‘नीला कोट लाल टाई’ का लोकार्पण और परिचर्चा

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फैजाबाद : प्रगतिशील लेखक संघ जनपद इकाई अयोध्या की  महत्वपूर्ण बैठक आज दिनांक 25 जुलाई 2021 रविवार अपरान्ह जनमोर्चा सभागार फैजाबाद में संपन्न हुई। प्रलेस अयोध्या के नवनिर्वाचित अध्यक्ष वरिष्ठ कवि श्री स्वप्निल श्रीवास्तव जी ने सभा की अध्यक्षता की तथा अध्यक्ष मंडल के वयोवृद्ध सदस्य कॉमरेड अयोध्या प्रसाद तिवारी ने संचालित किया।

वरिष्ठ मार्क्सवादी-आम्बेडकरवादी चिंतक, आलोचक एवं कवि कॉमरेड आर डी आनंद के कविता-संग्रह ‘नीला कोट लाल टाई’ का लोकार्पण हुआ। सर्वप्रथम, कविता-संग्रह पर बोलते हुए वरिष्ठ कवि श्री आशाराम जागरण ने कहा कि आर डी आनंद का यह कविता-संग्रह डॉ. आम्बेडकर के व्यक्तित्व और विचारधाराओं पर आधारित है। उनकी पहली कविता ही डॉ. आम्बेडकर पर है। उस कविता को पढ़कर डॉ. आम्बेडकर के विराट व्यक्तित्व का बोध होता है। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह साहित्यिक हो अथवा राजनीतिक, आनंद जी के इस कविता के आधार पर यदि डॉ. आम्बेडकर का मूल्यांकन लिखने बैठ जाए तो निश्चित ही एक बहुत मोटा ग्रंथ तैयार हो जाएगा लेकिन तब भी उसे लगेगा कि शायद वह आर डी आनंद के कविता के अनुसार डॉ. आम्बेडकर के व्यक्तित्व और विचारों को परिभाषित करने में सक्षम नहीं हो पाया है। यदि मैं उनकी इस कविता के मूल तत्व को यहाँ पर बताना चाहूँ तो मुझे कहना पड़ेगा कि उन्होंने इस कविता के माध्यम से डॉ. आम्बेडकर के गुणसूत्रों को समाहित करने की कोशिश की है जिसको उन्होंने अपनी प्रज्ञा के बल पर बुद्ध के तात्विक विवेचना से ग्रहण किया था; जैसे त्रिसूत्र-समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व एवं प्रज्ञा, करुणा और शील। इसके अतिरिक्त पंचशील, अष्टांगिक मार्ग, लोकतंत्र, संसदीय लोकतंत्र और समाजवाद। मुझे लगता है आनंद जी ने इस कविता में न सिर्फ डॉ. आम्बेडकर और उनके विचारों को समाहित किया है बल्कि मनुष्य जीवन के लिए जरूरी सारे सिद्धांत को एक छोटी सी कविता में गागर में सागर की तरह रच दिया है। इस तरह जब उनकी आगे की कविताओं में बढ़ते हैं तो वे डॉ. आम्बेडकर विचारधारा और दलित विचारधाराओं के अंतर्विरोधों को लिखने की पूरी कोशिश करते पाए जाते हैं। कहीं-कहीं पर उन्होंने डॉ. आम्बेडकर साहब का मानकीकरण करके उनके स्वयं के विचारों को उन्हीं के द्वारा जनमानस के मध्य रखवाया है तथा जनमानस जिन गलतियों को दोहरा रहा है उसको इंगित करते हुए सही मार्ग की व्याख्या कर उस पर चलने को निर्दिष्ट किया है।

जुझारू, साहसी और निर्भीक बौद्धिष्ट साथी श्रीमती विनीता कुशवाहा किन्हीं निजी कारणों से कार्यक्रम में अपनी सहभागिता नहीं दे सकीं लेकिन उन्होंने अपने लिखित संदेश में कहा कि आर डी आनंद जी मेरे घनिष्ठतम मित्र हैं और उनकी कविताएँ मानवतावादी, आम्बेडकरवादी, मार्क्सवादी और क्रांतिकारी विचारों की होती हैं। ‘नीला कोट लाल टाई’ के अतिरिक्त ‘सुनो भूदेव’ और ‘जय भीम कामरेड’ दलित पृष्ठभूमि की कविताएँ हैं लेकिन तीनों किताबों में उन्होंने बिल्कुल अलग-अलग विषय चुना है।

