पुरखतर होती है राह-ए-इंक़लाब

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  • संदीपा दीक्षित

‘ये राह पुरखतर है’ की समीक्षा

मार्क्सवादी इंक़लाबी कवि आर डी आनंद सर ने एक ग़ज़ल-संग्रह “ये राह पुरखतर है” लिखा है। यह ग़ज़ल-संग्रह परिकल्पना प्रकाशन, सुभाष चौक, दिल्ली से प्रकाशित हुआ है। इसके प्रकाशक आनंद सर के प्रिय मित्र श्री शिवानंद तिवारी जी हैं। यह संग्रह 130 पेज की है, जिसमें 91 गज़लें संग्रहित हैं। “ये राह पुरखतर है” में “ये” का संदर्भित और रूपान्तरिक अर्थ “क्रान्ति” है और “पुरखतर” के मायने है “पूरा ख़तरनाक”। कुल मिलाकर संग्रह के शीर्षक का अर्थ है “क्रान्ति का रास्ता पूर्ण रूप से ख़तरनाक है”। इस संग्रह की अधिकतर ग़ज़लें व्यवस्था के विरुद्ध क्रान्ति की उद्घोष हैं। भारतीय व्यवस्था पूँजीवादी व्यवस्था है लेकिन जातीय स्वरूप की वजह से भारतीय व्यवस्था को ब्राह्मणवादी व्यवस्था के रूप में भी समझा जाता है। हालाँकि, ब्राह्मणवाद कोई व्यवस्था नहीं है बल्कि पूँजीवाद की जरूरत है। भारतीय संदर्भ में पूँजीवाद ब्राह्मणवाद की वजह से काफी कुछ सुरक्षित है। भारतीय जनमानस जातीय व्यवस्था के कारण आपस में ही लड़ता रहता है। जाति व्यवस्था की वजह से श्रमिक वर्ग जाति में विभाजित रहता है। यहाँ वर्गीय एकता के लिए उचित वैचारिक क्रान्ति अभी तक संभव नहीं बन पाया है। आनंद सर ने इस संग्रह में जातिवाद, ब्राह्मणवाद, दलितवाद हमेशा पूँजीवाद के संरक्षक के रूप में बने रहे हैं। भारत की सभी राजनीतिक पार्टियाँ जाति के आधार पर वोट माँगती हैं और जातियों को अपने पक्ष में करने के लिए अनेक जातिवादी मुद्दे सुनिश्चित करती हैं। इन्हीं जातिवादी मुद्दों के प्रचार-प्रसार में हर नेता हर पार्टी आम जनता को गुमराह करती है। आज हम इस युग में पहुँच चुके हैं जहाँ फेक न्यूज और फेक व्यूज इंडस्ट्री रन कर रही है। आम जनता को इतना झूठ पिला दिया गया है कि जनता को झूठ ही सच लगने लगा है। आज सत्ता वर्ग खुद को ईश्वर मानने लगा है। सच की बात करने वाले श्रमिक चिन्तक को अर्बन नक्सल कह कर डरवा दिया गया है। जो नहीं डरते हैं उनको या तो जेल में डाल दिया जा रहा गया या फिर उकसावे के चलते उन्हें न्यूसेंस जान से मार दे रहा है। ऐसी परिस्थितियों के कई बुद्धिजीवी शिकार हो चुके हैं। इन तमाम जनता के शत्रुओं के विरुद्ध आर डी आनंद सर ने विद्रोही और क्रान्तिकारी तेवर की गज़लें लिखा है। यह संग्रह क्रान्तिकारी यथार्थ का दस्तावेज़ है।

इस संग्रह की एक विशेष विशेषता यह है कि इसकी भूमिका में “ग़ज़ल क्या है” को परिभाषित करते हुए 24 पृष्ठों में ग़ज़ल के अनेक बिंदुओं पर प्रकाश डाला गया है। सामान्य व्यक्ति जो ग़ज़ल विधा और उसकी प्रक्रिया से नहीं वाकिफ़ है, वह भी भूमिका पढ़कर गजल के प्रकार-मुअद्दस ग़ज़ल, मुकफ्फा ग़ज़ल, मुसलसल ग़ज़ल और गैर-मुसलसल ग़ज़ल, शेर, मतला, क़ाफ़िया, रदीफ़, मक्ता, बहर, लघु, दीर्घ इत्यादि को बेहतर समझ सकता है। आनंद सर ने बहुत संक्षिप्त में ग़ज़ल के इतिहास को भी खूबसूरत ढंग से लिखा है। वैसे ग़ज़ल लिखना एक कठिन प्रक्रिया से गुजरना है लेकिन आनंद सर ने लिखा है कि, “ग़ज़ल लेखन में एक नया प्रयोग शुरू किया गया है। इन प्रायोगिक गज़लों से शेर की दोनों पंक्तियों से मीटर की पाबंदी हटा दी गई है, लेकिन रदीफ़ और काफ़ित की पाबंदी रखी गई है। इन गज़लों को “आज़ाद ग़ज़ल” कहते हैं।” (भूमिका, पेज 32)। मैं आनंद सर के गज़लों को “आज़ाद ग़ज़ल” कहना उचित समझती हूँ। मैं इस “आज़ाद ग़ज़ल” की समीक्षा से पहले यह स्वीकार कर लेना चाहती हूँ कि मुझे न ग़ज़ल की समझ है और न मैं उर्दू की जानकर हूँ। सच तो मुझे इस ग़ज़ल संग्रह की समीक्षा लिखनी ही नहीं चाहिए लेकिन इस ग़ज़ल-संग्रह की पाठक होने के नाते मुझे सामान्य रुप से जो कुछ समझ में आया तथा आनंद सर की बेहतरीन भूमिका और हिंदी-उर्दू डिक्शनरी का सहारा लेते हुए वर्तमान भौतिक परिस्थितियों, राजनीतिक स्थितियों और जातिवाद के संदर्भ में गज़लों के अर्थ और भाव को समझने की कोशिश कर रही हूँ। इससे पूर्व मैंने आनंद सर के कविता संग्रह “सुनो भूदेव”, “जय भीम कॉमरेड”, “धर्म के भाव ऊँचे हैं”, “मेरे हमराह” तथा उनकी आत्मकथा “क्या लिखूँ क्या छोड़ दूँ” की आलोचनात्मक समीक्षा लिखा है। उन संग्रहों में वर्चस्ववादी गैर-वैज्ञानिक सिद्धांतों पर सैद्धांतिक नकार, प्रतिरोध, मसौदा और क्रान्ति की कविताएँ हैं, स्वयं के अंतर्विरोधों तथा मित्रों के प्रति द्वंद्व की आलोचनात्मक कविताएँ हैं, स्त्री से सम्बन्धित कविताओं में स्त्रियों के वैचारिक फसन और उनकी हालात पर कविताएँ हैं। सच कहा जाय तो उन कविताओं में प्रतिशोध, प्रतिकार, प्रतिक्रिया, विद्रोह, आक्रोश नहीं है। कुछ समीक्षकों को पढ़ा है वे आनंद सर को उदारवादी और समझौतावादी कवि कहते हैं। मैं यह कहना चाहती हूँ कि उन पाठकों के समक्ष आनंद सर का काव्य-संग्रह “धर्म के भाव ऊँचे हैं” तथा ग़ज़ल-संग्रह “ये राह पुरखतर है” नहीं गुजरा है। इन दोनों संग्रहों की समीक्षा करते समय मुझे डर लगने लगता है कि आनंद सर के इन कविताओं को लिखने कर कितना जोख़िम उठाया है। इन संग्रहों में सीधे-सीधे सत्तारूढ़ नेताओं, नस्लवादियों, वर्चस्ववादियों, जातिवादी मठाधीशों, पूँजीपतियों, चमचों आदि को जिस तरह नंगा किया है, जिस तरह से ललकारा है, जिस तरह से क्रान्तिकारी आह्वान किया है, बहुत बिरले कवियों में मिलता है। इन दोनों संग्रहों में नकार, प्रतिकार, प्रतिक्रिया, प्रतिरोध, प्रतिशोध, आक्रोश, विद्रोह, ललकार, बग़ावत, क्रान्ति इस कदर मिलता है कि यदि कोई भी पढ़ेगा, तो एक बार उसका रोवाँ खड़ा हो जाएगा बल्कि वह यह सोचने को विवश हो जाएगा कि सत्ता वर्ग ने आनंद सर जैसे लोगों के लिए ही “अर्बन नक्सल” शब्द का इजाद किया है। मुझे कहने में कोई हिचक नहीं है कि आर डी आनंद सर किसी भी तरह उदारवादी और समझौतावादी व्यक्तित्व नहीं हैं बल्कि एक विद्रोही, युयुत्सावादी, प्रतिरोधी और क्रान्तिकारी कवि हैं। उनके साहित्य में जहाँ भी उदारवाद और समझौतावाद दिखाई पड़ता है, वह, दरअसल, एक रणनीतिक और रणकौशलयुक्त विचार व प्रयास है जिससे मित्र शाक्तियाँ आपसी द्वेष और वैचारिक संकीर्णता में न फँसने पाएँ। आनंद सर जातिप्रथा उन्मूलन और वर्ग-संघर्ष की लड़ाई में शत्रुओं को बिल्कुल अच्छी तरह पहचानते हैं इसलिए वे शत्रुओं तथा क्रान्तिकारी सिद्धांत से बिल्कुल समझौता नहीं करते हैं। उनकी दृष्टि बहुत ही प्रखर है। उनके हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी। उनका जुझारूपन, क्रान्तिकारी अदम्य साहस, विद्रोही तेवर, प्रतिकार की स्पष्टता और इनकार की हिम्मत उनके इन शेरों में सूर्य की लाली की तरह स्पष्ट है। यथा:

