रिप्ड जीन्स डैमेज युग की अभिव्यक्ति है

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  • आर डी आनंद
पूँजीवाद जिस तरह से पुरुष प्रधानता, नारीवाद, जातिप्रथा, वर्चस्ववाद, आतंकवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, संस्कृतिवाद, फासीवाद, साम्प्रदायिकता, पहचान की राजनीति, जाति की राजनीति, धर्म की राजनीति को संरक्षित करता है, ठीक उसी तरह से फैशन को पैदा करता है और उसे संस्कृति और विचारधारा के रूप में भी पालता है। पूँजीवाद का संकट जैसे जैसे गहराता जाता है, वह कुसंस्कृतियों को और अधिक पनपाता और विस्तार देता है। कुसंस्कृतियाँ और कुविचार जनता को जनता के वास्तविक उद्देश्य से भटका कर क्रांति के रास्ते से विमुख करते हैं। इस तरह मरणासन्न पूँजीवाद को कुछ और समय तक जिंदा रहने का अवसर मिल जाता है। जब तक जनता में मुनाफ़े और शोषण पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था को उखाड़ कर समाजवादी व्यवस्था को स्थापित करने की सोच-समझ नहीं पैदा होगी तब तक इस तरह के न जाने कितने फैशन और विचार पैदा होते रहेंगे।इन दिनों फटी जीन्स (Ripped Jeans) काफी चर्चा में है, चाहे वह पहनने का मामला हो या फिर राजनीति। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री तीरथ सिंह रावत के बयान के कारण फटी जीन्स या रिप्ड जीन्स की चर्चा पूरे देश में हो रही है। इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार रावत ने कहा है कि मुझे जीन्स से आज भी कोई दिक्कत नहीं है, मुझे फटी हुई जीन्स से दिक्कत है। शॉपिंग करते हुए या फिर कहीं किसी सड़क पर चलते हुए कई हॉलिवुड और बॉलिवुड सिलेब्रिटिज रिप्ड जीन्स पहने हुए आप को नजर आ जाते हैं। ऐसी जीन्स आमतौर पर घुटनों या फिर जांघ के पास से फटी हुई होती है।  खास बात यह है कि इन फटी हुई जीन्स की कीमत नॉर्मल जीन्स से बहुत ज्यादा होती है।
जीन्स को सबसे पहले 1970 में एक जर्मन कारोबारी लोइब स्ट्रॉस ने डिजाइन किया था। इसका नाम लेवी रखा गया और स्ट्रॉस ने ही डेनिम ब्रांड की शुरुआत की थी। उन्होंने रेशेदार कॉटन के कपड़ों को मिलाया और एक ट्राउजर बना दिया। इसके अलावा उन्होंने इसका रंग गहरा नीला कर किया। इसके बाद जीन्स में रिप्ड ट्रेंड आया। हालाँकि, उस दौर में इसका काफी विरोध भी हुआ और लोगों ने इसका खूब मजाक भी उड़ाया था लेकिन इस तरह के फैशन को असल में पहचान तब मिली जब हॉलिवुड ऐक्ट्रेसेज ने इसे पहनना शुरू किया। इसके बाद लोग अपनी जींस को खुद ही फाड़ने या काटने लगे। ट्रेंड में आने के बाद डेनिम ने इस तरह की रिप्ड जीन्स काफी तादाद में बनाना शुरू किया और इसकी बिक्री भी खूब हुई।
इसके बाद बीच के दशक में रिप्ड जीन्स का फैशन थोड़ा कम नजर आया। ज्यादा लोग इस तरह की जींस पहनना नहीं पसंद करते थे लेकिन 2010 में एक बार फिर रिप्ड जीन्स का ट्रेंड नजर आया। डीजल और बालमेन जैसे डिजाइनर्स ने इसे फिर से लॉन्च करने का काम किया और अपने स्टोर्स में इसे जगह दी। डेनिम अपनी जींस को दो तरह से रिप करता है- एक लेजर तरीके से और दूसरा हाथों से। आमतौर पर सस्ते ब्रांड के जींस को हाथों से ही रिप करवाते हैं लेकिन बड़े ब्रांड इसे एक प्रोग्रामिंग सॉफ्टवेयर से लेजर की मदद से रिप करने का काम करते हैं।
