राहुल गाँधी और कांग्रेस को भी पूँजीपतियों के हितों की ही रखवाली करना है तो फिर भाजपा आखिर क्यों बुरी है?

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राहुल गांधी क्या हैं? व्यक्तिगत तौर पर वे “नेकदिल” इंसान हैं। उनका अपना परिवार (सोनिया, राहुल और प्रियंका) कमोबेश “सहृदय” लोगों का समूह है। लेकिन वैचारिक और राजनीतिक तौर पर वे और उनका परिवार क्या है? इस अर्थ में इस बात पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिये कि वे और उनका पूरा कुनबा भारत के बड़े पूंजीपति वर्ग की सबसे पुरानी और विश्वस्त पार्टी (कांग्रेस) की सबसे नई पीढ़ी के और पूंजीवाद के आर्थिक संकट जनित सबसे बुरे दौर के अग्रणी व योग्य नेता हैं, जैसा कि पूंजीवादी लूट के इस भयावह दौर के कुपरिणामों से पूंजीवाद को बचाने के लिए होने चाहिये। भले ही आज की कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष कोई और हो। वास्तविक नेता कोई हो और पार्टी अध्यक्ष कोई और हो, हमारे लिए यह कोई बुनियादी आलोचना का विषय नहीं है।

असली प्रश्न क्या है? यही कि पूंजीवादी लूट-खसोट व शोषण को खत्म करने एवं आम अवाम की जिंदगी में बुनियादीसुधार की उनसे उम्मीद पालना तो बचकानी बात है ही, लेकिन क्या आज के दौर में “सत्ता की दौड़ में उनके राजनीतिक उत्थान” से यह सीमित लक्ष्य भी हासिल किये जाने की उम्मीद पाली जा सकती है कि वे देश को 2014 के पहले के दौर में ले जा सकते हैं?

2014 के बाद का समय 1991 की निरंतरता में भारतीय व विश्व की पूंजीवादी अर्थव्यस्था में हुए विकास का ही परिणाम है, इसलिए 1991 के पहले के दौर में ले जाने की बात की राहुल गांधी से उम्मीद करना हमारी कल्पना से और भी बाहर है। खासकर इसलिए कि राहुल गांधी ने अभी तक “दिखावे के लिए भी” 1991 में उनकी ही पार्टी द्वारा शुरू की गई नवउदारवादी नीतियों की आलोचना नहीं की है। तो फिर उनके द्वारा 60, 70 और 80 के दशक के भारतीय पूंजीवाद के दौर में भारत को ले जाने की बात तो बस चांद को धरती पर उतारने की कपोल-कल्पना ही है या रात को दिन कहने वाली बात ही मानी जा सकती है। यह सच है कि कुछ लोग हैं जो उनमें “नेहरू की छवि” देखते है और उनमें से कुछ अतिउत्साही लोग राहुल के कर कमलों से नेहरू के युग के पुनः सूत्रपात का दिवास्वप्न भी देखने लगे हैं! ऐसा कभी नहीं होने वाला है। और होना भी नहीं चाहिए। यह प्रतिकयावादी कदम होगा जो सर्वप्रथम नेहरू के बाद उत्पादक शक्तियों में हुए विकास को निरस्त व नष्ट करने की मांग करता है। इसका असली जवाब है : आज के भारत की परिस्थिति या तो सर्वहारा वर्ग एवं अन्य मेहनतकश वर्गों की संयुक्त सत्ता को जन्म देगी या फिर सर्वनाश लाएगी।

तो फिर इसका क्या अर्थ है कि राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी “भारत जोड़ो यात्रा” के नाम पर पूरे देश में मोदी के खिलाफ बिगुल बजाने निकले हैं? इसका राजनीतिक निहितार्थ वास्तव में क्या है? यही कि मजदूर-मेहनतकश वर्ग और पूंजीपति वर्ग के बीच होने वाली फाइनल टक्कर, जिसकी संभावना आर्थिक संकट के लगातार अटल बने रहने और गहराते जाने के कारण बलवति हो चुकी है, उससे पूंजीवादी व्यवस्था को बचाने की यह कवायद भर है। इस संकट की घड़ी में बड़े पूंजीपति वर्ग का एक बार फिर से विश्वासपात्र बनने की बढ़ी हुई चाहत ही राहुल गांधी को मोदी और आरएसएस से इस तरह के टकराव की ओर प्रेरित कर रही है।

दूसरी तरफ, भारत में मोदी शासन से अत्यधिक भयभीत लोगों की जमात है जो कल तक इस खतरे से आंखें मूंदे हुए थे। नतीजा यह है कि मोदी के नेतृत्व में भारत में फासीवादी शासन की पूर्ण स्थापना (हालांकि यह पहले ही लगभग पूरा हो चुका है) से भयभीत “वामपंथी’ (क्रांतिकारी खेमा सहित) खेमे के लोग भी” , जो कल तक या आज भी इस खतरे से लड़ने के लिए खुद जिम्मेवारी लेने से कतरा रहे हैं, आज चुनौतियों से ‘लोहा लेते’ और “निर्भीक” दिख रही कांग्रेस और राहुल गांधी के पाले में खिसकने लगे हैं।

जो परिस्थिति प्रकट हो रही उसकी लाक्षणिकता यह है कि चिरस्थाई आर्थिक संकट जनित और परिपक्व होती वस्तुगत क्रांतिकारी परिस्थिति में जब मज़दूर वर्ग के नेतृत्व में शोषितों-उत्पीड़ितों की पूंजीवाद और खासकर बड़े पूंजीपति वर्ग से पूर्ण सामाजिक बदलाव के लिए “जबरदस्त टक्कर” का समय आ रहा है, तो आत्मगत शक्तियों की तैयारी और उनके केंद्रीकरण के अभाव की वजह से ठीक यही “वस्तुगत क्रांतिकारी परिस्थिति” कांग्रेस जैसी प्रतिक्रियावादी शक्ति को “राहुल गांधी की व्यक्तिगत नेकदिली और सॉफ्ट व्यक्तित्व के साये” में उभरने के मौके में परिवर्तित हो रही है। और इसे हमारा क्रांतिकारी खेमा आज भी शायद “ठीक से” देख नहीं पा रहा है। इसलिए इस संकट से उपजे हालात से जनाक्रोश का उपयोग जो फासीवाद को (इसकी जननी पूंजीवादी व्यवस्था सहित) “सदा-सर्वदा के लिए” इतिहास के अजायबघर में दफन करने के लिए करना चाहते हैं, उनके लिए “अभी-अभी” प्रकट हो रही इस नई राजनीतिक परिस्थिति से निपटना एक विकट चुनौती साबित होने वाली है। हमारी “यथार्थ” पत्रिका इस चुनौती को पूरी शिद्दत से स्वीकार करती है।
यह “यथार्थ” के संपादक मण्डल के एक सदस्य अजय सिन्हा की फेसबुक  टिप्पणी है

 

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