कोरोना पर कविताई…

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यह लोकतंत्र है
दुपहरिया गनक रही है
आँखों के सामने घोर अँधेरा है
मुर्दे चमकीले वस्त्रों में बैंड बाजा बजा रहे हैं
कारिंदा घोड़े की रस्सी पकड़े है
धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है
मुकुट पहने
तलवार उठाए
सफेद दाढ़ी में
घोड़े पर राजा बैठा है
कमांडोज अगल-बगल
गिद्धदृष्टि जनता पर है
अदृश्य आकाशवाणी होती है
हुजूर! यह ग्रुप उन सामन्तों का प्रतिनिधि है
जिसने संविधान बनाया था
ये आप के विरोधी हैं
किन्तु आप का विरोध नहीं करेंगे
इन्हें पता है
जो नाव आप खे रहे हैं
इन्होंने बहुत दिनों तक खेई है
फिर खेने की उम्मीद में है;
आप के बाएँ
आप के ही सहोदर हैं
इनके सारे पत्ते आप खेल रहे हैं
बस, ये कुछ पत्ते चुरा सकते हैं
वह लाल पगड़ी
लाल सलाम की है
कर्मविहीन सिद्धांतवादी हैं
बची-खुची चिंगारियों को सहेज लिया है
आप के समर्थक
उन्हें देशद्रोही-राष्ट्रद्रोही कहकर
अंडरग्राउंड कर देते हैं
नीची जातियों के कॉमरेड कहते हैं
ईश्वर नहीं है
और इनके नेता हनुमान भक्त हैं
राम की शक्ति पूजा करते हैं
बहन-बेटियाँ आप की भक्त हैं मालिक!
सायकिल पर आता हुआ मुसाफिर
सछूतों का नेता है
उसके कबीले के रामभक्त
कभी भी प्रभु का निरादर नहीं करते हैं
सभी प्रभु श्रीराम के नारे लगाते हैं
हुजूर! आगे जो ढ़ेर सारी नीली पट्टियाँ दिख रही हैं
नीला सलाम वालों की हैं
वे शान्तिप्रिय लोग हैं
न खून बहाएँगे
न क्रान्ति करेंगे
न तानाशाही उनकी फ़ितरत में है
सर! उनसे ‘जय भीम’ जरूर कर लीजिएगा
उनके एक बंदे को आप
आर्मी से सिविल में ला चुके हैं
दूसरे से ‘ब्राह्मण विदेशी’ का प्रचार करवा रहे हैं
उसकी प्रतिक्रिया से कारवाँ कितना सशक्त हुआ है
आप से छिपा नहीं है
यह करोड़ों का हुजूम उसी का फल है
थोड़ा सा डार्क रंग वाला
अब नहीं बोलेगा
एक लाख का जुर्माना
और केस ख़ारिज हो चुका है
सर! अभी जो अडानी का नाम ले रहा था
वह कोई सिरफिरा है
पुलिसवाले अभी देख लेंगे
अम्बानी का नाम लेने वाला
कोई पूँजीवाद विरोधी होगा
अभी कोई उसके बगल का आदमी ही
उससे भिड़ जाएगा
यहाँ पहले रामराज्य था
प्राण जाय पर वचन न जाई
आप ने भी वही सपथ ली है
सपना पूरा होता हुआ दिख रहा है
अब सड़कें चौड़ी हो गई हैं
न जाने प्रभु राम का जुलूस
इन पतली गलियों से कैसे निकला होगा
आप के सपनों का विधान मनीषियों ने बनाया था
कहा था यह लोकतंत्र है
इसमें संसद निवास करता है
संसदीय लोकतंत्र पवित्र शब्द है
कोई भी इसका विरोधी नहीं है प्रभु!
आप निष्कंटक राज करो
बढ़ो प्रभु!
संजय की आँखें चहुओर देख रही हैं
कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता है
आप का मंत्र अमोघ है।