मेरी   जुबान   काट   लो   हुक्मरानों   क्या    हुआ।
तुम  मुझे  सूली   चढ़ा   दो   बेईमानों   क्या   हुआ।।
मैं  तुम्हें  गियरदानों ब्रूनों  ही  नज़र  आऊँगा हरदम।
खौफ़  हूँ  तेरी आँखों  में  फाँसी  पे हूँ तो क्या हुआ।।
हर  शिकंजे  हर  हथकंडे  दस्तूर  है    तेरे   जानिब।
छीनी-हथौड़ी  है  मेरे  घर  बेड़ियाँ  हैं तो क्या हुआ।।
 (ये राह पुरखतर है, पेज 34)

आर डी आनंद सर कहते है कि, “मैं ग़ज़ल नहीं लिखता हूँ क्योंकि ग़ज़ल लिखते समय उसकी मात्राओं के चक्कर में मुझे बहुत से जरूरी शब्दों को बदल देना पड़ता है जिससे मेरे अर्थों का भाव बदल जाता है। मैं ग़ज़ल की शक्ल में कविताएँ लिखता हूँ अथवा यह कह सकते हैं कि मैं अगज़ल लिखता हूँ।” आनंद सर के इस स्वीकारोक्ति से मैं यह कह सकती हूँ कि वह प्रयोगवादी ग़ज़ल ही लिखते हैं जिसमें मात्राओं का अनुपालन नहीं है परन्तु रदीफ़ और क़ाफ़िया का मेल जरूर है। मैं यह जरूर कहना चाहती हूँ कि आनंद सर ने अपने प्रयोगवादी गज़लों पर जरूरी उचित ध्यान नहीं दिया है। उनकी पहली ही ग़ज़ल के सभी शेरों में रदीफ़ और क़ाफ़िया में समरूपता नहीं है जबकि आनंद सर इस कार्य को बहुत आसानी से कर सकते थे। आनंद सर की पहली प्रयोगवादी ग़ज़ल “तैमूरों को मात दे रहे हो” है जिसमें आठ शेर हैं और उन आठ शेरों में से दो शेर में “दे रहे हैं”, दूसरे पाँच शेर में “ला रहे हैं” और एक शेर में “आ रहे हैं” क़ाफ़िया है तथा किसी भी शेर का रदीफ़ एक दूसरे से मिलता ही नहीं है। मात्रा तो घोषित रूप से समरूप नहीं है। गज़लों में ग़ज़लियात बिल्कुल नहीं है। ग़ज़लियात का अर्थ गज़लों के तग़ज़्ज़ुल से है। आनंद सर के किसी भी ग़ज़ल को गीत बनाना बहुत कठिन है क्योंकि आनंद सर शब्दों की रवानीयत को ध्यान नहीं रखते हैं। आनंद सर की ग़ज़लें गेय न होकर पठनीय हैं। ये गज़लें वाचिक परम्परा का निर्वहन करती हैं। मैं यह कह सकती हूँ कि आनंद सर दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी की परंपरा के विद्रोही और क्रान्तिकारी शायर हैं। विद्रोह और क्रान्ति की चिंगारी को देखना है तो आनंद सर की पहली ग़ज़ल के अनेक शब्दों ” जैसे “भगत सिंह”, “लेनिन”, “बगावत”, “ज़ुल्मतों”, “तैमूर”, शहादत”, “बेखौफ”, “इंक़लाब”, “दस्तक”, “सामंतवाद”, “फासीवाद”, “राष्ट्रद्रोह”, “समाजवाद”, “माफिया”, “तोप”, “पूँजीवाद”, “संविधन”, “हवेली”, “हरामजादों”, “भक्षक”, “नाख़ूनी पंजे” और “नश्तर” आदि को देखना पड़ेगा। आखिर ऐसे शब्दों को किजी ग़ज़ल में प्रयोग किया जाएगा तो उस ग़ज़ल की रवानीयत भला किसे रहेगी। ऐसे शब्दों के साथ लिखी ग़ज़ल की रवानीयत भले ही न हो लेकिन उन गज़लों का कद कितना ऊँचा होगा उसके शेरों के क्रान्तिकारी अर्थों से अंदाजा लगाया जा सकता है। आनंद सर आज के दौर के क्रान्तिकारियों को बहुत ही महत्वपूर्ण और हिम्मती मानते हैं क्योंकि यह दौर नस्लवाद के प्रयोग का बहुत बीहड़ दौर है, यह दौर फासीवाद के बहुत सूक्ष्मतम प्रायोग का दौर है, यह बाँटो और राज करो का बहुत घटिया समय है, यह जातिवाद का बहुत फूहड़ समय है, यह फेक के इजाद और प्रयोग का खूनी दौर है, यह किसी भी सच्चे और अच्छे चिन्तनशील/विवेकवान व्यक्ति को अर्बन नक्सल कह कर उसकी हत्या आयोजित करवाने का दौर है। ऐसे दौर में यदि कोई भी क्रान्ति पसंद व्यक्ति नस्लवादी, जातिवादी, ब्राह्मणवादी और पूँजीवादी अन्यायी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की बात करता है तो वह बहुत ही बहादुर और निडर है, निश्चित वह रिश्क लेकर चल रहा है। इस ग़ज़ल में “तैमूर” शब्द का प्रयोग सीधे सत्ता के संचालकों को संबोधित करना है। आनंद सर ऐसे ही क्रांतिकारियों को संबोधित करते हुए लिखते हैं:

भगत सिंह हो  कि  लेनिन  जो  बगावत  बो रहे हो।

ज़ुल्मतों  के  दौर में  भी  तैमूरों  को मात दे रहे हो।।

क्या बात है तुममें जो शहादत के चौखट पे खड़े हो।

और  बेख़ौफ़  इंक़लाब  को  कोई दस्तक दे रहे हो।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 33)

इस ग़ज़ल के अन्य शेर में आनंद सर यह स्वीकार करते हैं कि अभी भी सामंतवाद जिंदा है लेकिन वे यह भी कहते हैं कि सामंतवाद से व्यवस्था के मंसूबे पूरे नहीं हो पा रहे हैं इसलिए वह फासीवाद का प्रयोग भी कर रहा है। पूँजीवादी अपने मैनेजिंग कमेटी के संचालकों (सरकार) के साथ छद्म सांस्कृतिक उद्योग को जनता में संचालित करता हुआ जनविरोधी जनमत तैयार करता है, यही जनविरोधी जनमत फासीवाद है। आनंद सर बहुत स्पष्ट कहते हैं कि सभी कवायदों की जड़ पूँजीवाद है। इसके अर्थ में यह संदेश निहित है कि हमें पूँजीवाद को उखाड़ फेंककर समाजवाद को लागू करने का पुरखतर प्रयास करना चाहिए। वे क्रांतिकारियों से कहते हैं कि पूँजीवाद ही हर मुशीबतों की जड़ है बल्कि वे यह भी कहना चाहते हैं कि पूँजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने का मंसूबा रखने वाले क्रांतिकारियों को अपने आप में बहुत स्पष्ट हो जाना चाहिए कि पूँजीवाद उन्मूलन के बाद जो व्यवस्था स्थापित किया जाना है, उसका संविधान क्रांतिकारियों को स्पष्ट रहना चाहिए क्योंकि एक स्पष्ट मसौदा और संविधान के बिना क्रान्तिकारी साथी अन्य को प्रेरित नहीं कर पाता है। इसका पुष्टिकरण इन दो शेरों से होता है:

सामंतवाद  है  रास्ते  में  फासीवाद फिर भी खड़ा है।

राष्ट्रद्रोह करके देश से सुना है समाजवाद ला रहे हो।।

सारी  कवायदों  की  जड़  इनकी अम्मा है पूँजीवाद।

मित्रों!  क्या   समाजवाद   का  नक्शा  ला  रहे  हो।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 33)