आनंद जी की एक बहुत बड़ी कविता है ‘हे हेलो’। इस कविता को पढ़ते-पढ़ते व्यक्ति बोर होने लगता है लेकिन इस कविता में कहीं पर भी किसी बात की पुनरावृति नहीं हुई है इसलिए कुछ नए तथ्य की जानकारी और सामाजिक समस्याओं के हल को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति इस कविता को बहुत ही उत्सुकतावश पढ़ डालता है। इस कविता को पूरा पढ़ने के बाद मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मैंने बहुत अच्छा किया। दरअसल, इस कविता में आर डी आनंद ने पूँजीपति वर्ग का मानकीकरण किया है तथा उसके द्वारा अपनी महत्वाकांक्षा और मजदूर वर्ग के शोषण की विधियाँ गिनाया है। इस कविता में न सिर्फ मजदूर वर्ग बल्कि दलित वर्ग के बहुआयामी अंतरद्वंद्व को रेखांकित करते हुए पूँजीपतियों के साजिशों को बताने की कोशिश की है। मुझे लगता है इस संग्रह को जरूरी साहित्य के रूप में यूनिवर्सिटी कॉलेजों में पढ़ाया जाना चाहिए।

जुझारू, साहसी और निर्भीक बौद्धिष्ट साथी श्रीमती विनीता कुशवाहा किन्हीं निजी कारणों से कार्यक्रम में अपनी सहभागिता नहीं दे सकीं लेकिन उन्होंने अपने लिखित संदेश में कहा कि आर डी आनंद जी मेरे घनिष्ठतम मित्र हैं और उनकी कविताएँ मानवतावादी, आम्बेडकरवादी, मार्क्सवादी और क्रांतिकारी विचारों की होती हैं। ‘नीला कोट लाल टाई’ के अतिरिक्त ‘सुनो भूदेव’ और ‘जय भीम कामरेड’ दलित पृष्ठभूमि की कविताएँ हैं लेकिन तीनों किताबों में उन्होंने बिल्कुल अलग-अलग विषय चुना है। उदाहरण के लिए ‘सुनो भूदेव’ में लगभग सभी कविताएँ ब्राह्मणवादी अवधारणाओं के विषय में लिखी गई कविताएँ हैं जबकि ‘जय भीम कामरेड’ में दलितों के अंतर्विरोध पर लिखी गई कविताएँ हैं। जिस पुस्तक पर आज परिचर्चा हो रही है उसकी सम्पूर्ण कविताएँ डॉ. आम्बेडकर के दर्शन पर आधारित हैं इसलिए समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व, प्रज्ञा, करुणा, शील, लोकतंत्र और समाजवाद इत्यादि विषयों पर बहुत बारीकी से कलम चलाई है। आनंद जी ने जाति-धर्म, भाषा-संप्रदाय, भाग्य-भगवान, जादू-टोना, ऊंच-नीच, छुआ-छूत, संचितफल-प्रारब्ध, पूर्वजन्म-पुनर्जन्म, आत्मा-परमात्मा इत्यादि को भी विषय बनाया है। आनंद जी की कई कविताओं में बिम्ब और प्रतीक के बहुत अच्छे प्रयोग हैं। उनकी बेहतरीन कविताओं में ‘अम्बेडकर’, ‘नीली मूर्ति’, ‘लाल टाई’, ‘मैं आम्बेडकर बोल रहा हूँ’, ‘भोले का नाम’, ‘डेविल जीतेगा नहीं’, ‘आम्बेडकरवाद’, ‘बाबा की झोपड़ी’, ‘हे हेलो’, ‘बूझो वे कौन हैं’, ‘नंगा देख लेना अपराध है’, ‘सहो मत कुछ कहो’, ‘उनकी न मानो’, ‘उनकी न सुनो’, ‘फुलप्रूफ’ कविताएँ हैं। इन कविताओं को पढ़ते समय ऐसा लगता है कि मैं डॉ. आम्बेडकर से होते हुए भारतीय क्रांति के सोपानों से होकर गुजर रही हूँ। इसी क्रम की उनकी एक कविता ‘कल्पनालोक’ है जिसमें उन्होंने इस व्यवस्था को परास्त करने के बाद वह जिस नई व्यवस्था की सिफारिश करते हैं, उसकी नीति-नैतिकता, उसके तौर तरीके और उसके संविधान की भी चर्चा करते हैं। अक्सर, कवि यथार्थवादी होता है और जीवन में आने वाली घटनाओं तथा उनकी वस्तुपरिस्थितियों को हूबहू लिखने की कोशिश करता है लेकिन आनंद जी उन भौतिक परिस्थितियों को लिखने के साथ-साथ नए समाज की रूपरेखा, अचार संहिता, व्यवस्था के स्वरूप और संविधान को बताने की पूरी कोशिश करते हैं इसलिए आनंद जी की कविताएँ अन्य कवियों की कविताओं से बिल्कुल भिन्न है। मुझे आनंद जी के पुस्तक लोकार्पण के कार्यक्रम में न पहुँच पाने का अफसोस है तथा मैं उनके साहित्य के उत्तरोत्तर विकास और उनके अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हूँ।

