बलात्कार और बलात्कार की संस्कृति की समस्या

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– राधिका और अंशुल
(दोनों परा-स्नातक की छात्राएं हैं जो वर्तमान में बनारस हिन्दू विश्विद्यालय में अध्ययनरत हैं।)

अनुवादः अनुपम

यह कोई नई बात नहीं है कि भारत में महिलाओं को ‘दोयम दर्जे का नागरिक’ माना जाता है। जो आम तौर पर या तो ‘कमजोर व दब्बू‘हैं’ या इसी रूप में जानी जातीं हैं। उन्हें किसी काम के लायक नहीं समझा जाता है,सिवाय लैंगिक नियंत्रण व हिंसा, पराधीनता एवं मर्यादाहीन जीवन के । ये विचार किसी भी समाज के लिए समस्या का कारण है लेकिन इस तरह के विचार काफी लंबे समय से हमारेसमाज में बने हुए हैं। इसके साथ साथ ये सब समस्याएं अधिकांशतः अनियंत्रित बने हुए हैं।

इस तरह के विचार व संस्कृति एक बड़ी समस्या का अंग हैं जिसे ‘बलात्कार की संस्कृति’ कहा जाता है। इस शब्द के प्रति लोगों में गलत धारणा बनी हुई है। कई लोग मानते हैं कि बलात्कार ‘संस्कृति’ का हिस्सा नहीं है। संस्कृति का अर्थ विचार, विश्वास, मानक, रीति-रिवाज और खास लोगों या समाज का सामाजिक व्यवहार है, लिहाजा यहाँ तक कि अपराध, सामाजिक बुराइयाँ, स्त्री-द्वेष, पितृसत्ता आदि संस्कृति का अंग हैं। बलात्कार की संस्कृति सामाजिक परिवेश से संबंधित है, जिसमें लिंग एवं यौनिकता के इर्दगिर्द निर्मित प्रतिगामी समाजिक विश्वास एवं मानकों के चलते बलात्कार एवं दरिंदगी भरा व्यवहार जारी है।

इस तरह का व्यवहार, नजरिया, अवधारणा ही बलात्कार की संस्कृति के लिए जिम्मेदार है। लैंगिक व महिलाओं के ऊपर बनने वाले चुटकुलें जो आमतौर पर सिर्फ माजाक लगता है वास्तव में ये भी यौनिक हिंसा एवं बलात्कार की तरह ही हानिकारक है। जितना हम इस तरह के व्यवहार को स्वीकार करने से नफरत करते हैं, दिन-प्रतिदिन की गतिविधियाँ, व्यवहार, अवधारणाएं, वार्तालाप ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं जो बलात्कार को और समान्य बनाते हैं। उदाहरण के लिए, महिलाओं को एक वस्तु समझना, उनको देखकर सिटी बजाना, गालीयां देना जैसे रंडी बुलाना, बलात्कार के लिए पीड़िता को दोषी ठहराना, बलात्कार के ऊपर चुटकुले बनाकर,बलात्कार का मज़ाक बनाना,लड़ाई झगड़े में किसी को नीचा दिखाने के लिए उनकी महिलाओं के नाम से गाली देना, महिलाओं के सम्मान को परिवार के सम्मान से जोड़ना, यौन हमले से पीड़ित महिलाओं का बहिष्कार करना आदि। बलात्कार जैसी समस्याओं को बहुत ही कम गंभीरता से लेना व इसके प्रति उदारभाव रखना ये सब का परिणाम बलात्कार की घटनाओं के रूप में होता है।

पितृसत्ता से स्त्री द्वेष एवं लिंग-भेद पैदा होता है और इन दोनों के विभिन्न पहलुओं का सामान्यीकरण बलात्कार की संस्कृति को जन्म देता है। लेकिन बलात्कार की संस्कृति के लिए कौन ज़िम्मेदार है? कोई व्यक्ति? परिवार? या समुदाय? या केवल कुछ खास समुदाय? क्या मीडिया को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? या फिर राज्य-व्यवस्था को ? लेकिन हम जब इसकी जांच पड़ताल करते हैं तो पातें हैं कि इसके लिए ऊपर गिनाई हुए सारी संस्थाएं जिम्मेदार हैं। अधिकतर व्यक्ति, परिवार, पड़ोस, संस्थाएं और यहाँ तक कि राज्य की तरह ही भारी-भरकम संस्थाएं और उसकी राज्य मशीनरी बलात्कार की संस्कृति के लिए जिम्मेदार होती है।

