व्यक्तिवादी असंगतियों की कहानी है ‘संक्रमण’ 

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‘संक्रमण’ कहानी प्रतिष्ठित पत्रिका ‘हंस’ के जनवरी 2021 अंक में प्रकाशित डॉ. अजय नावरिया की कहानी है। संक्रामक कहानी का मुख्य किरदार मिलिन्द भारतीय जातिप्रथा, विद्या, संस्कार, शील, श्रद्धा, वीर्य, समाधि और ज्ञान के दृष्टि से विवाद के घेरे में है। मिलिंदपह का मिलिन्द यूनानी सम्राट था जिसे शील समाधियों के अनुपालन का बहुत खयाल था और उसे भिक्खु नागसेन से अपनी संकाओं का निवारण करना था लेकिन संक्रमण का मिलिन्द आधुनिक संस्कृतियों का हिमायती है तथा स्त्री, सेक्स और शराब के लुफ्त से बिल्कुल परहेज़ नहीं करता है। इस मिलिन्द को कुछ सीखने की परवाह नहीं, यह तो सिखाने के लिए विदेश जाता है। वायरस और संक्रमण दो शब्द है। यहाँ वायरस के दो अर्थ हैं, प्रथम करोना और दूसरी जाति। करोना और जाति दोनों संक्रमित होते हैं। भारत में अक्सर दलित जातियाँ ब्राह्मण जातियों को वायरस कहती हैं। संक्रमण कहानी में वायरस का छिया अर्थ ब्राह्मण जातियाँ ही हैं।

संक्रमण कहानी का सच तो इतना भर है कि कहानीकार भारतीय जाति-व्यवस्था के अत्यंत घृणित रूप को दिखाना चाहता है कि रतिक्रिया में निमग्न सवर्ण नायिका दलित शब्द सुनकर किस तरह जातीय अहम से भर उठती है और उसे ग्लानि की अनुभूति होने लगती है इसलिए वह दलित नायक के आगोश में संसर्ग में रत ढ़ीली पड़ जाती है लेकिन कहानी के कैनवास में जो तथ्य उपस्थिति होते हैं, वे इतने वैपरीत्य से भरे हैं जिससे कि कहानीकार के मनोविज्ञान पर शक होने लगता है। मिलिन्द कहानी का नायक है लेकिन मिलिन्द का मनोविज्ञान, ज्ञान, चरित्र, योजना कहानीकार का है। किसी भी कहानी व कविता में उसके लेखक/रचयिता के प्रज्ञा, मनोविज्ञान, चरित्र और भौतिक परिस्थितियों का निरूपण होता है। दलित कहानीकार जहाँ भारतीय जातिप्रथा के यथार्थ को अपने पात्रों में भरता है, वहीं वह पात्रों के द्वारा एक संघर्ष, आंदोलन, संगठन निर्माण की प्रक्रिया का सृजन भी करता है। माना कि यह सभी कहानियों में संभव नहीं हो सकता है लेकिन जिस यथार्थ को कहानीकार उद्घाटित करना चाहता है उसकी भौतिक परिस्थितियों के साथ उसे न्याय करना चाहिए, न कि वह भौतिक परिस्थितियों को एब्सर्ड बना दे और उसके साथ मनमानी करने लगे। वैसे तो कहा यह भी जाता है कि कहानी यथार्थ का मनोगत रूप ही होता है लेकिन मनोगत के पीछे के तथ्य और कथ्य विरोधाभाषी बना देने से कहानी का सत्यानाश तो होता ही है बल्कि कहानीकार के बौद्धिक और चारित्रिक अवस्थितियों पर भी शक होने लगता है। यह एक तरह से प्रतिक्रियावादी बौद्धिकता है जिसे मौलिक परस्थितियों से कुछ भी लेना-देना न होकर एक जाति व वर्ग के विपरीत निंदा का प्रस्ताव-पत्र भर पेश करना है।

मिलिन्द एयरपोर्ट के बाद जब शहर में प्रवेश करता है तो उसकी निग़ाह एक सफाई कर्मचारी पड़ती है और वह भारतीय परिवेश के सफाई कर्मचारियों की मानसिक स्थिति में उलझ जाता है जबकि यहाँ किसी जाति विशेष के व्यक्ति को कोई कार्य नहीं सौंपा जाता है और न ही किसी कार्य को नीचा ही समझा जाता है। यह मिलिन्द के अपने देश के भौतिक परिस्थितियों से उत्पन्न मानसिकता का मनोवैज्ञानिक प्रतिबिम्ब है। कहानी के उन शब्दों से नायक के मनोविज्ञान की अनुभूति की जा सकती है:

“तभी दीवार को साफ़ करता एक कर्मचारी उन की नज़रों में अटक गया…उस के हाथों में दस्ताने थे, शांत और तल्लीन, दुनिया से बेखबर, अपने काम में वह एकदम खोया हुआ था।”

जापानी सज्जन और मिलिन्द के वार्तालाप से अवगत हुआ जा सकता है कि मिलिन्द जी अपने पूरे नाम मिलिन्द भारती के नाम से अतिथिगृह, विश्वविद्यालय, दोस्तो, प्रोफेसरों, स्कॉलरों, विद्यार्थियों के मध्य परिचित हैं। इस मिलन से तथ्य को समझिए:

“एयरपोर्ट से धीमे-धीमे कदमों से वे बाहर निकल आए। बाहर-पन्द्रह-बीस लोग, अपने-अपने परिचितों और अतिथियों का इंतज़ार कर रहे थे। कुछ के हाथ में प्लेकार्ड थे। मिलिन्द की नज़रें उन तख्तियों पर अपना नाम खोज रही थीं कि तभी उन्हें सुनाई दिया –‘मिस्टर मिलिन्द भारती!’ आवाज़ की दिशा में उन्होंने  पलट कर देखा, वहाँ एक जापानी सज्जन हाथ हिला रहे थे।  वे उन की तरफ बढ़ गए।

सामने पहुँचते ही उन्होंने हाथ बढ़ाया–‘जय भीम, मिलिन्द जी!’