 

कार्यक्रम में न शरीक हो पाने की वजह से अपने एक व्हाटसअप संदेश में डॉ. संदीपा दीक्षित ने लिखित टिप्पणी प्रेषित किया है कि इस संग्रह में आर डी आनंद सर की कुछ कविताएँ आम्बेडकर पर प्रतिबद्ध कविताओं के रूप में लिखी गई हैं। प्रतिबद्ध कविताएँ जब भी लिखी जाएँगी वे भाषा और शिल्प के रूप में टेक्निकल हो जाएँगी। इस संग्रह में आर डी आनंद सर की कविताओं के साथ भी यही हुआ है। किसी भी राजनयिक पर जब भी कविताएँ लिखने का प्रयास होगा तब उसका समय, उसके आंदोलन और उसका विमर्श समय की प्रतिबंध शब्दावली या तथा उस दौर में उत्पन्न हुए विचार और उपलब्धियाँ कविता की भाषा में लिखे जाएँगे। कवि को समय के निश्चित शब्दों को कविता के फ्रेम में डालना पड़ता है। ऐसे शब्द न सरल होंगे न सहज होंगे और न भाषा और शैली की सुंदरता बन पाएगी। इतना ही नहीं साहित्यिक सौंदर्य बोध के जितने भी पैरामीटर हैं उसमें फिट नहीं हो पाएगा। इस कविता संग्रह को पढ़ते हुए मैंने देखा उनकी हर कविताओं में लगभग एक वैचारिक अवस्थिति उभर कर आती है। वह वैचारिक अवस्थिति अपने साथ टेक्निकल भाषा को लेकर चलती है। उनकी एक छोटी सी कविता है आम्बेडकरवाद। उस कविता में उन्होंने आम्बेडकरवाद क्या है और ब्राह्मणवाद क्या है, के अंतर को स्पष्ट किया है। इस तरह वह कविता इन दोनों वादों को बहुत खूबसूरत ढंग से परिभाषित करती है लेकिन यह परिभाषा बहुत कुछ अर्थों में गत्यात्मक है। यदि इस परिभाषा को गद्य साहित्य में लिया जाए तो यह परिभाषा बहुत ही सुदृढ़ परिभाषा है लेकिन यहाँ उन्होंने इसे पद्य शैली में लिखा है इसलिए शब्दों की टेक्निकलिटी, यदि सही अर्थों में पूछा जाए तो, कविता कम दर्शन अधिक लगता है। काव्य-सौंदर्य के रूप में उनकी चार कविताएँ मुझे बहुत पसंद आई-प्रथम, भोले तेरा नाग; दूसरा, डेविल जीतेगा नहीं; तीसरा, नीली मूर्ति और चौथा, लाल टाई। इन कविताओं में काव्य भाषा तथा काव्य शैली के साथ-साथ बिंबो का बहुत बारीकी से प्रयोग किया गया है। भोले तेरा नाम में भोले दलित है, नाग आम्बेडकरवाद है, नाग दलित विचारधारा है तथा शेषनाग दलितों की विभिन्न शाखाओं की विचारधाराएँ हैं। इस कविता में दलितों के आपसी द्वंद और वैमनस्य को उभारा आ गया है। ठीक इसी तरह, डेविल जीतेगा नहीं में डेविल अंग्रेजी शब्द का हिंदी शैतान है जिसके बारे में आनंद जी ने कहा है कि वह किसी भी तरह से दलित और सर्वहारा के सम्मुख अपने किसी भी छवि के साथ जीत नहीं सकता है। नीली मूर्ति या नीला कोट डॉ. आम्बेडकर का प्रतीक है जिसमें एक वैचारिकी का उत्कृष्ट रूप देखने को मिलता है। इस तरह से उनकी कुछ और कविताएँ बारीक अध्ययन और मूल्यांकन की माँग करती हैं।

 