यह लॉकडाउन है 
लॉक डाउन है
संभल के!
सोसल डिस्टेंसिंग है
भीड़ नहीं हो सकती है
फिर भी अकेले निकलो
अकेले चलो
शहर की सड़कों को जरूर देखो
अब चौड़ी होंगी
शहर के बीचोबीच
फोरलेन बनेगा
बचपन का सपना
अब पूरा होगा
लेकिन तब यह पता नहीं था
फुटपाथ की दुकानें तोड़ दी जाएँगी
नुक्कड़ पर लगने वाली मजलिस हट जाएगी
हमारे घर भी तोड़े जाएँगे
फुटपाथों पर स्त्रियाँ माथे पर हाथ रखकर बैठी है
दुकानदारों में कोलाहल है
कोई इधर से उधर बैठ रहा है
कोई उधर से इधर बैठ रहा है
हम भी तमाशबीन खड़े हैं
एक युवक ने कहा
अब अपना शहर बहुत सुंदर हो जाएगा
शहर के चारो तरफ बड़े-बड़े आवासीय होटल बन जाएँगे
पर्यटक खूब आएँगे
विकास सुनिश्चित है;
सचमुच
दीवालें रंग उठी हैं
सुना है
चौराहे की अज़ीम पाकड़ काट दी जाएगी
चिड़ियों का रैन बसेरा गायब हो जाएगा
चिड़ियाँ गायब हो जाएँगी
चहचहाहट गायब हो जाएगी
चौराहा हाइवे से जोड़ दिया जाएगा
शोरगुल बढ़ जाएगा
देशी लोग नहीं दिखेंगे
विदेशियों की बारंबारता दिनरात रौनक बरसाएंगी
एक बुज़ुर्ग बड़बड़ा रहे थे
अब धर्म भी धंधा हो गया है
नेता मालामाल हो जाएँगे
गरीबों की चिंता किसी को नहीं है
सच्चाई-ईमानदारी लोगों में रह ही नहीं गई है
पहले लोग अच्छे थे
अपनापन था
भाईचारा था
रिश्तों को पहचानते थे
अब बेगानापन फैल रहा है
यह किस तरह का उजाला है
जिसमें अँधेरा ही अँधेरा है।

करोना
कोविड-19 तो बाद में समझा
पहले तो करोना का आतंक आया
प्रधानमंत्री ने 22 मार्च 2020 को घोषणा किया
लॉक डाउन, लॉक डाउन, लॉक डाउन
मेरी डिक्शनरी में एक नए शब्द का इज़ाफ़ा हुआ
सेनिटाइजर पापुलर वर्ड हो गया
एक दिन पुलिस वालों ने चालान काट दिया
बोला-मास्क नहीं लगाए हो
दूसरे दिन भी चालान काट दिया
बोला-ग्लब्स कहाँ है
सोसल डिस्टेंसिंग इम्पॉर्टेन्ट हो गया
न लोगों से बोलना
न लोगों से मिलना
खड़े भी हो तो 10 कदम दूर
हाथ तो मिलाना ही नहीं
सब्जी और राशन तो मिल जा रहा था
लेकिन दिलों में डर समा रहा था
खाँसी आई तो क्या होगा
बुखार हुआ तो क्या होगा
मेडिकल स्टोर से दवा मिलेगी क्या
डॉक्टर दवा देंगे क्या
सरकारी अस्पताल गए नहीं
कि करोना जाँच हुआ
करोना पॉजिटिव हुए नहीं
कि एकांतवास हुआ
एसी में शिफ्ट
पुराने रोग की दवा बन्द
हाई एंटीबायोटिक्स चालू
न धूप मिलेगी
न इम्युनिटी बढ़ेगी
साँस तो रुकना ही है
अज़ीब कश्मकश में ज़िन्दगी
लगता है रोग संक्रामक नहीं
बल्कि सरकारी आतंक है
हम घरों में कैद
हम घरों में नज़रबंद
हम डिप्रेशन में
हम हाइपरटेंशन में
मुहल्ले वालों का डर अलग से
कोई मुखबिरी न कर दे
कोई झूठी शिकायत न कर दे
मुझे पड़ोसियों के दुष्प्रचार का बहुत डर लगता है
जब भी घर से निकलता हूँ
मास्क जरूर लगा लेता हूँ।