मनुष्य मनुष्य की प्रवृत्तियों में कितनी विभिन्नता है कि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य का शोषण करता है, उसे गुलाम बनाता है, दास बनाता है, सेवक बनाता है और अपने सुख के लिए उसे उत्पीड़ित करता है। दुनिया के निन्नानवे प्रतिशत संसाधन, उत्पादन और संपत्ति कुछ कुमानवों के पास है। यदि आम आदमी अपने जीवन-यापन और शिक्षा-संस्कृति के लिए आंदोलित न रहे तो ये कुमानव सौ प्रतिशत संपत्ति पर कब्ज़ा कर लें। एक तो इसी आम आदमी से श्रम लेना है और दूसरे उन्हीं से सेवा भी करवाना है इसलिए हाँड़-पास के स्वचालित इस मानव को जिंदा रखना भी जरूरी है इसीलिए उनको जीवित रहने भर को भोजन-पानी तथा किसी तरह रहने भर को आवास उपलब्ध कराते हैं। यदि आम आदमी के बिना कुमानवों को सभी सुविधाएँ उपलब्ध हो जाय, तो उनकी खाल तक खींच लें। आम आदमी बेवजह इंक़लाबी नहीं है। वह कितना भी कमजोर और अशिक्षित क्यों न हो, इतना तो समझता ही है कि दुनिया किसी के बाप की जागीर नहीं है, दुनिया भर के संसाधन वह अपने गर्भ से नहीं पैदा किया है और न ही उसने संसाधनों के लिए कोई श्रम किया बल्कि धूर्तता, बेईमानी, बत्तमीजी, छल, छद्म, झूठ, फ़रेब और जोर-जबरदस्ती के बल पर कब्ज़ा कर लिया। जोर-जबरदस्ती के बल पर शासक बन बैठे। अपने हित के हर नियम-कानून बनाए। कानूनों को जबरदस्ती मनवाया। उसके विरुद्ध जाने वालों को दंडित किया। इन सब हथकंडों, नियमों, कानूनों के बावजूद भी आम आदमी के समय-समय पर विद्रोह और बगावत किया। प्रभु वर्ग को यदि यह ज्ञात हो जाय कि उसके कृत्यों के विरुद्ध कोई आवाज़ नहीं उठेगी तो वे अब तक इस मनुष्य के तीन चौथाई हिस्सों को मार डालते और थोड़े से मनुष्य आबाद रहते इसलिए आनंद सर की चिंतन प्रक्रिया में यह शेर लिखने का विचार कौंधा होगा:

इंक़लाब की आग हमें ठंडा नहीं होने देती।

वरना तो आदमी कब का  बुझ गया होता।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 36)

इसके विपरीत, आनंद सर ऐसा भी सोचते हैं कि जो मनुष्य इंक़लाबी है, विद्रोही है, क्रान्तिकारी है, वह घोर वर्चस्ववाद, प्रतिक्रियावाद, नस्लवाद और फासीवाद की मार के उपरांत भी बगावत पर क्यों नहीं उतर रहा है, क्यों शांत है मनुष्य? कुछ-कुछ समय में थोड़ी-थोड़ी समस्याओं के बाद भी इंक़लाब के नारे लगने लगते थे। कभी मंदिर निर्माण के नाम पर रात का सन्नाटा जयश्रीराम के नारों से भयाक्रांत हो उठता था। कभी मंडल तो कभी कमंडल, कभी आरक्षण तो कभी शिक्षण, कभी इंदिरा तो कभी राजीव के नाम पर साम्प्रदायिकता की आँधी, कभी नेहरू तो कभी जिंदा, कभी गाँधी तो कभी नाथूराम गोडसे, कभी बॉम्बे बम धमाका तो कभी भिंडरवाला काण्ड से देश भयभीत रहता था लेकिन अब देश में बिल्कुल अमन-चयन प्रतीत हो रहा है। क्या यह सच है, नहीं न। फिर न कहीं मंडल, न कमंडल, न आरक्षण समर्थन, न आरक्षण विरोध, न जयश्रीराम, न अल्लाहोअकबर, न नारदतक़बी, न जय भीम, न गाँधी, न आम्बेडकर। यह आश्चर्यजनक शान्ति है। इस शान्ति का क्या कारण है? आनंद सर के शेर का लब्बोलुबाब क्या यह नहीं है कि देश के दंगाइयों को अब सत्त्ता नसीब हो गया है? इस शेर में एक विशेष बात यह छिपा हुआ है कि वर्तमान दौर में जनता आंदोलित नहीं है, इसका अर्थ होता है कि जनता को कोई मुसीबत नहीं है लेकिन यह सच नहीं है। यह वह दौर है जब भूमंडलीकरण की प्रक्रिया अपने चरम पर है। पूरी दुनिया की सरकारें उदारीकरण की प्रक्रिया को पूरा करने के अंतिम चरण में हैं। अब पब्लिक सेक्टर्स को प्राइवेट हाथों में सौंप देने की पचहत्तर प्रतिशत कार्य समाप्त कर लिया गया है। शिक्षा तक को निजी उद्योग में बदल दिया गया है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का बोलबाला है। इन सब के बावजूद भी पूँजीपतियों को जनता के विद्रोह का डर है इसलिए अपनी-अपनी सरकारों को विश्वास में लेकर लॉकडाउन का उपाय तैयार कर एक ऐसा डर और कानून पास कर लिया गया जिससे जनता कोई भी संगठित आंदोलन न कर सके। आनंद सर का इशारा है कि यही वह देश है जहाँ अंग्रेजी राज में भी सरफ़रोशी की तमन्ना खत्म न हुई थी लेकिन अज़ीब विडंबना है कि इतनी परेशानियों के बाद भी सरफरोशों का इंक़लाबी जुनून शान्त है। आनंद सर प्रश्नवाचक भी हैं और आश्चर्यचकित भी हैं कि देश बुरी तरह तबाह है लेकिन कोई संगठित आवाज किधर से भी नहीं आ रही है। क्या यह वही हिन्दोस्तां है? आनंद सर कहते हैं कि इतनी परेशानियों के बाद भी लोग नहीं बोलेंगे, तो आखिर कब बोलेंगे? क्या जनता की जवानी मर गई है या आज के नवजवानों का खून ही पानी हो गया है। आनंद सर यह भी पूँछना चाहते हैं कि क्या सभी जातियों की भलाई अपनी-अपनी जातियों के हित साधने में हैं, आखिर यह जनता किस फितूर में जी रही है? आनंद सर कहना चाहते हैं कि अपनी जाति का मोह त्यागकर सामूहिक संघर्ष में सामूहिक सरोकारों के लिए इस देश के सरफरोशों को पूँजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध जरूर खड़ा हो जाना चाहिए:

इतनी  परेशानी  के बाद भी यह देश शान्त है।

क्या  वाकई  दंगाई  सब  देश  की  सत्ता में हैं।।

अब  नहीं  बोलेगा  तो कब बोलेगा हिन्दोस्तां।

सरफ़रोशी  की  तमन्ना क्या इसी जनता में है।।

खून  पानी  हो  गया  है या जवानी मर गई है।

या भलाई सब की अपनी कौम की सत्ता में है।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 39)

जब तक नेताओं को सत्ता सुख नहीं मिलता है तब तक जनता को लालीपॉप देते रहते हैं और जैसे ही उनको सत्ता में बैठने का सुख मिल जाता है, वे भूल जाते हैं कि उन्हें जनता के विकास के लिए चुना गया है। सत्ता की कुर्सी पर पहुँचकर उनके विचार बदल जाते हैं, उनकी दृष्टि बदल जाती है, उनकी प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं, उनके दोस्त-यार बदल जाते हैं। वे इतने बदल जाते हैं कि उन्हें चारो तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ दिखाई देती हैं, दुख एक सिरे से गायब नज़र आता है। वे बिल्कुल खुशगवार हो जाते हैं। यही नहीं, सावन के अन्धे को हमेशा हरियाली ही दिखाई पड़ती है। वह सत्ता सुख में इनका मस्त हो जाता है कि वह ऐसा फरमान जारी करने लगता है जैसे अब वही ख़ुदा हो, बाकी सभी उसकी रियाया हैं, प्रजा हैं, कनीज़ हैं। आनंद सर अपने शेर के माध्यम से उससे कहते हैं कि अरे स्वम्भू परवरदिगार तू सचमुच कोई ईश्वर नहीं है बल्कि तू भी हमारे जैसा मनुष्य है। हम जानते हैं, हम तुम्हें सत्ता के तख्तोराज़ पर बैठा सकते हैं, तो तुम्हें सत्ताच्युत भी कर सकते हैं। हर वह प्राणी जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु निश्चित है इसलिए हे तानाशाहों! संसदीय लोकतंत्र की एक बहुत बड़ी त्रासदी है कि हर बहुमत का एक समय होता है और उसके पश्चात उसे जनता परिवर्तित कर विपक्ष की कुर्सी पर घसीट कर बैठा देती है। कुछ सुंदर से शेर:

उसके  इसरार  तो  देखो  कि  सब  खुशगवार   है।

और फरमान तो देखो कि जैसे वह परवरदिगार है।।

तू  आका  है  कमज़र्फ   बाकी   सब   कनीज़   हैं।

तू  भी  सुपुर्देख़ाक  होगा  तुमको  नहीं  ऐतबार है।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 41)

काव्य की दृष्टि बहुत व्यापक होती है। कोई भी कविता अपने संदर्भ और प्रसंग के साथ इतिहास के साथ जुड़कर वर्तमान की भौतिक परिस्थितियों का संकेत करती हैं। कविताएँ इतिहास और वर्तमान के एक-एक रेशे को पकड़ती हुई भविष्य के अंदेशे का संदेश देने में समर्थ होती है। जिस तरह से यह चर्चा का विषय है कि देश फासीवाद के गिरफ्त में है उसी तरह यह भी चर्चा का विषय है कि हमारे नेता इस कदर तानाशाही की तरफ बढ़ गए हैं कि मजदूरों, किसानों, श्रमिको, गरीबों, मजलूमों, अशिक्षितों, बेरोजगारों और भूमिहीनों की दयनीय दशाओं को अनदेखा करते हुए स्वम्भू होते जा रहे हैं। जनता को सिर्फ और सिर्फ धोखे में रखते हुए मूर्ख बना रहे हैं। आम आदमी को कीड़े-मकोड़े से कुछ अधिक नहीं समझते हैं। सत्ता की ऊँचाइयों पर पहुँच कर मुल्क के रहबर हठी तो हो ही गए हैं बल्कि उनको गलतफहमी भी हो गया है कि भविष्य उनका है, वे अब देश विशेष के परवरदिगार हो गए हैं लेकिन उन नेताओं को यह नहीं मालूम है कि उनकी तानाशाही का फरमान नहीं चलेगा, ये जनता जो कुर्सी पर बैठकर ताजपोशी करती है, वही जनता नेताओं के खयाली साम्राज्य का सपना बिखेर कर जमीन पर पटक देगी।

राजहठ  है  कि  मुस्तकबिल   का  परवरदिगार   हूँ।

खूनेमुफ़्लिस   को   दिन   में   तारे   दिखा  रहे   हो।।

नज़्में  कुहन  न   रही   है   न   रहेगी   तेरे   जानिब।

जनता है उलट देगी साम्राज्य किसको सिखा रहे हो।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 50)

सत्ता की हुकूमत जनता की अज्ञानता में निहित होती है। कोई भी सत्ता कोई भी शासक जनता को मात्र उतना ही शिक्षित करना चाहता है जितने से उसके हुकूमत और पूँजीपतियों मुनाफे के विरुद्ध जनता गोलबंद न होने पाए। सत्ता जनता को एनकेनप्रकारेण गलत विचारधारा में उलझाती रहती है, जाति, धर्म, सम्प्रदाय में बाँटती है और जनता वर्गीय एकता के विरुद्ध जाति, धर्म, सम्प्रदाय, मंदिर, मस्जिद, हिन्दू, मुस्लिम, चमार, पासी, शिया, शुन्नी, घूँघट, बुर्का को प्राथमिक मानने लगती है। पिछले तीस वर्षों में धर्म को इतना उभारा गया कि भारतीय अपने भातृत्व भाव को त्याग कर हिन्दू और मुस्लिम, हिन्दू और उर्दू, जाति और उपजाति में बहुत बुरी तरह से बँट गया है। इन सब के बावजूद भी शासक जातियाँ जनता को तरह-तरह से बाँटने के लिए फेक इंडस्ट्रीज में थिंक टैंक स्कॉलरों को काम पर लगाए रखता है। वैसे धर्म से बड़ा कोई नशा नहीं है। सत्ता वर्ग धर्म को ईश्वरीय आस्था से जोड़कर गरीब जनता को गरीब जनता के विरुद्ध प्रयोग करता रहता है।

धर्म के खेल में नेता समझदार हो गया है।

आदमी  इसमें  फँसकर बेकार हो गया है।।

धर्म  क्या है ये नशे की लत है तौबा करो।

बुतपरस्ती  में  आदमी  बीमार हो गया है।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 59)

धर्म और बुतपरस्ती के नशे में मनुष्य इस कदर उलझा दिया गया है कि उसको आवश्यक आवश्यकता की चीजें और अपना शोषण भूल गया है। जनता यह बात भूल जाती है कि सत्ता वर्ग किसी भी जाति किसी भी धर्म के प्रति ईमानदार नहीं होता है। वह शासक है। शासक कभी भी सहिष्णु नहीं होता है। वह तत्कालीन व्यवस्था के मुनाफे और मुनाफे की सुरक्षा के लिए बनाई गई नीतियों के विरुद्ध जनता पर जुल्म ढाता है। शासक के अपने हित होते हैं, वह अपने हित की रक्षा, विकास और विस्तार के लिए हमेशा सितमगर की भूमिका में होता है। सत्ता की हैसियत नेताओं में फितूर पैदा करता है और उस ऊँचाई पर पहुँच कर नेता गुनहरगार हो ही जाता है।

हुक्मरां  कोई  भी  हो सितमगर होता है।

जरदार  होता  है  और जमींदार होता है।।

हमने  देखा  है  बलवले  फितूरे-आसमाँ।

आसमाँ पे पहुँच हर शे गुनहगार होता है।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 93)

हम निचले पायदान के ईमानदार, इज्जतदार और चरित्रवान व्यक्ति हैं लेकिन हम आपस में विभक्त रहते हैं और हुक्मरान विभिन्न जातियों के होकर भी सभी के सभी एकमत रहते हैं, सभी में मक्कारी का सेम दुर्गुण होता है, सब के सब दक्षिणपंथी होते हैं, सभी पूँजीवाद के हिमायती और वफादार होते हैं। अपने देश में चाहे कांग्रेस हो, बीजेपी हो, बीएसपी हो, सपा हो, डीएमके हो, एआईडीएमके हो, जेडी हो, आरजेडडी हो, तृणमूल हो आदि पार्टियाँ दक्षिणपंथी हैं। दक्षिणपंथी होने का अर्थ है संसदीय लोकतंत्र में आस्था रखना। संसदीय लोकतंत्र हमें राजनीतिक रूप से तो समानता प्रदान करती है लेकिन सामाजिक और आर्थिक रूप से दलित, शोषित और सर्वहारा ही बनाए रखती है। यह व्यवस्था के गुलाम हैं लेकिन संसदीय लोकतंत्र के सभी खम्भे इनकी रखैल हैं। आनंद सर के शेरों का मत है कि ऐसी व्यवस्था को पूर्णरूपेण उखाड़ फेंककर ही सुकून की व्यवस्था स्थापित किया जा सकता है लेकिन इस व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए बगावत के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है।

पसमंजर  में  मौजू रियाकारी के हुक्मरान होते हैं।

वहाँ न कोई दलित न ब्राह्मण सब बेईमान होते हैं।।

ये तो फिजूल दिमांगी गुलामी है फिरकापरस्ती की।

जमहूरियत  में  बैठकर  सारे रहबर समान होते हैं।।

हमारे  कानून  की  किताब रखेलों की नैपकिन है।

मुकम्मल  मसविदा  यह  कि बगावत का वख्त है।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 93)

कहा जाता है कि जब वर्तमान व्यवस्था का विकासवादी रूप खत्म हो जाता है तब भी उसके संचालक उसको अपने हित में संचालित करने की जिद करते रहते हैं क्योंकि नई व्यवस्था के आने से उनका वर्चस्व खत्म हो जाएगा, और वे ऐसा होने देना नहीं चाहते हैं इसलिए तत्कालीन व्यवस्था का अंतर्विरोध बढ़ता जाता है। दूसरे रूप में यह कहा जा सकता है कि अमीरी और गरीबी की खाई बढ़ती जाती है। और भी कहावतें हैं कि वर्तमान व्यवस्था अपनी कब्र स्वयं खोदता है। इसी तरह पूँजीवाद के बारे में ही लोगों की आमराय है कि पूँजीवाद मरणासन्न अवस्था में भी अपने मुनाफे की जिद पर अड़ा हुआ है, इससे वह सर्वहारा और पूँजीपतियों के असीम अंतर को दिनोंरात बढ़ाता जा रहा है। सर्वहारा की मजबूरी बनती चली जा रही है कि वह पूँजीपतियों के विरुद्ध बगावत खड़ी कर दे। आनंद सर के ग़ज़ल की ये लाइनें उसी बगावत के तरह संकेत कर रहे हैं। उनका दृढ़ इरादा है कि कुफ्र जरूर मिटेंगे। देखिए उनकी खूबसूरत ग़ज़ल के चंद शेर:

मुल्क के रहबर बड़े शैतान और बेखौफ है।

सोए हुए आवारा कुत्तों के दम हिला रहे हैं।।

जिन्दां  की  सलाखें टूटेंगी कुफ्र फ़ना होंगे।

ये  राह  पुरखतर  है  और  हमें बुला रहे हैं।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 58)

