आर डी आनंद : एक मित्र एक विचारक

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  • रामसुरेश शास्त्री
R.D. Anand

मार्क्सवादी/आम्बेडकरवादी चिंतक आर डी आनंद मेरे परम मित्र हैं। जब मैं 1996 में भारतीय जीवन बीमा निगम, शाखा कार्यालय अयोध्या, बजाजा, फ़ैज़ाबाद में स्थानांतरित होकर आया, तो उनसे एक कलीग के रूप में मुलाकात हुई। आनंद जी की जो पहली छवि मेरे मस्तिष्क में बनी, वह एक कवि की बनी। वे अकविता विधा की कविता लिखते रहते थे, जिसे गद्य कविता के रूप में ख्याति मिली। आनंद जी कविताएँ लिखते और ऑफिस में ही मुझे पढ़ने के लिए देते थे। जब मैं पढ़ता तो शब्दों की अनेक अशुद्धियाँ मिलतीं बल्कि अक्षरों की भी अशुद्धियाँ मिलतीं। आनंद जी को बताता कि भाई साहब! आप की कविताओं में बहुत सी अशुद्धियाँ हैं, आप ध्यान नहीं देते हैं क्या? वे बिना किसी लागलपेट के बिना हिचके अपनी कमी को स्वीकार करते हुए कहते थे, शास्त्री जी! मित्र, मैं स, श, ष में अंतर करना अभी तक नहीं सीख पाया। क्रियाओं में कर्तागत गलतियाँ भी हो जाती हैं। बहुत सारे शब्द ऐसे हैं जिसको मैं अभी भी दुरुस्त नहीं कर पाया। मित्र! आप इन्हें ठीक करते चलें। मैं आनंद जी के इस सहज स्वीकृत की प्रसंशा करता था। जब भी मैंने उन्हें उनकी गलतियाँ बताया, वे कभी भी अन्यथा नहीं लिए बल्कि खुश हो जाते थे, और उनमें यह भी एक अच्छाई थी कि वे हमेशा अपनी गलतियों को सुधारते हुए नया सीखते रहते थे। यह सब करते हुए भी मैं उनकी कविताओं में बहुत इंटरेस्ट नहीं लेता था और न उनकी कविताएँ मुझे अच्छी ही लगती थीं। उनकी सहजता, उनका सामाजिक दृष्टिकोण, बाबा साहब के बारे में वृहद जानकारियाँ, उनकी पढ़ने की महत्वाकांक्षा तथा किताबों के प्रति घोर लगाव ने मुझे उनका घनिष्ठ से घनिष्ठतम मित्र बनाने में अपार सहयोग किया।

आज जब उनकी तत्कालीन रचनाएँ पढ़ता हूँ तो उनके अर्थ और रहस्य बड़ी सहजता से समझ में आ जाते हैं । आनंद जी की सोच व दूरदर्शिता अब पता चलती है कि उन चीजों को मैं आज समझ पा रहा हूँ जिसे वे पच्चीस साल पहले समझ रहे थे। अब तक उनकी गद्य, पद्य व अन्य विधाओं में पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । उनका व्यक्तित्व, लेखन और वक्तव्य सबको अपना बना लेता है। आनंद जी हर किसी को आसानी से सुलभ हो जाते हैं। उनके सरल स्वभाव और बातचीत से पता ही नही लगता कि वे इतने बड़े विद्वान हैं। मुंबई नगर महापालिका के पूर्व उपायुक्त श्री जी आर खैरनार जी ने 20 वर्ष पूर्व ही पत्र लिखकर आर डी आनंद जी को भारत के पचास क्रांतिकारियों में से एक महत्वपूर्ण विद्वान क्रान्तिकारी बताया था। आर डी आनंद आम्बेडकरवाद को मार्क्सवाद के जरिए मजबूत करते हुए आगे बढ़ते हैं। उनका मानना है कि डॉ. आम्बेडकर साहब ने जो भी सिद्धांत दिए हैं उसको मार्क्स के रास्ते पर चलकर ही हासिल किया जा सकता है। उसको क्रांतिकारी मसौदा और क्रांतिकारी पार्टी द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है जिसके लिए मार्क्सवाद सहयोगी की भूमिका अदा करता है।

आर डी आनंद के वैसे तो लेख-संग्रहों के अतिरिक्त बहुत सारे कविता संग्रह भी आ चुके हैं लेकिन “सुनो भूदेव”, “जय भीम कॉमरेड”, “विद्रूप अँधेरा”, “धर्म के भाव ऊँचे हैं” और “ये राह पुरखतर है” बहुत ही शानदार संग्रह हैं। “सुनो भूदेव” में ब्राह्मणवादी सवर्णों की नीतियों, संस्कृतियों, सभ्यताओं और उनके सभी झूठों का सैद्धांतिक और व्यवहारिक काव्यमय प्रस्तुति है। “जय भीम कॉमरेड” ऐसा संग्रह है जिसमें आनंद जी ने दलितों से मार्क्सवादियों की कमियाँ तथा मार्क्सवादियों से आम्बेडकरवादियों की सैद्धांतिक और व्यवहारिक कमियों के साथ-साथ ब्राह्मणों द्वारा दलितों के बौद्ध मत के नए हिन्दू संस्करण और जड़ताओं पर प्रहार किया है। “विद्रूप अँधेरा” में मोदी युग में जनता पर हो रहे चौतरफा हमलों का जिक्र है। “धर्म के भाव ऊँचे हैं” में राजनीतिक, सांस्कृतिक और फासीवादी हमलों की बारीक व्याख्या करते हुए जातिवादियों के कुचक्रों तथा तथाकथित जातिवाद विरोधी दलितों के जातिवादी मोह को भी बहुत गहरी अनुभूतियों के साथ रखा है। उन्होंने “दलित साहित्य का नया सौंदर्यशास्त्र” भी लिखा है जो साहित्य जगत में क्रान्तिकारी कवियों/लेखकों के लिए एक साहित्यिक/सामाजिक विज्ञान की पुस्तक के रूप में गाइड की भूमिका अदा करेगा। दलित राजनीति का विकास समझने के लिए उनकी पुस्तक “आम्बेडकर के बाद दलित राजनीति” मील का पत्थर साबित होगा बल्कि मैं सभी क्रान्तिकारी दिमाग के साथियों को इस पुस्तक को पढ़ने की अपील करता हूँ। आर डी आनंद ने एक बहुत पतली किन्तु बहुत ही महत्वपूर्ण पुस्तक “भारतीय संविधान और डॉ. आम्बेडकर” लिखा है जिसमें उन्होंने बाबा साहब डॉ. आम्बेडकर के “राज्य और अल्पसंख्यक” पुस्तक के सार/संक्षेप के हवाले से कहना चाहा है कि बाबा साहब के मूल संविधान का ड्राफ़्ट “राज्य और अल्पसंख्यक” है जिस पर सामन्तों और ब्राह्मणवादी संविधान सभा के सदस्यों द्वारा संविधान बनाने ही नहीं दिया गया था। इस पुस्तक के हवाले से आर डी आनंद जी कहते हैं कि दलितों/आम्बेडकरवादियों को बाबा साहब के मूल संविधान के राजकीय समाजवाद को स्थापित करने लिए आन्दोनात्मक प्रयास करना चाहिए।

आर डी आनंद विशुद्ध मार्क्सवादी हैं लेकिन वे किसी भी सच्चे व कट्टर आम्बेडकरवादी से तनिक भी कम आम्बेडकरवादी नहीं हैं। इस बात को मैं इस नाते पूरी निष्ठा और विश्वास से कह रहा हूँ क्योंकि मैं और आनंद जी हर मीटिंग, सिटिंग, गोष्ठियों में साथ रहते हैं। वे हर दलित/आम्बेडकरवादी आह्वान की बैठकों में सबसे अग्रणी भूमिका निभाने में तत्पर रहते हैं। वे हर सभाओं/गोष्ठियों में पाए जाते हैं। वे एक कार्यकर्ता की भूमिका में भी रहते हैं, नेता की भूमिका भी निभाते हैं, चिंतक/विचारक तो हैं ही। आम्बेडकरवादी दलित चिन्तक/साहित्यकार/सामाजिक कार्यरता/नेता आर डी आनंद जी से  से इस कारण नाराज हो जाते हैं कि वे मार्क्सवादी हैं। आनंद जी कहते हैं कि दलित साथी मुझसे इस नाते नाराज रहता है क्योंकि वह मार्क्सवाद को ब्राह्मणवाद का मित्र और आम्बेडकरवाद का शत्रु समझता है। मुझसे नाराज होने का दूसरा कारण यह है कि दलित मार्क्सवाद को न पढ़ता है और न समझता है। आनंद जी का कहना है कि मैं उतना आम्बेडकरवादी हूँ जितना कोई बड़ा सा बड़ा आम्बेडकरवादी है परन्तु मेरा मार्क्सवाद का ज्ञान किसी दलित चिन्तक/बुद्धिजीवी के ज्ञान के अतिरिक्त है। यह तो एक विशुद्ध आम्बेडकरवादी का और अधिक प्रशिक्षित होना व बुद्धिमान होना है। मार्क्सवाद आम्बेडकरवाद का पूरक है, विरोधी बिल्कुल नहीं। आम्बेडकरवाद के सभी उद्देश्य मार्क्सवाद को मित्र बनाने से पूरा हो सकता है। उनकी अभी तक 56 पुस्तके विभिन्न प्रतिष्ठित प्रकाशनों से प्रकाशित हो चुकी हैं लेकिन वे बिल्कुल सहज व्यक्ति के रूप में रहते हैं। उनकी एक बात  बहुत ही अनमोल और काबिले तारीफ, मानने व ग्रहण करने योग्य है  कि जो ब्राह्मणवाद विरोधी है वे हमारी मित्र शाक्तियाँ है, भले ही बाबा साहब पर उनके विचार हमसे भिन्न क्यों न हों। हमें अनेक भिन्नताओं के बावजूद भी ब्राह्मणवाद व पूँजीवाद विरोध के नाम पर एकमत लोगों से हरहाल में मित्रता करनी चाहिए। यही हमारे जागरूक होने की उचित पहचान है। मैं बहुत ही खुश हूँ कि आर डी आनंद जी मेरे परम मित्र हैं।

आर डी आनंद की विचित्र आदतों में किताबों के प्रति अगाध मोह है। जब भी लंच ऑवर्स में हम लोग चौक की तरफ निकलते थे, वे सबसे पहले मुकेश श्रीमाली की बुक शॉप पर पहुँच जाते थे। वे किताबों को उलटते/पलटते नहीं थे बल्कि मुकेश या उनके पिता जी से कहते थे, हंस निकाल दो, वर्तमान साहित्य दे दो, उत्तर प्रदेश दे दो, आजकल दे दो, ऑर्गनाइजर दे दो, क्रॉनिकल दे दो, नवनीत दे दो, इंडिया टुडे दे दो, फ्रंट लाइन दे दो। कथा देश, समयांतर, आलोचना, तद्भव अभी नहीं आई क्या? सभी पत्रिकाएँ ले लेते थे। मुझे बहुत ताज्जुब होता था। इतनी कम तनख्वाह इतना अधिक पढ़ने की ख़्वाहिश। विचित्र है आर डी भाई। यही नहीं, हम जब घंटा घर की तरफ बढ़ते, तो वे अपनी पहल पर अक्सर प्रेम बुक स्टोल तक ले जाते थे। वहाँ से समीक्षा, आलोचना, तद्भव,  बहुबचन, कथा देश, कथाक्रम,समयांतर, आम्बेडकर टुडे, अश्वघोष, आम्बेडकर इन इंडिया और न जाने कौन-कौन सी पत्रिकाएँ खरीद लेते थे। उनकी पढ़ने की ललक इतनी थी कि वे कुछ पत्रिकाएँ बाईपोस्ट मँगवाते थे। उनमें से दस्तक बहुत अच्छी पत्रिका थी, जिसे वे हरियाणा से मँगवाते थे। आनंद जी की एक बहुत सुंदर और प्रसंशनीय आदत है कि वे जितनी भी अच्छी पत्रिकाएँ और पुस्तक मँगवाते थे, उनमें से एक मुझे जरूर देते थे। हर अच्छी पत्रिकाओं व पुस्तकों को वे कई-कई मँगवाते हैं और कई-कई मित्र ढूँढ कर देते हैं। उनमें से कुछ साथी तो मूल्य चुका देते हैं कुछ फ्री में लेकर चले जाते हैं। आर डी भाई को ऐसे लोगों की यह आदत कभी भी हर्ट नहीं करती। वे तब भी उनसे उतने ही प्यार/स्नेह से मिलते/बतियाते थे। आर डी भाई सिर्फ किताबों को देकर संतुष्ट नहीं हो जाते थे बल्कि दूसरे दिन ही पूँछते थे कि किताब में क्या अच्छा लगा/कितना पढ़ा/पढ़ा या नहीं? यदि कोई कह दे कि पढ़ा है तो वे उनसे उसके विश्लेषण की चाह भी प्रकट करते थे। उनकी सोहबत ने मुझमें किताबों को पढ़ने की शौक उत्पन्न किया।