 करोना-काल में
गाँव कल भी
हमारे बहुसंख्य जीवन का
निर्वाह करता था,
और, आज भी;
संकटकालीन स्थिति में लोग
अपने वतन को गले लगाते हैं,
आज भी लोग
गाँव को गले लगा रहे हैं;
लोग इसलिए भी
गाँव को गले लगा रहे हैं
कि गाँव में उनके स्वजन हैं
तथा, गाँव आज भी
ऐला-फैला पनाहगाह है;
यह सत्य है
विषम परिस्थिति में लोग
गाँव आ रहे हैं
लेकिन, वे वापस नहीं आ रहे हैं
बल्कि, इस इंतज़ार में आ रहे हैं
कि शहर फिर रोगमुक्त होगा,
कि शहर फिर लॉक डाउन मुक्त होगा,
कि शहर पुनः आबाद होगा,
कि शहर में उत्पादन के संसाधन हैं,
कि शहर में श्रम की जरूरत है,
कि शहर में श्रम संस्थान हैं,
कि शहर पूँजी का अखाड़ा है,
कि शहर कल-कारखानों का भंडार है,
कि शहर में राजधानी है,
कि शहर में राजनयिक हैं,
कि शहर में ब्यूरोक्रेट्स हैं
कि शहर बड़ी-बड़ी कम्पनियों का मालिक है,
कि शहर में अनेक बड़े अस्पताल हैं,
कि शहर उद्योग-धंधों का जाल है,
कि शहर शिक्षा का केंद्र है,
कि शहर कॉलेज और विश्व-विद्यालय का गढ़ है,
कि शहर ही नव-विकास का नेतृत्वकर्ता है,
कि शहर ही एक देश को दूसरे देश से जोड़ता है,
व्यक्ति की महा मज़बूरी है
वह हमेशा ही
शहर की तरफ उन्मुख रहता है
और, भविष्य में भी
शाहरोन्मुख रहेगा
गाँव की तरफ लौटना
व्यक्ति का स्थाईकरण नहीं
और, न ही शहर से पलायन करना है
बल्कि, विपरीत परिस्थितियों में
स्वयं को समायोजित करना है।

लॉक डाउन
एक राउंड लॉक डाउन
सब ने झेला
दूसरा लॉक डाउन
ऊब पैदा किया
तीसरा लॉक डाउन
सर से पानी ऊपर हो गया
प्रवासी मजदूर
सड़क पर निकल पड़े
न बस थी न ट्रेन थी न टैक्सी
भीड़ इकट्ठा हो गई
न कोई मास्क न सोसल डिस्टेंसिंग
दिल्ली से पटना
पंजाब से फैज़ाबाद
अहमदाबाद से गोरखपुर
मुंबई से बिहार
पैदल पैदल पैदल
सड़कों पर रेलमपेल
पटरी पर लेटे सो गए
ट्रेन ने सैकड़ों को सुबह का सूरज नहीं देखने दिया
करोना से डरकर लोग अपनों के पास आ रहे थे
हादसे ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा
लोग भूखे थे
लोग प्यासे थे
पाँव में छाले पड़ गए
बेहाल बदहाल
चार सौ किमी पैदल चलकर बच्ची ने
घर से बारह किमी पहले ही दम तोड़ दिया
सायकिल पर बीमार बाप को
बारह साल की बच्ची ने
तीन सौ किमी का रास्ता तय किया
ये डरे हुए लोग कौन हैं
ये मरे हुए लोग कौन हैं
ये मजदूर कौन हैं
ये प्रवासी कौन हैं
ये भूमिहीन भारत है
ये बेरोजगार भारत है
ये संसाधनहीन भारत है
ये भारत का वोट है
ये भारत का दलित है
ये भारत का शूद है
ये भारत का आदिवासी है
ये भारत का अल्पसंख्यक है
ये भारत का ओबीसी है
ये भारत का गरीब है
ये भारत का मजदूर है।