उदाहरण के लिए हमें अपने स्वयं के घरों से बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है। बलात्कार के ऊपर बनने वाले चुटकुले का धड़ले से प्रयोग, कमोबेश प्रत्येक घर में होने वाले वैवाहिक बलात्कार, जहाँ पर विवाह के बाद सहमति को महत्व नहीं दिया जाता है, ये सब क्लासिकीय उदाहरण हैं कि यही समाज किस तरह से बलात्कार की संस्कृति के लिए जिम्मेदार है। लड़कियों को कहा जाता है कि वे पुरुषों के इर्दगिर्द पूरी तरह से अपने आप को ढक कर रखें क्योंकि महिलाओं के शरीर का कोई भी अंग खुला होने पर उत्तेजनात्मक रूप से पुरुषों के लिए आकर्षण का काम करती है और एक तरह से पुरुषों को ‘आमंत्रित करता है’। इस तरह के उदहारण से पता चलता है कि यौन हिंसा से पीड़ित एक पीड़िता पर ही उसके पीड़ित होने का दोष मढ़ दिया जाता है। भारतीये फिल्मों में आइटम सांग्स और फुहड़ गीतों के माध्यम से महिलाओं का वस्तुकरण किया जाता है। इन गानो और विज्ञापनों के जरिये अप्रत्यक्ष रूप से उनकी सहमति को महत्वहीन ठहराया जाता है और उनका चित्रण ऐसे किया जाता है कि मानों वो कोई इंसान नहीं बल्कि यौनिक सुख देने वाली कोई वस्तु है। नायक की तरफ नायिकाओं को अक्सर रीझते हुए दर्शाया जाता है, जो उनकी निजता में खलल डालता है, उसकी सहमति नहीं लेता, शारीरिक आत्मीयता के लिए उसे बाध्य करता है, उसकी लैंगिकता की अनदेखी करता है। कबीर सिंह नामक हालिया फिल्म इसका उदाहरण है। इस तरह की फिल्में दर्शकों को गलत संदेश देती हैं और इन कृत्यों को सामान्यीकृत करती हैं। दुखद है कि यहाँ तक राज्य मशीनरी भी, जिसको लेकर हम सोचते हैं कि उसके पास इस तरह की यौन-हिंसा के विरुद्ध महिलाओं की रक्षा करने के लिए संस्थाएं हैं, लेकिन ये सभी ख़ुद इन समस्याओं को बनाये रखने में इस व्यवस्था का हिस्सा है। बलात्कार के आरोपी जो शक्तिशाली वर्ग से आते हैं इन सबको को सज़ा दिलाने के बजाय उन सभी आरोपियों को संसद के लिए चुनना, जो महिलाओं के लिए कानून बनाते हैं, स्वयं में इस व्यवस्था को असंवेदनशील बॉडी के रूप में दर्शाता है। आखिर ऐसे लोग संसद में जाएंगे,जो खुद रेप के आरोपी हैं और उनसे हम उम्मीद करेंगे की वो महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानून बनायेगें,ये बहुत ही अंतर्विरोधी बात है। पुलिस-तंत्र की धीमी करवाई, अयोग्य न्यायपालिका आदि ये सब के सब भी इस समस्या के लिए बराबर जिम्मेदार हैं।

समस्या का अंग होने का आवश्यक रूप से यह अर्थ नहीं है कि वह बलात्कारी बनने जा रहा है लेकिन इसका निश्चित रूप से यह अर्थ है कि वह संभावित बलात्कारी बन सकता है या संभावित बलात्कारी को काफी हद तक संरक्षण प्रदान कर सकता है यानि कि समस्या को बढ़ा सकता है।