एक बार मैं आर डी आनंद के साथ लखनऊ गया। वहाँ भी वे मुझे हजरतगंज में दस्तावेज़ बुक शॉप, कपूर बुक शॉप और यूनिवर्सल बुक शॉप तक ले गए। तकरीबन 1998/99 के दौर में भी वे वहाँ से 500/-1000/-रुपए की पुस्तकें खरीद लेते थे। आनंद जी ने मुझे एमिल बर्न्स की “मार्क्सवाद क्या है”, राहुल सांकृत्यायन की “मार्क्सवाद क्या है”, “भागो नहीं दुनिया को बदलो”, “वोल्गा से गंगा”, “मानव समाज”, “विश्व की रूपरेखा”, पढ़ने को दिया और जब मैं उनके साथ कानपुर गया, तो उन्होंने एंगेल्स की “काल्पनिक से वैज्ञानिक समाजवाद”, “परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति”, मार्क्स/एंगेल्स की “कम्युनिस्ट घोषणापत्र”, मॉरिस कॉर्नफोर्थ की “द्वंद्वात्मक भौतिकवाद” प्रेरित करके खरीदवाया। आनंद जी ने कॉमरेड शिवदास घोष की “भारत में एसयूसीआई ही एकमात्र जेनविन कम्युनिस्ट पार्टी क्यों”, “सांस्कृतिक क्रान्ति और हमारा कर्तव्य”, “मार्क्सवाद के कुछ पहलू” तथा “चीन की सांस्कृतिक क्रान्ति” दिया। आनंद जी मुझे 1996 से लगातार एक राजनैतिक अखबार  “सर्वहारा दृष्टिकोण” देते रहते हैं। मैं इस बात का गवाह हूँ कि उनके पास 1985 से अभी तक का सर्वहारा दृष्टिकोण वाइंड कर कर सुरक्षित रखा हुआ है। आर डी आनंद कहते रहते हैं कि शास्त्री जी! आखिर हमारे पास शिक्षा के सिवा क्या है, न खेत है, न कोई विरासत और न कोई और संसाधन, ले दे कर नौकरी है। नौकरी में एक सामान्य सी तनख्वाह है। तनख्वाह से कुछ बचना नहीं है। बच्चों के शादी/ब्याह के लिए पीएफ और कोऑपरेटिव लोन के अतिरिक्त हमारे पास कुछ नहीं है। सेवानिवृत्ति के बाद हमारी कोई हैसियत नहीं होगी। हमारा समाज भी बहुत पिछड़ा है। हमारी जातियाँ 90 प्रतिशत निरक्षर और भूमिहीन हैं।

ब्राह्मणवाद की वजह से दलित सामाजिक/शैक्षिक/आर्थिक रूप से तो त्रस्त है ही, सम्मान के दृष्टिकोण से बहुत ही प्रताड़ित है। अब कुछ लोग नौकरियों में है। कुछ करोड़ शिक्षित हो गए हैं। अब सम्मान की भूख जबरदस्त जगी है। दलित डॉ. आम्बेडकर के सपनों का समाज बनाना चाहता है लेकिन दुर्भाग्य यह है कि दलित आम्बेडकर साहब के विचारों से भिन्न मान्यवर कांशीराम साहब के सुनहरे राजनैतिक सपनों में उलझकर रह गया है इसलिए सत्य को समझने/समझाने के लिए हमें दुनिया भर की पुस्तकों को पढ़कर ज्ञान/विज्ञान/दर्शन को बखूबी समझ लेना चाहिए। मुझे ज्ञात है कि जैसे ही बाबा साहब के सभी वाङ्गमय हिन्दी में ट्रांसलेट हुए उन्होंने माध्यम निकालते-निकालते पता किया कि अरुण गौतम बनारस के पास सभी किताबें हैं। उस समय श्री लल्लन प्रसाद अम्बेश बनारस रेलवे में अधिकारी थे और प्रत्येक दिन आते /जाते थे। आर डी भाई ने अरुण जी से कहकर अम्बेश जी द्वारा बाबा साहब के इक्कीस खंडों का सम्पूर्ण वाङ्गमय मँगवा लिया। उनमें यह भी बड़ी विचित्रता है कि वे जैसे ही कोई पुस्तक लाते हैं, तत्काक पढ़ना प्रारम्भ कर देते हैं और जब तक खत्म नहीं कर लेते, रुकते नहीं हैं। उनकी पढ़ने की स्पीड बहुत अच्छी है। उन्होंने बाबा साहब का सम्पूर्ण वाङ्गमय तकरीबन दो महीने में पूरा पढ़ डाला। उनकी एक बात और बताता हूँ, जब महाराष्ट्र सरकार ने बाबा साहब के वैल्युम प्रकाशित किए थे, उस समय वह इंग्लिश में उन्नीस वैल्युम थी। आनंद जी 1988 में नौकरी में नहीं थे। उस समय बेरोजगार थे। वे लखनऊ में रहते थे और ट्यूशन पढ़ाते थे। वहाँ वे ट्यूशन पढ़ाकर डॉ. आम्बेडकर साहब के सम्पूर्ण इंग्लिश के उन्नीसों वैल्युम मगांकर पढ़ डाले थे। इस लिहाज से मुझे यह कहने में बहुत फक्र महसूस हो रहा है कि आर डी आनंद 1990 के दसक में इकलौते ऐसे व्यक्ति रहे होंगे जिसने बाबा साहब को सम्पूर्ण पढ़ डाला था। मुझे तो अब भी याद नहीं आता है कि आर डी आनंद के अतिरिक्त कोई दलित साथी फैज़ाबाद जिले में अभी भी बाबा साहब को कम्पलीट पढ़ा होगा। एक और विचित्र बात, आर डी आनंद मुंशी प्रेमचंद, शरतचंद, चेखव, टॉलस्टॉय, एलेक्सानद्र कुप्रिन, मैक्सिम गोर्की, बंकिम चंद चैटर्जी, रवींद्रनाथ टैगोर, नज़रुल, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आज़ाद इत्यादि के सम्पूर्ण साहित्य को 1986 तक पढ़कर खत्म कर लिया था। 1988 में बाबा साहब को सम्पूर्ण पढ़ डाला। 1996 से लगातार मैं आनंद जी के साथ हूँ। मैं उनकी सभी गतिविधियों से वाकिफ हूँ। आर डी आनंद का साहित्यिक सम्बन्ध डॉ. शरण कुमार लिम्बाले, मलखान सिंह, ओमप्रकाश वाल्मीकि, डॉ. धर्मवीर मोहनदास नैमिशराय, डॉ. माता प्रसाद, डॉ. जयप्रकाश कर्दम, कँवल भारती, डॉ. सी.बी.भारती, डॉ. श्योराज सिंह बेचैन, डॉ. कुसुम वियोगी, जयप्रकाश लीलावन, अनिता भारती, रजनी तिलक, डॉ. रजत रानी मीनू, कौशल्या बैसंत्री, डॉ. सुशीला टाकभौरे इत्यादि से था। आनंद जी इनमें से कई साहित्यकारों से निरंतर चिट्ठी-पत्री से और फोन के समय फोन पर खूब विमर्श करते रहते थे। मैं गवाह हूँ कि उन्होंने मेरे सामने मलखान सिंह, कँवल भारती, डॉ. धर्मवीर और ओमप्रकाश वाल्मीकि से फोन पर कई/कई बार लगभग एक घंटे से अधिक वार्ता किया है। वे सभी आनंद जी को बहुत मानते थे। आनंद जी के कहने पर मैं मलखान सिंह से मिलने आगरा में ताजगंज उनके घर चला गया। उन्होंने मेरा बहुत स्वागत किया। खाना/पीना कराकर ही उन्होंने मुझे आने दिया जबकि वे स्वयं आनंद जी से कभी नहीं मिले थे। ओमप्रकाश वाल्मीकि से आनंद कहते थे कि सर आप जल्दी रिटायर होइए जिससे हम लोगों से फ्रेक्वेंटली मिल सकें। आप की सेवा की जरूरत सरकार से अधिक समाज को है। दुर्भाग्य, आनंद जी चाहते हुए भी ओमप्रकाश वाल्मीकि जी से मिल न सके। ओमप्रकाश वाल्मीकि को कैंसर हो गया और वे शीर्घ्र ही हमसे बिछड़ गए। आनंद जी को यह दुख बहुत सालता है। इसी तरह आनंद जी डॉ. धर्मवीर के बहुत प्रिय थे। उनसे भी अनेक बिंदुओं पर वे चर्चा करते थे, उनसे भी आनंद जी मिल नहीं सके। आनंद जी ने मेरे सामने ही उनसे उनके अंतिम क्षणों में बात किया था। डॉ. धर्मवीर जी को भी कैंसर हो गया और वे मृत्यु को प्राप्त हो गए। आनंद जी के विशेष आग्रह पर मैं पुनः मलखान सिंह से मिलने आनंद जी के साथ ही 27 मई 2019 में उनके घर आगरा गया। आनंद जी ने बताया कि इस समय मलखान सिंह भी कैंसर से पीड़ित हैं और स्वस्थ दिखने के बावजूद भी हमारे प्रिय मलखान सिंह बहुत कम दिनों के मेहमान हैं। सचमुच वे बिल्कुल हिष्टपुष्ट थे। आनंद जी को पाकर मलखान सिंह अति प्रसंचित्त थे, जैसे वे और आनंद जी कोई बहुत पुराने परिचित मित्र हों। उन्होंने बहुत सेवा किया। आनंद जी चलते समय उनके पैर छूने लगे, मलखान सिंह ने मना कर दिया लेकिन आनंद जी ने बहुत ही भाव में कहा, नहीं सर, मैं आप का पैर छूना ही चाहता हूँ। मुझे याद है वह दृश्य जब वे चौखट के बिल्कुल उस पार खड़े थे और आनंद जी चौखट के इस पार। वहीं से झुककर आनंद जी ने मलखान सिंह के पैर छुए और बहुत भावुक व विह्वल हो उठे। मलखान सिंह ने कहा, क्या आनंद वापस नहीं आओगे? जी सर। आनंद जी को जो नहीं जानते उनके लिए यह बात आश्चर्यजनक हो सकती है लेकिन मैं जानता हूँ कि उन्होंने बाबा साहब को तो सम्पूर्ण पढ़ा है, साथ ही साथ हिंदी क्षेत्र के 90 प्रतिशत विशिष्ट कवियों/लेखकों के अधिकतम साहित्य को पढ़ डाला है। इतना ही नहीं, प्रगतिशील कहे जाने वाले पुराने व नए सवर्ण साहित्यकारों की रचनाओं को भी लगातार खूब पढ़ते रहते हैं। मुझे लगता है कि आनंद जी के परिचय में दलित और सामान्य रचनाकारों को मिलाकर लगभग तीन/चार सौ साहित्यकार परिचित होंगे। यह उनकी एक बड़ी उपलब्धि है।

 