‘जय भीम।’ थोड़े विस्मय से उन्होंने जवाब दिया। मिलिंद ने उन का बढ़ा हुआ हाथ थाम लिया।

“मैं हिंदी जानता हूँ और आप की आत्मकथा और कुछ दूसरी रचनाएं भी पढ़ चुका हूँ । मेरा नाम प्रो. हिदेआकी इशिदा है और यहाँ हिंदी भाषा और साहित्य पढ़ाता हूँ।””

यही नहीं, इनके रूम को साफ करने वाली श्वेता भी इनके नाम और जाति से परिचित रही होगी क्योंकि श्वेता दिल्ली विश्वविद्यालय से एमए किया था और  जापान में पीएचडी कर रही थी। वह हिरोको की मित्र भी थी। कहानी के शब्दों में,

“हिरोको ने बताया कि श्वेता उस की पुरानी दोस्त है। वे दोनों कभी साथ-साथ दिल्ली के एक विश्वविद्यालय में पढ़े थे। श्वेता यहाँ की एक यूनिवर्सिटी से पीएच.डी कर रही है।  हिरोको अच्छी हिंदी जानती थी। उस ने हिंदी में एम.ए किया था, सन 2012 में।”

दूसरी जगह श्वेता और मिलिन्द के एक वार्तालाप से स्पष्ट है कि श्वेता मिलिन्द के नाम, जाति और सम्प्रति से परिचित रही होगी। श्वेता कोई सामान्य लड़की नहीं थी बल्कि वह एक स्कॉलर थी और विदेश पढ़ने जाने वाली वह लड़की सामान्य घर की भी नहीं रही होगी। सामान्य घर की लड़कियाँ अगल-बगल के शहर के डिग्री कॉलेजों से ही ग्रेज्युएट हो जाँय, बहुत है। आज दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पीएचडी कौन कहे, किसी सामान्य विश्वविद्यालय से पीएचडी एक सामान्य घर की लड़की के लिए बहुत कठिन है इसलिए, ऐसा सोचना कि वह बेवकूफों की भाँति मिलिन्द की जाति नहीं जानती रही होगी, गलत धारणा है। श्वेता और मिलिन्द के कुछ सवाल-जवाब से रूबरू होकर अनुमान लगाइए:

“”आप इंडियन हैं ना सर!” उस युवती ने चलते हुए  पूछ लिया।

“हां।” मिलिन्द ने अपनेपन से उसे जवाब दिया।

‘ग्रेट…मैं उत्तराखंड से हूँ।”

‘क्या नाम है आप का?”

“श्वेता।  यहाँ पढ़ती हूँ और पार्टटाइम यह काम कर लेती हूँ अपना खर्च निकालने के लिए, यहाँ सभी करते हैं ।” उस ने चहकते हुए बताया।”

इतना ही नहीं, मिलिन्द को भी श्वेता की जाति का पता चल गया होगा क्योंकि मिलिन्द जाति-व्यवस्था का ही साहित्य लिख, पढ़ और पढ़ा रहे हैं बल्कि दलित साहित्य पर ही विदेश में लेक्चर देने जाते हैं, यहाँ भी वे दलित साहित्य पर ही लेक्चर देने आए हैं। जिस तरह से किसी के नाम के आगे टाइटिल न लगा होने से सवर्ण यह समझ लेता गया कि अमुक दलित ही होगा, उसी तरह दलित स्वयं भी किसी ऐसे व्यक्ति के जाति के बारे में पता लगाने का भरपूर प्रयास करता है जिसके नाम के आगे कोई टाइटिल नहीं लगा होता है। मिलिन्द को यहाँ सब के नाम, टाइटिल और जाति पता हैं, जैसे:-प्रो. हिदेआकी इशिदा, गीतांजलिश्री, डॉ. माया सुजुकी, शोभा, हिरोको अराकावा, प्रो. स्नेह, मिस्टर कुलकर्णी, यूताका फूजी, दाज्यू,। विचित्र बात है कि उन्हें सिर्फ किसी की जाति नहीं पता था तो वह श्वेता थी जिसके वे सबसे अधिक नजदीक आ गए थे, इतने नजदीक कि उससे उन्होंने सेक्स संबंध बनाने में भी कोई परहेज नहीं किया, और लेखकीय खेल देखिए कि उन्हें उसकी जाति तब पता चली जब हिरोको ने मिलिन्द के पूछने पर कि श्वेता कहाँ चली गई, बताया कि श्वेता ने कहा है कि-

“मैं उस व्यक्ति के बारे में कुछ जानती नहीं थी… आखिर  उस के सामने, उस का टॉयलेट, उस का कमरा  कैसे  साफ़ कर सकती हूँ, वह अछूत है, हमारे घरों में काम करने वाले, हमारे नौकर हैं ये लोग।”

