती रहती है, परंतू ख़त्म नहीं होती। पश्चिमी यूरोप जो कि राष्ट्र राज्यों की पहली जन्‍म-भूमि है, में भी राष्ट्र राज्य बनने की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। यूनाइटेड किंगडम (यू.के.) में स्कॉटलैंड, उत्तरी आयरलैंड और वेल्ज़, स्पेन में कैटालोनिया, बेल्जियम में फ़्लैमिश आदि राष्ट्र अपनी आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ‘द गार्डियन’ अख़बार के मुताबिक़ उत्तरी-दक्षिणी, पूर्वी तथा पश्चिमी यूरोप में उपरोक्त के अलावा 19 और राष्ट्र हैं जो क्षेत्रीय ख़ुदमुख़्तियारी या आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। भारत में कश्मीर तथा उत्तर-पूर्व के कुछ राष्ट्र अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं। शेष भारत में भी राष्ट्रीय प्रश्न को हल हुआ नहीं समझा जा सकता। पाकिस्तान में कश्मीर, पश्तून, बलूच आदि राष्ट्र अपनी आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। चीन में उइगारों तथा बर्मा में रोहिंग्‍यों पर हो रहा और हो चुका दमन सबके सामने है। श्रीलंका में तमिलों के राष्ट्रीय आज़ादी के आंदोलन को फ़िलहाल वहाँ के शासकों ने कुचल दिया है, लेकिन इससे वहाँ के तमिलों में राष्ट्रीय आज़ादी की उमंगें ख़त्म नहीं हुईं /ना ही होंगी।

हम देख सकते हैं कि संसार के बड़े हिस्से में अभी भी राष्ट्रीय प्रश्न एक जीवित प्रश्न है। राष्ट्रीय आंदोलनों, राष्ट्रीय उत्पीड़न के प्रति मज़दूर वर्ग का क्या रवैया हो? बहुत शुरू में ही मार्क्सवाद के संस्थापकों को इस प्रश्न का सामना करना पड़ा। मार्क्सवाद के संस्थापकों कार्ल मार्क्स और फ़्रेडरिक एंगेल्स ने अपने दौर के राष्ट्रीय आंदोलनों के प्रति मज़दूर वर्ग का रुख़ स्पष्ट किया। कामरेड लेनिन, कामरेड स्तालिन और कामरेड माओ ने राष्ट्रीय मसले पर मार्क्स-एंगेल्स के चिंतन को और आगे बढ़ाया।

 इस चिंतन की रौशनी में हम आज के बहु-राष्ट्रीय भारत, यहाँ के राष्ट्रीय मसले को समझ सकते हैं। भारत एक विविधता भरा देश है। यहाँ बसने वाले लोग सैकड़ों जातियों, धार्मिक संप्रदायों में बँटे हुए हैं। यह देश सैकड़ों राष्ट्रीयताओं का घर है। यहाँ बसने वाले लोग सैकड़ों ही भाषाएँ बोलते हैं। इनमें से सिर्फ़ 22 ही सूचीबद्ध हैं। इन 22 भाषाओं में शामिल डोगरी कोई अलग भाषा नहीं है, बल्कि पंजाबी की उप-भाषा है। 43 और भाषाओं को भारतीय संविधान की आठवीं सूची में शामिल करने की माँग समय-समय पर उठती रहती है। आने वाले दिनों में इन माँगों के और अधिक प्रबल होने की संभावना है।

भारत एक बहु-राष्ट्रीय देश है। भारत की हुक्‍मरान बुर्जुआजी इसे एक राष्ट्र बनाने पर उतारू है। आज़ादी के बाद पिछले लगभग 7 दशकों से वह इसी कोशिश में लगी हुई है। इसलिए भारत में मौजूद विभिन्न राष्ट्र उत्पीड़न की चक्की में पिस रहे हैं। संविधान में भारत को संघीय ढाँचा माना गया है, लेकिन भारतीय हुक्मरानों का ज़ोर हमेशा एकात्मक ढाँचे की ओर रहता है। कभी डंके की चोट पर और ज्‍़यादातर मामलों में चोर-मोरियों के ज़रिए भारत में बसने वाले विभि‍न्न राष्ट्रों पर हिंदी थोपी जाती है। अलग-अलग भाषाओं में शिक्षा पर रोक लगाई जाती है, इन भाषाओं के स्कूल बंद किए जाते हैं।

राष्ट्रीय प्रश्न भारतीय समाज का, भारतीय क्रांति का एक अहम प्रश्न है। इसका सामना किए बिना भारत में मज़दूर क्रांति सफल नहीं हो सकती। भारत का कम्युनिस्ट आंदोलन शुरू से ही इस प्रश्न से जूझता रहा है तथा आज भी जूझ रहा है।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी अपने क्रांतिकारी दौर में अलग होने सहित राष्ट्रीयताओं के आत्मनिर्णय के अधिकार की वकालत करती रही है (भले ही इसकी सोच में धर्म को राष्ट्र का आधार समझने जैसे भटकाव नज़र आते रहे हैं)। पर 1951 में संशोधनवाद का रास्‍तापकड़ने के बाद इसने राष्ट्रों के आत्मनिर्णय के मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांत को तिलांजलि दे दी और भारतीय हुक्‍मरानों के देश की एकता और अखंडता के समूह गान में शामिल हो गई। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) का जन्म ही एक संशोधनवादी पार्टी के रूप में हुआ था, इसलिए इससे राष्ट्रीय प्रश्न पर सही अवस्थिति अपनाने की उम्मीद नहीं की जा सकती। यह भी भारत की एकता और अखंडता के बेसुरे राग अलाप रही है। जिसका मतलब है, अलग-अलग राष्ट्रीयताओं को जबरन भारत देश में बाँधकर रखना।

2014 से फासीवादी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की राजनीतिक शाखा भारतीय जनता पार्टी दिल्ली के सिंहासन पर विराजमान है। यह फासीवादी हुकूमत जहाँ भारत के मज़दूरों, ग़रीब किसानों, अन्य मेहनतकशों, औरतों, दलितों और आदिवासियों के लिए ख़तरनाक है, वहीं यह भारत में बसने वाले अलग-अलग राष्ट्रों के लिए भी ख़तरनाक है। संघ परिवार का कार्यक्रम है – एक भाषा (हिंदी), एक धर्म (हिंदू) और एक राष्ट्र (हिंदुस्तान)। यह लगभग पिछली एक सदी से भारत को एक हिंदू राष्ट्र बनाने में जुटी हुई है। 1980 के बाद यह फासीवादी रुझान भारत के राजनीतिक सामाजिक दृश्य पर एक बड़ा ख़तरा बनके उभरा है। यह फासीवादी रुझान हिंदुओं के अलावा बाक़ी सभी धार्मिक अल्प-संख्यकों की हस्ती मिटाने पर आमादा है। यह भारत में बसने वाले अलग-अलग राष्ट्रों को कुचल रहा है, ताकि भारत को एक राष्ट्र बनाया जा सके। 5 अगस्त 2019 को फासीवादी शासकों ने कश्मीर से धारा 370 और 35 ए हटाकर भारतीय संघ में कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म कर दिया। तब से कश्मीर कर्फ़्यू तले है। कश्मीर आज संसार का वह क्षेत्र है, जहाँ सबसे अधिक सेना तैनात है।