आर डी आनंद जब भी बाबा साहब डॉ. आम्बेडकर और मान्यवर कांशीराम साहब के वैचारिकी की भिन्नताओं पर बात करते थे तो मित्र होने के नाते मैं उन्हें कुछ कहता नहीं था लेकिन मुझे उनकी बातों से आंतरिक रूप से बहुत पीड़ा होती थी। मुझे भी लगता था कि आर डी आनंद मार्क्सवादी होने के नाते डॉ. आम्बेडकर साहब के बारे में अनाप/सनाप ही सोचते है। हम सभी दलित अक्सर यही सोचते और मानते हैं कि आर्य विदेशी हैं। वे उत्तरी ध्रुव से भारत आए हैं। बामसेफ वाले तो साफ कहते हैं कि ब्राह्मण यूरेशियन हैं। यूरेशियन विदेशी ब्राह्मणों का डीएनए प्रमाणित हो चुका है। उटाह विवश्वविद्यालय अमेरिका के डॉ. बामाशाद के अनुसार ब्राह्मणों का डीएनए युरेशियन्स से 99.99 प्रतिशत मिलता है। हम यह भी मानते हैं कि आर्य श्रेष्ठ हैं। आर्य सवर्ण हैं। आर्यों ने भारतीय मूलनिवासियों पर आक्रमण किया और आदिवासियों/मूलनिवासियों/द्रविणों की स्त्रियों को अपनी रखैल/पत्नी/वेश्या बना लिया तथा हमें गुलाम बना लिया। हमारी संस्कृतियों/सभ्याताओं को नष्ट कर दिया। आश्चर्य तब हुआ जब आनंद जी ने कहा कि यह दर्शन जबरदस्ती बाल गंगाधर तिलक की ब्राह्मणी मानसिकता की उपज की वजह से अस्तित्व में आया और वर्चस्वदियों के मुखबिरों/दलालों/छद्मवेशियों द्वरा दलितों के मध्य प्रसारित/प्रसारित किया गया है। आनंद जी ने अपने विचार के साक्ष्य में प्रिय बाबा साहब का वाङ्गमय-13 (शूद्र कौन थे) पढ़वाया, तब मेरी आँखें खुली की खुली राह गईं कि अभी तक हमारा दलित समाज इतने बड़े झूठ को लेकर फँसा हुआ है। इस संबंध में डॉ. आम्बेडकर ने लिखा है, “आर्य कोई जाति या नस्ल नहीं वरन एक भाषा है। इसका आशय भाषा के सिवाय कुछ नहीं। उसे बोलने वाले आर्य कहलाए। मैं बार/बार कह चुका हूँ कि आर्य शब्द का संबंध न रक्त से है, न शारीरिक ढाँचे से, न बालों से और न कपाल से। मेरा सीधा तात्पर्य है जो आर्य भाषा बोलते हैं वे ही आर्य हैं। यही बात हिंदुओं, युनानियों, रोमनों, जर्मनों और स्लाबों पर लागू होती है। ((डॉ. आम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्गमय, खण्ड-13, पेज 46) ….आर्य जाति का सिद्धांत अनुमान के सिवाय कुछ नहीं है। यह डॉ. बोप के दार्शनिक विचारों पर आधारित है जो उन्होंने 1835 में प्रकाशित अपनी पुस्तकें “कंपटेटिव ग्रामर” में प्रकट किए हैं।……..आर्यों के आक्रमण का सिद्धांत एक नया अनुसंधान है। इसकी खोज की आवश्यकता पश्चिमी विद्वानों के इस कथन को सिद्ध करने के लिए पड़ी की “इंडो जर्मन” ही वर्तमान मूल आर्य के मूल प्रतिनिधि हैं। इनका मूल स्थान यूरोप बताया गया है। …….कल्पनाएं और भी हैं कि आर्य एक श्रेष्ठ जाति थी। इस मत का आधार यह विश्वास है कि आर्य यूरोपीय जाति के थे और यूरोपीय होने के नाते ये एशियाई जातियों से श्रेष्ठ हैं। श्रेष्ठता की इस कहानी को यथार्थ सिद्ध करने के लिए भी इस कहानी को गढ़ने की आवश्यकता पड़ी की यह सोच कर आक्रमण की बात कहने के सिवाय और तरीका नहीं है इसलिए पश्चिमी लेखकों ने यह कहानी रची कि आर्यों ने आक्रमण करके दस्यों और दस्युओं को पराजित किया।

(डॉ. आम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्गमय, खण्ड-13, पेज 55)

जब भी हम आरक्षण पर विमर्श करते हैं, उस समय आर डी आनंद कहते हैं कि आरक्षण लेना हमारी मजबूरी बनी हुई है और इस मजबूरी की वजह से हमें जाति प्रमाण-पत्र बनवाना पड़ता है। हम सभी दलित अपने को बौद्धिष्ट कहते हैं लेकिन हर स्तर पर हिन्दू लिखते हैं और समाज में दहाड़ते हैं कि हम हिन्दू नहीं हैं। यह एक तरह से हम दलितों का यह दोगलापन है। दरअसल, यह हम मानते नहीं हैं, हमसे मनवाया जाता है। आर डी आनंद कहते हैं कि क्या यह विडंबना नहीं है कि दलित जातियाँ जातिप्रथा के विरुद्ध हैं लेकिन संवैधानिक मजबूरी वश सभी प्रमाण पत्रों में हिन्दू और हिंदुओं की उपजाति लिखते हैं। आनंद जी ने मुझे समझाया कि मित्र! डॉ. आम्बेडकर का मत आरक्षण कदापि नहीं था। वे पृथक निर्वाचन चाहते थे। गाँधी जी के आमरण अनशन ने पूना पैक्ट करवाया, जिसमें हम डॉ. आम्बेडकर के मार्फत पृथक निर्वाचन हार गए और गाँधी ने आरक्षण का झुनझुना पकड़ाने का प्रस्ताव रख दिया। बाबा साहब मजबूरी में आरक्षण को इस आशय से स्वीकार कर लिए कि दलित जातियाँ जब कुछ सक्षम और शिक्षित हो जाएँगी तो पुनः पूना पैक्ट को तोड़कर निर्वाचन ले लेंगी लेकिन दलित वर्ग में एक संभ्रांत वर्ग पैदा हो गया जो ठीक ब्राह्मण वर्चस्ववादियों की ही तरह सोचने लगा और उसने सौ प्रतिशत दलितों के समता, स्वतंत्रता और बन्धुत्व के सपने को तिलांजलि देकर 10 प्रतिशत दलितों के सुख/सुविधा के लिए सभी निरक्षर/भूमिहीन/खेत मजदूर दलितों को गुमराह रखते हुए सम्पूर्ण दलित आंदोलन को संभ्रांत दलितों के सुख/सुविधओं के आंदोलन में केंद्रित कर दिया। आज हम दलितों का जातिप्रथा के विरुद्ध समता, स्वतंत्रता और बन्धुत्व का आंदोलन और संघर्ष संसदीय राजनीति के दुष्चक्र में उलझकर वोट के ध्रुवीकरण के लिए अपनी/अपनी जातियों को मजबूत करने में लग गए हैं, जो प्रकारांतर ब्राह्मणवाद के जातीय चक्र को मजबूती प्रदान कर रहा है। मैंने जब आनंद जी से कहा, इस लिहाज से तो दलितों को जातिप्रथा उन्मूलन की लड़ाई के लिए आरक्षण छोड़ देना चाहिए तथा जाति प्रमाण बनवाना भी बंद कर देना चाहिए और यदि दलित ऐसा करना प्रारम्भ कर देता है तो ब्राह्मणवादी सवर्णों के लिए क्या बिल्कुल ऐशोआराम वाली हालत नहीं हो जाएगी कि वे जिसे चाहें नौकरी दें जिसे चाहें नौकरी न दें, आखिर दलित क्या कर लेगा? आनंद जी ने बहुत स्पष्ट कहा कि इसका अर्थ यह नहीं है कि बिना नए कानून बने हम पुराने कानून की व्यवस्थाओं के उपादानों को ग्रहण करना बंद कर दें। हमारा दलित साथी तर्क के लिए बहुत उतावला रहता है। वह भर्र से तर्क गढ़ लेता है कि आर डी आनंद आरक्ष विरोधी हैं। आर डी आनंद ब्राह्मणवादी हैं। आर डी आनंद ब्राह्मणों के दलाल हैं। आनंद जी का मानना है कि जाति प्रमाण पत्र बनवाना व्यवस्थागत मजबूरी है। आरक्षण के आधार पर नौकरियाँ लेना व्यवस्थागत मजबूरी है इसलिए इन मजबूरियों को झेलते हुए प्रमाण पत्र बनवाना पड़ेगा और उसके आधार पर नौकरियाँ लेना भी चाहिए लेकिन स्वयं भी स्पष्ट रहिए और अन्य दलित क्रान्तिकारियाँ के मत को भी स्पष्ट करिए कि अंततः हमें आरक्षण छोड़ना है व जाति प्रमाण पत्र नहीं बनवाना है। हमें एक नई व्यवस्था का निर्माण करना है। जब हम उस स्थिति में पहुँच जाएँगे जब बाबा साहब द्वारा निर्दिष्ट राजकीय समाजवाद स्थापित कर ले जाँय अथवा क्रान्ति के द्वारा पूरी व्यवस्था को ही बदलकर एक नई समाजवादी व्यवस्था लागू करने की स्थिति में हो जाँय अथवा हम समाजवादी व्यवस्था के नियंत्रक हो जाँय, तब आरक्षण छोड़ देंगे और जाति प्रमाण पत्र बनना बन्द करवा देंगे। आनंद जी कहते हैं कि हमें किसी भी साथी के विचारों को यांत्रिक रूप से ग्रहण करने की जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए। हमें संभावित मित्रों को न हर्ट करना चाहिए और न उन्हें किसी भी तरह अमित्र करना चाहिए।

आर डी आनंद कहते हैं कि आरक्षण एक गुलामी की व्यवस्था है। इस व्यवस्था में दलित शाषित है। इस व्यवस्था में दलितों को धर्म और जाति बहुत मजबूरी में लिखना पड़ता है। यह संविधान हमें जाति और धर्म से मुक्त नहीं होने देगा। दूसरी बात, नस्लवादी बिल्कुल वर्चस्व की स्थिति में सक्रिय रहते हैं। आज भी वे सक्रिय हैं। संविधान में सवर्णों ने 117 संशोधन कर चुके हैं। कई अनेक संशोधन प्रस्तावित हैं। वैश्वीकरण के दौर में उदारीकरण और निजीकरण की प्रक्रिया के चलते सारे पब्लिक सेक्टर्स को प्राइवेट सेक्टर्स में परिवर्तित कर दे रहे हैं। प्राइवेट सेक्टर्स की नौकरियों के लिए हम उद्योगपतियों को आरक्षण के लिए मजबूर नहीं कर सकते हैं। इस तरह हमारी नौकरियाँ खत्म होने के कगार पर हैं। 1986 की नई शिक्षानीति ने व्यावसायिक और दोहरी शिक्षानीति के सैलाब का द्वार खोल दिया था। 2014 के बाद प्रस्तावित संशोधित शिक्षानीति को अब लागू कर दिया गया है। शिक्षा इतनी महँगी हो गई है कि नौकरीपेशा दलित भी अपने बच्चों को उच्च शिक्षा/व्यावसायिक शिक्षा नहीं दिला पाएगा। प्राइवेट संस्थान क्यों आरक्षण देंगे और क्यों नहीं फीस लेंगे?