बलात्कार की संस्कृति महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए नुकसानदेह है। यह महिलाओं को स्वतंत्रत रहने, उनके गरिमामय और सुरक्षित जीवन जीने के अधिकारों का हनन करती है। साथ ही साथ उनके जीवन को भय, अपराधबोध,अवसाद एवं खुद को हानि पहुँचाने जैसी स्थिति में पहुँचा देती है। इसके अलावा यौन उत्पीड़न पर उनकी समझदारी को भी उलझा देती है कि यौन उत्पीड़न क्या है और क्या नहीं है। बहुत सी महिलाएं,पीछा करने एवं छेड़खानी जैसे व्यवहारों को इसलिए नजरअंदाज कर देती है या इसको एक गंभीर समस्या के रूप में चिन्हित नहीं कर पाती है क्योंकि समाज में ऐसी घटनाओं और हरकतों को सामान्य व स्वाभविक बना दिया गया है। पुरुषों के मामले में, बलात्कार की संस्कृति पुरुषों के साथ होने वाले बलात्कार को महत्वहीन बनाती है और उसकी अनदेखी करती है। यह अनदेखी बहुत से पुरुषों को आक्रामक,चिड़चिड़ा और हिंसक बनाती है। इसलिए बलात्कार की संस्कृति को हमारे समाज की एक गंभीर समस्या के रूप में चिन्हित कर,एक प्रभावी और दीर्घकालिक समाधान ढूंढने के लिए ठोस कदम लेने की जरूरत है।

नवीनतम सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारतीय पुलिस ने 2017 में बलात्कार के 33,658 मामले दर्ज किए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में हर 16 मिनट में एक महिला का बलात्कार होता है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 2017 का डाटा बताता है कि भारत में 93 प्रतिशत बलात्कार उन लोगों द्वारा किए गए है जो पीड़ित के परिचित थे। बलात्कार भारतीय दंड संहिता के अनुसार गैर-जमानती अपराध है। लेकिन अधिकतर आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में जमानत दे दी जाती है। अभियुक्तों को अक्सर पुलिस, नेताओं या यहाँ तक कि वकीलों के द्वारा संरक्षण प्राप्त होता है। भारत में बलात्कार की समस्या सिर्फ एक कानूनी मुद्दा नहीं है, क्योंकि इसके पीछे हमने इसके सामाजिक पृष्टभूमि पर काफी बिस्तार से चर्चा की है इसलिए कोई भी इसके सामाजिक पहलू की अनदेखी नहीं कर सकता है।

हमारे पास भारत में एक पितृसत्तात्मक समाज है, जो पुरुषों को अधिक महत्व देता है। बच्चे बहुत ही कम उम्र में इसे अपने जे़हन में बसा लेते हैं। लड़को की तुलना में लड़की की इच्छाओं, उसकी राय और पसंद-नापसन्द को उतना महत्वपूर्ण नहीं समझता जाता है। लड़कीयों को बचपन से ही आज्ञाकारी होना सिखाया जाता है।

दिन-प्रतिदिन होने वाली बलात्कार की घटनाएं बहुत से भारतीयों के गुस्से से भर देती है। इसी गुस्से में कुछ लोग बलात्कारियों के लिए फाँसी की सजा की माँग करने लगते हैं। इसके अलावा वो सरकार से मांग करने लगते हैं कि अपराधियों को सार्वजनिक रूप से फाँसी दी जाए। इस से बलात्कार तो नहीं रूकते लेकिन इस तरह की मांग देश में हिंसक प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिलता है।

6 दिसंबर 2019 को, पुलिस ने हैदराबाद बलात्कार मामले के सभी चार आरोपियों को कथित रूप से फर्जी मुठभेड़ में गोली मार दी। बहुत से भारतीयों ने “न्याय” को अंजाम देने के लिए पुलिस अधिकारियों की प्रशंसा की। सोशल मीडिया पर चल रहे पोस्ट और वीडियोज में साफ देखा जा सकता था कि हैदराबाद शहर में महिलाएं मिठाइयाँ बांट रही हैं और हत्याओं का जश्न मना रही हैं। बलात्कार के मामले में बहुत ही कम लोगों को सज़ा मिलना (अधिकतर दोषियों को साक्ष्य और गवाह के आभाव में छोड़ देना)और देश की न्यायिक प्रणाली की खामियाँ एक बेहतर न्याय के रास्ते में बाधक बनी हुई हैं।