क्या कहानी के इस मोड़ पर मिलिन्द को श्वेता के सवर्ण होने का पता चला होगा, सत्य लगता है? यहाँ कहानीकार और मिलिन्द दोनों पर शक की पूरी गुंजाइश है कि दोनों जाति के बारे में न सिर्फ काशश रहते हैं बल्कि ओवर काशश रहते होंगे क्योंकि दोनों पेशे और जाति से एक हैं। मिलिन्द प्रो. स्नेह के पति के गोत्र कुलकर्णी से प्रो. स्नेह के जाति का अनुमान लगा लेते हैं। देखिए प्रो. स्नेह के शब्द:

“प्रो. स्नेह ने बताया कि उन्होंने मराठी से कुछ दलित कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया है और अगर मिलिन्द उन्हें सुनें तो उन्हें और उन के पति मिस्टर कुलकर्णी को बहुत अच्छा लगेगा। कुलकर्णी गोत्र सुन कर मिलिन्द समझ गए कि उन के पति मराठी हैं।”

जो मिलिन्द टाइटिल और जाति पर इतना ध्यान देता हो, वह भला श्वेता की जाति जाने उसके साथ टहलने और संभोग की सहमति क्यों देगा? निश्चित ही वह किसी भी तरह श्वेता की जाति का पता उसी समय लगा लिया होगा जब उसने उसका नाम श्वेता जान लिया रहा होगा क्योंकि अधूरा नाम उसे तब तक चुभता रहा होगा जब तक वह उसके आगे के टाइटिल को न जान लिया हो।

क्या इस कहानी को पढ़कर यह अजीब नहीं लगता है कि एक दलित प्रोफेसर जो जाति-व्यवस्था को लेकर इतना सचेत है और उसे डॉ. आम्बेडकर के जातिप्रथा उन्मूलन को लेकर विदेशों में भी अपने लेक्चर के माध्यम से ग़लीज़ जाति-व्यवस्था के विरुद्ध वैचारिकी तैयार करना है, वह अपने नैतिक कर्तव्य और डॉ.आम्बेडकर साहब के मिशन से विचलित होकर विदेश में एक स्त्री सफाई कर्मचारी से संभोग करने को क्यों आतुर हो जाएगा, यही नहीं, वह एक दलित प्रोफेसर होने के उपरांत भी शराब और शबाब में क्यों रत हो जाएगा? क्या उसे अपने कृत्य में पूरे दलित बुद्धिजीवियों और एक्टिविस्टों के चरित्र के धूमिल होने का बिल्कुल खयाल नहीं आया? क्या उसे अपनी उस बात पर खयाल नहीं आया कि दिल्ली दलित बुद्धिजीवियों का केंद्र है? क्या मिलिन्द के इस कर्म से दिल्ली का दलित अखाड़ा शर्मसार नहीं होगा?

मिलिन्द होटेल में ही समझ गया था कि श्वेता सवर्ण है। मिलिन्द शराबी था और उसे पूर्व ही स्त्रियों को फँसा कर संभोग करने की आदत थी। उसने श्वेता को  शराब पिलाया और संभोग किया। कहानी में अपने चरित्र को छिपाने के लिए कहानीकार ने ट्वीस्ट दिया कि उसे हिरोको द्वारा पता चला कि श्वेता उसके दलित होने के नाते ग्लानि में थी, जबकि कहानी के विभिन्न प्लाटों से ज्ञेय है कि दोनों को एक दूसरे के जाति का पूर्व ही संज्ञान हो गया था।

यह बात गले के नीचे नहीं उतरती है कि विदेश में पीएचडी करने वाली एक सवर्ण लड़की दलित प्रोफेसर से बिना किसी लंबे परिचय और घनिष्ट संबंधों के संभोग के लिए राजी क्हो जाएगी? क्या जापान पहुँचकर भारतीय लड़कियाँ भी शराब और सेक्स को सामान्य मान लेती हैं? मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगता है। मैं कहानीकार के इस सामान्यीकरण से बिल्कुल सहमत नहीं हूँ। मुझे ऐसा प्रतीत होता है मिलिन्द ने सवर्ण लड़की से संभोग करके अपनी जातीय कुण्ठा को मिटाने की कोशिश की है।