सामाजिक कार्यकर्ता और भारतीय जीवन बीमा में प्रशासनिक अधिकारी के पद कार्यरत श्री राम सुरेश शास्त्री जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि आर डी आनंद जी की कविता “भोले का नाग” प्रथम दृष्टया मुझे बहुत ही रहस्यमयी लगी। दो-तीन बार ध्यान से पढ़ा लेकिन सर के ऊपर से गुजर गई और कुछ समझ में ही नहीं आयी। मैंने अनुमान लगाया कि ‘भोले’ का मतलब ‘शंकर’ और ‘नाग’ का मतलब विष्णु का ‘शेषनाग’ हो सकता है। आनंद साहब तो मार्क्सवादी / आम्बेडकरवादी कवि व लेखक हैं। उनके सरोकारों का विश्वास देवी-देवता, भाग्य-भगवान और पौराणिकता से तो हो नहीं सकता है, यह निश्चित रूप से उनके सिद्धांतों की ही कविता होनी चाहिए। इसमें पूँजीपति, मजदूर, शोषण और श्रम के कोई भी बिम्ब नही मिल रहे हैं, अतः यह मार्क्सवादी कविता नहीं है। यह आम्बेडकरवादी कृति ही हो सकती है। मैं इसी उधेड़बुन में बहुत देर तक पड़ा रहा। अचानक दो बिम्ब कुछ समझ में आए। आर डी आनंद साहब शायद ‘भोले’ को ‘दलित’ और ‘नाग’ को ‘आम्बेडकरवाद’ के बिम्बों के रुप में लिए हों। आ।बेडकरवाद कई धड़ों में बदलता जा रहा है। पहले आम्बेडकरवाद अकेला वर्चस्ववादियों / मनुवादियों के खिलाफ आंदोलनरत होकर व्यस्था परिवर्तन की लड़ाई लड़ रहा था। उन्होंने लिखा कि नाग का दूसरा मुँह देह मजबूत करने लगा अर्थात देह मजबूत करना जाति मजबूत करने का बिम्ब हो सकता है। अस्सी के दशक में मान्यवर कांशीराम साहब का दौर आया। शुरू में उन्होंने जाति व्यस्था को खत्म करने का प्रयास किया लेकिन सफलता नहीं मिली। कांशीराम साहब ने खुद ही लिखा है कि भारत में जाति प्रथा की गुत्थी इतनी जटिल है कि जितनी सुलझाने की कोशिश किया उतनी ही उलझती चली गई। इस कमजोरी को उन्होंने हथियार बना लिया। जाति को मजबूत करके सत्ता हासिल किए और मायावती जी को चार बार यू पी का मुख्यमंत्री बनाए। आनंद जी के नाग के तीसरे मुँह का इशारा बामसेफ के मूलनिवासी परिकल्पना की तरफ है। इनका मानना है कि ब्राह्मण विदेशी हैं और बाकी सभी लोग मूलनिवासी हैं। यह थ्योरी लोकमान्य तिलक ने ब्राह्मणों को श्रेष्ठ घोषित करने के इरादे से गढ़ी थी। उन्हीं के जाल में फँसकर बामसेफ ने प्रजातीय गुण तलाशा अर्थात डीएनए से पुष्टि करने लगे कि आर्य विदेशी हैं। बाबा साहेब ने अपनी पुस्तक के खंड-13 “शूद्र कौन थे” में लिखा है कि आर्य विदेशी प्रजाति नहीं बल्कि आर्य एक भाषा है। इसको बोलने वाले आर्य कहलाए और वे यहीं के मूलनिवासी हैं। बाबा साहब के इस कथन को देश-विदेश के किसी भी विद्वान ने नोटिस नहीं किया और न ही दलित इस बात को मानते हैं। नाग के चौथे मुँह का इशारा विचारधारा की तरह है कि शायद दलित शुद्ध आम्बेडकरवादी और अशुद्ध आम्बेडकरवादी के चक्कर में आपस में ही झगड़ रहें हैं। इसमें से कुछ लोग बौद्ध धर्म की शरण मे जा रहें हैं क्योंकि बाबा साहेब ने 1956 में हिन्दू धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म अपना लिया था। दलितों में कुछ लोग मख्खलि गोशाल को शुद्ध मान रहे हैं इसलिए यहाँ ‘मख्खू’ ‘मखलि गोशाल’ का बिम्ब हो सकता है । ये लोग आजीवक परम्परा के वाहक हैं।

 

अब सभी विचारधाराओं के लोग आपस में लड़ रहे हैं, चिल्ला रहे हैं और एक दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं। आपस में लड़ने-झगड़ने से खुशी तिलकधारी को हो रही है। यहाँ पर ‘तिलकधारी’ ‘वर्चस्ववादी’, ‘मनुवादी’ और ‘ब्राह्मणवादी’ का बिम्ब है। निश्चित रूप से आपस में लड़ने झगड़ने से एकता नहीं बन पाएगी और दलित पहले भी शोषित-प्रताड़ित था और भविष्य में भी वह वर्चस्ववादियों, मनुवादियों और वर्णवादियों के पैर की जूती बना रहेगा, ऐसा चिन्तन कर ब्राह्मणवादी प्रसन्न हो रहा है। अब भोले अर्थात दलितों का क्या होगा, लिखना कवि की एक चिंता और चेतावनी भी है। दलित सत्तर साल पहले जहाँ पर था, आज वहीं पर फिर पहुँच रहा है। इस कविता के माध्यम में आनंद जी सभी दलितों को एक उद्देश्य के लिए एक एकमत होकर और एकजुट होकर आंदोलन करने को कह रहे हैं।

