जिस डिजिटल इंडिया की चर्चा है उसकी संकल्पना करने वाले का नाम था राजीव गाँधी

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राजीव गांधी के जन्मदिन 20 अगस्त सद्भावना दिवस पर विशेष—

बेशक आप राजीव गांधी से असहमत हो सकते हैं पर उनसे प्यार किये बिना नहीं रह सकते

नेहरू ने जिस आत्मनिर्भर एवं समाजवादी भारत की परिकल्पना की थी राजीव गांधी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में उसे मूर्त रूप प्रदान करने की कोशिश की। आज जिस डिजिटल इंडिया की चर्चा है उसकी संकल्पना उन्होंने ही तैयार की थी, इसीलिए उन्हें डिजिटल इंडिया का आर्किटेक्ट एवं सूचना तकनीक और दूर संचार क्रांति का जनक भी कहा जाता है।
युवाओं के सशक्तिकरण एवं सियासत तथा राष्ट्र निर्माण में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए मताधिकार की उम्र 21 से हटाकर 18 करने का श्रेय भी राजीव गांधी के हिस्से में ही जाता है। उन्होनें कंप्यूटर क्रांति की शुरुआत कर उसकी पहुंच आमजन तक कर दी जिसका लाभ कोविड 19 संकट काल में पूरे देश नें उठाया।गंगा के निर्मलीकरण को अमली जामा पहनाने के लिए योजनाबद्ध तरीके से उनकी ही सरकार ने काम शुरू किया था जो आज विस्तारित होते हुए लूट-खसोट का पर्याय बन गयी है। विरोधी पार्टियों के कम्प्यूटरीकरण के विरोध एवं भारत बंद के आवाहन के बावजूद 1988 में दिल्ली में पहला ए टी एम राजीव गांधी ने ही उद्घाटित किया था।आज बिना इसके सामान्य जीवन की कल्पना ही बेमानी है।
ये वही राजीव गांधी है जिन्होंने पंचायती राज व्यवस्था का पूरा प्रस्ताव नए तरीके से इस मकसद के लिए तैयार कराया जिससे सत्ता का विकेंद्रीकरण हो और गरीब,मजलूम व वंचित समुदाय को अधिकतम लाभ मिल सके।जिस वैज्ञानिक शिक्षा और सोंच की बात हम करते है उसे विस्तारित और आधुनिकीकृत करने की योजना 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति द्वारा राजीव गांधी ने ही की। नवोदय विद्यालय के शिल्पी भी वहीं हैं। शिक्षा का विस्तार करने के लिए देशभर में उन्होंने इन विद्यालयों का जाल बिछाया। राजीव गांधी वो सीढ़ी है जिस पर चढ़कर भारत न केवल दूरदराज गांव तक पहुंचा वल्कि अति आधुनिक भी हुआ।आज उनके इन्ही कामों को नकार कर स्वयं श्रेय लेने की होड़ सरकारों में देखी जा सकती है।
प्रारम्भिक दिनों में बेदाग छवि के होने के नाते उन्हें मिस्टर क्लीन कहा जाता था।विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उन्हें बोफोर्स घोटाले में घसीटने की कोशिश की तब भी देश की अधिकांश जनता और विपक्षी दलों के सदस्य उनकी आलोचना करने से बचते थे।जार्ज फ़र्नान्डिस कहते थे कि सज्जन राजीव गांधी घाघ कांग्रेसियों में फंस गए हैं और वे राजीव गांधी की निंदा करने से गुरेज करते थे।। सर्वविदित है कि अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन रक्षा का जो तरीका बिना श्रेय लिए राजीव जी ने निकाला ऐसे मानवीय उदाहरण भारतीय राजनीति में बिरले ही मिलते हैं। उनकी मृत्यु के बाद बाजपेयी जी ने इस घटना का उल्लेख किया और कई बार उन्हें कहते सुना गया कि ये मेरा जीवन राजीव जी की कृपा का फल है। ब्रिटेन यात्रा के दौरान प्रसिद्ध इतिहासविद प्रो. इरफान हबीब की योग्यता और वैज्ञानिक चिंतन के बारे में उन्हें जानकारी मिली।भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का चेयरमैन बनने का मसला जब उनके सामने आया तो वैचारिक भिन्नता के बावजूद उन्होंने इरफान हबीब को चेयरमैन बनाया। राजीव गांधी संस्थानों की स्वायत्तता को बनाये रखने को लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए आवश्यक समझते थे।आज विचारों की भिन्नता शत्रुता में बदलती दिख रही है।
राजीव गांधी बेहतरीन प्रधानमंत्री के साथ साथ बेहतर इंसान और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी भी थे।वे सामाजिक सद्भावना तथा सह-अस्तित्व के सिद्धांत के हामी थे।जो भी उनसे मिलता था उनके मृदुल व्यवहार एवं सहजता का मुरीद हुए बिना नही रहता था। इसी लिये सरकार ने उनकी याद में सद्भावना पखवाड़ा मनाना तय किया था पर आजकल इस पखवाड़े को भी ग्रहण लग गया है।
