कमला भसीन, गेल ओमवेट, मन्नू भंडारी और अपराजिता शर्मा को याद करते हुए बनारस में ऐपवा ने श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया

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संपादकीय टिप्पणीः गुजरी सदी के 70 के दशक में चारु मजूमदार ने संसदीय-चुनावी राजनीति की व्यर्थता को चिह्नांकित करते हुए माकपा से निकलकर भाकपा-माले (लिबरेशन) की स्थापना की। अपने साथियों सहित कॉ. चारु ने संशोधनवाद के विरुद्ध निर्णायक रेखा खींचते हुए अकूत कुर्बानियाँ दीं। पर विडंबना देखिए उन्हीं की पार्टी की महिला विंग अपने कार्यक्रम में अंबेडकरी सोच (दलित-पेटी बुर्जुआ का विश्व-दृष्टिकोण) वाले वक्ताओं को प्रमुखता से आमंत्रित करती है। जिस तरह से अंबेडकर जाति के उद्भव और विकास को जमीन के मालिकाने में न देखकर धर्मग्रंथों में देखते हैं, उसी प्रकार बिहार में पिछड़ी जातियों के हाथों दलित उत्पीड़न की परिघटना का उत्स संशोधनवादियों को अधिरचना में नजर आता है। जबकि तथ्य तो यह है कि बिहार में बड़ी जोत के किसान सवर्ण जातियों के लोग नहीं वरन पिछड़ी जातियाँ हैं। यहाँ पर मूल प्रश्न बेशी मूल्य के हस्तगतकरण का है। दलित मजदूर कम उजरत पर खटें इसके लिए उन्हें उत्पीड़ित किया जाता है यानि कि प्रधान पहलू मालिक-मजदूर की व्यवस्था है न कि सांस्कृतिक। और तो और हमारे जंगली भाई भी मोर्चाबंदी के नाम पर अंबेडकराइटों को भरपूर स्पेस देते हैं और साइड-इफेक्ट के रूप में सुधारवाद को परवान चढ़ने में मदद करते हैं। वे तो प्रयोगकर्ता हैं उनके तो सौ खून हजार बार माफ लेकिन सभी चुनावी कम्युनिस्टों को अब एक पार्टी में विलय कर ही लेना चाहिए क्योंकि सभी को स्टालिन-माओ हानिकारक लगते हैं। प्रमोद बागड़े बीएचयू में दर्शनशास्त्र पढ़ाते हैं, अपनी सरगर्मियों के आधार पर खुद के मार्क्सवादी होने का भ्रम देते हैं पर हैं सारतः दलित पेटी बुर्जुआ के विश्व-दृष्टिकोण से आक्रांत हैं। इनके द्वारा हर जगह सवर्ण मानसिकता का देखा जाना कुछ-कुछ वैसे ही है जैसे कि यह मानकर चलना कि बुर्जुआ समाज में कम्युनिस्ट कार्यकर्ता अलगावग्रस्त नहीं होगा। अजी क्यों नहीं होगा, बेशक उतना नहीं होगा जितना कि हम लोग हैं पर कमोबेश तो होगा ही, कितना भी जनसंग ऊष्मा से संचालित क्यों न हो। रह तो आखिर बुर्जुआ समाज में ही रहा है। इन्हीं अर्थों में मुक्तिबोध भी कम-ज्यादा ब्राह्मण रहे होंगे पर दलित बुर्जुआ को तो इसी दुनिया में संभर टक्का साम्यवादी मनुष्य चाहिए, सांस्कृतिक क्रांति की आखिर क्या जरूरत?