इन्हीं रिप्ड जींस को पहनने वाली महिलाओं पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री तीरथ सिंह रावत की टिप्पणी के बाद अब सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। इस बहस में एक्ट्रेस कंगना रनौत भी शामिल हो गई हैं। एक ओर जहाँ सभी लोग मुख्यमंत्री श्री तीरथ सिंह रावत की आलोचना कर रहे हैं, वहीं कंगना ने अलग ही रिएक्शन दिया है। उन्होंने  बाकी लोगों की तरह मुख्यमंत्री रावत की आलोचना नहीं की बल्कि बात को घुमाकर कुछ अलग ही अंदाज में पेश किया है। कंगना रनौत ने ट्विटर पर अपनी एक फोटो शेयर की, जिसमें वह रिप्ड जींस पहने हुई हैं। इसके साथ ही उन्होंने युवाओं को फैशन टिप्स भी दिए हैं। कंगना ने ट्वीट कर कहा, ‘अगर आप रिप्ड जींस पहनना चाहते हैं, तो सुनिश्चित करें कि इसमें कूलनेस उतनी ही हो, जितनी इन तस्वीरों में है। इससे आपका स्टाइल झलके न कि ऐसा लगे कि आप एक बेघर भिखारी हैं और उन्हें अपने माता-पिता से पैसा नहीं मिलता है। हालाँकि, आजकल ज्यादातर युवा इन दिनों ऐसे ही दिखते हैं।
मुख्यमंत्री श्री रावत ने हाल ही में रिप्ड जींस पहनने वाली महिलाओं पर टिप्पणी की थी, जिसके बाद यह मसला ट्विटर पर ट्रेंड होने लगा था. उन्होंने यह टिप्पणी अपनी एक महिला सह-यात्री को लेकर की थी, जो फ्लाइट में उनके बगल में बैठी थीं और एक एनजीओ चलाती हैं। उनके कपड़ों के बारे में बताते हुए मुख्यमंत्री ने सवाल उठाया था कि ऐसी महिला किस तरह के ‘संस्कार’ (मूल्य) देगी, जो ऐसी फटी हुई जींस पहनकर अपने घुटने दिखा रही हों।
मुख्यमंत्री श्री तीरथ सिंह रावत ने अपने बयान में कहा था, ‘अगर इस तरह की महिलाएं समाज में बाहर निकलकर लोगों से मिलती है और उनकी समस्याओं को हल करती हैं तो ये समाज को कैसा संदेश दे रही हैं, हमारे बच्चों को कैसा संदेश दे रही हैं? ये सब घर से शुरू होता है. जो हम करते हैं, वही हमारे बच्चे फॉलो करते हैं। जिस बच्चे को सही संस्कार घर पर मिले हैं वो कितना भी मॉडर्न हो जाए, अपने जीवन में कभी फेल नहीं होता। खुले घुटने दिखाना, रिप्ड जीन्स पहनना और अमीर बच्चों जैसा दिखना आज कल के संस्कार हैं, जो दिए जा रहे हैं। विदेशी लोग योग को अपना रहे हैं और शरीर को कवर कर रहे हैं और हम बदन दिखाने की ओर आगे बढ़ रहे हैं।
इस बयान के वायरल होने के बाद बॉलीवुड की कई हस्तियों ने मुख्यमंत्री श्री तीरथ सिंह रावत का विरोध किया। इसमें अमिताभ बच्चन की नातिन नव्या नवेली नंदा भी शामिल हैं। इसके साथ जया बच्चन ने भी इसका बयान के विरोध में अपना पक्ष रखा था। लोगों का कहना था कि तीरथ सिंह रावत को अपनी मानसिकता बदलनी चाहिए। इसके अतिरिक्त सोसल मिडिया पर रिप्ड जीन्स पहनने वाली स्त्रियों के विरुद्ध पुरुषों के कमेंट्स आने लगे।