मिलिन्द दलित प्रोफेसर है। इस दलित प्रोफेसर ने जापान में पहुँचकर ऐसा कुछ नहीं किया जिससे आम्बेडकरवादियों और क्रांतिकारियों को उस पर नाज़ हो बल्कि उसने दलित बुद्धिजीविता को शर्मसार किया है। मिलिन्द शराबी और ऐय्याश है। इसके लिए कहानीकार ने कहानी में बहुत से साक्ष्य छोड़े हैं।  जब वह जापान में प्रवेश करता है तो उसके सौंदर्य वर्णन के शब्दों में स्त्री मन और देह ही कौंधता है। इससे प्रतीत होता है कि दलित साहित्य का उद्देश्य और दलित साहित्य सौंदर्य से अधिक स्त्री देह उसके जहन में निरंतर मूल्यवान है क्योंकि जो व्यक्ति के मन-मस्तिष्क में होता है वही उसके जुबान पर आता है। कहानी में प्रयुक्त शब्द -‘मदहोशी’, ‘प्रेमी की बाहों में पोर-पोर डुबो दिया’, ‘प्रेमी का इंतजार’, ‘सुंदर महिला’, ‘तिकोना चेहरा’, ‘लम्बी नाक’, ‘छोटी पर लम्बी काली कजरारी आँखें’, ‘गोरा रंग’, ‘बड़ी-बड़ी आँखे और पुष्ट देह’, ‘उसे बांहों में कस कर निचोड़ देना चाहते थे’, ‘ऐसी लिपटी’, ‘बेतहाशा चूमने लगी’, ‘आवेश में उस ने उन के होंठो को इतना कस कर काटा कि खून चमचमा आया पर उस ने होंठो को फिर भी छोड़ा नहीं’, ‘उसे हौले से बेड पर लिटा लिया और कुछ मिनट बाद ही श्वेता भयानक रूप से आक्रामक हो गई’, ‘ओह्ह! एकदम राक्षस’, ‘श्वेता के होंठों को कस कर अपने दाँतों से दबा लिया’, ‘श्वेता के शहद के छत्ते में’- से दलित साहित्य का कुछ भी बोध नहीं होता है बल्कि किसी पोर्न साहित्य का हिस्सा लगता है। कहानी के कुछ ऐसे खंड को पढ़िए जिससे आप को विदित हो जाएगा कि यह दलित जीवन की कहानी न होकर एक दलित प्रोफेसर द्वारा किसी स्वच्छन्द लड़की के साथ रंगरेलियाँ मनाने की कहानी है। ,

“टोक्यो महक रहा था… पूरा शहर साकुरा के फूलों के खिलने से उस की मदहोशी में था, जैसे किसी प्रेमिका ने खुद को अपने प्रेमी की बाहों में पोर-पोर डुबो दिया हो। मार्च और अप्रैल के इन्हीं दो महीनों में खिलता है, साकुरा का फूल, फिर साल भर का बिछोह हो जाता है और शहर की आबोहवा जैसे तड़पती रहती है अपने प्रेमी के इंतज़ार में।

प्रो. इशिदा फुर्ती से उठे। “जरूर माया होंगी।’ कहते हुए उन्होंने दरवाज़ा खोल दिया । मिलिन्द ने दरवाज़े से भीतर आते हुए एक बेहद सुंदर महिला को देखा। तिकोना चेहरा, लम्बी नाक, छोटी पर लम्बी काली कजरारी आँखें, गोरा रंग, चेहरे पर मुस्कान ।

श्वेता की बड़ी-बड़ी आँखे और पुष्ट देह उन्हें बहुत तेजी से अपनी तरफ खींच रही थी।

उसे बांहों में कस कर निचोड़ देना चाहते थे वह , पर आश्चर्य कि उन से अपनी जगह से हिला तक नहीं जा रहा था। उन्होंने मोबाइल में आए वाट्सअप के संदेश पढना शुरू कर दिया, जिन्हें वे पहले भी पढ़ चुके थे, पर आँखे मोबाइल पर और दिमाग श्वेता के आस-पास तैरता रहा । एक तूफ़ान चल रहा था उन के भीतर।  ‘किसी को कुछ नहीं पता चलेगा कभी ।’ मिलिन्द बार-बार खुद को तैयार करने लगे अब । “खुद राज़ी है वह तो, रुकना चाहती है रात भर। समझो मिलिन्द किसी की जरूरत पूरी करना बिल्कुल गलत नहीं है, यह तो नेक काम है, नेक काम, नेकी का काम है यह।”

पल के जाने कौन से हिस्से में, वे मंत्रबिद्ध से उठे और श्वेता को बाहों में भर लिया। श्वेता भी उन से ऐसी लिपटी कि दोनों मिल कर जैसे एक हो गए। वह उन्हें बेतहाशा चूमने लगी। आवेश में उस ने उन के होंठो को इतना कस कर काटा कि खून चमचमा आया पर उस ने होंठो को फिर भी छोड़ा नहीं।

श्वेता को बाहों में ले कर उन्होंने उसे हौले से बेड पर लिटा लिया और कुछ मिनट बाद ही श्वेता भयानक रूप से आक्रामक हो गई।

“ओह्ह! एकदम राक्षस।” वह मदहोशी में बुदबुदाई और मिलिन्द को कस कर भींच लिया। ठीक इसी समय उत्तेजना और आवेश के इसी क्षण में मिलिन्द ने मजाकिया लहजे में, धीमे से,  उस के कान में कहा – ” दलित  जो हूँ…।” इतना कह कर उन्होंने श्वेता के होंठों को कस कर अपने दाँतों से दबा लिया, बहुत देर तक।

वे  अभी तक श्वेता के शहद के छत्ते में अटके हुए थे।”

वरिष्ठ दलित आलोचक कँवल ने संक्रमण कहानी पर निम्नलिखित विचार अपने 9 जनवरी 2021 के फेसबुक पर लिखा है:

“दलित कहानी को शिखर पर ले जाने वाले अजय नावरिया को मैंने एक दशक पहले ही युग-प्रवर्तक के रूप में देख लिया था. जब मैंने ‘हंस’ और ‘कथाक्रम’ में अपने आलेखों में लिखा कि अजय नावरिया ने दलित कहानी में एक नए युग का सूत्रपात किया है, तो अनेक दलित लेखक न केवल मेरे विरोधी हो गए, बल्कि मुझ पर हमलावर भी हो गए. लेकिन इनमें अधिकांश वे लेखक हैं, जो एक भी कालजयी कहानी दलित साहित्य को नहीं दे पाए. बहरहाल मुझे कई प्रतिष्ठित लेखकों का समर्थन मिला, एक, चित्रा मुदगल जी का, जिन्होंने एक सुबह मुझे फोन करके कहा कि अजय नावरिया उनका भी प्रिय कहानीकार है, क्या लिखता है, क्या उसकी सधी हुई भाषा है! शैलेन्द्र सागर ने यहाँ तक कहा कि दलित साहित्य में एक ही कहानीकार है अजय नावरिया, जिनकी कहानी का उन्हें इंतज़ार रहता है; और अब मराठी के कथा-उपन्यासकार शरणकुमार लिम्बाले की टिप्पणी ने भी मेरी धारणा पर मुहर लगा दी.