 

जनपद बस्ती से चलकर आए प्रधानाध्यापक श्री विनय कुमार करुण ने कहा कि आर डी आनंद की कविताएँ जनवादी कविताएँ हैं। हाहाँकि, उनकी कविताओं में दलित और आम्बेडकर के मसले जरूर होते हैं लेकिन उनका दृष्टिकोण उन कविताओं में भी जनवादी दिखाई पड़ता है। वे अपनी कविताओं में आम्बेडकरवादी साथियों को वर्गीय एकता के लिए प्रगतिशील सवर्णों के साथ मिलकर काम करने के लिए प्रेरित करते हैं। मैंने उनके अनेक कार्यक्रमों में भाग लेते हुए देखा है कि उनके बहुत से साथी सवर्ण हैं। उन अनेक साथियों के मध्य रहकर मुझे यह एहसास हुआ कि आनंद जी यदि अपनी कविताओं और लेखों में सभी वर्गों के गरीबों के लिए प्रगतिशील चेतना से लैश साथियों को लेकर चल रहे हैं तो वह क्रांति के लिए एक विशेष योगदान कर रहे हैं। हालाँकि, आर डी आनंद का लेख और विचारधारा समकालीन दौर में दलित साथियों के लिए विचित्र जरूर लगता है लेकिन कालांतर में आनंद जी के विचार दीर्घजीवी और अनिवार्य विचार के रूप में सब के सम्मुख रहेंगे। आर डी आनंद के साथ एक विचित्रता जुड़ी हुई लगती है कि आर डी आनंद को दलित मार्क्सवादी समझते  हैं और मार्क्सवादी उन्हें आम्बेडकरवादी समझते हैं। सवर्ण उन्हें दलित खेमे का मानते हैं तो दलित उन्हें मार्क्सवादी मानते हुए ब्राह्मणवादी खेमे का मानता है। जब उनकी कविताओं और उनके लेखों को पढ़ता हूँ तथा जैसे-जैसेआगे बढ़ता हूँ तो यह बात स्पष्ट होती चलती है कि आनंद जी कबीर की तरह हिंदू, मुसलमान, दलित, सवर्ण, आम्बेडकरवादी और मार्क्सवादी इत्यादि सभी को को डाँटते रहते हैं।

 

जनमोर्चा के संपादक श्री कृष्ण प्रताप सिंह ने कहा आर डी आनंद की कविताएँ बहुत सरल और सहज होती हैं। आर डी आनंद जिस व्यक्ति के लिए लिखते हैं वह व्यक्ति उनकी कविताओं को बहुत आसानी से समझ जाता है। यही उनकी कविताओं की वास्तविक क्षमता है और यही आर डी आनंद की बड़ी उपलब्धि है। जब कविताएँ प्रबुद्ध लोगों के बीच में विमर्श का विषय बनती हैं और उसके अर्थ पर सहमति बहुत कठिनाई से बन पाती है तो वे कविताएँ आम आदमी से दूर हो जाती हैं। ऐसी घटनाओं का एकेडमिक वजूद हो सकता है लेकिन आम आदमी, आम पाठक, आम छात्र के लिए ऐसी कविताएँ निरर्थक होती हैं। आर डी आनंद की कविताएँ एकेडमी कविताएँ न होकर आम छात्रों व आम पाठकों की कविताएँ होती हैं। आर डी आनंद के ‘नीला कोर्ट लाल टाई’ संग्रह की सभी कविताएँ पठनीय है। इन कविताओं को डॉ. आम्बेडकर के पाठकों की कविताएँ कहना वाजिब होगा। ऐसा नहीं है कि आर डी आनंद ने इस संग्रह में डॉ. आम्बेडकर का नख-सिख वर्णन किया हो अथवा उनकी प्रशंसा में गीत गाए हो; नहीं, ऐसा कदापि नहीं है बल्कि इस संग्रह की सभी कविताएँ डॉ. आम्बेडकर के विचारों और उनके अनुयायियों के विचारों के बीच एक पुल बनाने की कविताएँ हैं।

 