मैंने भी अपने विचार एक कविता में लिखा और उसे एफबी पर पोस्ट कर दिया। मेरी उस कविता का नाम है “फटी जीन्स”, जिस पर कई लोगों के कई कोणों पर विचार आए। स्त्रियों ने यदि सराहा नहीं, तो विरोध भी नहीं किया। कुछ पुरुष साथी वैचारिक हमला जरूर किए। उनका मानना है यह कविता फटी जीन्स का समर्थन करती है और कवि उनके पक्ष में पश्चिमी सभ्यता के साथ खड़ा है। कई लोग तो मेरे ऊपर व्यक्तिगत आक्षेप भी लगाना शुरू कर दिए। दरअसल, ऐसे लोग न अपनी सभ्यता के पृष्ठभूमि को समझते हैं और न पश्चिमी सभ्यता के पृष्ठभूमि को ही। इन्हें सिर्फ खुली टांगे, खुला किस और समुद्र के किनारे पैंटी-ब्रा में लेटी हुई लड़कियाँ दिखाई पड़ती हैं। उन्हें यह नहीं पता है कि यह उनकी नहीं, हमारी समस्या है। हम सभ्यता, संस्कृति और विचार के मामले में उनसे हजारों मील पीछे हैं। वे टाँग का मतलब टाँग समझते हैं और हमें टाँगों में भी योनि दिखाई पड़ती है। वे किस का अर्थ मेल-फीमेल के प्यार का मिलन समझते हैं और हम उसे संभोग की प्रक्रिया मान लेते हैं। उनके पैन्टी-ब्रा में नहाने और धूप सेंकने का अर्थ सिर्फ मनुष्य के रूप में नहाना और लेटना भर है जबकि हम उस अवस्था में उनके स्तन, हिप और सेक्स को खोजते रहते हैं। आखिर यह किसकी कमी है, यह किसका पिछड़ापन है। एक सामान्य व्यक्ति को तत्काल प्रभाव से प्रधानमंत्री बना दिया जाय अथवा अम्बानी के घर का सदस्य बना दिया जाय, तो वह न प्रधानमंत्री जैसा व्यवहार कर पाएगा और न ही अम्बानी के स्तर का उठना, बैठना, व्यवहार व सभ्यता प्रदर्शित कर पाएगा। भौगोलिक और भौतिक परिस्थितियों के अनुसार ही हमारा मानसिक गठन होता है। भारतीय धार्मिक संस्कृति के लोग रिप्ड जीन्स को नग्नता बोधक, रद्द चालोचलन, अश्लीलता और एक नई भोंडी संस्कृति मान बैठते हैं जब कि यह मरणासन्न पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा पैदा की जा रही कुव्यवस्थाओं का परिणाम है। फटी जीन्स का फैशन युग बोधक हैं। जीन्स डैमेज है और डैमेज जीन्स को संभ्रात पहन रहा है। उन संभ्रांतों को यह बोध नहीं है कि भारत की 80 फीसदी जनता के अंग-वस्त्र अभाव के कारण डैमेज हैं। हम यह भी नहीं कह सकते हैं कि ये संभ्रांत हम गरीबों को चिढा रहे हैं और न यह ही कह सकते हैं कि ये डैमेज जीन्स पहनकर हम कोई अच्छी सभ्यता को संरक्षित करने जा रहे हैं। यह संभ्रांत का बोध है। उनके बोध में उनका आनंद छिपा है। उनके आनंद और दुनिया के 80 फ़ीसदी के पीड़ा का कोई संबंध नहीं है। बस यह एक संयोग है कि 80 फ़ीसदी मुफ़लिसी में डैमेज पहन रहा है और 20 फीसदी आनंदातिरेक में। हम 100 प्रतिशत लोग डैमेज पहन रहे हैं इसलिए यह डैमेज युग है। हम मानसिक रूप से डैमेज हैं इसलिए भी यह डैमेज युग है। यह कविता का पहला खंड है,
नग्नता 
शरीर की रियल स्थिति है
नग्नता बुराई नहीं है
बुराई व्यक्ति की दृष्टि में भी नहीं है
बुराई का निर्धारण दृष्टिकोण से होता है
लड़कियाँ रिप्ड जीन्स पहनती हैं
वह मॉडर्न फैशन को सुनिश्चित करता है
रिप्ड जीन्स नग्नता बोधक नहीं है
न ही वह अश्लील चालोचलन है
रिप्ड जीन्स मॉडर्न कल्चर का प्रतीक है
और, डैमेज युग की अभिव्यक्ति है।