शासक वर्ग हमेशा एक वर्ग को अशिक्षित रखकर उन्हें सेवक/दास/मजबूर बनाता है। आज पुनः पूँजीपति अपने मंसूबे में कामयाब है। अब बात आती है आर डी आनंद के मूल विमर्श का, जिसे वे दलित बुद्धिजीवियों से बराबर कहते रहते हैं लेकिन दलित चिन्तक/बुद्धिजीवी/साहित्यकार उनकी बहुत ही तार्किक बातों को नहीं समझ पाता है अथवा इग्नोर करता है। आर डी आनंद जी “राज्य और अल्पसंख्यक” का हवाला देते हुए मुझसे कहते है कि यह पुस्तक बाबा साहब डॉ. आम्बेडकर द्वारा 1947 में  लिखे गए मूल संविधान का ड्राफ़्ट है। ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन होने के बावजूद भी बाबा साहब डॉ. आम्बेडकर के लिए संविधान ड्राफ़्ट को तत्कालीन राजे/रजवाड़े/सामंत/उद्योगपति/धन्नासेठों और गाँधी/नेहरू/राजेन्द्र प्रसाद/मालवीय/पटेल इत्यादि ने स्वीकार नहीं किया। उस संविधान ड्राफ़्ट में डॉ. आम्बेडकर ने लिखा है कि व्यक्तिगत संपत्ति रखने का अधिकार किसी को नहीं होगा, उत्पादन के सभी संसाधन-जमीन, खेत, बीज, खाद, बीमा, बैंक, कृषि, उद्योग, कारखाने, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय सभी का राष्ट्रीकरण कर दिया जाएगा। सभी को शिक्षा मुफ्त दिया जाएगा। सभी को नौकरियाँ दी जाएँगी।

जाति और धर्म लिखने को दंडनीय अपराध घोषित कर दिया जाएगा। बाबा साहब कहते हैं कि यदि आर्थिक विसंगतियों को समाप्त नहीं किया गया तो यही लोग इस संविधान को छिन्न/भिन्न कर डालेंगे। आनंद जी ने बताया कि इस व्यवस्था को बाबा साहब डॉ. आम्बेडकर “राजकीय समाजवाद” कहते हैं। उन्होंने “राज्य और अल्पसंख्यक” के खण्ड चार में लिखा है, “भारत का तेजी से औद्योगिकरण करने के लिए राजकीय समाजवाद अनिवार्य है। निजी उद्यम ऐसा नहीं कर सकता है, यदि कर सकता है तो भी वह संपदा की विसमता को जन्म देगा, जो निजी पूँजीवाद ने यूरोप में पैदा की है और जो भारतीयों के लिए एक चेतावनी होगी। चकबंदी और काश्तकारी विधान व्यर्थ से भी बदतर हैं। उनसे कृषि क्षेत्र संबृद्ध नहीं हो सकता। न तो चकबंदी और न ही काश्तकारी विधान छह करोड़ अस्पृश्यों के लिए सहायक हो सकते हैं, जो भूमिहीन मजदूर हैं। न तो चकबंदी और न ही काश्तकारी विधान उनकी समस्याओं का निराकरण कर सकते हैं। प्रस्ताव में वर्णित विधि से स्थापित सामूहिक फार्म ही उनके लिए सहायक हो सकते हैं। संबंधित हितों के स्वत्वहरण का कोई प्रश्न नहीं है। परिणाम स्वरूप इस आधार पर इस प्रस्ताव का विरोध नहीं किया जाना चाहिए। योजना की दो प्रमुख विशेषताएँ है: एक, इसमें प्रस्तावित है कि आर्थिक जीवन के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में राजकीय समाजवाद हो। इस योजना की दूसरी खाश बात है कि राजकीय समाजवाद की स्थापना विधान मंडल की इच्छा पर निर्भर नहीं करेगी। राजकीय समाजवाद की स्थापना संवैधानिक विधि द्वारा होगी और इस प्रकार उसे विधायिका और कार्यपालिका के किसी कृत्य से बदला नहीं जा सकेगा। (डॉ. आम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्गमय, खण्ड-2, पेज 194) …….इसका हल संसदीय लोकतंत्र को रखना तथा संविधि द्वारा राजकीय समाजवाद विहित करना ही प्रतीत होता है, ताकि संसदीय बहुमत उसे निलंबित, संशोधित या निराकृत न कर पाए। इसी मार्ग से तीन उद्देश्य प्राप्त किए जा सकते हैं। वे हैं, समाजवाद की स्थापना, संसदीय लोकतंत्र जारी रखना और तानाशाही से बचना। (डॉ. आम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्गमय, खण्ड-2, पेज 197)।

आर डी आनंद हमेशा प्रगतिशील सवर्णों का पक्ष लेते हैं। उनका गंभीर तर्क है कि ब्राह्मणवाद एकेले दलित नहीं खत्म कर सकता है क्योंकि यह वह युद्ध नहीं है कि एक जाति दूसरी जाति को बंदी बनाकर जेल में डाल दे या उनकी बर्बर हत्या कर दे। आनंद जी कहते हैं कि यदि दलित ब्राह्मणों से युद्ध करके परास्त कर दे तो भी तो दलितों को एक व्यवस्था, एक सरकार, एक संवैधानिक विधायिका, एक न्यायपालिका और एक कार्यपालिका देनी ही पड़ेगी। ऐसी स्थिति में उनके अभिमत को तत्काल बदला नहीं जा सकता है। उनके अभिमत को बदलने के लिए सरकार का पूरा नियंत्त्रण चाहिए। वह पूरा नियंत्रण अधिनायकवादी होगा, नहीं तो न ब्राह्मण मानेगा और न कर्मचारी नियंत्रण ही रखेगा क्योंकि कर्मचारी केवल दलित तो होंगे नहीं। एक सवाल मुँह बाए हमेशा खड़ा रहेगा कि क्या क्षत्रिय दलितों के सम्मुख सरेंडर करके ब्राह्मणों के तरीके से नस्तमस्तक हो जाएंगे? आनंद जी का कहना है, फिर क्षत्रिय से लड़ो, उन्हें जीतो, फिर उन पर अधिनायकवादी आदेश का पालन करवाओ। इसी तरह भारत की ओबीसी और अल्पसंख्यकों के साथ भी करना पड़ेगा। क्या दलित बारी-बारी से जातियों को परास्त करेगा? क्या ऐसा संभव है? यह एक कल्पना है। आनंद जी कहते हैं जातिप्रथा ऐसे कदापि नहीं खत्म किया जा सकेगा। आनंद जी की यह बात मुझे बिल्कुल सही लगती है कि बाबा साहब के सपनों और विचारों को पूरा करने वाली पार्टी अभी बनी ही नहीं है और न दलित विद्वानों ने अभी तक कोई ऐसा अभिमत ही तैयार किया है जिस पर सभी क्रान्तिकारी दलित सहमत और एकमत हों।

आनंद जी कहते हैं कि “जातिप्रथा (ब्राह्मणवाद) और पूँजीवाद के उन्मूलन के लिए एक क्रान्तिकारी सिद्धांत, एक क्रान्तिकारी संगठन, क्रान्तिकारी लोग, क्रान्तिकारी अचार संहिता, जनवादी केन्द्रीयता, चिंतन की एकरूपता, सर्वहारा (बहुजन) की तानाशाही और वर्गीय एकता होना चाहिए, जिसको अभी तक दलितों ने प्राप्त ही नहीं किया है। दलित अभी तक जातिप्रथा उन्मूलन की सांगठनिक प्रक्रिया और प्रयास में नहीं आ सका है। दलित कोई भी संगठित प्रयास न नहीं कर रहा है जिससे जातिप्रथा खत्म हो सके लेकिन जब कोई प्रगतिशील चेतना का दलित या सवर्ण बात करता है, तो दलितों के पास यह प्रश्न रेडीमेड रहता है कि जब तक जातिवाद खत्म नहीं हो जाता है तब तक वर्ग बन ही नहीं सकता है। यहाँ दलित बिल्कुल अवैज्ञानिक चिंतन प्रक्रिया पर उतर आता है। उसे यह बोध नहीं हो पाता है कि कोई भी परिवर्तन कभी भी एकाएक नहीं होता है, तो जातिप्रथा उन्मूलन की बात प्रारम्भ करते ही जातियाँ कहाँ से खत्म हो जाएँगी। ऐसा वक्त कभी नहीं आएगा कि सभी जातियों में जाति का बोध खत्म हो जाय और सिर्फ अमीर और गरीब दो वर्ग मात्र रह जाँय। जातिप्रथा उन्मूलन के लिए जब तक भारत की सभी जातियों के प्रगतिशील चेतना के व्यक्ति एकमत नहीं होंगे, एक संगठन नहीं बनाएँगे, एक उद्देश्य के लिए नहीं लड़ेंगे, एक दूसरे पर विश्वास नहीं करेंगे, तब तक जातिप्रथा उन्मूलन की सही अर्थों में पहल भी शुरू नहीं होगी।” (संदर्भ: आर डी आनंद के फेसबुक से) आनंद जी बहुत साफ कहते हैं कि जब क्रान्तिकारी सिद्धांत पर क्रान्तिकारी संगठन बनेगा, तो संगठन में कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं जा यह नैतिक कर्तव्य होगा कि वे अपने जाति/धर्म को तिलांजलि देकर ही संगठन में भर्ती हों। जैसे-जैसे संगठन का विस्तार होगा, जातिप्रथा की दीवार पर बल पूर्वक प्रहार शुरू हो जाएगा।

आर डी आनंद “प्रगतिशीलता” की बात करते हुए तथा जातिप्रथा उन्मूलन का उपाय बताते हुए अपने बौध्दिक विमर्श में कहते हैं कि “उत्पादन ही वह मुख्य विषय है जिस पर स्वामित्व के लिए शासक जातियाँ/वर्ग उत्पादन के साधनों पर कब्ज़ा करती हैं। उत्पादन और उत्पादन के संसाधनों के लिए शासक जातियाँ/वर्ग अपने एक विचार बनाते हैं। यही विचार वर्ग विचार कहलाता है। अपने विचारों को शासक वर्ग समाज पर थोपता है। शिक्षा व्यवस्था पर उसका अधिकार होता है, न्याय पर उसका अधिकार होता है, अदालतें उसकी होती हैं। अपने विरुद्ध खड़ी हुई जनता को वह अपनी न्याय प्रक्रिया द्वारा दंडित करता है। वह लोगों को नौकरियाँ देता है, नौकरियों से बर्खास्त करने की ताकत रखता है।

शासक वर्ग के विचार उसकी आवश्यकता जनित विचार होते हैं। यदि वह अपने विचार न मनवाए, दंडित न करे, तो लोग उसे चुनौती देने लगेंगे, यहाँ तक कि जनता किसी भी देश के राजा/प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति का गला भी काट सकता है।” आनंद जी इसीलिए कहते हैं कि उस संसदीय लोकतंत्र का जो भी भागीदार बनेगा, उसको शासक वर्ग के विचारों का पालन करना पड़ेगा। यहाँ मनमानी नहीं चलती है। यह अलग बात है पूँजीपति हमेशा दबंगो का साथ लेता है और दबंगों का साथ देता है। आनंद जी अक्सर कहते हैं, सरकार पूँजीपतियों की मैनेजिंग कमेटी हुआ करती है। भारत हमेशा से वर्णों/जातियों का देश रहा है। हमेशा सरकार में सवर्ण रहे हैं। पूँजीपतियों का सवर्णों से हमेशा गठबंधन रहा है। आज भी पूँजीपति वर्ग सरकार में नस्लवादी जातियों के बल पर पूँजी कमाने का उद्योग जारी रखा है। आनंद जी कहते हैं जब तक उत्पादन के संसाधनों पर कब्जा नहीं किया जाएगा तब तक सरकारी संस्था पूँजीपतियों के इशारे पर नाचेगी। हमें देश की संपत्ति और संसाधनों पर कब्जा कर सरकारी संस्था का प्रयोग करते हुए सर्वहारा (बहुजन) की तानाशाही द्वारा जातीय और धार्मिक अस्मिताओं को घर के भीतर रहने को बाध्य करना पड़ेगा। आनंद जी की एक कविता है “मसौदा”। उस मसौदा कविता में आनंद जी ने वह सारी बातें बताने की कोशिश की है जिससे वर्चस्ववादी/जातिवादी/ब्राह्मणवादी/नस्लवादी लोगों के मंसूबे फेल हो जाएँगे और जातिप्रथा टूट सकती है।