2014 में संघी फासीवादियों के केंद्र सरकार पर क़ाबिज़ होने के बाद भारत में राष्ट्रीय उत्पीड़न और तीखा हुआ है। सैकड़ों तरीक़ों से भारत के अलग-अलग राष्ट्रों पर हिंदी थोपने की कोशिशों में तेज़ी आई है। कश्मीर फ़ौजी बूटों तले कुचला जा रहा है। नागा राष्ट्र की आज़ादी के लिए जूझ रही नागालैंड की राष्ट्रीय समाजवादी काउंसिल के साथ चल रही बातचीत बेनतीजा रही। दिल्ली के फासीवादी शासक नागा राष्ट्रवादियों की कोई माँग मानने को तैयार नहीं थे। इस बातचीत के टूटने के बाद दिल्ली के शासकों ने फिर से नागा जनता पर फ़ौजी चढ़ाई कर दी है। भारत के उत्तर-पूर्व में चल रहे अलग-अलग राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन अधिक अध्ययन की माँग करते हैं। इन आंदोलनों के बारे में काफ़ी कुछ इस अध्ययन के बाद ही लिखा जा सकता है। ‘प्रतिबद्ध’ के आगामी अंकों में हम पाठकों को उत्तर-पूर्व के राष्ट्रीय आंदोलनों के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध कराने की कोशिश करेंगे।

नक्सलबाड़ी के बाद अस्तित्व में आए कम्युनिस्ट क्रांतिकारी शिविर ने भी भारत के राष्ट्रीय प्रश्न के प्रति हालाँकि मुख्य तौर पर सही रुख़ अपनाया है। भारत को एक बहु-राष्ट्रीय देश माना, राष्ट्रों के आत्मनिर्णय के मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांत को बुलंद किया है, लेकिन फिर भी इसमें कई विचलन देखने को मिलते हैं। इस शिविर के ज़्यादातर ग्रुप भारत में पूँजीवादी विकास से इनकार करते हैं। वे भारत को अर्ध सामंती-अर्ध औपनिवेशिक देश मानते हैं। भारत में राष्ट्रीय प्रश्न को वे भारत के अर्ध सामंती चरित्र से जोड़कर देखते हैं। जैसे कि पूँजीवादी बहु-राष्ट्रीय देशों में राष्ट्रीय प्रश्न हो ही ना। कुछ ग्रुप राष्ट्रीय उत्पीड़न के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते-उठाते सांप्रदायिक रास्ते पर चले गए और बिखर गए, जैसे कि पंजाब में किसी वक़्त सक्रिय रहा ‘पैग़ाम’ ग्रुप पंजाबी राष्ट्र की आज़ादी की वकालत करते-करते खालिस्तानियों के हत्थे चढ़ गया। कुछ ग्रुप इस मामले में वर्ग अपचयनवादी अवस्थिति पर जा खड़े होते हैं, ये विशेषकर मुख्य भूमि भारत में राष्ट्रीय उत्पीड़न से ही इनकार करते हैं। कश्मीर और उत्तर-पूर्व के राष्ट्रों की आज़ादी के बारे में ये कोई ठोंक-बजाकर स्टैंड नहीं लेते, बस कभी-कभार जुबानी जमा-ख़र्च तक सीमित रहते हैं। इनके लिए भारत में “मज़दूर मसला” ही एकमात्र मसला है।

भारत में राष्ट्रीय मसले के हल के लिए जहाँ राष्ट्रीय संकीर्णता, राष्ट्रीय शाविनिज़्म, राष्ट्रवादियों तथा सांप्रदायिकतावादियों (धार्मिक संप्रदायों को राष्ट्रों का कुनाम देने वाले) का पिछलग्गू होना ख़तरनाक है, वहीं राष्ट्रीय मसलों को नकारने वाली, राष्ट्रीय मसलों के प्रति दिल्ली के शासकों के सुर में सुर मिलाने, राष्ट्रीय भावनाओं के प्रति संवेदनाहीन रवैया रखने वाली वर्ग अपचयनवादी अवस्थिति भी ख़तरनाक है।

पूरी दुनिया में और ख़ासकर भारत में राष्ट्रीय मसले को समझने के लिए ज़रूरी है कि हम फिर से दुनिया के मज़दूर वर्ग के महान अध्यापकों के इस मसले के बाबत विचारों की ओर लौटें। इस लेख का मक़सद राष्ट्रीय मसले, इसके विभिन्न पहलुओं के बारे में मज़दूर वर्ग के महान अध्यापकों के विचारों की पुन: प्रस्तुति है। आज हमारे पास समाजवादी देश ख़ासकर सोवियत यूनियन का तजुर्बा भी है, जिसने राष्ट्रीय उत्पीड़न के ख़ात्मे के लिए मिसाली काम किया। यहाँ मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन और स्तालिन के राष्ट्रीय प्रश्न के प्रति विचारों ने अमली रूप ग्रहण किया है। इस लेख में हम इस समृद्ध तजुर्बे की भी चर्चा करेंगे। राष्ट्रीय प्रश्न पर मज़दूर वर्ग के महान अध्यापकों के विचारों और राष्ट्रीय मसला सुलझाने के सोवियत यूनियन के तजुर्बे की रौशनी में आज राष्ट्रीय प्रश्न पर उठ रहे और भविष्य में उठने वाले विचलनों को मात दी जा सकती है और भारत में राष्ट्रीय प्रश्न का कोई ठोस हल खोजा जा सकता है। इन प्रश्‍न को समझकर ही भारत में मज़दूर आंदोलन को आगे बढ़ाया जा सकता है। यह लेख लिखने के लिए हमने मुख्य रूप में मार्क्स, एंगेल्स, काउत्स्की, लेनिन और स्‍तालिन के विचारों को आधार बनाया है । इसके लिए हमें इन अध्यापकों की राष्ट्रीय प्रश्न के बाबत रचनाओं से उद्धरणों पर अधिक निर्भर होना पड़ा है। राष्ट्रीय मसले पर लिखे जा रहे लेखों की श्रृंखला का यह पहला लेख है। ‘प्रतिबद्ध’ के आगामी अंकों में इस मसले पर दो अन्य लेख – ‘भारत में राष्ट्रीय प्रश्न’ और ‘पंजाब में राष्ट्रीय मसला’ प्रकाशित करेंगे।

राष्ट्रों की उत्पत्ति

राष्ट्र हमेशा से मानव समाज का अंग नहीं रहे और ना ही भविष्य में सदा मानव समाज का राष्ट्रों में विभाजन क़ायम रहेगा। राष्ट्र सामाजिक विकास के एक ख़ास पड़ाव, पूँजीवादी अवस्था में अस्तित्व में आते हैं। मानव इतिहास में राष्ट्रों की उत्पत्ति, विकास और इनके भविष्य को सिर्फ़ ऐतिहासिक भौतिकवाद की रौशनी में ही समझा जा सकता है। ऐतिहासिक भौतिकवाद सिखाता है कि आदिम साम्यवादी समाज के बाद, जब से मानव समाज का वर्गों में विभाजन हुआ है, वर्ग संघर्ष मानव समाज के विकास का इंजन रहा है। इसलिए राष्ट्र भी वर्ग संघर्ष ख़ासकर बुर्जुआजी के सामंती और अन्य प्राक्-पूँजीवादी सामाजिक व्यवस्थाओं के विरुद्ध संघर्ष की उपज हैं।

कामरेड लेनिन लिखते हैं,

 “पूँजीवाद द्वारा उत्पादन शक्तियों का तेज़ विकास बड़े, राजनीतिक रूप से एकजुट और संयुक्त इलाक़ों की माँग करता है, क्योंकि सिर्फ़ यहाँ ही बुर्जुआजी अपने अटल प्रतिपक्ष, सर्वहारा, के साथ एकीकृत होती है और सभी पुराने मध्ययुगीन, जाति से उपजे, इलाक़ावार, तुच्छ राष्ट्रीय, धार्मिक और अन्य बंदिशों का सफाया कर देती है।” (लेनिन, ‘क्रिटिकल रीमार्क्‍स ऑन द नेशनल क्‍वेश्‍चन’, कलेक्टिड वर्क्‍स, अंग्रेजी, प्रोग्रेस पब्लिशर्स, संस्करण, 1972, खण्‍ड 20, पन्ना 45, कलेक्टिड वर्क्‍स से हवालों का सभी जगह अनुवाद हमारा)