हमारी विपन्नता हमारे विचारधारों में भी दिखता है। हम परछाई पीटते हैं। परछाई पीटने से हमारे ही ऊर्जा का क्षरण होता है और परिणाम जीरो है बल्कि साम्प्रदायिक फसादों की वजह से हम माइनस में पहुँच जाते हैं। मैंने अपनी कविता में भौतिक कारणों का संकेत किया है तथा भौतिक परिस्थितियों के रूप में संस्कृति उद्योग का जिक्र किया है। यदि हमारे पाठक का स्तर इतना न हुआ कि वह कविता के बिम्बों और संकेतों के मायने समझ सके, तो हमारा मिशन तो असफल होगा ही। यह कविता का अंतिम खंड है,
गतियाँ अदृश्य हैं
परिणाम परिघटनाएँ हैं
परिघटनाओं से पैदा हुआ बोध
प्रकाश का अँधेरे से रिश्ता है
व्यवस्थित और डैमेज का भी रिश्ता जरूर होगा
परछाई काटने से
अपना हाथ लहूलुहान हो जाएगा
संस्कृति उद्योग एक कारखाना है।
स्त्रियाँ जैसा चाहती हैं वैसा उन्हें रहने दिया जाना चाहिए। उनकी स्वतंत्रता में बाधा डालना पुरुष प्रधानता है। साथ में, यह भी ख्याल रखना चाहिए कि भारत की सभी स्त्रियाँ एक साथ एक जैसा कुछ भी नहीं करने जा रही हैं कि वह चिंता का बहुत बड़ा विषय बन गया है। पुरुषों को स्वयं अपना दृष्टिकोण, व्यवहार, सभ्यता, चरित्र का मापदंड बदल लेना चाहिए। हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि स्त्रियाँ न पुरुषों से कम जानती हैं और न उन्हें उनसे कम इज्जत ही पसंद है। उन्हें यह पता है कि समाज में नंगा नहीं रहना चाहिए। नंगा रहना सभ्यता नहीं है और वे नंगा रहेंगी भी नहीं। यह नंगा रहने का समर्थन नहीं है, स्त्रियों के चिंतन, ड्रेस, चरित्र के बारे में ख़याल बदलने का चित्र भर है। हम पुरुष अपनी ज्याजातियों को उन पर क्यों लादते हैं?
ये पश्चिमी सभ्यता की नकल करने वाले भारतीय कौन है? ये सभी खाए-अघाए लोग हैं जिन्हें किसी भी सभ्यता-संस्कृति से कुछ भी लेना-देना नहीं है। भारत में कई तरह का भारत बसता है। फिलहाल तो, भारत में दो तरह के लोग हैं- गरीब और अमीर। गरीब मजबूरी में फटे कपड़े पहनता है और अमीर व उसके अनुयायी डैमेज कपड़े को मॉडर्न फैशन के रूप में पहनते हैं। मॉडर्न फैशन की सुंदरता का पैमाना सेक्सी का हो चला है। आज “ब्यूटीफुल” का मतलब “सेक्सी इज ब्यूटीफुल है”। सेक्स से सेक्सी बन गया। शायद दुनिया के संदर्भ में “सेक्स” ही दुनिया में “सबसे सुंदर” होता हो इसलिए सुंदरता की तुलना में सेक्स शब्द एप्रोप्रियेट लगा हो जिससे “ब्यूटीफुल” के स्थान पर “सेक्सी” कर दिया गया हो। आम स्त्री सेक्सी शब्द का प्रयोग करने में झिझकती है लेकिन सभ्रांत बनने और दिखने वाली स्त्रियाँ सेक्सी शब्द को बहुत मोरल, उचित और संभ्रांत रूप से प्रयोग करती हैं। आप जिस रूप में भारत को समझते हैं और जिन्हें भारतवासी समझते हैं वे हमारे-आप जैसे व्यक्ति को मनुष्य के श्रेणी में नहीं रखते हैं बल्कि हमें अनएजुकेटेड और अनकल्चर्ड समझते हैं। भारत दो वर्गों में विभाजित है। यहाँ तर्क प्रस्तुत करते समय हमें ध्यान रखना होगा कि हम किसके पक्ष में बात रख रहे हैं।