आर डी आनंद सर जे गज़लों में प्रयुक्त “जम्हूरियत” का अर्थ है “लोकतंत्र” और “इज़ारेदार” का अर्थ है “पूँजीपति”। बहुत स्पष्ट मन्तव्य है कि संसदीय लोकतंत्र के सभी सिपहसलार और जनता का खून चूसकर मुनाफा कमाने वाले पूँजीपति सब सुविधाओं से सम्पन्न होने के बाद भी जनता द्वारा की जा सकने वाली क्रान्ति से भयाक्रांत रहता है। आनंद सर ने अपने शेर में संकेत किया है कि पूँजीवादी व्यवस्था के बाद समाजवाद ही आएगा। वह लिखते हैं जब समाजवाद आ जाएगा, तो क्या होगा। इसका मतलब यह है कि समाजवादी व्यवस्था में बिना मेहनत किए अकूत पूँजी और संसाधनों को नियंत्रित करने वालों के कब्ज़े से सम्पत्ति और संसाधन छीन लिए जाएँगे तथा उनसे और उनके बल पर ऐशोआराम की जिंदगी जीने वाले उनके परिवार और रिश्तेदारों से भी सामूहिक कार्यों में सामूहिक श्रम का उतना ही योगदान लिया जाएगा जितना किसी भी जनसामान्य से लिया जा रहा होगा। आनंद सर उसे ही “आसमां” कहकर संबोधित कर रहे हैं। वह यह भी संकेत कर रहे हैं कि जब असीम ऊँचाई से वे गिरेंगे तो उनके अहम को कितनी चोट लगेगी इसलिए वे आगाह कर रहे हैं कि जनता को इतना तबाह न करो कि जनता ऊब जाय और तुम्हारे साम्राज्य को ही उलट दे। प्रस्तुत है कुछ शेर:

जम्हूरियत और इज़ारेदार डरता है इंक़लाब से।

अभी पूँजीवाद है समाजवाद हो तो क्या होगा।।

आसमां  तुमझे  नाज क्यों है अपनी ऊँचाई पे।

कहीं  क़यामत  बरपा  हो  जाय तो क्या होगा।।

ये  पब्लिक  है  जल्द  ही  सीने  पर ले लेती है।

उठा  कर  पटकेगी  रेगिस्तान में तो क्या होगा।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 46)

इंक़लाब की बात करते हुए आर डी आनंद सर शोषक वर्ग से पूँछते है कि क्या जनता के इंक़लाबी जलजले की धमक तुम लोगों को नहीं सुनाई पड़ रही है? अरे जालिमों! यह इंक़लाब का समय है, तुमने हमारी जिन आवश्यकताओं और खुशियों को कैद कर रखा है, उसे स्वतंत्र कर दो, नहीं तो तुम्हें बगावत के अंजाम से वाकिफ हो जाना चाहिए। इस ग़ज़ल के शेर में दो महत्वपूर्ण बातें हैं, प्रथम-“जलजलों की धमक” और दूसरा-“इंक़लाब की तारीख”। आनंद सर जब जलजलों की धमक और इंक़लाब की तारीख कहते हैं तो क्या इसका अर्थ सिर्फ सामान्य रूप से पूँजीपति वर्ग को धमकाना मात्र होता है अथवा कोई हकीकत है? मुझे लगता है कि आनंद सर इन दोनों संयुक्त शब्दों का प्रयोग वास्तविक परिस्थितियों के लिए लिख रहे हैं क्योंकि आर डी आनंद सर अपने गद्य की कुछ किताबों में लिखते हैं कि क्रान्ति की भौतिक परिस्थितियाँ पूर्ण हैं लेकिन कर्तागत तैयारी नहीं हो पाई हैं। भौतिक परिस्थितियों का मतलब श्रम और पूँजी के मध्य का द्वंद्व अपने चरम पर है अर्थात शोषकों ने सारी मानवता की हदें पार कर श्रमिक वर्ग का निर्मम शोषण कर रहा है। इस लिहाज से व्यवस्था परिवर्तन के लिए भौतिक परिस्थिति परिपक्व है लेकिन दूसरी तरफ जिसको क्रान्ति करनी है वह छोटे-छोटे स्वार्थों और सत्ता वर्ग द्वारा फैलाए झूठ में फँसकर वर्गीय एकता न बना पाने के लिए अभिशप्त है। फिर भी यह दौर क्रान्ति का दौर ही है। जनता कभी भी क्रान्ति के लिए तैयार हो सकती है। इस बात की सत्यता की पड़ताल के लिए प्रस्तुत है वह क्रान्तिकारी शेर:

जलजलों  की धमक तुम तक नहीं क्या आ  रही।

इंक़लाब  की  तारीख  है  रानाइयाँ  मुफीद  करो।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 47)

आर डी आनंद सर अपनी ग़ज़ल संग्रह “ये राह पुरखतर है” में न सिर्फ पूँजीवाद, पूँजीपति, ब्राह्मणवाद, ब्राह्मण, इंक़लाब, सरफरोश, फेक इंडस्ट्री की बातें लिखते हैं। वे सिर्फ लोकतंत्र, संसदीय लोकतंत्र, समाजवाद, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक स्वन्त्रता की ही बात नहीं करते हैं। वे जलजलों की धमक और क्रान्ति के समय की ही बात नहीं लिखते है बल्कि वे क्रान्तिकारियाँ को भी संबोधित करते हैं। इसी तरह अपने एक शेर में वे एक स्त्री से उसके वांक्षित प्रेम के बारे में बातें करते हुए कहते हैं कि एक गरीब मजबूर इश्क के तौर-तरीके क्या जाने, वह तो सिर्फ रोजी-रोटी को ही इश्क समझता है। वह उस प्रेमाकुल स्त्री से कहते हैं यदि तुम अपने प्रेम नायक के जीवन रूपी नाव को डूबने से बचाने के लिए अपने साड़ी के आँचल को नाव का पाल न बना सको, तो प्रेम का क्या अर्थ है। आनंद सर का स्पष्ट कहना है कि पेट की भूख इश्क़ की भूख को नहीं जानती है। एक गरीब श्रमिक नायक पेट की भूख को शान्त करने के लिए नायिका के कठिन परिश्रम को ही प्यार समझता है।

तंग  गुरबत का कशीदा इश्क का सबब मजलूम क्या जाने।

सफीना पस्त है आँचल को परचम न बनाओ क्या मतलब।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 48)

तथाकथित क्रांतिकारियों के मनमानी क्रांतिकारिता की तरफ ध्यान आकृष्ट करते हुए आर डी आनंद सर ने लिखा है कि लोकतंत्र की लाश पड़ी हुई है और तुम गुनगुना रहे हो। यह कैसी गैरत है कि घर में लाश पड़ी है और तुम मुस्कुरा रहे हो। लोकतंत्र को अपने ही रक्षकों के गन प्वाइंट पर नंगा कर दिया गया है और उसी के पुत्र होकर उसके नग्नता को देखते हुए भी न जाने किस गलतफहमी में मुस्कुरा रहे हो। इन बातों का यह सीधा अर्थ नहीं है बल्कि यह सिम्बोलिक सत्य है। सत्य यह है कि लोकतंत्र किन लोगों के हाथों में है और लोकतंत्र के साथ क्या-क्या खेल हो रहा है। इन शेरों में “मैय्यत”, “गुनगुना रहे”, “गैरत”, “मरदूद”, “मुस्कुरा रहे”, “उरियां”, “अठिलाना” जैसे शब्दों से क्रान्तिकारी जनता के अनेक द्वंद्व को इंगित करता है जिसकी वजह से क्रान्ति की कोई ठोस अवधारणा विकसित नहीं हो पा रही है। यथा:

जम्हूरियत  की  मैय्यत  है  तुम  गुनगुना रहे हो।

कैसी  गैरत  है  मरदूद तुममें जो मुस्कुरा रहे हो।।

जम्हूरियत   उरियां   है   संगीनों   के   साए  में।

बेशर्म पूत जिस्म पे  निगाह और अठिला रहे हो।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 50)

इंक़लाब की फिलॉसफी को गाइड करते हुए आर डी आनंद सर सर्वहारा के नेताओं को बहुत स्पष्ट बताते हैं कि व्यवस्था परिवर्तन के रास्ते में सबसे बड़े अवरोधक यही संसदीय राजनीति के दक्षिणपंथी नेता हैं। ये नेता ही माफिया हैं। ये ही कालाधन के मालिक हैं। ये ही जनता के आपसी विवाद के कारक हैं। जिन्हें हरामखोरी की आदत है। ये सीधे मुँह कभी समझने वाले नहीं हैं। दूसरी बात, इनके धर्मान्धों को भी समझाने से कोई फायदा नहीं है। वर्ग-संघर्ष की लड़ाई में ये नेता पूँजीपतियों की सुरक्षा में अपना सूथन भी खोल देंगे इसलिए ये हमारे वर्ग-शत्रु हैं। जब भी संघर्ष हो, क्रान्तिकारियाँ को ब्यूरोक्रेट्स और इन नेताओं पर कभी भी विश्वास करने वाला नहीं है। ये हमारी गफलत होगी। इसलिए, आनंद सर अपने शेरों के माध्यम से क्रांतिकारियों को बहुत स्पष्ट ही इन नेताओं और माफियों से युद्ध के रास्ते मे निपटने की सलाह देते हैं।