हाल में नारीवादी कमला भसीन( 25 सितम्बर) इतिहासकार गेल ओमवेट( 25 अगस्त) साहित्यकार मन्नू भंडारी (15 नवंबर) और रेखा- चित्रकार अपराजिता शर्मा (15 अक्टूबर) का निधन हो गया। महिला आंदोलन की प्रणेता इन चारों महिला आइकन का जाना समाज के लिए अपूर्णीय क्षति है। लँका स्थित ‘क’ कला दीर्घा में अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन ( ऐपवा) ने 9 दिसंबर 2021 को श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया। एकेडमिक सेमीनारों से इतर अनौपचारिक वातावरण में आयोजित स्मृति सभा में अध्यापकों, छात्र- छात्राओं एवं सामाजिक कार्यकर्ताओ आदि ने शिरकत की।


★ बीएचयू के शिक्षा विभाग की प्रो मधु कुशवाहा ने कमला भसीन पर अपने विचारों को केंद्रित करते हुए कहा कि नारीवादी कमलाभसीन जनता से जुड़ाव रखने वाली स्त्रीवादी चिंतक और एक्टिविस्ट थी। मधु कुशवाहा ने अपने वक्तव्य में कमला भसीन को आज़ादी के बाद के नारीवादी आंदोलन के स्थापना स्तम्भों में से एक बताया। समाज से जुड़कर विकास कार्यो में संलग्न रहते हुए उन्होंने जमीनी स्तर पर पितृसत्ता, सामन्तवाद, वर्ण व्यवस्था और पूंजीवाद के अन्तर्सम्बन्धों को सचेत नागरिक के बतौर देखा और समझा और अपने इन अनुभवो से सीखते हुए और उन्हें परिष्कृत करते हुए नारीवादी आंदोलन को एक ऐसी भाषा और व्याकरण में प्रस्तुत किया जिसे अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों से लेकर एक साधारण महिला तक समझा जा सकता है। उनके नारीवादी चिंतन का फलक इतना व्यापक था कि भारत के तमाम पड़ोसी देशों जैसे पाकिस्तान, बांग्ला देश और श्रीलंका के नारीवादियों के साथ भी और ‘संगत नेटवर्क’ द्वारा एकता के तार स्थापित किये। कमला भसीन ने कई पुस्तकें और गीत लिखे जिनमें बच्चो के लिए भी विशेष अभिरुचि दिखती है और यह कहा जा सकता है कि उनके नारीवादी गीत महिला आंदोलन के ‘राष्ट्रगान’ स्वरूप है।

★बीएचयू के दर्शनशास्त्र विभाग के प्रो प्रमोद बागड़े ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारत में एक प्रगतिशील समतामूलक समाज निर्माण की एक प्रमुख शख्सियत गेल ओमवेट को याद करते हुए बताया कि वह अमेरिका में जन्मी और 1970 में उन्होंने “Cultural revolt In Colonial Society: the non Bhramanical movement in western India” विषय पर शोध पत्र जमा किया। उस समय भारत के साम्रज्यवाद विरोधी आंदोलन में ब्राह्मणवाद विरोधी समतामूलक समाज निर्माण के आंदोलन को साम्रज्यवाद विरोधी आंदोलन में मान्यता नहीं दी जाती थी, जिसे गेलओमवेट ने अपने लेखन कार्य से मान्यता और उच्च स्थान दिलाने का काम किया जो कि भारत में आंतरिक उपनिवेश के विरुद्ध ब्राह्मणवाद विरोधी संघर्ष को समाज के लोकत्रांत्रिकरण का वाहक माना था। ओमवेट ने जाति विरोधी सन्त परम्परा के महत्वपूर्ण कवियों जैसे कबीर, रैदास, तुकाराम आदि पर न केवल शोध की बल्कि उनके कार्यों का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया। बौद्ध दर्शन पर उनकी एक प्रमुख रचना ‘Buddism In India- Buddha’s Challenge to Brahmanism’ इस पुस्तक में उन्होंने श्रमण परम्परा और ब्राह्मणवादी परम्परा के बीच अंतर को रेखांकित किया और कबीर से लेकर फुले और बाबा साहेब आम्बेडकर तक श्रम को प्रधानता देने वाली श्रमण परम्परा के वाहक के रूप में स्थापित किया।
★आर्य महिला पीजी कॉलेज एवं प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ी प्रो वन्दना चौबे ने लेखिका मन्नू भंडारी पर बात रखते हुए उनकी तमाम रचनाओं में से एक उनके उपन्यास ‘महभोज’ को चुनते हुए कहा की बिहार के ‘बेलछी’ में दलितों को जिंदा जलाये जाने की घटना ने लेखिका को इतना उद्वेलित किया कि मन्नू भंडारी ने ‘महभोज’ उपन्यास की रचना की। 70 के दशक में शहरी पृष्ठभूमि से आई किसी महिला लेखिका के लिए ग्रामीण समाज के इस दमनकारी और मानवता विरोधी पहलू पर लिखना एक असामान्य बात थी। वन्दना चौबे ने बताया कि इस जघन्य हत्याकांड को अंजाम पिछड़ी जाति के लोगों ने दिया जिससे यह जाहिर होता है कि किस तरह से वर्चस्वशाली समाज अन्य जातियों का इस्तेमाल भी अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिये करता है और उभरती हुई मध्य जातियां अपना वर्चस्व बनाने के लिए समाज के सबसे निचले पायदान पर किस प्रकार उत्पीड़न करती हैं।
★बीएचयू के इतिहास विभाग की प्रो रंजना शील ने महिला आंदोलन की चारों अदम्य नायिकाओं को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि हमारे पाठ्यक्रमों में महिला आंदोलन से जुड़ी आइकन्स को आज तक उचित जगह नहीं मिल सकी है। यदि पाठ्यक्रमों में इनका समावेश किया जाय तो यह नई पीढ़ी के लिए तो महत्वपूर्ण होगा ही बल्कि इससे महिला आंदोलन की नायिकाओं की विरासत को लम्बे समय तक याद किया जा सकता है।