हीरोइनें कहानी के नाम पर स्तन, नाभि, जाँघ खोलती रहती हैं। डांस के कला और सौंदर्य के नाम पर हिप हिलाती हैं। बैली डांस के नाम पर पेट, ढोढ़ी और स्तन का खूब प्रदर्शन करती हैं। मेरी क्या मजाल की उनकी अभियक्ति और स्वतंत्रता पर कुछ अनर्गल टिप्पणी करूँ अथवा अनैतिक कहूँ। कुछ पुरुष जैसा वस्तु है उसे वैसा ही देखते हैं। कुछ पुरुष खुले हुए अंगों से पैसनेट हो जाते हैं। कुछ लोगों को खुला अंग देख कर वीभत्स लगता है। अब किसी को स्त्रियों के हाथ, पैर, कमर, पेट, नाभि, स्तन, आँख, गाल, होंठ, साड़ी, ब्लाउज और ब्रा का स्टेप देखकर रोमांटिक लगता है तो इसमें स्त्री का क्या दोष। यह तो पुरुष के मानसिक गठन पर निर्भर करता है।
बिल्कुल स्त्रियों और उनके कपड़ों देखिए और अपने मन में उठने वाले भाव का मज़ा भी लीजिए लेकिन स्त्रियों को कुछ कहिए मत। जो फूल सुन्दर लगता है उस फूल को लोग देखते ही हैं बल्कि जो फूल सुंदर नहीं लगता है उसे भी देखते हैं। फूल न खुश होता है न क्रोधित लेकिन जब फूल को तोड़ लेते हैं तो वह कुम्हला जरूर जाता है। आप शरीर और वस्त्र के सौंदर्य का लुत्फ लीजिए, कौन रोकता है लेकिन उस लुत्फ़ को नीति-नैतिकता से मत जोड़िए और न वस्त्र और स्त्री की तौहीन करिए। वस्त्र के कास्ट पर स्त्री पर व्यंग अथवा चरित्र पर अँगुली उठाना न सिर्फ अनुचित है, असंवैधानिक भी है तथा स्त्री स्वतंत्रता पर हमला भी है।
आप स्त्रियों के कपड़े और अंग खूब देखते हैं। इस देखने में आप की इच्छा और चरित्र भी छिपा है। मन ही मन मस्त रहते हैं और दिखाने के लिए पवित्र बनते हैं। यह देखिए कि ये किन घरों और ख्यालों की लड़कियों है। इनकी निगाहों में हम-आप जाहिल है, स्तरहीन, बेसमझ लोग हैं। ये हमें स्लम डॉग कहते हैं। यह उन्हें अच्छा लगता है क्योंकि वे दूसरे वर्ग के लोग हैं। आप को बुरा लगता है क्योंकि आप-हम उनकी निगाहों के स्लम डॉग हैं, हमारा दूसरा वर्ग है। उनके कल्चर और मानसिकता को आप अभी नहीं पहुँच सके हैं। आप को उनकी संस्कृति, ड्रेस और अनुभूतियाँ ओछी लगती हैं। आप उन्हें भी अपने कल्चर में रखना चाहते है तो सरकार से माँग करिए कि वह एक सर्वसम्मति से कोड ऑफ कंडक्ट तैयार करे और उसे कड़ाई से पालन करवाए। भारत बहुभाषा-भाषी, बहुसंस्कृति-सभ्यता, बहुजाति-धर्म का देश है तो यहाँ समरूपता कैसे हो सकती है। यदि आप फिर भी तानाशाही लागू करना चाहते हैं, यदि आप फिर भी स्त्रियों को गुलाम बनाए रखना चाहते हैं, यदि आप स्वतंत्रता के खिलाफ हैं, तो पुनः मनुवादी व्यवस्था को लागू करवाइए।
जिसका युग होता है वह मनमानी करता ही है। जब स्त्रियों का वर्चस्व हो जाएगा तो वे स्वतंत्र रूप से पुरुष पर शासन भी करेंगी। जैसे पुरुष चड्ढी पहनकर स्त्री, पुरुष, लड़की, लड़के के मध्य लेता बैठा रहता है, उसे अपनी नंगी बदन दिखाने में लज्जा नहीं महसूस होती है, तो कल को स्त्रियाँ भी कह सकती हैं कि उनके खुले बदन पर आपत्ति क्यों, और वैसे भी पुरुषों ने स्त्रियों को कमर से ऊपर कपड़े न पहन रखने का नियम बना रखा था। उन्हें स्तन ढकने के लिए स्तन कर देना पड़ता था। अब जब स्त्रियों की दृष्टि बदल रही है। वे शरीर का मतलब शरीर समझने लगी हैं तथा पुरूषों से भी अपेक्षा करती हैं कि उनके शरीर को पुरुष किसी भी तरह सेक्स न समझे तथा अंग-प्रत्यंग और कपड़े को सभ्यता-संस्कृति से न जोड़े। वे चाहती है कि पुरुष अपने वर्चस्व को स्त्रियों पर न लादे और यदि पुरुष आज ऐसा कर रहा है तो आने वाले कल में वह स्त्री वर्चस्व को झेलने के लिए तैयार रहे।