‘संक्रमण’ कहानी से अजय नावरिया ने एक और बड़ी ऊँचाई हासिल कर ली है. मैं अब कह सकता हूँ कि अजय नावरिया विदेशी पृष्ठभूमि को आधार बनाकर लिखने वाले भी पहले कहानीकार बन गए हैं. दलित कहानी में पहली बार उन्होंने ही ‘आवरण’ कहानी लिखकर सेक्स को स्थापित किया था, जो दलित कहानी में ही नहीं, दलित कविता तक में उपेक्षित है. सेक्स ‘संक्रमण’ कहानी में भी है, जो अगर न होता तो संक्रमण क्या है, पता भी नहीं चलता. यह प्रोफ़ेसर मिलिंद और श्वेता की कहानी है. श्वेता अकेली रहकर जापान में पढ़ रही है, पार्ट टाइम में होटल में सफाई कर्मचारी है, सफाई करते हुए ही वह प्रोफेसर पर आसक्त होती है. किन्तु जब श्वेता  मिलिंद के साथ सहवास के क्षणों में मदहोशी में बुदबुदाती है—ओह्ह, एक दम राक्षस!’ और मिलिंद को कसकर भींच लेती है, तो उसी समय मिलिंद उसके कान में कहता है—‘दलित जो हूँ.’ बस यह वाक्य श्वेता की चेतना में एक जहरीले बाण की तरह जा धंसा और उसकी सारी उत्तेजना ठंडी हो गई.

श्वेता भारत के उत्तराखंड से आई थी, और जापान में रहकर होटल में सफाई कर्मचारी का काम करते हुए भी उसने अपने वर्ण-संस्कार नहीं छोड़े थे. यही सवर्ण मानसिकता है कि उन्हें सारी आधुनिकता चाहिए, पर संस्कार पुराने चाहिए. ऐसे लोग जहाँ भी जाते हैं, जाति का संक्रमण साथ लेकर जाते हैं. श्वेता  जैसे लाखों लोग हैं, जो विदेश में तमाम आधुनिक सुविधाओं के साथ रह रहे हैं, पर जातिवाद का संक्रमण भी फैला रहे हैं. हिंदी की मुख्यधारा की कहानी में भी ‘संक्रमण’ जैसी कहानी ढूँढने से नहीं मिलेगी. निर्मल वर्मा ने विदेश की अनुभूतियों पर कई कहानी लिखी हैं, पर उनमें भी व्यर्थ की रूमानियत के सिवा कुछ नहीं है. (9/1/2021)”

कँवल भारती ने निराला के ‘वह तोड़ती पत्थर’ पद्यांश:

  • कोई न छायादार                       

  • पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;

  • श्याम तन, भर बंधा यौवन,

  • नत नयन, प्रिय-कर्म-रत-मन,

  • गुरू हथौड़ा हाथ,

  • करती बार-बार प्रहार:-

  • सामने तरू-मालिका अट्टालिका; प्राकार।”

पर लिखा है कि निराला एक ब्राह्मण था और पत्थर तोड़ने वाली स्त्री एक दलित थी इसलिए निराला नाम का ब्राह्मण जब यह लिखता है कि ‘श्याम तन, भर बँधा यौवन’ तो वह बदनीयत ब्राह्मण निराला की कुदृष्टि उस दलित स्त्री के यौवन (वक्ष) पर था परन्तु संक्रमण कहानी के अनेक व्यक्त अभद्र दलित शब्दों पर कँवल भारती का ध्यान क्यों नहीं गया? क्यों मिलिन्द के शराबी और ऐय्याशीपन पर कँवल भारती की दृष्टि नहीं जाती है? कँवल भारती की दृष्टि मात्र श्वेता के इतने शब्दों “मैं उस व्यक्ति के बारे में कुछ जानती नहीं थी… आखिर  उस के सामने, उस का टॉयलेट, उस का कमरा  कैसे  साफ़ कर सकती हूँ, वह अछूत है, हमारे घरों में काम करने वाले, हमारे नौकर हैं ये लोग।” पर ही क्यों टिकी रहती है जबकि वह जातीय परिघटनाओं में स्वाभाविक है? अगर श्वेता का इतना सोचना स्वाभाविक नहीं है तो क्या मिलिन्द का यह कहना/सोचना कि “दलित जो हूँ”, उचित है? क्या मिलिन्द अवर्णवादी नहीं है; और यदि, मिलिन्द अवर्णवादी है तो क्या यह ब्राह्मणवाद नहीं है? क्या मिलिन्द के ऐय्याशीपन का पक्ष लेना और उसका सवर्ण स्त्री के जातीय अस्मिता पर ठीकरा फोड़ना उचित होगा? कदापि नहीं। क्या कँवल भारती ने श्वेता के उस पत्र को नहीं पढ़ा जिसको उसने मिलिन्द के लिए पश्च्याताप के कारण लिखा था तथा इस संक्रमण को जातीय अस्मिताओं के टूटने के लिहाज से उचित बताया?