ये  जो  नेता  हैं  इनको  औकात  में  ला  सको तो बताओ।

देश  के  माफियाओं   का  वाट  लगा  सको  तो   लगाओ।।

कालाधन  इन्हीं  के  पास  है और ये ही फसाद की जड़ हैं।

ये बाज नहीं आएँगे जनता को समझा सको तो समझाओ।।

अंधभक्त  न  कभी समझे हैं न समझेंगे इनकी हरामखोरी।

धर्मान्धों को छोड़ो सरमायदारों को बता सको तो बताओ।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 57)

जैसे वस्तुपरिस्थितियों के परिपक्व होने के बावजूद भी क्रान्ति नहीं होती है, वैसे क्रान्तिकारी सिद्धांत के बिना भी क्रान्ति नहीं हुआ करती है इसलिए आनंद सर क्रान्तिकारी सिद्धांत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर विशेष ध्यान देते हैं। यह सच है कि किसी भी बदलाव के लिए दृष्टिकोण बिल्कुल साफ होना चाहिए। आनंद सर के इस शेर से बात बिल्कुल साफ हो जाती है:

चश्मा-ए-दीदा  बिना  बगावत  नहीं  होगी।

मजमून को बदले बिना बगावत नहीं होगी।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 65)

काव्य की सुंदरता उसकी भाषा, शैली, रस, छंद और अलंकार से जरूर होते हैं लेकिन काव्य की अंतरात्मा उसका भाव होता है। भाव विहीन काव्य की सुंदरता उसी तरह है जैसे किसी पुरुष का मेकअप करके उसे स्त्री बनाकर किसी पुरुष से ब्याह दिया जाय। निम्नलिखित शेरों के अशआर क्या गज़ब के अशआर हैं। आनंद सर के एक-एक शब्द क्रान्ति को अभिप्रेरित हैं। वे क्रान्तिकारी सिद्धांत के अभाव को पहचानते हैं इसलिए क्रान्ति उत्प्रेरक शब्दावली और भाव के अखबार की सलाह देते हैं। यहाँ अखबार प्रचुर अध्ययन सामग्री का सांकेतिक अर्थ ग्रहण करता है। क्रान्ति के लिए सिद्धांत जरूरी है तो सिद्धांत के लिए पर्याप्त पुस्तकें, पत्र और पत्रिकाएँ उपलब्ध कराई जानी चाहिए क्योंकि जैसे अँधेरा जुगनुओं से प्रकाश ग्रहण करता है उसी तरह क्रान्तिकारी पुस्तकों से क्रान्तिकारी सिद्धांत को ग्रहण करता है। शेर को पढ़कर जबरदस्त ऊर्जा प्राप्त होती है।

हर  इक़  हर्फ़  में  चिंगारियाँ  हों   जनाब।

अब मुसाफिरों को ऐसा अखबार चाहिए।।

तरीकियाँ  जुगनुओं  से  लेती हैं  खिराज।

नींदों  को  अपनी  रात    बेदार   चाहिए।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 64)

भारत जातियों और धर्मों का देश जरूर है लेकिन यहाँ की व्यवस्था पूँजीवादी है। भारतीय जातिवाद की वजह से पूँजीवाद नहीं है बल्कि पूँजीवाद की वजह से जातिवाद जरूर है। जातिवाद पूँजीवाद की एक सहायक इकाई है। जातिवाद के द्वारा पूँजीवाद श्रमिक वर्ग को बाँट कर रखता है जिससे सर्वहारा वर्ग संगठित नहीं हो पाता है। सभी जातियों के गरीब, मजदूर, अशिक्षित, बेरोजगार, मजलूम, शोषित, उत्पीड़ित लोग अपने रोटी, कपड़ा और मकान के लिए अवणि वर्गीय एकता नहीं कर पाते हैं बल्कि जाति और धर्म उनके जीवन-यापन की आवश्यक सामग्रियों से अधिक जरूरी महसूस होती है। ऐसा न तो भौतिक जरूरतें हैं और न ही भौतिक परिस्थितियाँ ही हैं बल्कि पूँजीपति जानबूझ कर हमें बाँट रखने के लिए अमानवीय जाल बुनता रहता है और यह सब अपने पूँजी के विकास और उद्योग की संरक्षा के लिए करता है। आम आदमी भूखों मरता है और पूँजीपति अकूत धन-संपदा कमाता रहता है। अजीब विडम्बना है कि असीम धन को पूँजीपति अनुत्पादक (बाँझ) रूप से स्थिर रखता है। उसका उपयोग न वह स्वयं करता है और न ही सर्वहारा वर्ग के किसी काम में आता है। पूँजीपतियों की बेहूदी लालची महत्वाकांक्षा के कारण पूरी दुनिया की बहुसंख्य आबादी को तिल-तिल के लिए मोहताज़ कर रखता है। मजदूर वर्ग जब भी अपनी आवश्यकता अथवा हित के लिए पूँजीपतियों के समझ अपनी बात रखता है, तो पूँजीपति उसे बास्टर्ड से कम गाली नहीं बकता है और जब वह अपने हक़ के लिए आंदोलित होता गया तो अनेक श्रमिक और पब्लिक विरोधी कानूनों द्वारा उसको रोक देने की पूरी कोशिश करता है। कभी टाडा लगाएगा, कभी अप्सा लगाएगा, कभी श्रमिक कानूनों को परवर्तित कर देगा, कभी एंटी पीपुल बिल, कभी एन्टी फार्मर्स बिल, कभी धारा 370, कभी तीन तलाक, कभी शरीयत और कभी स्त्रियों के ड्रेस पर हमला किया जाता है। स्कूल-कॉलेजों की फीस हाइक, नौकरियों में कटौती, उदारीकरण की प्रक्रिया से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और पब्लिक सेक्टर्स को प्राइवेट सेक्टर्स में तब्दील कर पूँजीपतियों के मुनाफे को बढ़ाते हैं तथा उनके हर कारनामें को संरक्षित करते हैं। आम जनता इनके द्वारा प्रायोजित साम्प्रदायिक दंगों में अपनी जान देकर भी इनको जिताती है और सत्ता के शीर्ष तक पहुँचाती है, उसका अंजाम जनता को बदहाली की जिंदगी में तब्दील करने जा हर उद्यम करते हैं। पूँजीपति और सत्ताधारी ऐसी ही परिस्थितियों के जनक हैं। इन परिस्थितियों के ख़ात्मे के लिए जनता के समक्ष बग़ावत और हथियार के सिवा क्या बचता है। आनंद सर के इन कविताओं और इसके खतनाक और जरूरी संदेश पढ़ने/जानने के बाद भी यदि कोई यह कहे कि आर डी आनंद सर समझौतावादी/उदारवादी कवि व चिंतक हैं, तो यह उसकी हेठी है अथवा आनंद सर को ठीक से न समझ पाने की गलती है। आनंद सर जे चंद शेरों को पढ़िए:

भूख  में  चाँद  रोटी  नज़र आता है क्या करें।

बाजार  में  मीनार  नज़र  आता  है क्या करें।।

बेतरतीब  है  दस्तूर   मुल्क  के   रहबरों   का।

हथियार  ही महफूज नज़र आता है क्या करें।।

जिस  मुल्क के मजदूर को मयस्सर नहीं रोटी।

उसे इक राह बग़ावत नज़र आता है क्या करें।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 67)