इसी के बारे में लेनिन और लिखते हैं,

“सारी दुनिया में सामंतवाद पर पूँजीवाद की अंतिम विजय के काल का राष्‍ट्रीय आंदोलनों से संबंध रहा है। इन आंदोलनों का आर्थिक आधार यह तथ्‍य है कि पण्‍य-उत्‍पादन की पूर्ण विजय प्राप्‍त करने के लिए पूँजीपति वर्ग के लिए अंदरूनी मंडियों पर क़ब्‍ज़ा करना, एक ही भाषा बोलनेवाले निवासियों के राजकीय दृष्टि से एकताबद्ध इलाक़ों का होना और इस भाषा के विकास तथा साहित्‍य में उसकी परिपुष्टि में सभी बाधाओं का हटाया जाना आवश्‍यक है। भाषा मनुष्‍य के पारस्‍परिक व्‍यवहार का सबसे महत्‍वपूर्ण माध्‍यम है। आधुनिक पूँजीवाद के उपयुक्‍त सचमुच स्‍वतंत्र तथा व्‍यापक वाणिज्यिक आदान-प्रदान के लिए, जनसंख्‍या के सभी अलग-अलग वर्गों के स्‍वतंत्र तथा विस्‍तृत ढंग से समूहबद्ध होने के लिए, और अंतत: मंडी और छोटे-बड़े हर मालिक, ख़रीदार तथा विक्रेता के बीच घनिष्‍ठ संबंधों की स्‍थापना के लिए एक ही भाषा तथा उसका अबाध विकास सबसे महत्‍वपूर्ण शर्तों में से एक है।

इसलिए हर राष्‍ट्रीय आंदोलन की प्रवृत्ति राष्ट्रीय राज्‍य बनने की दिशा में होती है, जिसके अंतर्गत आधुनिक पूँजीवाद की ये आवश्‍यकताएँ सबसे अच्‍छे ढंग से पूरी होती हैं। गूढ़तम आर्थिक तत्‍व इसी तक्ष्‍य की ओर ले जाते हैं और इसलिए पूरे पश्चिमी यूरोप में, बल्कि पूरे सभ्‍य जगत में, पूँजीवादी मंज़िल‍ के लिए राष्ट्रीय राज्‍य की लाक्षणिक तथा सामान्‍य अवस्‍था है। (लेनिन, ‘जातियों* का आत्मनिर्णय का अधिकार’, प्रगति प्रकाशन, मास्को, 1981, पन्ना 6, शब्दों पर ज़ोर मूल में)

(*नोट – इस निबंध के हिंदी अनुवाद के लिए स्रोत के तौर पर ली गईं विभिन्न हिंदी प्रकाशनों की किताबों में ‘राष्ट्र’/‘राष्ट्रीय’/‘राष्ट्रीयता’ (Nation/National/Nationality) के लिए ‘जाति’/‘जातीय’/‘जातीयता’ शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। हमने इन किताबों से लिए गए हवालों में ‘राष्ट्र’/‘राष्ट्रीय’/‘राष्ट्रीयता’ शब्दों का इस्तेमाल किया है। किताबों/लेखों के नामों/शीर्षकों में हमने बदलाव नहीं किया है – अनुवादक)

कामरेड स्तालिन की रचना ‘मार्क्सवाद और राष्ट्रीय प्रश्न’ (Marxism and the National Question) को राष्ट्रीय प्रश्न पर लिखे गए मार्क्सवादी साहित्य में सबसे अहम स्थान हासिल है। अपनी इस रचना में स्तालिन राष्ट्रों की उत्पत्ति के बारे में लिखते हैं,

“एक राष्ट्र सिर्फ़ एक ऐतिहासिक प्रवर्ग ही नहीं है, बल्कि एक ख़ास दौर, उभर रहे पूँजीवाद के दौर से संबंधित ऐतिहासिक प्रवर्ग है। सामंतवाद के ख़ात्‍मे और पूँजीवाद के विकास की प्रक्रिया उसी समय ही लोगों के राष्ट्रों में जुड़ने की प्रक्रिया भी होती है। पश्चिमी यूरोप में ऐसे उदाहरण मिलते हैं। ब्रिटिश, फ़्रांसीसी, जर्मन, इतालवी और अन्य राष्ट्रों ने पूँजीवाद के विकास और इसकी सामंती बिखराव पर जीत के मौक़े पर रूप ग्रहण किया।” (जे.वी. स्तालिन, ‘मार्क्सवाद और जातीयताओं का प्रश्न’, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, संस्करण 2016, पन्ना 23)

राष्ट्रकीअवधारणा

भले ही राष्ट्रों की अवधारणा की व्याख्या करने के लिए अन्य मार्क्सवादी अध्यापकों और विद्वानों ने भी लिखा है, परंतु राष्ट्र की एक सुगठित एवं परिपूर्ण व्याख्या कामरेड स्तालिन ने अपनी पुस्तिका ‘मार्क्सवाद एवं राष्ट्रीय प्रश्न’ में की है। राष्ट्र की मार्क्सवादी अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए हम स्तालिन की इस रचना को आधार बनाएँगे।

कामरेड स्तालिन के अनुसार राष्ट्र बुनियादी तौर पर एक समुदाय, लोगों का एक निश्चित समुदाय होता है। यह समुदाय नस्ली या क़बाइली नहीं होता, बल्कि ऐतिहासिक तौर पर बना लोगों का समुदाय होता है। सामाजिक विकास के एक ख़ास पड़ाव में पूँजीवादी विकास के पड़ाव में, अलग-अलग नस्लों तथा क़बीलों से मिलकर राष्ट्र अस्तित्व में आते हैं।

दूसरी ओर यह भी सच है कि साइरस और सिकंदर की सल्‍तनतें भले ही ऐतिहासिक तौर पर और अलग-अलग क़बीलों व नस्लों से मिलकर बनी थीं, लेकिन इन्हें राष्ट्र नहीं कहा जा सकता। ये राष्ट्र नहीं थे, बल्कि समूहों के आरज़ी और ढीले-ढाले तरीक़े से जुड़े हुए समूह थे, जो इस या उस विजेता की जीतों या हारों के अनुसार कभी इकट्ठा हो जाते, तो कभी अलग हो जाते थे। इसलिए राष्ट्र कोई आरज़ी या अल्पकालिक समूह नहीं, बल्कि लोगों का स्थिर समुदाय होता है। परंतु प्रत्येक स्थिर समुदाय भी राष्ट्र नहीं होता। जैसे कि रूस व ऑस्ट्रिया भले ही स्थिर समुदाय हैं, लेकिन ये राष्ट्र नहीं हैं। क्योंकि एक साझी भाषा के बिना एक राष्ट्रीय समुदाय की कल्पना भी नहीं की जा सकती। स्तालिन कहते हैं कि,

 यहाँ हमारा अभिप्राय लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा से हैकिसी सरकारी भाषा से नहीं। (स्तालिन, उपरोक्त, पन्ना 23, शब्दों पर ज़ोर हमारा) (स्तालिन के इस कथन का भारत के संदर्भ में विशेष महत्व है। यहाँ लोग अनेकों भाषाएँ बोलते हैं, लेकिन भारत के संविधान में केवल 22 भाषाओं को मान्यता प्राप्त है। दिल्ली के शासकों ने तो तथाकथित हिंदी पट्टी में लोगों द्वारा बोली जाने वाली अनेकों भाषाओं को हिंदी की उप-भाषाएँ घोषित करके मौत की सज़ा सुना दी है।)
इसलिए साझी भाषा राष्ट्र के लक्षणों में से एक है। यह हो सकता है कि कई राष्ट्रों की एक भाषा हो। परंतु यह नहीं हो सकता कि एक राष्ट्र कई भाषाएँ बोलता हो। (और यह भी संभव नहीं कि कोई भाषा राष्ट्रों से ऊपर हो या कोई ऐसी भाषा हो जो किसी भी राष्ट्र की ना हो। जैसा कि भारत में हिंदी को लेकर दावा किया जाता है।) अमरीकी और अंग्रेज़ एक ही भाषा बोलते हैं, लेकिन फिर भी एक राष्ट्र नहीं हैं। इसकी वज़ह यह है कि वे साझे इलाक़े में नहीं बसते। इसलिए साझा इलाक़ा होना राष्ट्र के लक्षणों में से एक है।