क्वारन्टीन
सासू के ललनवाँ आए
हमरौ जहनवाँ आए
भौजी आईं भइया आए
परदेशी बलम घर आए….।
पन्द्रह दिन तक खाए बनाए
मड़इम कइसो कइसो बिताए
मच्छर से देहिया नोचाए
परदेशी बलम घर आए….।
सपना होइगै सगरौ अरमनवाँ
क्वारन्टीन भए जब सजनवाँ
सिवनवाँ म कुटिया रम्हाए
परदेशी बलम घर आए….।
यमराज कै दस्ता आए
ढोकरकसवा यस रूप बनाए
शीशी में खून पसाए
परदेसी बलम घर बताए….।
धूप गरमी का सहिकै बिताए
बरसात में देहिया भीग-भीग जाए
कइसो जूड़ी-बुखार बचाए
परदेशी बलम घर आए….।

सोशल डिस्टेंसिंग
जनता ने सोसल डिस्टेंसिंग को
न्यायप्रिय चिकित्सीय शब्द समझा
फिर तुरन्त बाद
जनता का दिमाग़ फिरा
सोसल डिस्टेंसिंग को
बहस का मुद्दा बना दिया
जनाब! सोसल डिस्टेंसिंग तो सामाजिक दूरी है
यह सामाजिक विलगाव है
फिजिकल डिस्टेंसिंग होनी चाहिए
व्यक्ति से व्यक्ति की दूरी
शरीर से शरीर की दूरी
खैर! हम क्या कर सकते हैं, साब!
यह तो सरकारी फ़रमान है
उन्हीं के शब्दों से काम चलाइए
क्या फ़र्क पड़ता है
मतलब तो शरीर से शरीर की ही दूरी है न!
जो भी हो
सोसल मीडिया पर जोरदार बहस उठी
सोसल डिस्टेंसिंग राजनीतिक शब्द है
सोसल डिस्टेंसिंग फासीवादी शब्द है
करोना से डरवा कर
हाथ मिलाना बन्द करा दिया
कुछ लोग खुश हुए
सरकारी फॉलोवर हो गए
उन्हें सांस्कृतिक विजय महसूस होने लगा
मास्क अर्थात मुँह पर पट्टी
लोग स्वतः डर के मारे अधिक नहीं बोलते
वैचारिक क्रान्ति का दौर खत्म
भीड़ के नाम पर कोई मीटिंग नहीं
आंदोलन खत्म
विपक्ष ख़तम
सोसल डिस्टेंसिंग से जरूरी कार्य नहीं रुकता है
सरकारी कार्य जरूरी कार्य है
सारे संशोधन होंगे
सारे प्रोजेक्ट पूरे किए जाएँगे
राजनीति का भी कार्य होगा
धर्म का भी कार्य होगा
सिर्फ न्यूसेंस रोका गया है।