इतना ही नहीं, आनंद सर भारतीय दर्शन के महाज्ञानियों से भी संवाद करते हैं और स्वर्ग तथा नरक के उनके छद्म को उन्हीं के समक्ष एक तर्क जे रूप में रखते हैं। भारतीय दर्शन कहता है कि यह संसार शून्य है/सब कुछ माया है। मोह/माया को त्याग कर मनुष्य को मोक्ष के लिए प्रयास करना चाहिए। जन्म लेना एक दुख है। जन्म और मृत्यु से छुटकारा पाने के लिए मनुष्य को परब्रह्म की उपासना/आराधना करनी चाहिए। ब्राह्मण यहाँ तक बताता है कि रिश्ते/नाते/शरीर/सुख/सुविधा/धन/ऐश्वर्य/जर/जोरू/जमीन/रूप/श्रृंगार सब भ्रम है। अशक्तियों में ध्यान नहीं देना चाहिए। आनंद सर की कविता का भावार्थ है कि जब ब्राह्मण वर्ग को मोक्ष और परब्रह्म की इतनी चिंता और चाहत है तो वह संसार की सारी सम्पदाओं/जमीनों/नौकरियों/राजनीतिक सत्ताओं/ब्यूरोक्रेसी/उत्पादन/उत्पादन के सभी संसाधनों पर क्यों कुंडली मार कर बैठा है, क्यों सारे नियम/नियमावलियों को अपने पक्ष में गढ़ रखा है। जब स्वर्ग ही सब कुछ है तो ईश्वर की आराधना और प्राप्ति के लिए यह वर्ग सभी ब्राह्मण वर्ग के सदस्यों के साथ जंगलों और पर्वतों की गुफाओं में क्यों नहीं निकल जाता है? यहाँ जो अशिक्षित और मलिच्छ राक्षस जातियाँ हैं, वे ईश्वर के इस नारकीय संसार और जन्म/मृत्यु के चक्र को झेंलेंगे; लेकिन नहीं, इस संसार के अतिरिक्त यह शूक्ष्म जगत चेतनहीन, अनियंत्रित, असंगठित और अनिश्चित है। जिस स्वर्ग और मोक्ष लोक की की कल्पना जा निर्धारण ब्राह्मण वर्ग ने कर रखा है, उसका पूर्ण उलंघन वे स्वयं ही करते हैं क्योंकि जिसे वे सत्य कहते हैं, दरअसल, वही झूठ है और वे इस बात को जानते हैं तथा जिसे झूठ और माया कहते हैं, यही विचित्र सत्य है। इस संसार के अतिरिक्त कोई और संसार नहीं है और न ही एक बार किसी जीव का रूप मिलने के बाद उसकी पुनरावृत्ति ही होती है। जिसका संयोग से एक बार जन्म हो गया, मृत्यु के बाद पुनः उसका कोई अस्तित्व नहीं रहता है और न उसके अंदर कोई आत्मा जैसी निर्धारित शक्ति ही रहती है जो अमर/अजर हो। पूर्वजन्म और पुनर्जन्म एक समय का वास्तविक चिंतन जरूर है लेकिन सत्य नहीं है। विज्ञान के युग में यह सुनिश्चित हो चुका है कि न ईश्वर जैसी कोई शक्ति है और न आत्मा जैसी कोई परमात्मा द्वारा उत्पन्न की गई कोई दूसरी यूनिट ही है, जो फिर से कोई दूसरी शरीर धारण कर सकने में सक्षम होती है। पूर्वजन्म और पुनर्जन्म का कॉन्सेप्ट एक धोखा है। देवी/देवता और भूत/प्रेत जैसी किमदंतियाँ नालायकों द्वारा संचालित किए जाने वाला धूर्त योजना का पार्ट है। आनंद सर के विभिन्न शेर धयातव्य हैं:

वहाँ  स्वर्ग  ले  लो  तुम  नर्क  में  रहने दो हमें।

यह  दुनिया  पापों  की  है  पाप  सहने दो हमें।।

तुम  हो  ब्रह्मचारी  रहे  देववाणी  को   उवाच।

भिक्छा  पर  जीवन  सदा  खेती सारी दो हमें।।

स्वर्ग  में  ही  मोक्ष  है  सारी  अप्सराएँ हैं वहाँ।

जर  जोरू  जमीन  माया  मृत्युलोक  दो  हमें।।

अत्याचार  व्यभिचार सरमायेदार  सब  झेलेंगे।

जल्दी  स्वर्ग  जाइए  जहन्नम  में  रहने दो हमें।।

मृत्यु  चोला  परिवर्तन है आत्महत्या से न डरो।

बिना मरे स्वर्ग नहीं पाओगे अमर रहने दो हमें।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 79)

जन्म और मृत्यु की अवधारणा पर बात रखते हुए आनंद सर ने जिंदगी के वास्तविक स्वरूप पर भी कुछ ग़ज़लें लिखा हैं। वे कहना चाहते हैं कि यह संसार भौतिक संसार है। पदार्थ और प्रक्रिया की वजह से जन्म और मृत्यु होती है। पदार्थ और प्रक्रिया निरंतर गतिमान रहने वाली प्रकृति है। माइक्रो मिली सेकेंड के असांख्यवें भाग के समय के बराबर भी भौतिक गतियाँ न रुकती हैं न अवरुद्ध होती हैं। इसे ही प्रक्रिया कहते हैं। इसे ही पदार्थ का द्वंद्व कहते हैं। सामान्य बोलचाल में हम कहते रहते हैं कि यह शरीर मिट्टी और राख है। इन दोनों का मतलब पदार्थ है। मिट्टी का अर्थ जीवन निर्माण के तत्व से लगाया जाता है और राख का अर्थ मृत्यु के उपरांत शेष बचे कार्बन से लगाया जाता है लेकिन अन्ततः राख भी पदार्थ ही है। जीवन से पहले भी और जीवन के बाद भी ज़िन्दगी का वास्तविक वजूद राख है। आनंद सर कहते हैं कि इस सच को समझने के बाद भी मनुष्य को नैराश्य में जीवन नहीं बिताना चाहिए। जीवन एक प्रक्रिया है। आज हम हैं कल हमारी दूसरी पीढ़ी होगी। पीढ़ी का क्रम निरंतर चलता रहेगा। हमें अपनी सभी खुशियाँ, सभी विचार, सभी चिंतन, सभी लुत्फ भविष्य के जीवन में स्थानांतरित करने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए और स्वयं का जीवन बेहतर जीना चाहिए।

ज़िन्दगी राख का वजूद है मिरी जां पर फिर भी।

चलो आलम तक छककर जिएँ अपनी ज़िंदगी।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 72)

भौतिक जगत अजन्मा है। पदार्थ और प्रक्रिया अजन्मा है। शुक्ष्म से शुक्ष्मतर और विशाल से विशालतम पिंड भौतिक प्रक्रियाओं की उपज हैं। विशालतम पिंड का आकाश में बिना दिखने वाले किसी आधार के बिना ही एक ऐक्सिस और एक ऑरबिट पर चलते रहना हिग्स फ़ील्ड की वास्तविक विचित्रता है। मास, एनर्जी, गति, भार सब हिग्स फ़ील्ड, पदार्थ और प्रक्रिया की वजह से संभव है। अनेक रूप, जीव और चेतना निरंतर प्रक्रियाओं जा संश्लिष्ट परिणाम है। यह घटनाएँ भौतिक जगत में निरंतर घटती रहती हैं। आज मनुष्य जैसा विवेकवान व चिंतनशील मनुष्य भी उसी अनवरत प्रक्रिया का उत्कृष्ट परिणाम है। मनुष्य चूँकि ऐसा जीव संभव हुआ है जो इस सार्वभौम और उसकी प्रक्रियाओं को समझ गया है इसलिए वह अपने अमर रहने की इच्छा करता है। हालाँकि, मनुष्य का यह सोचना बिल्कुल गलत नहीं है। इस अमरत्व के प्रयास में मनुष्य अनेक ऐसे नियमों को खोजने में सफल हो सकता है जिससे मनुष्य इसी सार्वभौम की तरह अनादि काल तक जीवित रहने वाला प्राणी बन जाय; हालाँकि, मैं इसके बुरे और अच्छे किसी भी परिणतियों पर बहस नहीं करना चाहूँगी क्योंकि मेरी इच्छा भी एक इच्छा ही है, कोई वैज्ञानिक स्थिर प्रविधि नहीं है। फिलहाल, अभी तक मनुष्य भी मात्र एक अणु ही है। कुछ समय पश्चात मनुष्य अपनी शारीरिक प्रक्रिया के चलते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है और अभी तक अमर होने का कोई फार्मूला मनुष्य नहीं प्राप्त कर पाया है इसलिए आनंद सर भी यही मानते हैं कि जमीं और आसमां को भी इस सार्वभौम के नियमों के आगे एक दिन झुकना ही पड़ता है। कुछ बेहतरीन शेर विभिन्न अभिमतों पर उद्धृत है। आप उस पर अपनी व्यक्तिगत राय बना सकते हैं।

न    मेरे    कहने    से    ज़िन्दगी    मिली   थी।

न    मेरे    कहने    से    मौत    रुक    जाएगी।।

अजब  फ़रेब  सी है बज़्म-ए-हयात की आमद।

अजल  भी   है  पोशीदा  भी  है  गुम   जाएगी।।

कायनात  कयामत और हयात सब अहबाब हैं।

इक दिन आसमाँ-ज़मीं आजम में झुक जाएगी।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 70)