 “लेकिन बात सिर्फ़ इतनी-सी ही नहीं है। साझा क्षेत्र ख़ुद एक राष्ट्र क़ायम नहीं करता। इसके लिए एक अंदरूनी आर्थिक बंधन की ज़रूरत होती है जो राष्ट्र के विभिन्न हिस्सों को एकरूपता देते हैं। … अंत: एक साझा आर्थिक जीवन, आर्थिक जुड़ाव भी राष्ट्र के चारित्रिक गुणों में से एक है।” (स्तालिन, उपरोक्त, पन्ना 18)

 राष्ट्र की चौथी ख़ासियत के बारे में कामरेड स्तालिन लिखते हैं, 

“लेकिन बात अब भी पूरी नहीं हुई है। उपर्युक्त बातों के अलावा, एक राष्ट्र के तौर पर जुटने वाले लोगों के ख़ास आध्यात्मिक स्वरूप को भी ध्यान में रखना चाहिए। राष्ट्र न सिर्फ़ ज़िंदगी के हालात के मुआमले में एक-दूसरे से अलग होते हैं, बल्कि आध्यात्मिक स्वरूप में भी एक-दूसरे से अलग होते हैं। यही वह अंतर है जो राष्ट्रीय संस्कृति के रूप में सामने आता है। इंग्लैंड, अमरीका और आयरलैंड में एक ही भाषा बोली जाती है, लेकिन इसके बावजूद वे एक-दूसरे से भिन्न राष्ट्र हैं। इन्होंने एक ख़ास मनोवैज्ञानिक स्वरूप विकसित किया है जो अस्तित्व की अलग-थलग परिस्थितियों से पैदा हुआ है। यह सिलसिला पीढ़ियों से चला आ रहा है।

 मनोवैज्ञानिक स्वरूप को दूसरे शब्दों में ‘राष्ट्रीय चरित्र’ कहा जाता है। यह सही है कि इसे लोग देख न पाएँ, इसे समझ न पाएँ, लेकिन यह राष्ट्रीय चरित्र एक अनोखी संस्कृति के रूप में सामने आता है, जो किसी राष्ट्र के लिए साझी होती है। यह आपको फ़ौरन नज़र आ जाएगी और आप इसे अनदेखा नहीं कर सकते। यहाँ यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि राष्ट्रीय चरित्र कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसमें बदलाव मुमकिन नहीं। यह ज़िंदगी के हालात के मुताबिक़ बदलता रहता है। लेकिन यह हर पल हमारे साथ होता है, इसलिए राष्ट्र के ढाँचे पर इसका असर पड़ता है। अत: एक साझा मनोवैज्ञानिक स्वरूप जो साझी संस्कृति में नज़र आता है, वह भी राष्ट्र के चारित्रिक गुणों में से एक है।” (स्तालिन, उपरोक्त, पन्ना 18-19)

आगे कामरेड स्तालिन राष्ट्र के सभी लक्षणों को इकट्ठा करके राष्ट्र की एक सुगठित परिभाषा देते हैं,

“राष्ट्र ऐतिहासिक रूप से गठित, लोगों का एक स्थिर समुदाय है जो एक साझी भाषा, साझा क्षेत्र, साझा आर्थिक जीवन और एक साझी संस्कृति में अभिव्यक्त होने वाले मनोवैज्ञानिक स्वरूप के आधार पर क़ायम हुई है।” (स्तालिन, उपरोक्त, पन्ना 19)

स्तालिन यह भी कहते हैं कि कोई समुदाय तभी राष्ट्र बनता है, यदि वह उपरोक्त चारों शर्तों को पूरा करे। यदि उपरोक्त में से केवल एक शर्त या लक्षण भी अनुपस्थित हो तो कोई भी समुदाय राष्ट्र नहीं कहला सकता। एक अन्य स्थान पर कामरेड स्तालिन कहते हैं कि पूँजीवाद की आमद से पहले राष्ट्र अस्तित्व में नहीं आ सकते थे। सामंतवाद में जब देश अलग-अलग आज़ाद रियासतों में बिखरे हुए थे, वह ना सिर्फ़ राष्ट्रीय बंधनों से दूर थे, बल्कि ऐसे बंधनों की आवश्यकता को भी रद्द करते थे। सामंती रियासतों में ना तो राष्ट्रीय बाज़ार थे और ना ही आर्थिक और या सांस्कृतिक केंद्र थे। वहाँ ऐसे कोई कारक नहीं थे जो आर्थिक बिखराव को समाप्त कर सकते और बिखरे हुए हिस्‍सों को एक राष्ट्रीय समुच्‍चय में इकट्ठा कर सकते हैं।

 “लेकिन यह भी सच है कि राष्ट्र के तत्व – भाषा, इलाक़ा, साझी संस्कृति आदि आसमान से नहीं गिरे बल्कि धीरे-धीरे, यहाँ तक कि पूर्व पूँजीवादी दौर में अस्तित्व में आए। लेकिन ये अभी अपनी प्रारंभिक अवस्था में थे जो कि अनुकूल परिस्थितियों में, भविष्य में राष्ट्र बनने की संभावना रखते थे।” (स्तालिन, ‘द नेशनल क्‍वेश्‍चन एंड लेनिनिज़्म’, फ़ॉरेन लेंगुएजिज़ पब्लिशिंग हाउस, मास्को, 1954, अंग्रेज़ी से अनुवाद हमारा)

बहु-राष्ट्रीयराज्य

ऊपर दिए गए हवाले में लेनिन लिखते हैं, पूरे पश्चिमी यूरोप मेंबल्कि पूरे सभ्‍य जगत मेंपूँजीवादी मंज़िल के लिए राष्ट्रीय राज्‍य की लाक्षणिक तथा सामान्‍य अवस्‍था है। परंतु कुछ विशेष परिस्थितियों में दुनिया में अनेकों बहु-राष्ट्रीय देश भी अस्तित्व में आए, आज भी ऐसे देशों का अस्तित्व है। इसके साथ ही यह भी सच है कि इनमें से कई बहु-राष्ट्रीय देश बिखरकर कई राष्ट्रीय राज्य भी बनते रहे हैं। जैसा कि 20वीं सदी के दूसरे दशक में बहु-राष्ट्रीय ऑस्ट्रिया-हंगरी सल्‍तनत का बिखराव। 1917 की समाजवादी क्रांति से पहले रूस भी एक बहु-राष्ट्रीय देश था। जहाँ अनेकों राष्ट्रीयताएँ ज़ारशाही के बर्बर उत्पीड़न का शिकार थीं। इसीलिए रूस को रूस के क्रांतिकारी ‘राष्ट्रों की जेल’ भी कहा करते थे। अक्‍टूबर 1917 में रूस की विजयी समाजवादी क्रांति के बाद 1922 में राष्ट्रों के स्वैच्छिक संघ के रूप में सोवियत यूनियन अस्तित्व में आया। समाजवादी सोवियत यूनियन में एक प्रक्रिया में राष्ट्रीय उत्पीड़न ख़त्‍म हुआ। परंतु 1956 में संशोधनवादी ख्रुश्चेव गुट सोवियत यूनियन की सत्ता पर क़ाबिज़ हुआ। समाजवादी सोवियत यूनियन में पूँजीवादी पुनर्स्थापना हुई। पूँजीवाद की पुनर्स्थापना के बाद सोवियत यूनियन में राष्ट्रीय उत्पीड़न फिर से शुरू हुआ। राष्ट्रीय झगड़े बढ़ने लगे। 1922 में राष्ट्रों की स्‍वेच्‍छा के आधार पर बना सोवियत संघ, अब स्वैच्छिक नहीं रह गया था। कई राष्ट्रों ने आज़ादी की राह पकड़ी, लेकिन फ़ौजी दमन के ज़रिए उनकी आज़ादी का अधिकार छीन लिया गया। 1980 के अंत और 1990 की शुरुआत में जब सामाजिक साम्राज्यवादी सोवियत यूनियन का आंतरिक संकट बहुत तीखा हुआ तो 1991 में सोवियत यूनियन का विघटन हो गया। इसके परिणामस्वरूप 15 देश अस्तित्व में आए। इसी तरह संशोधनवादी यूगोस्लाविया बिखरकर 7 देशों में विभाजित हो गया। चेकोस्लोवाकिया का भी यही हश्र हुआ। आज भी दुनिया में बहु-राष्ट्रीय देश मौजूद हैं। परंतु इन देशों में राष्‍ट्रों की आज़ादी की आवाज़ें उठ रही हैं। परंतु हुकूमती डंडे के ज़ोर पर ये बहु-राष्ट्रीय राज्य क़ायम हैं। जैसा कि स्पेन में कैटेलन जनता आज़ादी के लिए लड़ रही है। परंतु स्पेनी हुक्‍मरान फ़ौजी दमन के द्वारा कैटेलन जनता की आज़ादी की माँग को कुचल रहे हैं। तीसरी दुनिया के बहु-राष्ट्रीय देशों में जहाँ देर से पूँजीवादी विकास हुआ और कमज़ोर, लंगडा-लूला पूँजीवादी विकास हुआ, जहाँ बुर्जुआ जनवाद का दायरा बहुत सीमित है, में राष्ट्रीय उत्पीड़न अधिक वहशी है।