सच का समर्थन करने वालों पर तोहमत लगाई जाती है कि वे बवंडर मचा रखे हैं? मैं तो सिर्फ आप से सामान्य तौर पर बात कर रहा हूँ। मैं तो एक तर्क रख रहा हूँ लेकिन आप ज्ञान-विज्ञान और परिवेश को ध्यान में ही नहीं रखना चाहते हैं। किसी स्त्री के पहनावे पर छींटाकसी कर के उसकी प्रवृत्ति और सभ्यता को नहीं बदला जा सकता है। सभ्यता और प्रवृत्ति को बदलने के लिए व्यवस्था को बदलना पड़ेगा, जहाँ पर न बोल रहे हैं और न ध्यान दे रहे हैं बल्कि मेरी कविता के अंतिम बंध पर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रहे हैं जिसमें अनुचित लगने वाले बातों का उपाय भी दर्ज है।
हम सभी को एक दूसरे से मिलकर सैद्धांतिक बातों की अदला-बदली करनी चाहिए। हम जिन सिद्धांतों को फॉलो करते हैं, वह हमारा भला नहीं करता है बल्कि हमारे मानसिकता का दोहन करता है और हमें जिन सिद्धांतों के समर्थन और साथियों के हित में कार्य करना चाहिए, हम उन्हें के विरुद्ध शोषकों के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। हम इस विद्रूप अँधेरे के समय में अपने विरुद्ध हैं और अपने मित्रों को अपने से दूर करने का पूरा उद्यम कर रहे हैं। यह बौद्धिक अँधेरे का समय है।
जब हमारा समाज दो वर्गों में विभाजित है, तो दो तरह के लोग और दो तरह की दृष्टि का होना लाज़िम है। वस्तुपरिस्थितियाँ ही विचारों को जन्म देती हैं। आम इंसान अभाव में जिंदगी जीता है। वे और उनके बच्चे कपड़े के अभाव में जीवन बिताते हैं। कुछ के तन पर बिल्कुल कपड़ा नहीं होता है और कुछ के तन पर फटे-पुराने, मैले-कुचैले कपड़े होते हैं। एक का तन अभाव में झाँकता है, दूसरा का फ़ैशन के चलते। अभाव वाला छिपाता घूमता है और उसे इज्जत से जोड़कर देखता है लेकिन संभ्रांत अपने मानसिक स्तर को तन-बदन से बहुत ऊपर उठा लेता है। जब कोई गरीब के फटे कपड़ों के अंदर झाँकता है तो वह शर्म के मारे गड़ जाता है और वहीं अमीर, यदि कोई फैशन के अतिरिक्त शरीर देखते व सभ्यता की तौहीन करते हैं, तो उन्हें अनसिविलाइज्ड, अनकल्चर्ड और अनएजुकेटेड कहता है। एक के पास तन ढकने के लिए कपड़ा व साधन नहीं है, दूसरे के पास इतना कपड़ा व साधन है कि वह कपड़ों में वैराइटी और डिजाइन तलाशता है। आज डिजाइन के रूप में डैमेज डिजाइन ही निर्मित हो गई। संभ्रात बच्चों में डैमेज जीन्स को लेकर ही क्रेज और कम्पटीशन है। उनकी नकल करते-करते वह फिशन गरीबों की दुनिया तक भी पहुँच गया। अब सवाल है क्या फटी जीन्स और उनके पहनने वालों को दोषी माना जाय अथवा फैशन के नाम पर उसे भी बर्दाश्त किया जाय? हमें यह याद रखना चाहिए कि फटी जीन्स और उसके पहनने वाले लोग जनमानस के नुमाइंदे नहीं हैं और न ही इसका अर्थ यह गया कि जनमानस ने सम्पूर्ण उसे स्वीकार कर लिया है। यह फैशन है। फैशन आता-जाता रहता है। फैशन को सभ्यता-संस्कृति में लेना ठीक नहीं है और न ही कोई फैशन पूरी सभ्यता को ही कैप्चर कर पाता है। उन पर हमला करना या उनको जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है लेकिन जो चीज जनमानस के दिलोदिमाग़ में असभ्य लग रहा हो, उसका विरोध एक उचित