★बीएचयू की प्रो बिंदा परांजपे ने कहा कि क़ई बार महान विभूतियों के विचार अपने समय से काफी आगे के होते है और उनका समाज में असर दिखने में क़ई दशक लग सकते हैं। महिलाओं में अपने अधिकारों के प्रति जो चेतना बढ़ी है उसका श्रेय उन स्त्री और पुरूषों को भी जाता है जिहोने महिला समानता के लिए दशकों तक काम किया।
★इसके अतिरिक्त बीएचयू के राजनीति विभाग से प्रो. प्रियंका झा, इतिहास विभाग से प्रो. सुतपा दास, काशी विद्यापीठ के समाजशास्त्र विभाग से प्रो रमेश कुशवाहा, प्रलेस के महासचिव प्रो संजय श्रीवास्तव एवं इंडियन रेलवे इंप्लाइस फेडरेशन के संयक्त राष्ट्रीय महासचिव राजेन्द्र पाल, आइसा से राजेश और बीसीएम से आकांक्षा ने भी श्रद्धांजलि सभा में अपना वक्तव्य दिया।

इस मौके पर अपने संबोधन में बीएचयू आईआईटी के प्रोफेसर असीम मुखर्जी ने भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि अति-उत्पादन जनित महामंदी ने उत्पादक शक्तियों के पैरों में जो बेड़ी डाली है, उसे तोड़ने और मजदूर राज कायम करने के लिए संघर्ष तेज करने का समय आ गया है।
★इस अवसर पर मार्क्सवादी नारीवादी चिंतक वी. के. सिंह. बीएल्डबलू से अमर सिंह, डॉ. संगीता, विभा वाही, सामाजिक कार्यकर्ता अनिल एवं छात्र- छात्राएं शामिल थे।
★ ऐपवा जिला सचिव स्मिता बागड़े ने अतिथियों का स्वागत एवं विषय प्रवर्तन क़िया। जिलाध्यक्ष सुतपा गुप्ता, जिलाउपाध्यक्ष विभा प्रभाकर एवं एम. भावना ने कमला भसीन की स्त्री केंद्रित कविताओं का पाठ किया। धन्यवाद ज्ञापन ऐपवा सहसचिव सुजाता भट्टाचार्य ने किया। कार्यक्रम का संचालन ऐपवा राज्य सचिव कुसुम वर्मा ने किया।
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