कामरेड स्तालिन बहु-राष्ट्रीय राज्यों की परिघटना की व्याख्या करते हुए लिखते हैं,  “लेकिन राष्ट्रों में उभरने वाले ये लोग (यहाँ स्तालिन का इशारा पश्चिमी यूरोप के देशों की तरफ़ है – लेखक) बावक़्त आज़ाद राष्ट्रीय राज्यों में भी बदल गए थे…।

पूर्वी यूरोप में हालात कुछ दूसरे तरह के थे। जहाँ पश्चिमी राष्ट्रीयताएँ राज्यों में तब्दील हो रही थीं, वहीं पूर्व में बहुराष्ट्रीय राज्य वजूद में आ रहे थे जिनमें बेशुमार राष्ट्रीयताएँ शामिल थीं। ऑस्ट्रि‍या-हंगरी और रूस ऐसे ही बहुराष्ट्रीय राज्य हैं।…

राज्यों के गठन का यह तरीक़ा सिर्फ़ उन्हीं स्थानों पर संभव हो सकता था, जहाँ सामंतवाद को पूरी तरह नेस्तनाबूद न किया जा सका हो, जहाँ पूँजीवाद की स्थिति कमज़ोर हो, जहाँ राष्ट्रीयताओं को पीछे धकेल दिया गया हो, वे आर्थिक रूप से इतनी मज़बूत न हो पाई हों कि ख़ुद को राज्य के तौर पर एकता में बाँध सकें।” (स्तालिन, ‘मार्क्सवाद और जातीयताओं का प्रश्न’, उपरोक्त, पन्ना 23-24)

स्तालिन के इस हवाले से कोई यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि बहु-राष्ट्रीय राज्य वहाँ बनते हैं या वे होते हैं जहाँ अभी सामंतवाद का अंत ना हुआ हो। ऐसा भ्रम ना पैदा हो सके इसलिए स्पष्ट कर दें कि स्तालिन ऐसे राज्यों के अस्तित्व में आने के समय और कारणों की चर्चा कर रहे हैं। किसी राज्य का बहु-राष्ट्रीय स्वरूप यहाँ पूँजीवादी विकास की राह में रुकावट नहीं बनता।

स्तालिन लिखते हैं,  

“लेकिन पूर्वी राज्यों में भी पूँजीवाद विकसित होने लगा था। कारोबार और संचार के साधनों का विकास हो रहा था। बड़े शहर उभरने लगे थे। राष्ट्र आर्थिक रूप से संगठित होने लगे थे।” (उपरोक्त, पन्ना 24)

            कार्ल काउत्स्की दुनिया का एक बड़ा मार्क्सवादी विचारक हुआ है। परंतु बाद में वह भटककर संशोधनवाद के ग़लत रास्‍ते पर चल पड़ा। परंतु जब वह मार्क्सवादी होता था, तो उसने भी राष्ट्रीय प्रश्न पर लिखा। इस मसले पर उसकी एक महत्वपूर्ण रचना है, ‘राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता’ (Nationality and Internationality) (1907/08)। कामरेड लेनिन भी राष्ट्रीय मसले पर काउत्‍स्की की इस रचना का हवाला देते हैं। बहु-राष्ट्रीय राज्यों के बारे में काउत्स्की लिखता है,

            “राष्ट्रीय राज्य, राज्य का वह रूप है जो मौजूदा संबंधों के अनुसार है, वह रूप जिसमें यह अपने कार्य सबसे अधिक आसानी से पूरा कर सकता है। फिर भी हर राज्य इस रूप तक पहुँचने के लिए नवाज़ा हुआ नहीं है। जैसे कई सामंती या यहाँ तक ​​कि आदिम साम्यवादी काम करने के ढंग उत्पादन के आधुनिक ढंग तक विस्तार हासिल कर लेते हैं, इसी तरह एक वक़्त जब राज्य अपने कई राष्ट्रीय अंगों से मिलकर बनते थे, बिना अपनी ताक़त गँवाए या असाधारण आंतरिक टकरावों या अंतरविरोधों के, बचे रहते हैं। यहाँ तक कि राष्ट्रीय राज्यों में अभी भी बहु-राष्ट्रीय राज्यों के अवशेष (Remains) हैं। इनके साथ-साथ हालाँकि ऐसे राज्य भी हैं जो पूरी तरह से राष्ट्रीयताओं के राज्य हैं।

ये ऐसे राज्य हैं जिनकी आंतरिक संरचना, चाहे जिस भी कारण से हो, पिछड़ी हुई या असाधारण बनी रहती है। (काउत्स्की का यह कथन भारत, पाकिस्तान या तीसरी दुनिया के अन्य ऐसे देशों के लिए ख़ास तौर पर उपयुक्त है। – लेखक) तुर्की या रूस के मामले में यह साफ़ देखा जा सकता है, लेकिन यह आर्थिक रूप से विकसित दो देशों, बेल्जियम और स्विट्ज़रलैंड के लिए भी सही है” (कार्ल काउत्स्की, ‘नेशनेलिटी एंड इंटरनेशनेलिटी’, भाग 2, क्रिटीक, भाग 38, नंबर 1, पन्ना 149, फ़रवरी 2010, अंग्रेज़ी से अनुवाद हमारा)

स्तालिन भी रूस के और ऑस्ट्रि‍या के राष्ट्रीय मसले में फ़र्क़ करते हैं। उनका कहना है,