बात राजीव गांधी के प्रधानमंत्री कार्यकाल के अंतिम दिनों की है। सुल्तानपुर का निवासी होने के कारण उनसे मिलना बड़ा आसान था और कई बार तो उनका सहृदय और निर्छल होना भी मुलाकात में बहुत सहायक साबित होता था ।मुझे अनेक बार उनसे मिलने का मौका मिला।ऐसे ही एक बार सुल्तानपुर डाक बंगले में उनसे मिलने का अवसर प्राप्त हुआ और बातों-बातों में जब उन्हें पता चला कि मैं इतिहास का विद्यार्थी हूँ और मेरी रुचि और अध्ययन आजादी के आंदोलन में है तो बरबस उन्होंने कहा कि क्यों न 1857 की क्रांति में उत्तर प्रदेश की जनता की भागीदारी का पुनर्मूल्यांकन किया जाए।उन्होंने ये भी कहा कि सुल्तानपुर का गाँव गाँव 1857 की क्रांति के संस्मरणो में भरा पड़ा है ।मैंने कई बार अपने मंचो पर इसका बखान सुना है और कुछ जानने की कोशिश भी की है। बहुत बार सोंचा की इस पर कुछ करना चाहिए लेकिन व्यस्तता के कारण ये मेरी प्राथमिकता में न आ सका।आपसे मुलाकात से फिर मेरी ये ख्वाहिश जाग उठी।आप कोई योजना बनाएं और विद्वानों से बात करें, किसी तरह की कमी आड़े हाथों नही आएगी।मैने कहा कि एक विनम्र सुझाव देना चाहता हूँ कि 1857 की क्रांति में मुसलमानों के रोल पर बातें करें तो कैसा रहेगा क्योंकि आज़ादी की लड़ाई में उनकी भागीदारी पर इतिहासकारों ने बहुत ही कम फोकस किया है।
राजीव जी का बड़ा ही वैज्ञानिक और सधा हुआ जवाब था कि डॉक्टर साहब देश की कोई भी ऐसी विधा नही है जो मुसलमानों के योगदान के बगैर मुकम्मल हो सके और आज़ादी की लड़ाई तो बिल्कुल नही। आधुनिक भारत की जो परिकल्पना है वो उनके बगैर अधूरी है।परन्तु हमें इतिहास को समग्रता में देखना होगा कि कैसे धर्म,जाति और भाषा की विभिन्नता के बावजूद सब लोग संकट का सामना एक साथ मिलकर करते है और यही साझी विरासत हमारी ताकत और दुनिया में भारत की पहचान है।इसे बचाये रखने का मतलब भारतीयता को बचाये रखना है।ये थी उनकी भारतीय समाज और इतिहास की समझ । मैं मंत्रमुग्ध होकर उनकी बात सुनता रहा और अब मेरे पास जवाब देने के लिए शब्द ही नही बचे थे।
फिर राजीव जी के एक प्रस्ताव से में चौक पड़ा कि इसे जिलेवार लिखा जाए और सुल्तानपुर का इतिहास लेखन आपके हवाले।हमने इसपर काम करना शुरू किया पर समय की गति कौन जानता है,राजीव जी नही रहे।21 मई 1991को उनकी हत्या हो गयी। मैं भी अपनी रोजी रोटी कमाने की व्यस्तता में इतना खो गया की यह काम अधूरा रह गया।इधर कुछ दिनों से हमने इस काम की नए सिरे से रूपरेखा बनानी शुरू की है क्योंकि मुझे लगता है कि राजीव गांधी की पैनी निगाहों ने ये भांप लिया था कि आने वाला वक़्त तथ्यपरक इतिहास लेखन के लिए संकट भरा होगा। उनकी ये सोंच आज सच साबित हो रही है और ऐतिहासिक तथ्यों को नकारने की प्रवित्ति तेजी से बढ़ रही है।उनकी सोंच को अमल में लाना एक कर्ज़ है मुझ पर राजीव जी का,जिसे उतारने के लिए मैं आजकल काम कर रहा हूँ।पूर्वी उत्तर प्रदेश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में नवजवान इतिहासकारों की एक पौध इन दिनों मौजूद है जो तमाम झंझावतों के बावजूद वैज्ञानिक एवं तथ्यपरक इतिहास लेखन में रुचि रखती है।राजीव यही तो चाहते थे कि इतिहास लेखन में साइंटिफिक टेम्पर विद्यमान हो।
तमाम उपलब्धियों के बाद भी ये तथ्य भी विचारणीय है कि राजीव गांधी बेहतर इंसान होने के बावजूद शुरुआती दौर में कुछ स्वार्थी राजनीतिक तत्वों से घिर गए थे जिन्होंने बाबरी मस्जिद/रामजन्मभूमि और शाह बानो केस में उन्हें दिग्भ्रमित किया।उनकी रुचि राजनीति में नहीं थी,परिणामस्वरूप उनके साथ कुछ अवसरवादी यहां तक कि सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे लोग भी जुट गए थे जिन लोगों नें अन्य कई ऐसे निर्णय को भी प्रभावित किया जिससे भारतीय राजनीति की दशा और दिशा बदल गयी।बाद के दिनों में राजीव जी में संसदीय राजनीति की समझ जैसे-जैसे बढ़ती गयी उन्होंने ऐसे तत्वों से किनारा कर लिया। बेशक आप राजीव गांधी से असहमत हो सकते हैं पर उनसे प्यार किये बिना नहीं रह सकते।
मेरी तरफ से सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि उनसे किये गए वादे को पूरा करें**

डॉ. मोहम्मद आरिफ़

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