“हमारा सब-कॉन्शियस  माइंड  भी शायद  ट्रेंड कर दिया गया है। इस में, हम उतने दोषी नहीं हैं, जितनी हमारी फैमिली या सोसाइटी के  लोग दोषी हैं, वो ट्रैनिंग और वैल्यू-सिस्टम दोषी है, जो हमें सोचने का ये ढंग देता है। शायद पहली बार इस तरफ़ ध्यान गया कि आप के लोगों को कैसे मजबूर किया जाता है,  कैसे गुलाम बनाए रखा  जाता है और वो लोग कैसे ताकतवर बने रहते हैं। आप ने ठीक ही लिखा है कि औरतें हर जगह गुलामों की भी गुलाम होती हैं।  जाति की ये व्यवस्था, इस्पात से भी मजबूत और हवा सी अदृश्य है। मरने के बाद भी ये अपनी क़ैद से आज़ादी नही देती। हमें क्या, देवताओं तक को  जाति की इस महामारी ने संक्रमित कर रखा है। मैंने सोचा कि क्या हम सवर्ण औरतों की भी हालत, इस दमघोंटू पैट्रिआर्क सिस्टम में कमोबेश आप के लोगों जैसी ही नहीं है? क्या हम भी उस ढाँचे में मामूली से ग़ुलाम या कीड़े-मकोड़े ही नहीं हैं? बस थोड़े अलग वाले गुलाम। आप ने ठीक लिखा है कि कोई भी औरत, अगले जन्म में, अगर कोई पुनर्जन्म होता है तो फिर से औरत नहीं बनना चाहेगी… आखिर क्यों चाहेगी? हर वक़्त की गुलामी, हर वक़्त अपमानित होने को आशंकित और अभिशप्त।”

इस कहानी में नायक मिलिन्द भारती जिसे क्रांतिकारी चरित्र हासिल करना चाहिए था, वह निरंतर कुसंस्कृतियों और व्यवहारों का शिकार होता हुआ दलित वैचारिकी के क्रांतिकारी स्वरूप को भूलता चला गया और कहानीकार के अनुसार, “श्वेता के शहद के छत्ते में” ही खोया रहा। वहीं श्वेता ने उस निजी घटना के पश्च्याताप के तुरंत बाद मिलिन्द के आत्मकथा को पढ़ डाला तथा सवर्णों के माइंड, ट्रेंड, सवर्ण परिवार के दोष, सवर्ण समाज के दोष, ट्रेनिंग, वैल्यू, सिस्टम, गुलामी, पितृसत्ता इत्यादि कमियों को समझा। श्वेता अपने स्तर पर मानवीय गुणवत्ता की तरफ बढ़ी है। उसने जातीय अस्मिताओं के विरुद्ध प्रगतिशीलता को अपनाने का दम भरा है और मिलिन्द भारती जैसे व्यक्ति से पुनः मिलने की परमिशन माँगी है।

जब पार्टनर ने जाति नहीं पूँछा और न बताया तो सेक्स की चरम परिणति की स्थिति में मिलिन्द ने श्वेता से क्यों अपनी जाति-“दलित जो हूँ”-कहने की जरूरत महसूस किया? क्या दलित में जोश अधिक होता है, शेष भारतीय जातियाँ मुर्दा व नपुंसक होती हैं? क्या यह जातिवाद नहीं है? क्या मिलिन्द जापान जैसे देश में और उस लड़की के आगोश में जिसने न जाति जाना न जाति बताया, जातिविमोह अथवा जातिहीनताबोध को छोड़ सका? क्या यह दलित जाति का संक्रमण नहीं है? आइए, अब हम इस दृश्य को महसूस करते हैं और इसकी सच्चाई में उतरते हैं:

“”ओह्ह एकदम राक्षस।” वह मदहोशी में बुदबुदाई और मिलिन्द को कस कर भींच लिया। ठीक इसी समय उत्तेजना और आवेश के इसी क्षण में मिलिन्द ने मजाकिया लहजे में, धीमे से उस के कान में कहा – “दलित जो हूँ…।” इतना कह कर उन्होंने श्वेता के होंठों को कस कर अपने दाँतों से दबा लिया, बहुत देर तक।”

कहानी में एक लेखकीय विचित्रता है। मिलिन्द को श्वेता के मन की बात हिरोको द्वारा तब पता चला जब वह जापान छोड़ने के लिए तैयार होते हैं और यहाँ कहानी में श्वेता और मिलिन्द के अतिरिक्त कौन से संजय या बर्बरीक की आँखे देख/महसूस कर रही थीं कि ‘दलित जो हूँ’ सुनकर श्वेता संसर्ग में रत ढ़ीली पड़ गई थी? क्या उस समय कोई और था? क्या वहाँ कहानीकार स्वयं तो नहीं उपस्थित था क्योंकि जिस बात को मिलिन्द स्वयं न समझ सका, उसको लेखक कैसे समझ गया? सच तो यह है कि कहानी के सभी पात्रों और उनकी परिस्थितियों का कर्ता और नियंता लेखक ही होता है लेकिन कोई भी क्रिया जब पात्र के द्वारा नहीं घटित होती है तो उसका सूत्रधार लेखक ही होता है लेकिन प्रेमी जोड़े के अंतर्भूत स्थिति को उन्हीं के अनुभूतियों से महसूस करवाना न सिर्फ जायज होगा बल्कि कहानी के शिल्प के लिहाज से भी अप्रश्नेय और उत्तम होगा। यहाँ हमें बतौर चैतन्य पाठक यह ध्यान देना है जिस वाकया को पति-पत्नी, प्रेमी-युगल बन्द अँधेरे कमरे में न समझ सके हों, उसे दूसरा भला कैसे समझ लेगा? इसमें दाल में काला लगता है। देखिए आप ही देखिए:

“यह वाक्य श्वेता की चेतना में किसी जहरीले बाण की तरह जा धंसा। अचानक उस के हाथों की पकड़ ढ़ीली हो गई। उस की सारी उत्तेजना जैसे एक ही पल में ठंडी सी हो गई…एक निर्जीव देह में बदल गई वह। उधर मिलिन्द किसी समुद्री तूफ़ान की तरह बहके हुए थे और श्वेता की निष्क्रियता बहुत देर तक, इस प्रचंड वेग के सामने ठहर नहीं सकी और किसी छोटी नौका की तरह उलट-पलट गई। ऐसा नहीं कि उस के मन में प्रतिरोध नहीं उठा , उठा था , कई बार उठा, पर मिलिन्द को दूर हटाने को उस का मन साथ नहीं हुआ, उफ़्फ़…किसी दुर्दमनीय सम्मोहन में थी जैसे वह। वे जैसा-जैसा कहते गए, श्वेता किसी मंत्रबिद्ध युवती सी सब करती चली गई। मिलिन्द इस क़दर गहराई में डूबे थे कि उन का ध्यान , इन सब मामूली लहरों पर बिल्कुल ही नहीं गया।”

सब कुछ जानने के बाद मिलिन्द भारती के अंतर्मन को पढ़िए। पढ़िए कि क्या मिलिन्द भारती श्वेता से प्रेम करने लगे हैं अथवा सेक्स की अनुभूति उन्हें पुनः पुनः उन्हीं अवस्थितियों में ले जाना चाहती हैं? इन पंक्तियों के रहस्योद्घाटन से आप को अवगत हो जाना चाहिए कि मिलिन्द या तो दलित साहित्य के दर्शन, दलित साहित्य के उद्देश्य, दलित साहित्य के आधुनिक परिवर्तन, दलित साहित्य के सामाजिक और राजनीतिक संबंधों में हस्तक्षेप की अनिवार्यता, दलित साहित्यकारों और क्रांतिकारियों के अचार संहिता और दलितों के चारित्रिक मूल्यों को जनता नहीं है अथवा वह दलित क्रांतिकारिता के महत्व को अपने व्यक्तिगत हितों के सम्मुख मानता नहीं है। देखिए इन पंक्तियों को:

“उन की आत्मकथा, उपन्यास और कुछ कहानियों पर विद्यार्थियों और अध्यापकों ने अनेक सवाल पूछे । लगभग हर किसी ने पूछा – “क्या वहाँ अब भी छुआछूत और जातिगत हिंसा है।” श्रोताओं में वाक़ई बहुत उत्साह और उत्सुकता थी ।  कुछ लोगों ने उन के उपन्यास पर ऑटोग्राफ लिए और साथ में फोटो भी खिंचवाई, पर मिलिन्द के मन में सिर्फ़ श्वेता घूम रही थी, चकरघिन्नी की तरह। श्वेता की चुलबुली बातें और उस की गंध उन्हें बेचैन कर रही थी, रह रह कर, कल रात की यादें उन्हें गुदगुदा देती। उस का चुम्बन अब भी उन का पीछा कर रहा था । उन का ध्यान अपने होंठों पर गया, वह मुस्कुरा गए।  वह सोचते और विचारों को झटक देते पर वे भूखे प्यारे मेमनों की तरह पीछे पड़े थे, जो किसी तरह पीछा छोड़ने को तैयार नहीं थे।”

जापान में शराब पीना अनुचित नहीं माना जाता है, कोई बात नहीं लेकिन जिसने कभी शराब न पी हो उसके लिए किसी का अनुरोध भी अजीब लगेगा। वहाँ ठंडी अधिक होती है, अनुरोध को स्वीकार कर लेना स्वास्थ्य के लिहाज से जरूरी भी है, ठीक है। शराब पीकर एक लड़की के साथ हमबिस्तर होने के लिए कार्य-योजना बनाना और मानसिक रूप से स्वयं को तैयार करना गलत ही नहीं, अनुचित और अनैतिक भी है। अब इस कानून का हवाला देकर दो युवा स्त्री-पुरुष के आपसी सहमति से किए गए संभोग को उचित व नैतिक कहा जा सकता है लेकिन कहानी के निम्नलिखित वार्तालाप में निहित मंतव्यों को समझकर मिलिन्द के योजनाओं और उसके पक्का शराबी होने का अंदाज़ लगाया जा सकता है कि मिलिन्द के मन में श्वेता से सेक्स की लालसा पूर्व ही बलवती हो गई थी और उसके लिए वह लालायित तो था ही, उसने पूरी परिस्थिति भी तैयार की थी:

““शराब तो पीते हैं न।”

“हाँ कभी-कभी।”

“चलिए तो फिर आज हम साके पिएंगे, यहाँ की मशहूर वाइन… पिएंगे न ?” उस की आवाज़ में सिर्फ अनुरोध नहीं था, एक आग्रह था, अजीब सा निमन्त्रण । मिलिन्द ने हाँ कर दी। “कल हिरोको के साथ भी पी थी।”