लेकिन, दुर्भाग्य है। ऐसा सोचने और कहने से आम्बेडकरवादी दलित साथी आर डी आनंद पर हमलावर हो जाते हैं। दलित कहता है कि ब्राह्मण/क्षत्रिय कभी प्रगतिशील हो ही नहीं सकता है। ब्राह्मणों ने कम्युनिस्ट पार्टी ही इसलिए बनाई थी जिससे लोग गुमराह हो जाँय और ब्राह्मणवाद विरोध के रास्ते से भटक जाँय। यहाँ तक कि आर डी आनंद जैसे प्रबुद्ध दलित मार्क्सवाद का झुनझुना पकड़ लें जिससे आम्बेडकरवाद कमजोर बना रहे। आर डी आनंद जैसी मेधाएँ दलित मेधाएँ हैं, यदि ये दलित संगठनों में आम्बेडकरवादी विचारों पर कार्य करेंगी, तो ब्राह्मणवाद को उखाड़ फेंका जा सकेगा लेकिन यदि प्रभु वर्ग आनंद जैसी प्रतिभाओं को गुमराह कर ले जाएँगी तो दलित क्रांतियाँ दिग्भ्रमित होकर बिखर जाएँगी। आर डी आनंद जी के मार्क्सवादी होने पर दलित वर्ग बहुत नाराज रहता है। आर डी आनंद का मार्क्सवादी होना जैसे कोई अपराध हो। आर डी आनंद एक तर्क प्रस्तुत करते हैं कि आरएसएस/बीजेपी/शिव सेना/बजरंग दल/वशव हिन्दू परिषद/ब्राह्मण महासभा/चाणक्य परिषद इत्यादि घोर ब्राह्मणवादी संगठन मार्क्सवाद को आतंकवादी सिद्धांत मानते हैं। वे मार्क्सवाद से चिढ़ते हैं। वे मार्क्सवादियों से घोर नफरत करते हैं। यह बात समझ में आती है क्योंकि मार्क्सवाद विज्ञान को मानता है, धर्म और ईश्वर में विश्वास नहीं करता है, मनुष्य का मनुष्य के द्वारा किसी भी तरह के शोषण के विरुद्ध क्रान्ति का उद्घोष करता है, विषमता और जातिवाद के विरुद्ध समता और बन्धुत्व की बात रखता है।

एक तरह से मार्क्सवाद कम्पलीट ब्राह्मणवाद का वर्ग-शत्रु है। दूसरी तरफ, सभी दलित जातियाँ/आम्बेडकरवादी/दलित संगठन भी मार्क्सवादी सिद्धान्तों का विरोध करते हैं। मार्क्सवाद को विदेशी विचार मानते हैं। मार्क्सवाद को भारत में न लागू होने वाला विचार मानते हैं। मार्क्सवादियों को छद्म ब्राह्मणवादी मानते हैं। दलित और आम्बेडकरवादी मार्क्सवाद को बिल्कुल नहीं पढ़ना चाहता है। जो दलित चिन्तक/बुद्धिजीवी/साहित्यकार मार्क्सवाद की आलोचना करता है वह मार्क्सवाद की सुनी/सुनाई बातों के आधार पर आलोचना करता है। आर डी आनंद दलित बुद्धिजीवियों से हमेशा निवेदन करते हैं कि दलित साथियों को मार्क्सवाद की संतुलित आलोचना करने के लिए भी मार्क्सवादी सिद्धांतों को मार्क्स की मूल पुस्तकों से पढ़कर करना चाहिए। आनंद जी एक बहुत सही बात कहते हैं कि आम्बेडकरवादी साथी अपने सदियों के शोषक/उत्पीड़क ब्राह्मण वर्ग की सारी झूठी किताबों को आलमारी में ठूस/ठूस कर रखता और पढ़ता है। रामायण/महाभारत/गीता/मनुस्मृति/पुराणों के एक/एक दोहा/चौपाई/सोरठा/छंद/श्लोकों को संस्करण, प्रकाशन और पृष्ठ सहित उल्लिखित करता है लेकिन जो सिद्धांत क्रान्तिकारी है लेकिन गलत हाथों में है, इसे छीनकर अपनाने के बजाय उसे दुतकारता है और इस हथियार से महरूम रहना चाहता है। ऐसे अनेक कारण हैं जिससे आम्बेडकरवादी दलित साथी आर डी आनंद जैसों से नाराज रहते हैं। आनंद जी कहते हैं कि दलितों को ऐसे लोगों को गैर-आम्बेडकरवादी अथवा बेकार आम्बेडकरवादी कहकर शत्रु की तरह नहीं व्यवहार करना चाहिए और न ही उन्हें मित्र कैटेगरी से निकाल ही देना चाहिए, वे सभी आम्बेडकरवादी शक्तियों की मित्र शाक्तियाँ हैं। इनको अमित्र करके दलित साथियों को स्वयं नहीं कमजोर हो जाना चाहिए। हमारी लड़ाई बहुत कठिन है। हमें इस लड़ाई को जीतने के लिए एक कदम आगे तो दो कदम पीछे भी हटाना पड़ सकता है। समझौते कभी भी हार नहीं होते हैं बल्कि विजय के लिए शक्ति ग्रहण करने का अवसर प्रदान करते हैं।

सोसल मीडिया पर हर पल “आम्बेडकरवाद क्या है अथवा आम्बेडकरवाद किसे कहते हैं” तथा “असली आम्बेडकरवादी कौन है” पर विवाद होता रहता है। मैंने देखा है इस युद्ध के शिकार आर डी आनंद जी भी हुए हैं। आनंद जी पर सबसे खतरनाक इल्जाम तो यह है कि वह मार्क्सवादी हैं इसलिए वे असली आम्बेडकरवादी हो ही नहीं सकते हैं। दूसरी बात, आनंद जी आम्बेडकर साहब के “जातिप्रथा उन्मूलन और राजकीय समाजवाद” के सवाल पर दलितों से कहते हैं कि यह दोनों सवाल संसदीय लोकतंत्र के रास्ते नहीं चल किया जा सकता है। इन सवालों को हल करने के किए बीएसपी, बामसेफ और बीएमपी से काम नहीं चलेगा बल्कि ये पार्टियाँ तो घोर दक्षिणपंथी और आलोकतांत्रिक हैं। इनमें लोकतंत्र है ही नहीं बल्कि ये अधिनायकवादी लोकतंत्र में विश्वास करती हैं। इनके अध्यक्ष का कभी चुनाव नहीं होता है जो एक बार हो गया वही स्थाई तौर पर चलता रहेगा। आनंद जी मान्यवर कांशीराम के सिद्धांतों को डॉ. आम्बेडकर के सिद्धांतों के विरुद्ध मानते हैं। सुश्री मायावती ने तो डॉ. आम्बेडकर को कौन कहे, मान्यवर कांशीराम के सिद्धांतों को भी तिलांजलि दे दिया है। बहुजन मुक्ति पार्टी का सिद्धांत एक निराला सिद्धांत है जो ब्रह्माणों को यूरेशिया खदेड़कर दूसरी आज़ादी के सपने दिखा रहा है तथा आम्बेडकर के विचारों से कुछ भी लेना देना नहीं है। ऐसा कहने से दलित वर्ग आर डी आनंद से नाराज हो जाता है। इसी तरह बहुत से आम्बेडकरवादी हैं जो भिन्न/भिन्न तरह से चिंतन करते हैं। कुछ स्वयंभू आम्बेडकरवादी ऐसे अनेक साथियों को आम्बेडकरवादी नहीं मानते हैं और अपनी फ्रेंड लिस्ट से अमित्र कर देते हैं, यहाँ तक कि ऐसे व्यक्तियों से ऐसे लोग घृणा/वैमनस्य करते हैं तथा शत्रु मान बैठते हैं।

आर डी आनंद ने ऐसे ही व्यक्तियों के चलते आम्बेडकरवादियों की बहुत ही खूबसूरत और सरल परिभाषा दी है, “वह हर व्यक्ति आम्बेडकरवादी है जो ब्राह्मणवाद का विरोध करता है। संभव है, कोई बौद्ध धर्म अपना कर ब्राह्मणवाद का विरोध करता है। कोई जातिप्रथा उन्मूलन की सीधी लड़ाई लड़ कर ब्राह्मणवाद का विरोध करता है। कोई समता, स्वतंत्रता और बन्धुत्व की स्थापना को सही मान कर ब्राह्मणवाद का विरोध करता है। कोई भाग्य/भगवान, आत्मा/परमात्मा, पूर्वजन्म/पुनर्जन्म, पुण्य/पाप, प्रारब्ध/संचित फल, जादू/टोना, तंत्र/मंत्र को न मान कर ब्राह्मणवाद का विरोध करता है। कोई राजकीय समाजवाद की स्थापना को ही ब्राह्मणवाद विरोध मानता है। कोई किसी भी तरह ब्राह्मणवाद का विरोध कर रहा है, वह आम्बेडकरवादी है।” आनंद जी कहते हैं ऐसे लोग हमारी मित्र शाक्तियाँ हैं। भिन्न मत के कारण उन्हें अमित्र की श्रेणी में नहीं रखना चाहिए। आर डी आनंद जी ब्राह्मणों का उदाहरण देकर आम्बेडकरवादी दलित साथियों को समझाते हैं कि, “ब्राह्मण वर्ण विभिन्न उपजातियों में बँटा है। सभी उपजातियाँ अन्य वर्णों से स्वयं को श्रेष्ठ मानती हैं और आपसी उपजातियों के सामाजिक स्तर के अनुसार सभ्यता/संस्कृति/व्यवहार/अभिवादन इत्यादि का अनुपालन करती हैं लेकिन हीन भावना से कभी भी ग्रसित नहीं रहती हैं। वे आपस में समता, स्वतंत्रता और बन्धुत्व का भाव रखती हैं।

ब्राह्मणों के 33 करोड़ देवी/देवता हैं। विभिन्न स्थानों पर अलग/अलग देवताओं का महत्व है और अलग/अलग देवताओं की पूजा होती है। कोई राम को ईश्वर मानता है और पूजता है। कोई श्रीकृष्ण को ईश्वर मानता है और पूजता है। कोई शंकर भगवान को सबसे बड़ा ईश्वर मानता है और उनकी पूजा करता है। कोई हनुमान की पूजा करता है। कोई गणेश को मानता है। कोई दुर्गा को आदि शक्ति मानते हुए ईश्वर से बड़ा मानता है। कोई काली को सर्वश्रेष्ठ मानता है। कोई काल को आदि ईश्वर मानता है। सभी के अपने/अपने ईश्वर हैं। सभी की अलग/अलग अस्थाएँ हैं। सभी की पूजा पद्धतियों में अंतर है। रामायण हो या रामचरितमानस, महाभारत हो या गीता, मनुस्मृति हो या उपनिषद, उसमें लिखित चौपाइयों, दोहों, छंदों, श्लोकों, मंत्रों के अलग/अलग टीकाएँ हैं, अलग/अलग भाष्य हैं और अलग/अलग टिप्पणियाँ हैं लेकिन कोई भी मनीषी/ऋषि/मुनि/विद्वान/लेखक आपस में अपने मंतव्यों/विचारों को लेकर कदापि नहीं लड़ते हैं। यदि भाष्य को लेकर मनीषियों में टकराव हो ही गया, तो किसी एक को सत्य घोषित करने की ज़हमत नहीं उठाई जाती है बल्कि अलग/अलग सभी टिप्पणियों/सभी भाष्यों को सत्य मान लिया जाता है। ब्राह्मण ईश्वर, देवता, देवी, पूजा, पूजा पद्धति, संस्कार, संस्कृति, भेषभूषा इत्यादि के अलग/अलग मानने और उस अनुसार किए जाने पर एक दूसरे को शत्रु नहीं मानता है और न मनमुटाव करता है। ब्राह्मण वर्ण का मूल उद्देश्य अधिभौतिक सत्ता में विश्वास बनाए रखने, अपने वर्ण को श्रेष्ठ समझने का मनोवैज्ञानिक चिंतन बरकरार रखने, शूद्र जातियों को किसी भी तरह झूठ में फँसाए रखने का फ़रेब करने, उत्पादन और उत्पादन के साधनों पर वर्चस्व स्थापित किए रहने तथा छुआछूत/भेदभाव/ऊँचनीच/जातिवाद करते रहने में दलितों के विरुद्ध ब्राह्मणों में एकता बनाए रखना है। ब्राह्मण अनेक विभिन्नताओं के बावजूद भी अपनी उपजातियों को ब्राह्मण न समझने की भूल/गलती कभी नहीं करता है।” ब्राह्मणवादियों के संगठित विचार और व्यवहार को देखते हुए आर डी आनंद जी हमें सीख देने की कोशिश करते हुए कहते हैं, “आम्बेडकरवादियों को ब्राह्मणों से सीखना चाहिए। आम्बेडकरवादियों में आपसी मतैक्य न होने के उपरांत भी उन साथियों को एक दूसरे को आम्बेडकरवादी समझते रहना चाहिए, जो मूलतः ब्राह्मणवाद विरोधी हैं।”