कॉमरेड एस एन बागी ने कविताओं पर बोलते हुए कहा कि आर डी आनंद वामपंथी-मार्क्सवादी लेखक एवं कवि हैं। उनकी कविताएँ वर्ग संघर्ष की कविताएँ हैं। आर डी आनंद दलित पृष्ठभूमि से आते हैं इसलिए उनकी कविताओं में दलित और आम्बेडकर से संबंधित विचार जरूर होते हैं लेकिन उनका दृष्टिकोण किसी भी तरह जातीय आग्रह की नहीं होती हैं बल्कि वे वर्ग संघर्ष के लिए वर्गीय एकता की बात करते हैं। उनके इस संग्रह में भी डॉक्. आम्बेडकर की विशेषताओं को लिखते हुए कहीं से भी वह जातीय पहचान को लेकर अपने को धूमिल नहीं करते हैं बल्कि दलित साथियों और आम्बेडकरवादियों का आवाहन करते हैं कि वह डॉक्. आम्बेडकर को शुद्ध रूप में समझते हुए मार्क्सवाद का सहयोग लेते हुए जन क्रांति की तरफ बढ़ें।

 

गीतों के राजकुमार कहे जाने वाले वरिष्ठ साहित्यकार और गीतकार श्री रामानंद सागर साहब ने आर डी आनंद की प्रशंसा करते हुए बताया कि आनंद साहब की मेधा एक विलक्षण मेधा है। कई बार उनको देखने और उनको सुनने में भ्रम होता है। जब तक आम साहित्यकार किसी पुस्तक के लिखने व प्रकाशन की बात सोचता है तब तक आर डी आनंद की एक नए सब्जेक्ट पर एक नई किताब प्रकाशित होकर आ जाती है। अभी हाल ही में उन्होंने आशाराम जागरथ के अवधी काव्य-संग्रह ‘पाहीमाही’ के तकरीबन 400 पेज को 5 दिन में पढ़ करके 225 पेज की आलोचना की एक पुस्तक लिख डाली बल्कि तत्काल प्रकाशक को भेजकर ‘पाहीमाफी : कलात्मक जीवन राग’ नाम से प्रकाशित भी करवा दिया। यह आनंद के प्रतिभा का एक विलक्षण पक्ष है। मैंने देखा है कि जब से मैंने अपने एक पुस्तक ‘महामानव’ के प्रकाशन की बात आनंद के सामने रखी थी तब से लेकर आज तक मेरी एक पुस्तक प्रकाशित हुई और इन वर्षों में आर डी आनंद की तकरीबन 30 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनमें से कई किताबें उन्होंने मुझको सादर भेंट भी किया है। यही नहीं, उनकी कविताएँ दलित जीवन की विसंगतियों तथा सर्वहारा के बदहाली को लेकर लिखी गई कविताएँ होती हैं। इतना ही नहीं, आनंद ने अभी तक जितने कविता संग्रह लिखे हैं उससे कहीं अधिक उन्होंने आलोचना तथा आम्बेडकरवाद और मार्क्सवाद से संबंधित निबंधों की पुस्तकें भी लिखकर प्रकाशित करवाया है। यह एक सुखद आश्चर्य है उन्होंने अपने 57 साल की उम्र में 67 किताबें लिख डाली हैं। मैं उनके इस सफल लेखन के लिए उनको बहुत-बहुत बधाई देता हूँ।

 