ज़िन्दगी को छक कर जीने के लिए उत्पादन की प्रचुरता जरूरी है। उत्पादन की प्रचुरता के लिए सामूहिक श्रम की जरूरत है। इसके लिए संसाधनों पर सामूहिक मालिकाना भी आवश्यक है। आनंद सर की ग़ज़लों की भाषा बहुत समृद्ध है। उनकी ग़ज़लों के सभी शब्द एक अलग मायने रखते हैं। यहाँ “हवाएँ” जनता का प्रतीक है, “शोखियाँ” का अर्थ क्रांतिकारी इच्छाओं से है तथा “बहार” भी जनता ही है, “औकात बताना” निश्चित क्रांति करने की बात है। वर्तमान में नेताओं के कुशासन और कुदृष्टि से जनता बुरी तरह से परेशान है। आनंद सर आम आदमी से बगावत का आह्वान करते हैं। आर डी आनंद सर एक आशावादी कवि भी हैं। वे लिखते हैं कि आम जनता में बगावत की चिंगारियाँ बुझी नहीं हैं, वह देश की तस्वीर बदल सकता है। यथा:

हवाएँ  अपनी  शोखियों  का  नाज उठाओ।

बहार  जरा  थमकर  इन्हें  औकात बताओ।।

बगावत के राख की चिंगारियाँ बुझी नहीं हैं।

इन  रहबरों  को मुल्क की तस्वीर दिखाओ।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 83)

आर डी आनंद सर जब शत्रु की बात करते हैं तो वे वर्ग शत्रु की बात करते हैं और उस संदर्भ में कहते हैं कि क्रांतिकारी जब भी खड़ा होगा, पूरी व्यवस्था को बदलने के लिए खड़ा होगा। ऐसी स्थिति के लिए वे लिखते हैं कि किसी ग़फ़लत में पड़े बिना आम आदमी को एक सुंदर, स्वस्थ और शोषण विहीन समाज की स्थापना के लिए हथियार उठाना ही पड़ेगा। यहाँ हथियार उठाने का अर्थ कदापि यह नहीं है कि आम आदमी कत्लेआम के लिए एकाएक उठ खड़ा होगा, बिल्कुल नहीं। क्रांति का अर्थ बम और पिस्तौल बिल्कुल नहीं है। क्रांति का अर्थ पूँजीपति वर्ग की हत्या बिल्कुल नहीं है। क्रांति का अर्थ रक्तरंजित युद्ध बिल्कुल नहीं है। ये जो पूँजीपति हैं और उनके हर कम्पनियों के अधिकारी व कर्मचारी हैं, सब हमारे भाई है-ठीक उसी तरह जैसे अर्जुन के सम्मुख सभी उनके प्रियजन तीर/धनुष लेकर खड़े थे और अर्जुन के सामने यह सवाल मुँह बाए खड़ा था कि वह किसको मारें, सभी तो अपने हैं। पूँजीपतियों ने अपनी एक मैनेजिंग कमेटी बना रखी होती है जिसे हम सरकार कहते हैं। सरकार के पास पुलिस है, मिलिट्री है, न्याय पालिका और कार्यपालिका है, संसद और विधान सभाएँ हैं, अनेक विभाग हैं, उनके अधिकारी/कर्मचारी हैं, मीडिया है। सभी सरकार की बात मानेंगे। सरकार का आदेश/निर्देश क्रांतिकारियों के विरुद्ध होगा क्योंकि क्रांतिकारी उत्पादन के उद्देश्य को बदलने का आग्रह करेंगे। वे कहेंगे कि उत्पादन देश की सेवा अरब आबादी के भौतिक और नैतिक जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाना चाहिए और उस बात को न पूँजीपति मानेगा और न ही साकार व सरकारी तंत्र ही। क्रांतिकारी कहेंगे कि उत्पादन के सम्पूर्ण संसाधनों पर सामूहिक मालिकाना होना चाहिए, तो पूँजीपति व सरकार इस बात को कभी मनाने को तैयार नहीं होंगे। संभव है इस विमर्श के डर से घटित होने वाले अंजाम को टालने के लिए सरकार पुलिस और मिलिट्री के जोर का इस्तेमाल करे। निश्चित सरकार की तरफ से पूँजीपतियों की रक्षा के लिए ऐसी कार्यवाही प्रारम्भ की जाएगी। क्रांतिकारियों से झड़पें निश्चित हैं। ऐसी स्थिति में क्रांतिकारी सामूहिक हित के लिए सामूहिक श्रम को तिलांजलि नहीं देगा। वह अपने प्राणों की बाजी लगाकर उठेगा। वह उनकी बंदूकें छीनेगा। वह उत्पादन के संसाधनों पर कब्ज़ा करके का प्रयास करेगा। पुलिस और मिलिट्री जनता की हत्याएँ करेंगी। जनता अपनी बचत में हथियार उठा सकती है।

शत्रु से लोहा लेना ही होगा।

हथियार उठा लेना ही होगा।।

रहबर  जब रहजन हो जाएँ।

हथियार उठा लेना ही होगा।।

चोर-उचक्कों  के शासन में।

हथियार उठा लेना ही होगा।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 119)

इंक़लाब का बीज-मंत्र है सम्पूर्ण परिवर्तन; जिसमें सभी के खाने-/पीने और जीवन जीने लायक परिस्थितियों का विस्तार और विकास संभव किया जा सके। उत्पादन का उद्देश्य मुनाफा बिल्कुल नहीं होगा। संपत्ति और संसाधनों पर किसी का निजी अधिकार नहीं होगा। यदि ऐसा संविधान राज्य के द्वारा प्रस्तावित व पारित किया जा सके तो भी और क्रांति द्वारा ऐसी व्यवस्था स्थापित किया जा सके तो भी, किया जाना ही सम्पूर्ण परिवर्तन का हिस्सा है। मनुष्य का मनुष्य के द्वारा किसी भी प्रकार का शोषण नहीं होने दिया जाएगा। व्यक्ति की तानाशाही नहीं होगी। इसे ही क्रांति कहते हैं।

इंकलाब का बीज मन्त्र लो।

गाँव-शहर   में   फैला   दो।।

पूँजीवाद  का  तंत्र-मन्त्र है।

इसको  तोड़ो  बिखरा  दो।।

तानाशाही    की   सरकारें।

इनकी    चूल    हिला    दो।।

दुश्मन   है   मक्कार  बहुत।

उन    पर    बज्र   गिरा  दो।।

पूँजी  है  श्रम  को  लूट रही।

श्रमिक    को     बतला  दो।।

क्राँति बिना कुछ न सुधरेगा।

सिद्धांत  इन्हें  सिखला   दो।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 124-25)

मुर्दे कभी चिंतन नहीं करते और न ही मुर्दे कभी क्रांति करते हैं। आर डी आनंद सर हमेशा क्रांतिकारी गीत को गाने की प्रेरणा देते हैं। क्रांतिकारी गीत से खून में बिजलियाँ कौंधती हैं। उनकी कविताओं, गज़लों और गीतों में वर्ग पक्ष और उसकी प्रतिबद्धता बिल्कुल साफ रहती है। अक्सर वे कहते हैं कि हमारा समाज वर्ग विभाजित समाज है। वर्ग विभाजित समाज में शोषक और शोषित हमेशा दो वर्ग विद्यमान रहते हैं। आनंद सर शोषित वर्ग के लिए गीत लिखते हैं और शोषकों का गला मरोडने की बात करते हैं। शोषक एक ऐसा वर्ग है जिसकी प्रवृत्ति दूसरों का शिक्षण कर मुनाफा कमाना है। वह किसी भी सभ्यता, संस्कृति, मानवता, सद्विचार, उपदेश, ईश्वर भय से अपनी प्रवृत्ति नहीं छोड़ सकता है इसलिए सर्वहारा के लिए एक ही विकल्प है कि वह शोषकों का गला ही मरोड़ दें।

चलो कि इंक़लाब तक चलें कि गीत गा उठे।

बहे  रगों में बिजलियाँ कि इंक़लाब गा  उठे।।

बढ़ो  कि  सीना  चीर  दो  गरदनें  मरोड़ दो।

समुद्र   हरहरा  उठे  आकाश  थरथरा   उठे।।

(ये राह पुरखतर है, पेज 33)

इस ग़ज़ल-संग्रह में बहुत ही जोशीले किन्तु सुचिंतित शेरों की भरमार है। ऐसा नहीं कि आनंद सर ने इस संग्रह में क्रांति के अतिरिक्त कुछ अन्य विषयों पर ग़ज़लें लिखी ही नहीं हैं। उन्होंने जीवन, जिंदगी, मित्र, माशूका, सौंदर्य, बाल, आँख, इश्क़ आदि विषयों पर भी एक दो ग़ज़लें लिखी हैं। कुछ ग़ज़लें इतने गूढ़ और उनके शब्द इतने कठिन हैं कि मैंने उनकी समीक्षा की जहमत ही नहीं उठाई। मैं यह कह सकती हूँ कि आनंद सर की ये प्रयोगवादी ग़ज़लें एक न एक दिन बहुत सराही जाएँगी और बहुत ही पापुलर होंगी। कुछ शेर तो इतने अच्छे हैं जो लोगों को जोश से भर देंगे और वे शेर समाज की जरूरत बन जाएँगे।

-संदीपा दीक्षित

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