“स्वतंत्र भारत में हिंदी प्रयोग-अनुप्रयोग की अनिवार्यता” पर व्याख्यान आयोजित

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दिल्लीः दिल्ली विश्वविद्यालय के श्यामलाल महाविद्यालय (सांध्य) के हिंदी विभाग द्वारा विभागीय विशेष व्याख्यान श्रृंखला के रूप में शुरू की गई एक नई पहल के क्रम में अब से पहले तीन विशेष व्याख्यान का आयोजन हो चुका है। व्याख्यान श्रृंखला की इसी कड़ी में आगामी ‘हिंदी दिवस’ के उपलक्ष में हिंदी विभाग के साहित्यिक मंच ‘सृजन’ द्वारा गत 10 सितंबर को “स्वतंत्र भारत में हिंदी प्रयोग-अनुप्रयोग की अनिवार्यता” शीर्षक विषय पर व्याख्यान श्रृंखला के चतुर्थ व्याख्यान का आयोजन अतिथि व्याख्यान रूप में किया गया। इस अतिथि व्याख्यान के विषय-विशेषज्ञ के रूप में मुख्य वक्ता थे- दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर पूरन चंद टंडन जी । कार्यक्रम के आरंभ में महाविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रभारी डॉ. अमित सिंह जी ने कार्यक्रम में उपस्थित अतिथि मुख्य वक्ता व अन्य श्रोताओं का स्वागत करते हुए कार्यक्रम के औपचारिक शुभारंभ हेतु बी.ए. (ऑनर्स) हिंदी, तृतीय वर्ष के छात्र नंदन कुमार को सरस्वती वंदना प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया। सरस्वती वंदना की प्रस्तुति के बाद हिंदी विभाग के प्रभारी डॉ. अमित सिंह जी ने कार्यक्रम के आगामी संचालन का दायित्व हिंदी विभाग के साहित्यिक मंच ‘सृजन’ के परामर्शदाता डॉ. रामरूप मीना को सौंप दिया। इस अवसर पर कार्यक्रम के संचालक डॉ. रामरूप मीना द्वारा विभागीय साहित्यिक मंच ‘सृजन’ के परामर्शदाता होने के नाते कार्यक्रम में उपस्थित अतिथि मुख्य वक्ता, प्राचार्य महोदय, अन्य शिक्षकगण व विद्यार्थीगण का स्वागत करते हुए अपने साहित्यिक मंच ‘सृजन’ द्वारा समय-समय पर आयोजित कराए जा रहे विभिन्न व्याख्यान की ज्ञानवर्धक महत्ता से उपस्थित श्रोताओं को अवगत कराया गया। तदुपरांत स्वागत वक्तव्य देते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. रमेश कुमार ने हिंदी विभाग द्वारा आयोजित की जा रही व्याख्यान श्रृंखला को बहुत महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने अतिथि व्याख्यान के विषय “स्वतंत्र भारत में हिंदी प्रयोग-अनुप्रयोग की अनिवार्यता” को प्रासंगिक बताया और हिंदी भाषा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हमारे देश का नाम हिंदी से हिंदुस्तान बना है। हिंदी भाषा हमारे देश की संस्कृति व इतिहास का प्रतीक है। उन्होंने गांधीजी के उद्धरण के माध्यम से कहा कि जिस देश की अपनी भाषा नहीं है वह देश गूंगा है। भाषा देश की आवाज है। यह आवाज जनता की आवाज है। भारत के बहुसंख्यक लोगों की आवाज है। हिंदी का प्रयोग लोग बहुतायत करते रहे हैं, हिंदी आज भी अधिकतर लोगों की बोलचाल की भाषा है। देश की स्वतंत्रता के पूर्व व उसके बाद हिंदी ही अधिकतर बोलचाल की भाषा रही है। तदुपरांत कार्यक्रम संचालन के आगामी क्रम में हिंदी विभाग के साहित्यिक मंच ‘सृजन’ की छात्र पदाधिकारी साक्षी तिवारी द्वारा अतिथि व्याख्यान के विषय विशेषज्ञ प्रोफेसर पूरन चंद टंडन जी का औपचारिक परिचय प्रस्तुत किया गया। इसके बाद अतिथि व्याख्यान के मुख्य वक्ता प्रोफेसर पूरन चंद टंडन जी ने सितंबर माह को ‘शिक्षा, शिक्षक व भाषा’ का माह बताते हुए “स्वतंत्र भारत में हिंदी प्रयोग-अनुप्रयोग की अनिवार्यता” शीर्षक विषय पर आयोजित किए जा रहे अपने व्याख्यान को ‘हिंदी उत्सव’ से ही संबद्ध बताते हुए अपने वक्तव्य की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि भाषा व्यक्ति के व्यक्तित्व की पहचान है। भाषा संस्कृति की वाहिका होती है। हमारे देश में अनेक संस्कृति हैं। हम हमारी निज भाषा, मातृभाषा व राष्ट्रभाषा के प्रति उदासीनता रखते रहे हैं, जबकि हिंदी का इतिहास 1100 वर्षों का इतिहास है। मध्यकाल में शासन-प्रशासन की भाषा फारसी रही और फिर ब्रिटिश काल में अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ गया। हम आज तक अंग्रेजी का लबादा ओढ़े हुए हैं जो कि दुर्भाग्यपूर्ण हैं। आज हिंदी सभी अनुशासन में प्रयुक्त हो रही है जो हिंदी की प्रगति का सूचक है। आधुनिक काल में खड़ी बोली हिंदी