“अन्त में, जो भी फ़ौरी काम इस समय रूस और ऑस्ट्रिया के सामने मौजूद हैं, वे बिल्‍कुल भिन्न हैं और इसलिए राष्ट्रीय सवाल के हल के लिए भिन्न तरीक़े अपनाने पर बाध्य करते हैं। ऑस्ट्रिया में संसदीय प्रणाली विद्यमान है, और मौजूदा समय में कोई भी काम बिना संसद के संभव नहीं है। लेकिन ऑस्ट्रिया में संसदीय और विधायी काम में राष्ट्रीय पार्टियों के बीच गंभीर संघर्ष के कारण ठप हो जाते हैं। इससे ऑस्ट्रिया के समय-समय पर उभरने वाले उस राजनीतिक संकट के बारे में पता चलता है जिससे ऑस्ट्रिया लंबे समय से जूझ रहा है। इसलिए, ऑस्ट्रिया में राष्ट्रीय सवाल राजनीतिक गतिविधियों में हलचल पैदा करता है। यह बहुत अहम सवाल है। इसलिए इसमें हैरत की कोई बात नहीं है कि ऑस्ट्रियाई सामाजिक-जनवादी राजनीतिज्ञ राष्ट्रीय टकराव को हल करने के लिए कोई न कोई रास्ता निकालना चाहें।…

 रूस में ऐसी बात नहीं है। पहली बात तो यह कि “रूस में कोई संसद नहीं है, इसके लिए ईश्वर को धन्यवाद।” दूसरी बात जो बहुत अहम भी हैयह है कि रूस में राष्ट्रीय नहीं बल्कि कृषि का सवाल केंद्र में है। इसलिए रूसी समस्या का भविष्य और राष्ट्रों की “मुक्ति” की समस्या भी कृषि के सवाल के हल … से जुड़ी हुई है। (स्तालिन, ‘मार्क्सवाद और जातीयताओं का प्रश्न’, उपरोक्त, पन्ना 34, शब्दों पर ज़ोर हमारा)

 ऑस्ट्रि‍या में राष्ट्रीय प्रश्न ऐसे रूप में था कि यहाँ ना तो कोई राष्ट्र किसी दूसरे का उपनिवेश ही था और ना ही यहाँ सामंती संबंध, या कृषि प्रश्न था।

काउत्स्की का कहना है कि कई बहु-राष्ट्रीय राज्यों में एक राष्ट्र का स्पष्ट दबदबा होता है और यह भी संभव है कि किसी बहु-राष्ट्रीय देश में किसी एक राष्ट्र का स्पष्ट दबदबा ना हो। उसका कहना है,

 “अपनी बारी में रूस में चीज़ें ऑस्ट्रिया से भिन्न भी हैं और थोड़ी सरल भी हैं। रूस अनेकों राष्ट्रीयताओं वाला एक बड़ा केंद्रीकृत राज्य है, परंतु इसका मुख्य केंद्र (Core) बड़ी आबादी वाले रूसियों से बनता है और अन्य राष्ट्रीयताएँ इस सल्‍तनत के हाशिए पर बसी हुई हैं।

 यूरोपीय रूस की आबादी में 8 करोड़ 40 लाख रूसी, 80 लाख पोल, 50 लाख यहूदी, 30 लाख लिथुआनियाई, लगभग इतने ही फिन, 20 लाख जर्मन और 10 लाख रोमानियाई और आर्मेनियाई हैं। रूस इन राष्ट्रों को बिना किसी समस्या के ख़ुदमुख़्त‍ियारी दे सकता है। वास्तव में, ये राष्ट्र, जिस हद तक जुड़े हुए प्रदेशों में रहते हैं, मुख्य देश के अस्तित्व के लिए किसी भी तरह ख़तरा खड़ा किए बिना, इससे अलग भी किए जा सकते हैं।

परंतु ऑस्ट्रिया में स्थिति भिन्न है। यह अपने राष्ट्रों की बड़ी संख्या – कुल 9 या 11, यदि चेक के साथ ही स्लोवाकों को और क्रोएटों के साथ ही सर्बों को शामिल कर लें – के कारण स्विट्ज़रलैंड और बेल्जियम से भिन्न है।… ऑस्ट्रिया की स्थिति रूस से भी भिन्न है कि यहाँ कोई भी राष्ट्र संख्या पक्ष से दूसरे राष्ट्रों से विचारणीय लाभ की हालत में नहीं है और कि कोई भी राष्ट्र सल्‍तनत का केंद्र नहीं बनता। (इस मामले में बहु-राष्ट्रीय भारत की स्थिति ऑस्ट्रिया जैसी है। – लेखक) यहाँ जर्मनों की कुल संख्या 1 करोड़ 10 लाख, हंगेरियन (मग्यार) 90 लाख, चेक (स्‍लोवाकों सहित) 80 लाख, पोल और रुबेनियन 40-40 लाख, स्लोवेनियाई 10 लाख हैं। बाद वाले राष्ट्र परिधि पर बसते हैं, लेकिन तीन बड़े राष्ट्र – जर्मन, मग्‍यार और चेकोस्लोवाकियाई, सल्‍तनत के केंद्र में फैले हुए हैं। वियाना के क़रीब ब्रातिस्लावा में ये आपस में टकराती हैं। यूरोप का कोई भी बहु-राष्ट्रीय राज्य, इसमें शायद यूरोपीय तुर्की एक अपवाद है, राष्ट्रीयताओं के संबंध में इतनी मुश्किल स्थिति में नहीं है। यह अनूठे बहुराष्ट्रीय राज्य की नुमाइंदगी नहीं करता, क्योंकि यहाँ कोई भी अनूठे बहु-राष्ट्रीय राज्य नहीं हैं – प्रत्येक बहुराष्ट्रीय राज्य अपने आप में एक अलग मामला है”। (कार्ल काउत्स्की, ‘नेशनेलिटी एंड इंटरनेशनेलिटी’, उपरोक्त, पन्ना 150-151)

इस बात की पुष्टि लेनिन भी करते हैं। रूस और ऑस्ट्रि‍या में राष्ट्रीय मसले की तुलना करते हुए लेनिन लिखते हैं कि पहले ऑस्ट्रि‍या में,

 “पहली बात यह है कि हम पूँजीवादी-जनवादी क्रांति के पूरी होने का बुनियादी सवाल उठाते हैं। ऑस्ट्रिया में यह क्रांति 1848 में आरंभ हुई और 1867 में पूरी हुई। तब से, लगभग पचास वर्ष से वहाँ जिस चीज़ का प्रभुत्‍व रहा है, वह कुल मिलाकर पूर्णत: स्‍थापित पूँजीवादी संविधान है जिसके आधार पर मज़दूरों की एक क़ानूनी पार्टी क़ानूनी ढंग से काम कर रही है।

            इसलिए ऑस्ट्रिया के विकास की अंतर्निहित परिस्थितियों में (अर्थात ऑस्ट्रिया में आम तौर पर, और उसकी अलग-अलग राष्ट्रों में ख़ास तौर पर, पूँजीवाद के विकास के दृष्टिकोण से) कोई ऐसे कारक नहीं हैं, जिनकी वजह से ऐसी छलाँग मारना संभव हो, जिसका एक परिणाम राष्‍ट्रीय रूप से स्‍वतंत्र राज्‍यों की स्‍थापना हो।…

            दूसरे, जिस प्रश्‍न पर हम विचार कर रहे हैं, उसकी दृष्टि से ऑस्ट्रिया की राष्ट्रीयताओं तथा रूस की राष्ट्रीयताओं के सर्वथा भिन्‍न पारस्‍परिक संबंध बहुत महत्‍व रखते हैं। केवल यही बात नहीं है कि ऑस्ट्रिया बहुत समय तक एक ऐसा राज्‍य रहा, जिसमें जर्मन लोगों की प्रधानता रही, बल्कि बात यह भी थी कि ऑस्ट्रियाई जर्मन समूचे तौर पर जर्मन राष्ट्र में भी अगुआई का दावा करते थे। शायद रोज़ा लक्‍ज़ेमबर्ग (जिन्‍हें देखने में तो पिटी-पिटाई बातों, घिसी-पिटी चीज़ों और अमूर्त बातों से बहुत चिढ़ है…) यह याद करने की कृपा करेंगी कि 1866 के युद्ध ने इस “दावे” की धज्जियाँ उड़ा दीं। ऑस्ट्रिया में जिस जर्मन राष्ट्र की प्रधानता थी, उसने अपने को उस स्‍वतंत्र जर्मन राज्‍य के घेरे से बाहर (ज़ोर मूल में – लेखक) पाया, जिसका निर्माण अंतत: 1871 में संपन्‍न हुआ। दूसरी ओर हंगरीवालों की एक स्‍वतंत्र राष्ट्रीय राज्‍य बनाने की कोशिश बहुत पहले, 1849 में रूसी भूदास सेना के हमलों की वजह से निष्‍फल हो चुकी थी।