मिलिन्द ने उसे वक़्त का अहसास कराने की गरज से कहा- “आप का घर कितनी दूर है श्वेता ।”

“वहाँ कोई नहीं है सर । सिर्फ अकेलापन है । यहाँ अकेलापन बहुत है सर । ” कहते हुए उस ने दोनों पाँव फैला कर सामने टेबल पर रख दिए। ” चार साल से मैं यहाँ एकदम अकेली हूँ। यहाँ रहे बिना, इस तनहाई को आप कभी महसूस नहीं कर सकते।” वह कहीं अनंत में खो गई। “क्या आप के पास थोड़ी और वाइन होगी।” वह उन की आंखों में झांक रही थी, आत्मीयता से।

मिलिन्द ने कंधे उचकाते हुए कहा- ‘नहीं, वाइन तो नहीं है, पर हां, व्हिस्की जरूर है जो मैं भारत से लाया हूँ।’

‘अरे वाह, ग्रेट…मज़ा आ गया, प्लीज़ निकालिए ना उसे।’ वह उतावली सी हो गई।

मिलिन्द ने अपने सूटकेस से वह बोतल निकाली। श्वेता ने तुरंत ही दो पैग बना डाले और चीयर्स बोलते हुए उसे एक ही सांस में गटक गई। अब उस ने अपने लिए दूसरा लार्ज पैग भर लिया।

‘क्या तुम्हें इस वक्त मेट्रो ट्रेन मिल जाएगी।’ वे अब भी ऊहापोह में थे कि आगे क्या होने वाला है। कुछ भी तय नहीं हो रहा था, उन के दिमाग में। विचारों के नए-नए नक्शे बनते और धुँधला जाते।

इंतजार कर रहा होगा, सूनी दीवारें।” उस की उन्मुक्त हँसी कमरे में चमकीले मोतियों सी बिखर गई जिस में मिलिन्द ने शहद से तर-बतर, कई चांद चमकते हुए देखे। “सब के पास दोस्त हैं…श्वेता! एक तुम ही हो, एकदम अकेली यहाँ पर, चार साल से अकेली।” “क्या आप बूढ़े हो गए हैं, सर!” कहते हुए श्वेता ने अचानक अपने दोनों हाथ मिलिन्द के कन्धों पर रख दिए ।

मिलिन्द को लगा कि जैसे उन के पूरे शरीर में गर्मी की लहर दौड़ गई हो । उन्होंने खुद को संभाला, हालांकि उन्हें इस साहचर्य की वाकई ज़रूरत थी,

“नींद…। ” कह कर श्वेता जोर से हँसी ।  “आप भी न सर…स्वर्ग सोने के लिए होता है!” उन की हिचक को तोड़ते हुए वह आगे बढ़ी और उस ने मिलिन्द के होंठो को कसकर चूम लिया और सामने वाली कुर्सी पर जा बैठी – “बुढ़ापे में हम दोनों बैठ कर इन्हीं  यादों को याद कर मुस्कुराया करेंगे।’’”

कहानी में एक वाक्य है, “उन्हें इस साहचर्य की वाकई ज़रूरत थी” इस बात को प्रमाणित करने के लिए कहानीकार के पास क्या तर्क और तथ्य हैं? उसे कैसे मालूम था कि साहचर्य की दोनों की जरूरत थी?

एक विचित्र बात और है कि जिस देश में जातिवाद है, ब्राह्मणवाद है, छुआछूत है, भेदभाव है, ऊँचीनीच है, सवर्णों के द्वारा दलितों को प्रताड़ित किया जाता है, मारा जाता है, गाली दिया जाता है, बलात्कार किया जाता है, दैत्य किया जाता है, वहां के लोग पूरी दुनिया में जाति के संक्रमण को फैला रहे हैं, आखिर मिलिन्द के मार्फत अजय नावरिया साहब किस आधार पर कहते हैं कि “हम सम्मानित भारतीय नागरिक हैं… वी द पीपल ऑफ इंडिया?”

अंत में, श्वेता के अनुरोध पर कि “क्या मैं आप से मिलने सुबह सात बजे आ सकती हूँ?” मिलिन्द कहता है-“ओके”, तो फिर हम लोग श्वेता को यह  कहने वाले कौन होते हैं कि “ऐसे लोग जहाँ भी जाते हैं, जाति का संक्रमण साथ लेकर जाते हैं। श्वेता  जैसे लाखों लोग हैं, जो विदेश में तमाम आधुनिक सुविधाओं के साथ रह रहे हैं, पर जातिवाद का संक्रमण भी फैला रहे हैं।” हर गड़बड़ियों के उपरांत भी, मिलिन्द को सवर्ण जातियों से या तो उम्मीद है कि वे परिवर्तित होंगे अथवा वह श्वेता से प्रेम करने लगा है अथवा वह उसने पुनः संबंध बनाना चाहता हो। श्वेता अगर गलत है तो मिलिन्द किसी भी तरह दूध का धुला नहीं है। श्वेता यदि जातिवाद का संक्रमण फैला रही है तो मिलिन्द अपनी जाति के मोह से दूर नहीं है। श्वेता और मिलिन्द दोनों शराबी और चरित्रहीन है।

 

 

 

 

  • आर डी आनंद
    सम्पर्क : 9451203713

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