 भूख, भय और करोना
श्रमिक प्रवासी है
रोजी-रोटी कमाने परदेस में है
करोना ने भयभीत किया
नौकरी छोड़ी
परदेस छोड़ा
शहर लॉक डाउन की चपेट में है
उद्योग-धन्धे बन्द
मालिक का कारोबार बन्द
न उत्पादन है
न सप्लाई है
उद्योग ठप्प
रोजागर ठप्प
श्रम का चक्का जाम
जाम जाम जाम
श्रमिक बिलबिला रहा है
करोना से नहीं भूख से मर रहा है
फीस का पैसा नहीं है
रेंट का पैसा नहीं है
बीपी बढ़ रही है
शुगर बढ़ रहा है
नींद हराम हो गई है
घबराहट हत्यारिन आँखे लगाए बैठी है
अनहोनी अशुभ हरदम मंडरा रहा है
बीवियाँ बौखलाई हैं
पतीली में क्या उबाले
तवे पर क्या सेकें
थाली में क्या परोसे
बेटी को कैसे बचाए
बेटे पर नज़र कैसे रखे
आवाज़ें आनी शुरू हो गई हैं
हमें करोना से आज़ाद करो
हमें करोना से मरना मंजूर है
लेकिन भूख, भय, डिप्रेशन
और, आत्महत्या से मत मारो।

प्रवासी मजदूर
प्रवासी मजदूर कौन है?
यह बड़ा कठिन
और, साम्प्रदायिक सवाल है,
इसका उत्तर
बड़ा कठिन
और, आंतरिक बवाल है,
सवाल का जवाब
सवाल है;
मजदूरी कौन करता है?
भूमिहीन,
.और कौन?
साधनहीन,
..और कोई?
कोई नहीं;
कौन है ये भूमिहीन?
कौन है ये साधनहीन?
दलित, दलित, दलित;
ये दलित कौन हैं?
शूद, चमार, कोरी, पासी, धोबी, धानुक, हेला, भंगी;
ग्रामसभा में
यही मजदूर हैं
यही गरीब हैं
यही कमजोर हैं
यही लाचार हैं
यही मजलूम हैं;
अभी तक झोपड़पट्टियों में रहते थे
अब एक कमरे के ईंट के मकान में हैं
इन्हीं की बीवियाँ सवर्णों के खेतों की मजदूर हैं;
शहरों मेंयही नाले पर बसते हैं
यही रेल पटरियों के किनारे मिलते हैं
यही गंदी बस्तियों में निवास करते हैं
तीन चौथाई झुग्गी-झोपड़ियों में
शहर को यही आबाद करते हैं;
संक्रमण से मरेगा तो यही दलित
भूख से मरेगा तो यही दलित
दंगे में मरेगा तो यही दलित
मारा जाएगा तो यही दलित
करोना तो एक बहाना है
दरअसल, दलितों को लतियाना है।

 हम मरते हैं तो मरने दो

करोना चिंता का विषय है
चाहे रोग हो
चाहे राजनीति
पब्लिक परेशान होती है
भला नेताओं का क्या जाता है।
पिछली बार
जनता डर गई थी
इस बार
चिंतित है
उसका भविष्य कैसा होगा।

चाय और पान की दुकानें
राजनीतिक बतकही के लिए मुफ़ीद हैं
सौ में नब्बे कहते हैं
करोना रोग नहीं राजनीति है
जनमत दबाने का सरकारी हथकंडा है।

पब्लिक का तर्क बेमिशाल है
जब परिक्रमा होता है
करोना नहीं रहता है
जब कुम्भ होता है
करोना गायब हो जाता है
चुनावी रैली में
करोना भी नारे लगाने लगता है।

बच्चों की छुट्टी कर दो
नहीं तो करोना फैल जाएगा
आंदोलन को रोक दो
भीड़ से करोना हो सकता है
परीक्षाओं को निरस्त कर दो
करोना बढ़ जाएगा
आखिर ये सब पब्लिक के हित में जो है।

लोग कह रहे हैं
हम करोना से मर जाएँगे
मरने दो मगर
कर्फ्यू मत लगाओ
स्कूल खोल दो
हमारी भी राजनीति चलने दो
कृषि और व्यापार चलने दो
सड़कें और अस्पताल चलने दो
परीक्षाएँ लो
हमें नौकरी दो।

 

 

 

आर.डी. आनन्द

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