            इस प्रकार एक विचित्र परिस्थिति पैदा हो गई : हंगरीवालों की तरफ़ से, और फिर चेकों की तरफ़ से भी, ऑस्ट्रिया से अलग होने की नहीं, बल्कि इसके विपरीत, ठीक राष्ट्रीय स्‍वतंत्रता को बनाए रखने के उद्देश्‍य से, जो अधिक ख़ूँख़ार तथा शक्तिशाली पड़ोसियों द्वारा पूरी तरह कुचली जा सकती थी, उसकी अखंडता को बनाए रखने की कोशिश की गई। इस विचित्र परिस्थिति के कारण ऑस्ट्रिया ने एक द्विकेंद्रीय (दोहरे) राज्‍य का रूप धारण कर लिया और इस समय वह एक त्रिकेंद्रीय (तेहरे) राज्‍य (जर्मन, हंगेरियाई तथा स्‍लाव) में रूपांतरित हो रहा है।

             क्‍या रूस में इस प्रकार की कोई बात है? क्‍या हमारे देश में बदतर राष्ट्रीय उत्‍पीड़न के ख़तरे से बचने के लिए ग़ैर-रूसियों की तरफ़ से रूसियों के साथ एकता स्‍थापित करने की कोई कोशिश हुई?

            राष्ट्रीयताओं के प्रश्न के बारे में रूस की विशिष्ट परिस्थितियाँ उन परिस्थितियों से बिल्कुल उल्टी हैं, जो हम ऑस्ट्रिया में पाते हैं। रूस एक ऐसा राज्य है, जिसका राष्ट्रीय दृष्टि से केवल एक ही समरूप केंद्र है – रूस। (लेनिन, ‘जातियों का आत्मनिर्णय का अधिकार’, उपरोक्त, पन्ना 19-20, शब्दों पर ज़ोर हमारा)

            आगे काउत्स्की लिखता है कि ऑस्ट्रि‍या में अमीर राष्ट्र भी बसते हैं और ग़रीब भी। उसका कहना है,

            “ज़्यादातर पूँजीपति जर्मनों में से हैं – जो कि ऑस्ट्रिया में पैदा किए जाते, यहाँ तक कि जो अधिशेष मूल्य दूसरे राष्ट्रों द्वारा पैदा किया जाता है, को झपट लेते हैं।” (उपरोक्त, पन्ना 155)

            ऑस्ट्रियाई अर्थव्यवस्था में जर्मन पूँजीपतियों के दबदबे की तरह ही, भारत की पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में गुजराती और मारवाड़ी पूँजीपतियों का दबदबा है। फोर्ब्स अमीरों की सूची 2019 के अनुसार, भारत के 100 सबसे अमीरों में से 80 प्रतिशत गुजराती हैं। यदि इनमें मारवाड़ी भी जोड़ लिए जाएँ, तो यह प्रतिशत और ऊपर चला जाता है।

            बहु-राष्ट्रीय ऑस्ट्रि‍या के भविष्य के बारे में काउत्स्की कहता है,

            “ऑस्ट्रिया के शक्ति संबंधों को देखते हुए, इसका पतन नज़र नहीं आता। परंतु यह भी उतना ही सच है कि इसके राष्ट्रीय संबंध अरक्षणीय बन चुके हैं; वे समस्त सामाजिक और राजनीतिक विकास को बाधित कर रहे हैं।” (उपरोक्त)

            काउत्स्की द्वारा यह लेख लिखे जाने के क़रीब 10 साल बाद ऑस्ट्रि‍या-हंगरी सल्‍तनत का पतन हो गया और वह अलग-अलग राष्ट्रीय राज्यों और बहु-राष्ट्रीय राज्यों में विभाजित हो गई।

दो तरह के राष्ट्र

कामरेड स्तालिन राष्ट्रों को दो क़िस्‍मों में बाँटते हैं – बुर्जुआ राष्ट्र और समाजवादी राष्ट्र। स्तालिन लिखते हैं,

            “ऐसे राष्ट्र बुर्जुआ राष्ट्र कहलाते हैं। उदाहरण के तौर पर फ़्रांसीसी, ब्रिटिश, इतालवी, उत्तरी-अमरीकी और ऐसे अन्य राष्ट्र। इसी तरह हमारे देश में सर्वहारा अधिनायकत्व और सोवियत व्यवस्था की स्थापना से पहले रूसी, यूक्रेनी, तातार, आर्मेनियाई, जॉर्जियाई और रूस में अन्य राष्ट्र बुर्जुआ राष्ट्र ही थे। स्वाभाविक रूप से, ऐसे राष्ट्रों का भाग्य पूँजीवाद के भाग्य से जुड़ा हुआ है; पूँजीवाद के पतन के साथ, ऐसे राष्‍ट्र भी लाज़िमी ही परिदृश्य से विदा हो जाते हैं।… बुर्जुआजी और इसकी राष्ट्रवादी पार्टियाँ इस दौर में ऐसे राष्ट्रों की मुख्‍य अगुआ ताक़त होती हैं।…

लेकिन यहाँ अन्य राष्ट्र भी हैं। ये नए, सोवियत राष्ट्र हैं, जिन्होंने रूस में पूँजीवाद को उखाड़ फेंकने, बुर्जुआजी और इसके राष्ट्रवादी दलों के ख़ात्मे के बाद, सोवियत व्यवस्था की स्थापना के बाद, पुराने बुर्जुआ राष्ट्रों के आधार पर विकसित हुई हैं तथा आकार ग्रहण किया है।

            मज़दूर वर्ग और इसकी अंतरराष्ट्रीय पार्टी वह ताक़त है जो इन नए राष्ट्रों को मजबूत करती है और उनका नेतृत्व करती है। पूँजीवाद के अवशेषों के ख़ात्‍मे के लिए राष्ट्रों के भीतर मज़दूर वर्ग और मेहनतकश किसानी का गँठजोड़ क़ायम किया जाता है ताकि विजयी तौर पर समाजवाद का निर्माण हो सके; राष्ट्रीय उत्पीड़न के अवशेषों के ख़ात्मे के लिए ताकि राष्ट्रों और राष्ट्रीय अल्पसंख्यकों में बराबरी हो सके और वे आज़ादी से विकास कर सकें; राष्ट्रवाद के ख़ात्मे के लिए ताकि लोगों में दोस्ती हो सके और अंतरराष्ट्रीयवाद मज़बूती के साथ स्थापित हो सके; क़ब्‍ज़ों की नीति और क़ब्‍ज़ों के लिए युद्धों के विरुद्ध संघर्ष में, साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष में, सभी दबे-कुचले और ग़ैर-बराबर राष्‍ट्रों का संयुक्त मोर्चा क़ायम किया जाता है – इन राष्ट्रों का इस तरह का आत्मिक, और सामाजिक व राजनीतिक रंग-रूप होता है।

            ऐसे राष्ट्र समाजवादी राष्ट्र कहलाते हैं।” (स्तालिन, ‘लेनिनिज़्म एंड नेशनल क्‍वेश्‍चन’, कॉमरेड मेश्‍कोव, कोवलचुक व अन्य को जवाब, 18 मार्च 1929, अंग्रेज़ी से अनुवाद हमारा)