प्लेटफार्म पर और कानूनी तरह से किया जाना अधिक जरूरी है। सोसल मीडिया पर व्यक्तिगत राय रखकर सभ्यता-संस्कृति के ठेकेदार बनकर आपस में रंजिश पाल लेना अथवा एक दूसरे को मारने के लिए खोजने लगता, बहुत बड़ी मूर्खता है। अमानवीय लगने वाले सभ्यता-संस्कृतियों जे विरुद्ध एक राय बनाई जा सकती है और संगठन के लोग सरकार ने उस पर रोक लगाने की अपील कर सकते हैं, सरकार पर आंदोलन करके दबाव डाला जा सकता है कि सरकार और सुप्रीम कोर्ट इन सभ्यताओं, संस्कृतियों और वेशभूषा पर रोक लगाने हेतु कानून पास करे और कड़ाई से अनुपालन करवाए। लेकिन, किसी भी सभ्यता-संस्कृति के मानने वालों के पास भी अपनी मानसिकता होती हौ, अपना तर्क होता है, अपनी वास्तविकता होती है और अपनी जरूरतें होती हैं। इसे ही भौतिक संरचना कहते हैं।
फ़िल्म इंडस्ट्री के पापुलर हीरो राजकपूर के समय नैरो मोहड़ी का पैंट फैशन था। अमिताभ बच्चन ने चौड़ी मोहड़ी-36 और 40 इंच तक का पैंट फैशन में ला दिया। अमिताभ के कान ढकने वाले बाल नवयुवकों में एक क्रांति ही ला दिया। तत्काल, मिथुन चक्रवर्ती के पीछे साइड के लम्बे-लम्बे बालों ने फैशन की दुनिया में सोने पर सुहागा काम किया। लड़के एक साथ अमिताभ और मिथुन दोनों के बालों का लुत्फ़ ले रहे थे। हीरोइन साधना के बालों की साधना कट छवि आज भी प्रचलित है। बॉब कट बाल, ब्वाय कट बाल, कंधों तक बाल, थ्री स्टेप बाल, फ्लैट बाल, करली बाल ने धूम मचा दिया। इस समय जनमानस के दिलोदिमाग़ में वे फैशन फिटनाहीं बैठते थे। उस समय अभिभावक कहते थे कि इस फौशन ने बच्चों को बिगाड़ कर रख दिया है। यह सच है जो फैशन जनमानस को नहीं लुभा पाता है व उचित नहीं लगता है, वह कुछ दिनों के बाद लुप्त हो जाता है। बचता वही फ़ैशन है जो जन सामान्य एक लंबे समय के लिए पसंद करता है। लड़कियों फिटिंग सूट प्रचलित हुआ। पसंद भी किया गया। आज भी पसंद किया जाता है लेकिन उसका क्रेज क्रेजी होने तक नहीं है औरन ही जन सामान्य में उसके प्रति कोई विरोध भाव ही है। जिसका मन हो पहने, जिसका मन हो न पहने। न कोई दबाव न कोई रोक। आज लड़कों में वन साइडेड, टकला, गजनी, मिलिट्री, स्पाइक्स इत्यादि बालों का चलन है, फिर भी जनसामान्य वही पुरातन स्टाइल के बलों में रहता है। अधिकतर स्त्रियों में गुथे हुए चोटीनुमा बाल ही प्रचलित है। आज स्त्रियों में ब्लाउज को लेकर बहुत क्रेज है। एक से एक डिजाइनदार ब्लाउज पूरी पीठ को खुला रखते हैं। पहले साड़ी नाभि पर बाँधी जाती थी। नाभि का दिखना लज्जास्पद था। आज स्त्रियाँ नाभि के बहुत नीचे साड़ी बाँधती हैं। आज नाभि का दिखना सुंदरता का अभिप्राय है। आज सेक्सी इज ब्यूटीफुल का जमाना है लेकिन ऐसा जनसामान्य स्त्रियाँ बिल्कुल नहीं पहनती हैं बल्कि उन स्त्रियों पर हँसती हैं, कमेंट करती हैं और उन्हें बदचलन कहती हैं। फिर भी, क्या अधुनिक खयालों की स्त्रियों के शौक और फैशन को दबाया जा सकता है। आज पुरुषों और स्त्रियों में टैटू बनवाने का चलन खूब जोरों पर है। यह भी एक फैशन का शौक है। यहाँ तक कि स्त्रियाँ अपने बाजू, कमर, नाभि, स्तन और सेक्स के इर्द-गिर्द बनवाती हैं। इसका गुप्त अभिप्राय यह भी है कि उस टैटू का प्रदर्शन सौंदर्य के रूपमें किया भी जाना चाहिए। निश्चित वे अपने अनुसार उचित स्थान व अवसर पर उन अंगों पर बने टैटू का प्रदर्शन भी करती होंगी। वह भी इसी समाज की स्त्रियाँ हैं। किसी फैशन का इतना विरोध नहीं किया जाना चाहिए कि वह साम्प्रदायिक हो उठे अथवा बात साम्प्रदायिक दंगों तक पहुँच जाय। फैशन को हिन्दू और मुस्लिम सभ्यताओं के विरुद्ध नहीं देखा जाना चाहिए।  