आर डी आनंद अनीश्वरवादी व्यक्ति हैं। बहुत से नास्तिक ईश्वर को नहीं मानते हैं। आनंद जी कहते हैं कि हमारे मानने न मानने का सवाल ठीक नहीं है। ईश्वर नहीं है को समझिए। आखिर ईश्वर क्यों नहीं है?  ईश्वर को ब्रह्माण्ड, प्रकृति, पदार्थ, प्रक्रिया, जीव, देवी, देवता, भूत, प्रेत, जानवर, मनुष्य सब का रचयिता, नियंता, पालक, संहारक माना जाता है। ईश्वर को सर्वशक्तिमान कहा जाता है। अनेक धर्मों के लोग ईश्वर के अस्तित्व को सपने में भी इनकार करने की हिम्मत नहीं कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में नास्तिक होना एक बात है। ईश्वर को न मानना एक बात है। किसी वस्तु को न मानने का अर्थ यह भी हो सकता है कि यह हमारी प्रतिक्रिया हो, फिर न मानने का अर्थ यह भी है कि वह वस्तु अस्तित्व में है जिसे हम नहीं मानते हैं। आनंद जी कहते हैं कि ईश्वर नहीं है। वे कहते है, हमें सार्वभौम के विकास के नियमों को समझने की कोशिश करनी चाहिए, तब हम ईश्वर की उत्पत्ति, विकास और उसके अस्थायित्व के वास्तविक कारण को समझ सकेंगे, तब हम कह सकेंगे कि ईश्वर नहीं है।

आर डी आनंद ईश्वर, देवी, देवता, भूत, प्रेत न मानने के बावजूद भी किसी धर्म, उसके ईश्वर, इबादत और पवित्र पुस्तक के प्रति अपशब्द कहने को मना करते हैं। वे कहते हैं, यह उसकी अज्ञानता जरूर है लेकिन यह उसकी आस्था भी है। आस्था में तर्क नहीं चलता है। पब्लिक धर्म और ईश्वर पर कोई तर्क करना भी नहीं चाहती है। वह सिर्फ इतना जानती है कि ईश्वर की इच्छा के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता है। ईश्वर की मर्जी के बिना संसार चल नहीं सकता है। ईश्वर ही सब को पैदा करता है, वही सब को मारता है। यह संसार शून्य है। इस शून्य में यह संसार ईश्वर की माया है। जब हम किसी धर्म, मजहब, ईश्वर, धार्मिक पुस्तक, इबादत, पूजापाठ, उसके भेषभूषा, रहन-सहन पर कुठाराघात करते हैं, उसकी निंदा करते हैं, अपमानित करते हैं अथवा निरादर करते हैं, तो अमुक धर्म के व्यक्ति का पीड़ित होना स्वाभाविक है। यहीं से धार्मिक असहिष्णुता पनपती है। जब भी वे प्रतिक्रियाएँ करते है, कोई न कोई बड़ा विवाद व साम्प्रदायिक दंगे इत्यादि घट ही जाते हैं। आनंद जी का मानना है कि अधिभौतिक सत्ता और शक्ति के विरोध करने से उसकी मान्यताएँ नहीं खारिज़ की जा सकती हैं। इन अधिभौतिक धारणाओं का विकल्प सिर्फ वैज्ञानिक चेतना/शिक्षा है। किसी के धर्म और ईश्वर पर कटाक्ष व तर्क प्रस्तुत करने पर वह सिर्फ नाराज ही होता है, सुधार बिल्कुल कुछ नहीं होता है बल्कि इसके विपरीत प्रतिक्रिया करने वाले व उसके समुदाय के प्रति एक विषाक्त प्रतिक्रिया/नफरत जन्म लेती है। हमारा उद्देश्य धार्मिक जड़ता को खत्म कर वैज्ञानिक चेतना विकसित करना है। इसके लिए हम कार्यक्रम आयोजित तो करें लेकिन यह ध्यान रखें कि किसी के धार्मिक आस्था को चोट पहुँचाए बिना ही हम वैज्ञानिक शिक्षा व चेतना का प्रचार/प्रसार करें। आनंद जी विशुद्ध अनीश्वरवादी व अधार्मिक होते हुए भी किसी के तीज/त्योहार, होली/दिवाली, भैया दूज/रक्षा बंधन की खिल्ली नहीं उड़ाते हैं। यह भी सच है कि इन त्योहारों की महत्ता से वे इनकार करते हैं और इन्हें जड़ परंपरा कहते हैं। कई बार आम्बेडकरवादी साथी आनंद जी की इस बात की निंदा करने लगते हैं जो उन्हें नजदीक से नहीं जानते हैं या उनके समुचित विचारों/योजनाओं से परिचित नहीं हैं। आनंद जी एक बहुत ही तर्कपूर्ण और चिंतनपरक विचार प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि किसी भी देश की अशिकांश पब्लिक निरक्षर/अशिक्षित/गैर-वैज्ञानिक/परम्परावादी होती है।

शासक जातियाँ पब्लिक को अशिक्षित और आस्थावान बनाए रखने की पूरी करती हैं इसलिए किसी भी क्रान्तिकारी/मार्क्सवादी/आम्बेडकरवादी साथी को पब्लिक की जड़ आस्थाओं के विरुद्ध बहुत ही रणनीतिक तौर पर व कुशल योजनाओं के साथ खड़ा होना चाहिए। पब्लिक का हमारे विरुद्ध हो जाना हमारी क्रान्तिकारी शक्ति में दीमक लगने जैसा है। यह सच है कि शासक जातियाँ इसी पब्लिक की जड़ताओं का प्रयोग करते हुए शासन करती हैं और दंगे आयोजित करती है लेकिन हमें यह बात गाँठ बाँध कर रखना चाहिए कि यह पब्लिक हमारा वर्ग है, यही शोषित वर्ग है, यही उत्पीड़ित वर्ग है, यही सर्वहारा है, यही दलित है। इस वर्ग का हमारे विरुद्ध हो जाना ठीक नहीं है। पब्लिक के विचार और पब्लिक के मध्य के शासक वर्ग के विचार में हमें भिन्नता करना सीखना पड़ेगा। आनंद जी कहते हैं, भारतीय ब्राह्मण/क्षत्रिय जातियों के सभी लोगों को एक मान लेना और एक मानकर प्रतिक्रिया देना शासक वर्ग को फायदा पहुँचाना हो जाएगा। सवर्ण जातियों के सभी सदस्यों को शासक और जड़ नहीं माना जा सकता है। बहुत बारीक अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि सवर्ण जातियों में एक शोषक वर्ग है जो अपनी ही जातियों को अशिक्षित/बेरोजगार/जड़/शोषित/उत्पीड़ित बनाए रखने की हर कोशिश करता है बल्कि भावनात्मक दोहन करने के लिए उसे कट्टर धार्मिक धार्मिक बनाए रखने के लिए समुचित प्रयास करते हैं। दलित जातियाँ जब भी धार्मिक प्रतिक्रियाएँ करते हैं तो उससे शासक जातियाँ न आहत होती हैं और न उनका नुकसान होता है बल्कि दलित जातियों की धार्मिक/ईश्वरीय प्रतिक्रिया का सीधा असर सवर्ण जातियों के शोषित वर्ग अर्थात पब्लिक पर पड़ता है और पब्लिक अपनी प्रतिक्रिया में दलित जातियों का विरोध करते हुए गाँव के गरीब दलितों की पिटाई/हत्या/बलात्कार करती है। एक तरह से पब्लिक पब्लिक से लड़ती है और शासक जातियाँ हमारी जड़ता और बेवकूफियों पर हँसते हुए वर्ग-संघर्ष के अंदेशे से निश्चिंत रहते हैं।

आर डी आनंद बहुत आसानी से किसी के दोस्त बन जाते हैं। मैं उनका परिचय किसी व्यक्ति से करवाता हूँ तो कुछ दिन बाद ही ऐसा महसूस होता है जैसे अमुक व्यक्ति आनंद जी का बहुत पुराना मित्र है और मैं अभी-अभी परिचित हुआ हूँ। आनंद जी को प्रेरणा पुरुष कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा। वे मुझे अनेक बातों/विचारों को शेयर करते हुए अनेक पुस्तकों को पढ़ाते हैं और अनेक पत्रिकाओं को देते हैं। उनके पास ऑफिस में प्रतिदिन ¾ पत्रिकाएँ आती ही रहती हैं। मैं मंडल कार्यालय में पोस्ट हूँ और वे शाखा कार्यालय में। शाखा कार्यालय ग्राउंड फ्लोर पर है और मेरी ऑफिस तीसरे फ्लोर पर। वे लंच के बाद मुझे जरूर फोन करके बुलाते हैं कि शास्त्री जी फलाँ-फलाँ पत्रिकाएँ आ गई हैं, ले जाइए। आर डी आनंद जी अभी भी मुझे “सर्वहारा दृष्टिकोण”, “डेमोक्रेसी”, “लोकलहर”, “संघर्ष”, “साहित्य एक्सप्रेस”, “डिप्रेस्ड एक्सप्रेस”, “आदित्य संस्कृति”, “समयांतर”, “सब लोग”, गाँव के लोग”, “लहक”, “आम्बेडकर इन इंडिया”, “आम्बेडकर मिशन”, “बाबा साहब टुडे”, “हाशिए पर”, “हाशिए की आवाज”, “जनमत”, “लोकयुद्ध”, “बिगुल”, “आह्वान” देते हैं। ऐसी और कई पत्रिकाएँ हैं जिसे वे मुझे पढ़ाते ही पढ़ाते हैं। ऐसा वे सिर्फ मेरे साथ नहीं करते हैं, वे किसी भी अच्छी पत्रिका को कम से कम 10 मँगाते हैं तथा 10 साथियों को पढ़ाते हैं। उनके अच्छे मित्रों में अन्य साथी भी हैं जिन्हें वे किताबें खरीदने और पढ़ने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। उन्होंने एक दिन बहुत दुखी होकर कहा, शास्त्री जी! दलित “जय भीम-जय भीम” कहते नहीं थकता है और ब्राह्मणों/क्षत्रियों को दलित विरोधी कहकर उलझा रहता है। दलित कहता है कि वह आम्बेडकरवादी है, वह ब्राह्मणवाद की चूलें हिला देगा लेकिन अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि लगभग 25 वर्ष फैज़ाबाद में रहते हो गया किसी भी आम्बेडकरवादी के घर में बाबा साहब का वाङ्गमय नहीं है। जिस साथी से पूँछता हूँ कि बाबा साहब की कौन-कौन सी पुस्तक पढ़े हैं, तो दाँत चिआर देते हैं। आर डी भाई! जातिप्रथा उन्मूलन पढ़ा है। जब पूँछता हूँ उसमें क्या है तो कहेंगे कि बाबा साहब ने लिखा है आर्य विदेशी हैं। आर्यों ने भारत के आदिवासियों/मूलनिवासियों पर आक्रमण करके इसकी सभ्यता/संस्कृतियों और उपलब्धियों को नष्ट कर दिया तथा हमारी बहन/बेटियों पर कब्जा कर लिया। हमें गुलाम बना लिया। आगे कहेंगे कि बाबा साहब ने लिखा है कि ब्राह्मणों ने बड़ी चालाकियों से जाति बना कर हमें शूद्र घोषित कर दिया। इनका कहना है कि अंतरजातीय भोज और विवाह से जातिप्रथा खत्म किया जा सकता है। दलितों के इन बातों/विचारों से लग जाता है कि उन्होंने किताब नहीं पढ़ी है बल्कि सुनी/सुनाई बातों को कहकर उसी झूठ को दोहरा रहे हैं जिसे बाबा साहब ने बिल्कुल नहीं कहा है।