वयोवृद्ध साथी श्री अयोध्या प्रसाद तिवारी ने बताया कि आर डी आनंद न सिर्फ कविता और लेख लिखते हैं बल्कि वे भारतीय जीवन बीमा निगम के बहुत बड़े ट्रेड यूनियन एआईआईईए के अनुषांगिक संगठन बीमा कर्मचारी संघ फैजाबाद मंडल के मंडल अध्यक्ष भी हैं। इसी के साथ साथ वे प्रगतिशील लेखक संघ तथा भारतीय नाट्य संघ के जिला सचिव भी हैं। इसी तरह शहर के अन्य संगठनों और गतिविधियों के आनंद जी हिस्सेदार बने रहते हैं। अनेक वामपंथी कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए वे दूर-दूर तक चले जाते हैं। दलित पृष्ठभूमि में जन्म लेने के कारण उन्हें दलित समस्याओं एवं डॉ. आम्बेडकर से संबंधित अनेक विषयों पर भाषण देने के लिए दूर-दूर तक बुलाया जाता है और वे सामाजिक परिवर्तन को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए उन कार्यक्रमों में शरीक होने के लिए जरूर पहुँचते हैं। यही नहीं, लगभग सभी कार्यक्रमों में तय विषयों पर वे क्रांति के सापेक्ष विश्लेषणात्मक पक्ष रखते हैं। मैं प्रगतिशील लेखक संघ और भारतीय नाट्य संघ में बहुत पहले से कार्य करते हुए आर डी आनंद के साथ लगातार जुड़ा रहा हूँ। वे अपने कार्यालय में पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ कार्य करते हुए हमारे जैसे अनेक साथियों को भी विभिन्न मुद्दों पर बात करने के लिए समय निकाल लेते हैं। आप को जानकर आश्चर्य होगा की आर डी आनंद तकरीबन 30 वर्षों से डायबिटिक हैं तथा बाईपास सर्जरी और गॉलब्लेडर के ऑपरेशन के बाद सुबह-शाम इंसुलिन लेते हैं लेकिन कभी भी न हौसला हारते हैं, न अपनी बीमारी की बात करते हैं और न कभी बीमार लगते ही हैं। सबसे विचित्र बात तो यह है कि उनकी कविताओं और लेखों में कहीं से भी उनकी बीमारी की दुर्बलता नहीं दिखाई देती है। अपनी कविताओं में वे अपनी बात कभी नहीं करते हैं। वे कविताओं में समाज के एक-एक अंग, एक-एक विचारधारा, एक-एक परिस्थिति, एक-एक विसंगति तथा संघर्षशील शक्तियों के आपसी अंतर्द्वंद्व को अपने लेखों और कविताओं में बहुत बारीकी के साथ रखते हैं। आर डी आनंद की कविताएँ विचारधारा की कविताएँ हैं। कई बार उनकी कविताओं को पढ़ते हुए सपाट बयानी का भी बोध होता है लेकिन पूर्ण सपाट बयानी में भी एक गत्यात्मक भावबोध तैरता है। मैंने आर डी आनंद के कई कविता संग्रह पढ़ें हैं लेकिन यह कविता संग्रह अन्य कविता संग्रह से बिल्कुल भिन्न एक विषय पर केंद्रित किया गया है। यह कविता संग्रह एक बड़े डिबेट की माँग करता है।

 

फैजाबाद और अयोध्या शहर के वरिष्ठ कवि एवं कहानीकार श्री स्वप्निल श्रीवास्तव जी कहते हैं जब तक मैं कोई चीज सोचता हूँ आर डी आनंद उन विषयों को लिख चुके होते हैं, तब मुझे बहुत आश्चर्य होता है। आर डी आनंद की गतिविधियाँ उनके लेखों और कविताओं में दिखाई पड़ती हैं। उनकी कविताओं में व्यवस्था का द्वंद्व तथा क्रांतिकारी शक्तियों का अंतर्द्वंद्व बराबर दिखाई पड़ता है। आर डी आनंद की कविताओं में उनकी महत्वाकांक्षा, आंदोलन, संघर्ष स्पष्ट रास्ता के साथ-साथ व्यवस्था परिवर्तन तथा उसके बाद एक नई व्यवस्था का सृजन जी मौजूद होता है। आर डी आनंद जैसे कवि, लेखक और चिंतक की रचनाओं में हमेशा एक बेहतरीन दुनिया का ख्वाब मौजूद होता है। मुझे आश्चर्य होता है कि आर डी आनंद कब पढ़ते हैं, कब लिखते हैं और कब उनकी किताबें प्रकाशित हो जाती हैं। उनकी लगभग सभी किताबें मेरे पास है। मैंने सभी किताबें लगभग पढ़ी है। किसी भी किताब में विचारधारा का अथवा समस्याओं का रिपीटेशन नहीं दिखाई पड़ता तथा उनकी रचनाओं को पढ़ते हुए महसूस होता है कि हम अंधेरी गुफाओं से किसी प्रकाश की तरफ बढ़ रहे हैं। आर डी आनंद के बारे में एक बात जरुर कहना चाहूँगा कि वह जितना लिखते हैं, जितना पढ़ते हैं, जितना दौड़ते-भागते हैं, और जितना बोलते है, उस हिसाब से साहित्यिक दुनिया में लोग उनको तरजीह नहीं देते हैं। मैं इसका कारण आज के दौर में साहित्यिक इमानदारी का न होना मानता हूँ। लेकिन, एक विचित्र बात और आर डी आनंद में है वह यह कि वह व्यक्ति कभी भी लोगों की प्रवाह नहीं करता है कि लोग उसको तरजीह दे रहे हैं, देंगे अथवा नहीं देंगे, उसका साहित्य पढ़ा जाएगा, नहीं पढ़ा जाएगा, मूल्यांकन होगा कि नहीं होगा। ऐसा लगता है कि आर डी आनंद अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान हैं और उन्हें आशा है कि एक न एक दिन जब क्रांतिकारियों को अच्छे साहित्य की जरूरत होगी, अच्छी पुस्तकों की जरूरत होगी, तब वे खोज-खोज कर आर डी आनंद का साहित्य पढ़ेंगे। निश्चित उनका साहित्य एक दिन क्रांतिकारियों के मध्य होगा और पढ़ा जाएगा।