एवं हिंदी गद्य का विकास हुआ जिसके फलस्वरूप हिंदी भाषा ने राष्ट्रीय आंदोलन एवं हिंदी साहित्य की आधुनिक प्रगति में अपना योगदान दिया। हिंदी की प्रगति में आधुनिक कालीन भारतेंदु युग, द्विवेदी युग एवं छायावाद युग के हिंदी साहित्यकारों का विशेष योगदान रहा। भारतेंदु जी ने हिंदी भाषा के विकास के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए हिंदी को विश्व-ज्ञान से जोड़ने की बात कही तथा आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी भाषा का परिष्कार एवं परिमार्जन किया। इसके बाद हिंदी भाषा के संवर्धन, संशोधन व परिवर्तन का काम छायावाद ने किया। छायावादी कवियों ने खड़ी बोली हिंदी को सुसंस्कृत, मर्यादित व परिनिष्ठित बनाया। छायावाद के बाद प्रेमचंद ने खड़ी बोली हिंदी को जन-जन का कंठहार बना दिया । प्रेमचंद की रचनाओं से पूरे देश में हिंदी का प्रचार-प्रसार हो गया। किंतु स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हिंदी को राजभाषा घोषित करने के क्रम में अनेक बाधाएं उपस्थित हुई और राजभाषा घोषित होने के उपरांत भी हिंदी अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर पाई क्योंकि अंग्रेजी उसके साथ सह राजभाषा बनकर उसके विकास के मार्ग में रोड़ा अटकाती रही है। हालांकि राजकार्य की दृष्टि से हमारी हिंदी भाषा  कठिन नहीं है, फिर भी अंग्रेजी के प्रति नई पीढ़ी में अनावश्यक आकर्षण दिखाई देता है जो कि चिंताजनक है। हमारे देश की नई पीढ़ी को हिंदी से प्रेम करना चाहिए। अपने इस व्याख्यान के दौरान प्रोफ़ेसर टंडन ने श्रोताओं को हिंदी की प्रशासनिक, पारिभाषिक एवं तकनीकी शब्दावली के प्रयोग से भी अवगत कराया और शासन-प्रशासन में राजकाज के अंतर्गत उचित हिंदी शब्दों के प्रयोग की आवश्यकता पर बल दिया। आज हिंदी की पारिभाषिक एवं तकनीकी शब्दावली विद्यमान है, इसलिए उन्होंने हिंदी भाषा की उन्नति के प्रसंग में चिंता व्यक्त करते हुए अपने व्याख्यान के अंत में कहा कि आज भी हम अपनी भाषाई संस्कृति का अंग्रेजी के कारण क्यों नुकसान कर रहे हैं, यह चिंता का विषय है । व्याख्यान के बाद प्रश्नोत्तर काल के अंतर्गत महाविद्यालय के वरिष्ठ प्राध्यापकों डॉ. अर्चना उपाध्याय, डॉ. अनिल कुमार राय तथा महाविद्यालय के आइक्यूएसी के कोऑर्डिनेटर डॉ. कुमार प्रशांत द्वारा अतिथि व्याख्यान के प्रसंग में बहुत ही सारगर्भित एवं मूल्यवान टिप्पणी प्रस्तुत करते हुए व्याख्यान की भूरी-भूरी प्रशंसा की गई। इस अवसर पर कार्यक्रम में उपस्थित विद्यार्थियों द्वारा भी अपनी जिज्ञासा एवं प्रश्न मंच के समक्ष प्रस्तुत किए गए जिन प्रश्नों के जवाब में अतिथि वक्ता प्रोफेसर टंडन जी द्वारा बहुत ही सहज ढंग से अपने विचार व्यक्त किए गए। प्रश्नोत्तर सत्र ने इस व्याख्यान की सार्थकता को और अधिक बढ़ा दिया। प्रश्नोत्तर काल के उपरांत हिंदी विभाग के प्रभारी डॉ. अमित सिंह जी द्वारा औपचारिक धन्यवाद के क्रम में महाविद्यालय एवं संबंधित हिंदी विभाग की ओर से अतिथि व्याख्यान के मुख्य वक्ता प्रोफ़ेसर पूरन चंद टंडन जी के प्रति हार्दिक धन्यवाद ज्ञापित किया गया। प्रोफेसर टंडन जी के प्रति अपने धन्यवाद ज्ञापन के दौरान डॉ. अमित सिंह जी  ने कहा कि आज के हमारे अतिथि मुख्य वक्ता द्वारा हम सभी श्रोताओं को विशिष्ट ज्ञान यात्रा कराई गई है, इस ज्ञान यात्रा के दौरान उन्होंने मातृभाषा, राष्ट्रीय भाव, सांस्कृतिक गौरव, साहित्य के इतिहास की परंपरा के प्रसंग में अपने विचार रखे हैं तथा हमें हिंदी-प्रेम के प्रति प्रेरित किया है। प्रोफेसर टंडन जी के इस व्याख्यान से हम सभी लाभांवित हुए हैं। विभागीय विशेष व्याख्यान श्रृंखला के अतिथि व्याख्यान के आयोजन के इस अवसर पर महाविद्यालय के अन्य विभागों तथा हिंदी विभाग के अन्य सभी प्राध्यापकों डॉ. रेणु गुप्ता, डॉ. सुमित्रा, डॉ. सुनीता खुराना, डॉ. प्रमोद कुमार द्विवेदी, डॉ. सरिता, डॉ. सुनीता सक्सेना, डॉ. दीपिका वर्मा, सुश्री धर्मा रावत, सुश्री अंजू बाला जी एवं हिंदी विभाग के अतिथि प्राध्यापक डॉ. नीरज कुमार मिश्र, डॉ. प्रणव ठाकुर एवं डॉ. अरुणा चौधरी जी की गरिमामय उपस्थिति रही जिसने कार्यक्रम को और अधिक शोभा दायक बना दिया ।

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