आखिर जातिप्रथा कैसे खत्म होगी? जिस वर्ग को जातिप्रथा के विरुद्ध लड़ना है वह अपने ही क्षमताओं और संज्ञान के प्रति लापरवाह है, झूठ बोलता है, लिखने/पढ़ने में रुचि नहीं लेता है। अखिर युद्ध के लिए बलिदान कैसे देगा। अन्य पुस्तकों के बारे में बड़ा सा सिर हिला देगा कि नहीं भाई साहब और तो नहीं पढ़ा है। आनंद जी ने मुझसे कहा कि बाबा साहब की सभी पुस्तकों का मूल्य 750/-रुपए हैं। कम से कम आप तो मँगवा लीजिए। पढ़ डालिए। हम लोगों के एक मित्र हैं श्री विनीत मौर्या जी। वे हम सब को बहुत प्यार करते हैं। वे बौद्धिष्ट भी हैं। अक्सर दिल्ली जाते रहते हैं। आनंद जी ने विनीत जी से 2015 में सम्पूर्ण वाङ्गमय (21 खण्ड) को 10 सेट मँगवाया। एक सेट भारतीय जीवन बीमा निगम की लाइब्रेरी में रखवाया। एक सेट मुझे दिया। एक सेट अपने सामने राजेश मास्टर साहब को दिया। इस तरह कई साथियों को जबरदस्ती किताबें उपलब्ध कराई। मैंने उनके द्वारा निर्दिष्ट विषयों को पहले पढ़ा। मुझे बहुत अफसोस हुआ कि हम लोग किस तरह के आम्बेडकरवादी हैं जो बाबा साहब को समझते ही नहीं बल्कि बाबा साहब के नाम पर बाबा साहब के विचारों के विपरीत उनका प्रचार/प्रसार कर रहे हैं। शुक्रिया आनंद जी कि आप ने हमारे जैसे बहुत से दलितों/आम्बेडकरवादियों की आँखे खोल दी हैं।

आर डी आनंद के कुछ विचित्र गुण हैं; जैसे दोस्त बनाने की कला। पढ़ने की कला। लिखने की कला। भाषण देने की कला। मोबाइल पर एक अँगुली से बहुत तेज टाइप करने की कला। कविता लिखने की कला। लेख लिखने की कला। संगठन में नेतृत्व की कला। ट्रेड यूनियन चलाने की कला। हँसी/मजाक की कला। पत्नी को खुश रखने की कला। बच्चों को दोस्त बना लेने की कला। किसी की भी गलतियों को नजरअंदाज करने की कला। लोगों की गलतियों को माफ करने की कला। स्वयं की गलती को समझ जाने पर तत्काल क्षमा याचना कर लेने की कला। यदि माहौल/सम्बन्ध दूसरों की वजह से भी बिगड़ जाने की संभावना है तो वहाँ भी अपनी पहल/विनम्रता पर उदार होकर माहौल शान्त करने की कला। दूसरों के दुख/सुख में बढ़/चढ़ कर हिस्सा लेने की कला। सुख/दुख में समरूप रहने की कला। चिंता को धुएँ में उड़ा देने की कला। ठाट/बाट से रहने की कला। खूबसूरत कपड़े पहनने की कला। बीमारी को भाँफ लेने की कला। गंभीर बीमारी में भी धैर्य रखने, मुस्कुराने और दूसरों को सामान्य बनाए रखने की कला। संतुलित आहार/विहार की कला। रोमांटिक रहने की कला। युवा बने रहने की कला। विवाद रोकने की कला। फोटो खींचने की कला। फोटो खिंचवाने की कला। अच्छी/अच्छी किताबें जुटाने की कला। वैचारिक हस्तक्षेप की कला। प्रगतिशील सवर्णों से मित्रता जोड़ने की कला। परम्परावादी सवर्णों को बौद्धिक रचनात्मकता से प्रतिक्रिया करने से रोकने की कला।

आर डी आनंद अपने अनेक कलाओं में माहिर होने की वजह से फैज़ाबाद के इकलौते दलित हैं जो प्रगतिशील सवर्णों के मध्य, उनके घरों में, उनके सभाओं में, उनके शादी/ब्याहों में और उनके बहस/मुबाहिसों में पाए जाते हैं। आनंद जी अपनी प्रगतिशीलता की वजह से प्रगतिशील सवर्णों में अत्यधिक लोकप्रिय हैं। यदि मैं आनंद जी का मित्र न होता तो मैं भी कहता कि आर डी आनंद को सवर्णों ने बेवकूफ़ बना रखा है और इनका ब्राह्मणवाद के हितों में सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक प्रयोग करते हैं लेकिन चूँकि मैं भी धीरे/धीरे इनके साथ कुछ सवर्ण साथियों के घर आने/जाने लगा, तो पाया कि ऐसा बिल्कुल नहीं है। मेरा एक भ्रम और टूटा कि सभी सवर्ण दलितों को अलग गिलासों/गंदे गिलासों में चाय देते हैं। नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं हैं। अधिकतर सवर्णों के घर बिल्कुल दलितों के साथ ऐसा व्यवहार होता है लेकिन जिनके साथ आनंद जी जुड़े हैं, वे सवर्ण बिल्कुल ऐसा नहीं करते हैं। अब मैं भी प्रगतिशील लेखक संघ/जनवादी लेखक संघ/जनसंस्कृति मंच और अन्य संगोष्ठियों में भाग लेने लगा हूँ। उन संगोष्ठियों में कभी भी परम्परावादी/वर्चस्ववादी सवर्णों जैसा दलित विरोधी मनुस्मृति को लागू किए जाने की बातें/दलितों को सताए जाने की बातें/दलितों को गुलाम बनाए रखने की बातें/दलितों से छुआछूत करने की बातें नहीं की जाती हैं बल्कि जाति की व्यवस्था और हर तरह से शोषण की व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की बातें की जाती हैं।

सवर्णों के गैर-वैज्ञानिक बातों का विरोध दर्ज किया है। हमारे शहर के सवर्ण साथियों में डॉ. रघुवंशमणि त्रिपाठी, डॉ. अनिल कुमार सिंह, कृष्ण प्रताप सिंह, सुमन गुप्ता, अशोक कुमार तिवारी, अतीक अहमद, सत्यभान सिंह, जशवंत अरोड़ा, स्वप्निल श्रीवास्तव, एस एन बागी, रामतार्थ पाठक, अयोध्या तिवारी, डॉ. परेश पांडेय, डॉ. अनुराग मिश्रा, डॉ. विशाल श्रीवास्तव, गोपालकृष्ण वर्मा, अफाक उल्लाह, धीरज द्विवेदी, दिनेश सिंह, आर जे यादव इत्यादि साथियों का नाम लिया जा सकता है। आनंद जी का मानना है कि ये सवर्ण शहर के प्रतिष्ठित सवर्णों में हैं। इसके प्रगतिशीलता के सहारे हम अन्य सवर्णों के मध्य भी पहुँचते हैं। उनसे भी वैज्ञानिक शिक्षा की बात करने का अवसर मिलता है। यह बात सही है कि दलित मित्रों को परम्परावादी सवर्णों के मध्य वर्ग की बात पर उन्हें सहमति करने के लिए बहुत सावधानी और अत्यधिक विवेक व्यय करने की तत्परता दिखानी पड़ती है लेकिन इससे वे हमारे व्यवहार और सद्भभावनाओं से परिचित होकर प्रभावित जरूर होते हैं। क्रान्तिकारी दलितों को प्रगतिशील सवर्णों के साथ मिलकर परम्परावादी मूल्यों को पीछे धकेलने का सुअवसर और मित्रता प्राप्त होती है। आनंद जी कहते हैं यह सिलसिला एक दिन चलाने से कुछ हासिल नहीं होने वाला है बल्कि इसे निरंतर प्रक्रिया में ढालना पड़ेगा, तो निश्चित ही उस वर्ग से सच्चे क्रान्तिकारी सच्चे दलित क्रान्तिकारियों का साथ देंगे। इस तरह ब्राह्मणवाद कमजोर होगा तथा पूँजीवाद विरोधी समाजवादी क्रान्ति का रास्ता प्रशस्त होगा।

एक और विचित्रता की तरफ ध्यान आकृष्ट करना जरूरी समझ रहा हूँ। भारतीय जीवन बीमा निगम का फैज़ाबाद मंडल 1 मई 2007 में प्रारम्भ हुआ। सभी ट्रेड यूनियनें संगठन बनाने के लिए जोर मारने लगीं। भारतीय जीवन बीमा निगम के राष्ट्रीय  संगठन “एआइआइईए” ने फैज़ाबाद मंडल में अपना मंडलीय संगठन बनाने का प्रयास शुरू कर दिया। 4 नवम्बर 2007 को “बीमा कर्मचारी संघ फैज़ाबाद डिवीजन” नाम से एक संगठन निर्मित कर आर डी आनंद जी को मंडल अध्यक्ष और रवि चतुर्वेदी को महामंत्री घोषित कर दिया गया। ये दोनों निर्विरोध चुने गए साथी हैं। यह एक महत्वपूर्ण बात है। तब से अब तक हर बार आनंद जी निर्विरोध अध्यक्ष हैं। इस बात में विचित्रता यह है कि इस ट्रेंड यूनियन के सभी पदाधिकारी और सदस्य ब्राह्मण हैं। यह भी विचित्र है कि यह जगह अयोध्या में हैं जहाँ सारे ब्राह्मण हिंदू राष्ट्र और राम मंदिर के लिए देश भर से इस स्थल की तरफ केंद्रित होते हैं। निश्चित यह बात देश के महत्वपूर्ण व्यक्तियों के मध्य विचरती होगी। सामान्य तरह से कहा जा सकता है कि ब्राह्मणों ने जब बड़े/बड़े मेधाओं को लील लिया है तो आर डी आनंद की क्या बिसात। यह सच भी हो सकता है लेकिन आर डी आनंद आम्बेडकरवादी हैं जिसने बाबा साहब को न सिर्फ विधिवत पढ़ा है, समझा भी है और बाबा साहब के अनेक विचारों को बिना लागलपेट ट्रेड यूनियन सभाओं में बोलते हैं।

ब्राह्मणवाद के वर्चस्ववादी विचारों और रवैये का खुलासा करते हुए विरोध करते हैं। निश्चित आनंद जी ब्राह्मणों के मध्य दब्बू और डरपोक दलित बुद्धिजीवी नहीं हैं। आर डी आनंद एक विशुद्ध मार्क्सवादी भी हैं। एक मार्क्सवादी होने के नाते वे निश्चित ही मजदूरों के मध्य वर्गीय एकता तलाशते रहते हैं। यह अलग बात है कि भारत की सभी वामपंथी ट्रेड यूनियनें ब्राह्मणवाद से प्रभावित हैं। आनंद जी ट्रेड यूनियन में शामिल ब्राह्मण नेताओं से अपेक्षा नहीं करते हैं बल्कि वे कर्मचारियों में आम्बेडकर साहब के समता, स्वतंत्रता, बन्धुत्व, राजकीय समाजवाद तथा जातिवाद के विरुद्ध शासक जातियों के जातिवादी/वर्चस्ववादी रवैए को सविस्तार समझाते रहने का उद्यम करते रहते हैं। इसी तरह वे मार्क्सवाद की अवधारणा के अनुसार साथियों में भाग्य, भगवान, धर्म, सम्प्रदाय, पूर्वजन्म, पुनर्जन्म, प्रारब्ध इत्यादि के निरर्थकता की व्याख्या करते रहते हैं। चूँकि, वामपंथ मार्क्सवाद के सिद्धांतों का संगठन है इसलिए भी आर डी आनंद जैसे मार्क्सवादी दलित साथी का ट्रेंड यूनियन में होना आवश्यक है। आर डी आनंद के होने से ब्राह्मणवादी ब्राह्मण वामपंथ को अधिक नहीं छल पाएँगे। एक दौर ऐसा भी आया जब आनंद जी ने यह सुनिश्चित किया कि वे ट्रेड यूनियन से इस्तीफा दे देंगे क्योंकि ट्रेड यूनियन के सभी साथी यहाँ दलितों और ब्राह्मणों के सभी कर्मचारियों को संगठित रहने की बात जरूर करते हैं लेकिन यह कैसा संगठन है जहाँ सभी एक रहें लेकिन लोकसभा और विधान सभा का चुनाव होते ही सभी ब्राह्मण ट्रेड यूनियनिस्ट अपने जातीय संगठन बीजेपी को ही वोट देते हैं। वे खिन्न हो चुके थे कि अभी तक कोई भी ब्राह्मण ट्रेड यूनिनिस्ट मार्क्सवाद के सिद्धांत वर्ग-संघर्ष के लिए व्यवहारिक कौन कहे, सैद्धांतिक रूप से भी तैयार नहीं होते हैं। यह बात हम लोग साथी कृष्णप्रताप सिंह, संपादक दैनिक जनमोर्चा, फैज़ाबाद से कह रहे थे। कृष्णप्रताप सिंह ने कहा, नहीं कॉमरेड! आप जैसे लोग यदि ट्रेड यूनियन छोड़ देंगे, तो हमारे जैसे प्रगतिशील चिंतकों के लिए उस ट्रेड यूनियन के कक्ष में बैठना नामुमकिन हो जाएगा। ऐसी हालत में वह फिर दुष्टों का अड्डा बन जाएगा। अभी आप हैं तो शहर के अनेक वामपंथी, दलित, आम्बेडकरवादी, प्रगतिशील, लेखक, कवि, शायर, अध्यापक और विद्यार्थी वहाँ बातचीत का अवसर और जगह पा जाते हैं लेकिन आप के वहाँ न रहने से, जहाँ कुछ है वहाँ कुछ नहीं रहेगा इसलिए आप का  वहाँ बने रहना भी क्रान्तिकारी उद्देश्य के लिए सार्थक है। तभी से आनंद जी वहाँ अध्यक्ष पद को सुशोभित किए हुए हैं।