 

इसके पश्चात, करोना काल में दिवंगत हुए प्रलेस के जिला अध्यक्ष श्री दयानंद सिंह मृदुल, अध्यक्ष मंडल के सदस्य डॉ. राममूर्ति चौधरी एवं वामपंथी साथी एस पी चौबे, अवधी कवि श्री आशाराम जागरथ के पिता, प्रलेस लखनऊ के साथी एस के पंजम, प्रलेस गोरखपुर के साथी सुरेश चंद्रा और आदर्श इंटर कॉलेज के वाइस प्रिंसिपल श्री पूर्णमासी जी के चित्र पर पुष्प चढ़ाकर साथियों से श्रद्धाजंलि अर्पित किया। ये सभी संगठन के एवं समाज के सक्रिय साथी सहयोगी थे।

 

दिवंगत डॉ. राममूर्ति चौधरी का जन्म 15 जुलाई 1946 में बस्ती जिले में हुआ था। बाद में वे वक्सरिया टोला, अयोध्या में आकर बस गए। उन्होंने एम ए, पीएच डी किया था। वे साहित्य मंगलम, शब्दांजलि, जन जागृति सेवा समिति एवं प्रगतिशील लेखक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता रहे हैं। उन्होंने हरिवंश पुराण : एक सांस्कृतिक अध्ययन, भारत में कुर्मी वंश, प्राचीन भारतीय इतिहास (काव्य-संग्रह) लिखकर साहित्यिक योगदान किया। उनके पत्नी की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी। उनके पीछे उनकी दो बेटियां हैं। एक बस्ती में रहती हैं दूसरी फैजाबाद में। दोनों अध्यापिका है। श्री एस पी चौबे 1981 में फैजाबाद आए और यहीं पर वे सेंट्रल बैंक में काम करते हुए ट्रेड यूनियन तथा वामपंथी राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते हुए लेखन-पाठन का काम किया। उनकी मृत्यु 15 मई 2021 को हार्ट अटैक से हो गई। उनके बाद उनके घर में उनकी पत्नी, बेटा और बेटी हैं।

 

सर्वप्रथम, साकेत डिग्री कॉलेज के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. जनार्दन उपाध्याय, जो डॉ. राममूर्ति चौधरी के साथी, सहयोगी, मित्र और पड़ोसी थे, ने उनके व्यक्तित्व, कृतित्व, लेखकीय और सामाजिक योगदान पर विस्तृत बात रखा।

 

तत्पश्चात, डॉ. राममूर्ति चौधरी साहब की बड़ी बेटी-श्रीमती संधिला चौधरी ने अपने पिता स्नेहमयी अभिभावकत्व के बारे में बताते हुए उनकी पीएचडी तथा उनके साहित्य की बारीकियों पर चर्चा करते हुए बताया कि किस तरीके से वे अपने साहित्यिक गतिविधियों में संलग्न रहते हुए चाय और खाना तक भूल जाते थे। उन्होंने बताया कि साहित्य एक साधना है जिसको मैंने अपने पिताजी में देखा। उनके पश्चात, उस क्रम को आगे बढ़ाते हुए श्रीमती मंधिला ने कहा कि यहां पर जितने भी साहित्यकार उपस्थित हैं, मैं सब की पीड़ा से अवगत हूँ। साहित्यकार समाज की पीड़ा को किस तरीके से आत्मसात करते हुए अपने समय और धन को व्यय करता है इसे हम दोनों बहनों ने आत्मसात किया है इसलिए मैं कह सकती हूँ कि साहित्य समाज का दर्पण है। आज जब पिताजी नहीं तो मुझे उनके होने और न होने का वास्तविक एहसास हो रहा है।
वक्ताओं की श्रेणी में अशोक तिवारी, सूर्यकांत पाण्डेय, अमिताभ श्रीवास्तव, राम लौट, रविंद्र कबीर, अखिलेश चतुर्वेदी, शिवकुमार फैजाबादी, शंभूनाथ गुप्ता, देवेश, श्याम नारायण पांडेय, चंद्रमौलि तिवारी, पूनम कुमारी, संस्कृति कौल, संधिला चौधरी, मंधिला चौधरी इत्यादि ने अपने संस्मरण रखें। अंत में, श्रद्धांजलि के उपलक्ष्य में दो मिनट का मौन रख मृतक साथियों को श्रद्धांजलि अर्पित किया गया।

 

आर डी आनंद

एल-1316, आवास विकास कॉलोनी,

बेनीगंज, फैज़ाबाद,

अयोध्या-224001

मो.9451203713

25.07.2021

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