वर्ग बनाम राष्ट्र

            वर्ग व राष्ट्र सामाजिक विकास के अलग-अलग पड़ावों में उत्‍पन्‍न हुए। हालाँकि राष्ट्र मानव समाज के वर्गों में विभाजन के बहुत बाद में अस्तित्व में आए, लेकिन राष्ट्रों का ख़ात्‍मा, वर्गों के ख़ात्‍मे के साथ अटूट रूप में जुड़ा हुआ है। आज संसार अनेकों राष्‍ट्रों में विभाजित है और आगे ये राष्ट्र वर्गों में विभाजित हैं। विभिन्न देशों, राष्ट्रों की वर्ग सरंचना, यहाँ की उत्पादन शक्तियों के विकास के स्तर के अनुसार अलग-अलग है।

            राष्ट्र व वर्ग सामाजिक विकास के वस्तुगत अमल के आधार पर अस्तित्व में आए, उनका उभार एवं विकास उत्पादन शक्तियों और उत्पादन संबंधों द्वारा ही निर्धारित होता है। मार्क्स और एंगेल्स ने दर्शाया कि वर्गों का अस्तित्व सामाजिक उत्पादन के विकास के कुछ निश्चित दौरों से बँधा हुआ है। उत्पादन शक्तियों की वृद्धि ने, जिसके कारण अधिशेष उपज और श्रम का सामाजिक विभाजन अस्तित्व में आया तथा उत्पादन के साधनों का निजी स्वामित्व स्थापित हुआ, वर्गों की रचना की राह साफ़ की। आदिम साम्यवाद के पतन के कारण मानव समाज के वर्गों में विभाजन का उदय हुआ।

वर्गों को परिभाषित करते हुए लेनिन लिखते हैं,

            “वर्ग लोगों के बड़े समूह हैं, ऐतिहासिक रूप से निर्धारित सामाजिक उत्पादन की प्रणाली में हासिल अपने स्थान, उत्पादन के साधनों के साथ अपने संबंधों (ज़्यादातर मामलों में क़ानून द्वारा सूत्रबद्ध और निर्धारित होते हैं), श्रम के सामाजिक संगठन में अपनी भूमिका और नतीजतन सामाजिक धन में अपने हिस्से के आयामों और इसे हासिल करने के ढंग द्वारा एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। वर्ग लोगों के समूह हैं जिनमें से एक, सामाजिक अर्थव्यवस्था में अपने अलग स्थान के कारण दूसरे का श्रम हड़प सकता है।” (लेनिन, ‘ए ग्रेट बिगिनिंग’, कलेक्टिड वर्क्‍स, खंड 29, पन्ना 421)

            शुरू में राष्ट्र उभर रही बुर्जुआजी के नेतृत्व में अन्य मेहनतकश जनता के सामंतवाद के विरुद्ध संघर्ष के कारण अस्तित्व में आए। सामाजिक उत्पादन के विकास ने भी इसमें अपनी भूमिका निभाई। सामाजिक उत्पादन के विकास ने लोगों में आर्थिक संबंध मज़बूत किए, आबादी की सघनता में वृद्धि करके उसे सामाजिक समुदायों के बड़े रूप में एकजुट होने के क़ाबिल बनाया। इनके उत्थान के परिणामस्वरूप सामंती फूट का ख़ात्‍मा हुआ। एक बोली बोलने वाले एक राष्ट्र में एकजुट लोगों की आबादी वाले इलाक़े राजनीतिक तौर पर एकजुट हुए, देश के अलग-अलग हिस्सों में आर्थिक संबंध परिपक्व हुए, एक राष्ट्रीय बाज़ार अस्तित्व में आया। राष्ट्रों का जन्म हुआ। राष्ट्रों का गठन एक बोली बोलने वाली आबादी वाले इलाक़ों के एकीकरण की आर्थिक आवश्यकता के प्रभाव के तहत हुआ।

            वर्गों और लोगों में जो साझा है, वह यह है कि वे लोगों के भिन्न रूप में क़ायम समुदाय हैं। उनकी जड़ें समाज के भौतिक जीवन में हैं और इसके साथ ही यह तथ्य चेतना में भी झलकता है। वर्गीय समूह मुख्य रूप से अपनी आर्थिक हैसियत के कारण भिन्न होते हैं। परंतु वर्ग केवल आर्थिक संरचना नहीं होता, बल्कि सामाजिक संगठन भी होता है। किसी एक वर्ग के लोग अपने रहन-सहन के ढंग और परिस्थितियों के अनुसार कम या ज़्यादा ख़ास वर्ग चेतना तथा वर्गीय मनोविज्ञान की ख़ासियतों को जन्म देते हैं। मार्क्स का कहना है,

“संपत्ति के विभिन्न रूपों के आधार पर और, अस्तित्व की सामाजिक परिस्थितियों के भिन्न तथा विशेष तरीके़ से बनी भावनाओं, भ्रमों, सोचने के तरीक़ों और जीवन के प्रति विचारों की एक पूरी अधिरचना खड़ी होती है। समूचा वर्ग इन्हें अपने भौतिक आधारों और संबंधित सामाजिक संबंधों में से निर्मित करता है।” (कार्ल मार्क्स, फ्रे़डरिक एंगेल्स, चुनिंदा रचनाएँ, भाग पहला, पन्ना 421, अंग्रेज़ी से अनुवाद हमारा)

 राष्ट्र भी वर्गों की तरह समाज की भौतिक जीवन परिस्थितियों के एक निश्चित समूह से संबंधित हैं। एक राष्ट्र के विशेष भौतिक तत्व, साझा इलाक़ा और आर्थिक जीवन का एक समुदाय होता है। जो कि राष्ट्रों के सभी हिस्सों को एक समुच्‍चय में बाँधता है। एक राष्ट्र को उसके आत्मिक जीवन के ख़ास लक्षणों, ख़ास राष्ट्रीय विलक्षणताओं, एक भाषा या बोली तथा राष्ट्रीय चेतना के ज़रिए से भी प्रकट किया जा सकता है।

 समाज या एक राष्ट्र का वर्गों में विभाजन और मानवता के राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं आदि में विभाजन की विभिन्न ऐतिहासिक जड़ें हैं। फिर भी राष्ट्रों और वर्गों के बीच संबंधों को एक-दूसरे से अलग करके नहीं समझा जा सकता। राष्ट्रों की संरचना, राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के विकास तथा राष्ट्रीय राज्यों के बनने की प्रक्रिया को वर्गों को ध्यान में रखे बिना नहीं समझा जा सकता।

एक बुर्जुआ समाज में एक राष्ट्र के भीतर वर्गों के बढ़ रहे वैर-विरोध और इसके साथ ही मेहनतकश जनता का मज़दूर वर्ग और इसके हिरावल दस्ते के इर्द-गिर्द इकट्ठा होना, समाजवादी क्रांति की राह को साफ़ करते हैं, जिसके ज़रिए बुर्जुआ राष्ट्र समाजवादी राष्ट्रों में बदलते हैं। एक राष्ट्र का परस्पर विरोधी वर्गों में तीखा विभाजन और उनके बीच तीखे टकराव का अर्थ यह नहीं की एक राष्ट्र का अस्तित्व ही नहीं रहा।

एक राष्ट्र के अंदर तीखे संघर्ष में जुटे परस्पर विरोधी वर्गों के अस्तित्व का अर्थ यह नहीं होता कि एक राष्ट्र का लोगों के एक स्थिर समुदाय के रूप में अस्तित्व नहीं रहा। वर्गों के बीच विरोध भले ही कितने भी तीखे क्यों ना हों, राष्ट्र लुप्त नहीं हो जाता। जिस तरह प्रत्येक वर्ग की अपनी वर्ग विचारधारा और मनोविज्ञान होता है, उसी तरह एक राष्ट्र का साझा राष्ट्रीय मनोविज्ञान भी होता है।

सम्पूर्ण लेख के लिए पीडीएफ लिंक देखें : 

https://muktimargmag.files.wordpress.com/2020/09/rashtriya-prashan-aur-marxwaad-hindi-translation-1.pdf

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