जब हम सभ्यताओं, पहनाओं, संस्कृतियों, भाषाओं पर धार्मिक मुलम्मा लगाने लगते हैं, तब बात बिगड़ जाती है।
पूँजीवाद जिस तरह से पुरुष प्रधानता, नारीवाद, जातिप्रथा, वर्चस्ववाद, आतंकवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, संस्कृतिवाद, फासीवाद, साम्प्रदायिकता, पहचान की राजनीति, जाति की राजनीति, धर्म की राजनीति को संरक्षित करता है, ठीक उसी तरह से फैशन को पैदा करता है और उसे संस्कृति और विचारधारा के रूप में भी पालता है। पूँजीवाद का संकट जैसे जैसे गहराता जाता है, वह कुसंस्कृतियों को और अधिक पनपाता और विस्तार देता है। कुसंस्कृतियाँ और कुविचार जनता को जनता के वास्तविक उद्देश्य से भटका कर क्रांति के रास्ते से विमुख करते हैं। इस तरह मरणासन्न पूँजीवाद को कुछ और समय तक जिंदा रहने का अवसर मिल जाता है। जब तक जनता में मुनाफ़े और शोषण पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था को उखाड़ कर समाजवादी व्यवस्था को स्थापित करने की सोच-समझ नहीं पैदा होगी तब तक इस तरह के न जाने कितने फैशन और विचार पैदा होते रहेंगे।

टी जीन्स

नग्नता
शरीर की रियल स्थिति है
नग्नता बुराई नहीं है
बुराई व्यक्ति की दृष्टि में भी नहीं है
बुराई का निर्धारण दृष्टिकोण से होता है
लड़कियाँ रिप्ड जीन्स पहनती हैं
वह मॉडर्न फैशन को सुनिश्चित करता है
रिप्ड जीन्स नग्नता बोधक नहीं है
न ही वह अश्लील चालोचलन है
रिप्ड जीन्स मॉडर्न कल्चर का प्रतीक है
और, डैमेज युग की अभिव्यक्ति है।
पुरुष हायतोबा करता है
स्त्री के हर सृंगार और ड्रेस को
सभ्यता से जोड़कर देखता है
क्योंकि युगबोध में पुरुष प्रधानता है
पुरुष अपने अश्लील मन को
स्त्री अंगों से जोड़ता है
और आरोप उन पर मढ़ता है।
जानवर सहज होता है
उसके लिए नग्नता और खुली देह का
कोई अर्थ नहीं होता
न ही वह जानवर की सभ्यता से जोड़ता है
न अपने कामुक होने का कारण
पशु मादा पर मढ़ता है
पुरुष मनुष्य है
और विवेकशील है
लेकिन क्या बुद्धि का अर्थ यह है
कि पुरुष स्त्री देह देखकर ही कामुक रहा करे
और उसके कपड़ों से ही सभ्यता सुनिश्चित करे।
पुरुष को
स्त्री की रोशनी काली दिखाई पड़ती है
विचित्र विकास है
अद्भुत चेतना है
स्त्री आज भी नागिन है
अब भी भोग्या है
मोक्ष में बाधा है
पुरुष यह नहीं सोचता कि
विचलित कौन होता है
पाना कौन चाहता है
असहज कौन रहता है।
गतियाँ अदृश्य हैं
परिणाम परिघटनाएँ हैं
परिघटनाओं से पैदा हुआ बोध
प्रकाश का अँधेरे से रिश्ता है
व्यवस्थित और डैमेज का भी रिश्ता जरूर होगा
परछाई काटने से
अपना हाथ लहूलुहान हो जाएगा
संस्कृति उद्योग एक कारखाना है।

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