सिर्फ इतनी ही विचित्रता से आर डी आनंद के सख्शियत की बात पूरी नहीं हो जाती है। जब भारतीय जीवन बीमा निगम में मंडल कार्यालय नहीं हुआ करता था, सिर्फ शाखा कार्यालय ही था; आर डी आनंद जी 14 अप्रैल और 6 दिसम्बर को श्री जयराज विमल, श्री अजय कुमार, श्री अभय राज और मुझे (रामसुरेश शास्त्री) लेकर डॉ. आम्बेडकर साहब के चित्र पर तत्कालीन शाखा प्रबंधक से माल्यार्पण करवाते थे एवं बाबा साहब के चित्र के सम्मुख नंगे पाँव खड़े होकर सभी से हाथ जोड़वाकर स्वयं बुद्ध वंदना, त्रिशरण और पंचशील का उच्चारण करते व सभी से उच्चारण करवाते थे। इस तरह स्तुति के बाद शाखा प्रबंधक के सम्मुख पड़ी कुर्सियों पर हम सभी बैठ जाते थे। आनंद जी ही बैठे/बैठे 15/20 मिनट का एक भाषण देते थे। इसके बाद सभी लड्डू खाते और सभा विसर्जित कर दी जाती। जब मंडल कार्यालय बना, तब माल्यार्पण के साथ एक गोष्ठी भी आहूत की जाने लगी। बाबा साहब के चित्र के सम्मुख मंडल प्रभारी के नेतृत्व में आर डी आनंद जी 14 अप्रैल और 6 दिसम्बर को अनेक कर्मचारियों के साथ बुद्ध वंदना, त्रिशरण और पंचशील का पाठ करवाते और स्वयं एक घंटे का मुख्य भाषण देते थे। कलान्तर में, आनंद जी को अन्य शहरों/कॉलेजों/विश्वविद्यालयों/बौद्धिस्ट संस्थानों में आयोजित कार्यक्रमों में बतौर मुख्य अतिथि/मुख्य वक्ता बुलाए जाने लगा। अब समस्या यह उत्पन्न हुई कि अपने कार्यालय में आम्बेडकर जयंती एवं आम्बेडकर परिनिर्वाण का कार्यक्रम कौन संचालित करे। आर डी आनंद जी ने मुझे लिखकर रटने को कहा तथा अपने देखरेख में एक वर्ष तक शहर के कई कार्यक्रमों का विधिवत संचालन करवाया व भाषण सिखाया। कार्यक्रम पूर्व कई बार प्रस्तावित विषयों पर मुझसे अपने सामने बोलने को कहा और उसे रिकार्ड किया। कई/कई बार आनंद जी की रिकार्डिंग की हुई बातों को सुना और सफल भाषण दिया। अब मैं भी फुलफ़्लेज्ड बिना किसी के सहयोग के सभी दायित्वों को निभाता हूँ। अपने इस सफलता की क्रेडिट मैं आनंद जी को देता हूँ। आनंद जी जब कुछ मित्रों से मेरा परिचय करवाते हैं तो कहते हैं “आर डी आनंद की अनुपस्थिति में आप सभी, सभी सामाजिक/राजनीतिक/बौद्धिक कार्यों और निर्णयों के लिए शास्त्री जी को बेफिक्र आर डी आनंद समझ सकते हैं।” बात यहीं पूरी नहीं हो जाती है। जब मंडलीय एससीएसटी एसोसिएशन का निर्माण होने लगा तो हम सब आनंद जी को ही पदाधिकारी बनाना चाहते थे लेकिन आनंद जी ने कहा, ऐसा करने से अन्य साथियों का विकास रुक जाएगा और मैं “वन मैन शो” बन कर रह जाऊँगा। हमें अनेक साथियों को एक्सपर्ट बनाना चाहिए। यही अवसर है जब अन्य साथी सीखते हैं। कुछ वर्षों तक आनंद जी संरक्षक की भूमिका निभाते हुए दलित एसोसिएशन को मजबूत बनाने में सहयोग किया। एक बार आनंद जी को साथियों ने निर्विरोध एकमत से महासचिव चुन लिया और जबरदस्ती एक माह तक वे महासचिव रहे। फिर साथियों को कंविंश करके महासचिव पद से इस्तीफ़ा दिया और श्री अभयराज जी को पुनः पद संभालने के लिए राजी किया। तब से अभी तक श्री अभय राज जी महासचिव हैं। आनंद जी ने मुझे एक्टिंग महासचिव के रूप में कार्य करने की सलाह दी। उन्होंने कहा, इससे इंडस्ट्री में आप की एक हैसियत बनेगी और आप बाबा साहब के बहुत से मतों को प्रायोजित कर सकेंगे।

 

आर डी आनंद के अनुसार, “जातिप्रथा, ऊँचनीच, छुआछूत, भेदभाव, गैर बराबरी, वर्चस्व की भावना, श्रेष्ठ की भावना, जादू/टोना, तंत्र/मंत्र, भाग्य/भगवान, पाप/पुण्य, पूर्वजन्म/पुनर्जन्म, प्रारब्ध इत्यादि का चिंतन ब्राह्मणवाद है।” इसके विपरीत, “जातिप्रथा, ऊँचनीच, छुआछूत, भेदभाव, गैर बराबरी, वर्चस्व की भावना, श्रेष्ठ की भावना, जादू/टोना, तंत्र/मंत्र, भाग्य/भगवान, पाप/पुण्य, पूर्वजन्म/पुनर्जन्म, प्रारब्ध इत्यादि के विरुद्ध समता, स्वतंत्रता, बन्धुत्व, न्याय, लोकतंत्र, एक व्यक्ति एक मूल्य और राजकीय समाजवाद की स्थापना की भावना आम्बेडकवाद है।” इस खूबसूरत आम्बेडकरवादी चिंतन पद्धति के बावजूद भी बाबा साहब ने अपने ग्रंथ “जातिप्रथा उन्मूलन” में अपने इस आशय को व्यक्त किया है कि जातिप्रथा अभेद्य दीवार है। इसको खत्म किया जाना मुमकिन नहीं है। आनंद जी कहते हैं कि मान्यवर कांशीराम साहब ने सोचा कि जब जातिप्रथा अभेद्य दीवार है और इसको तोड़ना नामुमकिन है तो बेकार में इसको तोड़ने की जिद पाल कर ऊर्जा व्यय न किया जाय। उन्होंने जातियों का ध्रुवीकरण करके वोट हासिल करने का सिद्धांत प्रतिपादित किया। उन्होंने कहा यदि जाति तोड़ी नहीं जा सकती है तो सब को एकत्रित करके शासन तो किया जा सकता है। यहीं से डॉ. आम्बेडकर के सपनों का कॉन्सेप्ट चेंज हो गया। जहाँ जातिप्रथा उन्मूलन के तौर/तरीके पर विमर्श होना था और कोई क्रान्तिकारी संगठन बनाया जाना था, वहाँ जाति को मजबूत करके के लिए जातीय संगठन बना लिया गया और दिनों दिन दलित जातियों की उपजातियाँ अपनी/अपनी जाति को मजबूत और संगठित करने में लगी हैं। सभी अपना मशीहा और नेता खोज और तैयार कर रही हैं। आर डी आनंद कहते हैं कि ऐसी स्थिति में दलित ब्राह्मणवाद के विरुद्ध जातिप्रथा उन्मूलन की लड़ाई नहीं लड़ सकता है। न हमारे पास क्रान्तिकारी सिद्धांत है न क्रान्तिकारी संगठन है और जिस आम्बेडकरवाद की हम बहुत बड़ी दुहाई देते हैं, वह आम्बेडकरवाद जातिप्रथा को अभेद्य दीवार बताता है। जिस कांशीराम को हम महान प्रवर्तक कहते हैं वह जातिप्रथा को और अधिक मजबूत करता है। जिस सुश्री मायावती को हम अद्वितीय नेता मानते हैं वह सर्वजन के साथ ही संसदीय राजनीति के चक्रव्यूह में हैं। इसीलिए आर डी आनंद जी कहते हैं कि, “मार्क्सवाद ही वह रास्ता है जो आम्बेडकरवाद के सपनों को पूरा कर सकता है। मार्क्सवाद आम्बेडकरवाद का सहयोगी दर्शन है। मार्क्सवाद किसी भी तरह संसदीय राजनीति के बहकावे में नहीं फँसता है। मार्क्सवाद कभी भी नौकरशाही के झाँसे में नहीं आता है। मार्क्सवाद व्यवस्था परिवर्तन के लिए क्रान्ति को एक अनिवार्य परिघटना मानता है। मार्क्सवाद का अपना एक समाजवादी संविधान है जिसे मार्क्सवादी पूँजीवादी व्यवस्था को ध्वस्त करके लागू करना चाहता है। मार्क्सवाद कभी भी पूँजीपतियों से कोई अपेक्षा नहीं करता है और न विश्वास। मार्क्सवाद हमेशा सर्वहारा की तानाशाही से पूँजीवाद, सामंतवाद, जातिवाद जैसी बुराइयों को खत्म करना चाहता है। मार्क्सवाद पूँजीवाद के विरुद्ध समाजवादी समाज की स्थापना करना चाहता है। मार्क्सवाद कहता है कि पूँजीपति अपनी व्यवस्था को यूँ ही नहीं त्याग देंगे, इन्हें जबरन हटाना पड़ेगा। मार्क्सवाद के व्यवस्था परिवर्तन का अर्थ है मुनाफे पर टिकी उत्पादन की पूँजीवादी व्यवस्था को हटाकर लोगों के नैतिक और भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति पर आधारित समाजवादी व्यवस्था लागू किया जाय। उत्पादन की पूँजीवादी व्यवस्था में उत्पादन के सभी संसाधन चंद पूँजीपतियों के हाथों में रहता है इसलिए वह मालिक बना इतराता है, इन संसाधनों पर जबरन कब्जा करके सामूहिक हाथों में लिया जाना चाहिए।” आनंद जी कहते हैं इसलिए मार्क्सवाद अपने क्रान्तिकारी सिद्धांत को असली जमा पहनाने के लिए न सिर्फ क्रान्ति की बात करता है बल्कि क्रान्तिकारी संगठन बनाए जाने और उस पर अमल करने के सभी बिंदुओं पर चर्चा करता है लेकिन आम्बेडकरवादियों का न कोई ऐसा सिद्धांत है और न कोई क्रान्तिकारी संगठन बनाने का फार्मूला ही। आर डी आनंद जी ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद के विरुद्ध लड़ी जाने वाली दलित और सर्वहारा की लड़ाई के लिए मार्क्सवाद का पूर्ण सहयोग लिए जाने की अपील करते हैं। आनंद जी कहते है कि मार्क्सवाद एक क्रांतिकारी दर्शन तथा दलित और सर्वहारा का आधुनिकतम हथियार है। इसे छद्म सवर्ण मार्क्सवादियों से छीन लेना चाहिए। मार्क्सवाद का अध्ययन और एप्लिकेशन बाबा साहब डॉ. आम्बेडकर के हाथों को मजबूत करना है।

 

रामसुरेश शास्त्री

1270, आवास विकास कॉलोनी,
बेनीगंज, फैज़ाबाद,
अयोध्या-224001
मो.9452076620

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