हालाँकि सरकार ने बलात्कारियों की सज़ा की अवधि को दुगुनी करके 20 साल कर दिया है लेकिन नागरिक समाज के कार्यकर्ता कानूनों के त्वरित क्रियान्वन की मांग निरंतर कर रहे हैं।

अक्सर यह समझा जाता है कि कड़े और सख्त कानून बड़े बदलाव ला सकते हैं। लेकिन सख्त कानून है क्या? कानून प्रभावी होना चाहिए और जाँच एजेंसी और अभियोजन पक्ष को और मजबूत एवं कुशल होना चाहिए। सरकार को अवश्य ही एक विशेष यूनिट की स्थापना करनी चाहिए जो विशेषरूप से यौन अपराधों से निपटने के लिए अधिकारियों को भर्ती करे और उन्हें प्रशिक्षित करे और डॉक्टरों, फोरेंसिक विशेषज्ञों, रेप पीड़ितों और मनोवैज्ञानिकों तक आसानी से पहुँच की व्यवस्था करे। सरकार और कानून के तरफ से पीड़ितों को इतना भरोसा देना चाहिए की वो आश्वस्त होकर न्याय के लिए आगे आएं। जितने भी अपराध पंजीकृत होते है सभी को अवश्य ही इस यूनिट के द्वारा फास्ट ट्रैक अदालतों का उपयोग करके महीने भर के भीतर निपटाया जाना चाहिए। पहले से ही भारतीय पुलिस बल के ऊपर काफी भार और काम है और अधिकतर पुलिस बल असंवेदनशील होते हैं और साथ की साथ उनके कई तरह के कामों से निपटना होता है। भारतीय पुलिस से यह आशा नहीं की सकती है कि वो इस गंभीर सामाजिक मुद्दे में उतना लगन और ईमानदारी दिखाए जितना इस अति संवेदनशील मुद्दों में जरूरत होती है। अपराधियों और महिलाओं पर अपना विशेषाधिकार समझने वाले लोगों के मन में इतना भय अवश्य होना चाहिए की देश की न्याय-कानून व्यवस्था पीड़ितों के लिए अनुकूल और पक्षधर है न की आरोपियों और अपराधियों की। भारत में यौन हिंसा को रोकने के लिए अवश्य ही ऐसा महौल होना चाहिए जिससे की महिलाएं कभी भी खुद को कमतर महसूस ना करें बल्कि इसके खिलाफ पितृसत्तात्मक नजरिए व परंपराओं को खत्म करने के लिए मजबूती से आगे आये।

हाल ही में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने परिवहन मालिकों से रात वाली शिफ्ट में महिलाओं को भर्ती करने और काम से दूर रखने का आदेश दिया है। उन्होंने इस बात पर जोर देकर कहा कि अपने आप को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी खुद महिलाओं की है।इस तरह का दृष्टकोण बहुत ही भ्रमित करने वाला है। क्योंकि इसके लिए जिम्मेदार पुरुषों तो ठहराया जाना चाहिए जिनके कारण कार्य स्थलों पर महिलाएं असुरक्षित महसूस करती है। इस समस्या का पूरी तरह से उन्हीं से लेनादेना है और महिलाओं से उसका कोई संबंध नहीं है। इस समस्या का कारण स्त्री-के प्रति नफरत की संस्कृति, आक्रामकता और महिलाओं के यौन शोषण को सामान्य घटना मानने की संस्कृति है। इस तरह की संस्कृति को बदलने का प्रयास शुरू करने के लिए हमे पुरुषों के चारों ओर गंभीर और समझदारी भरा बातचीत शुरू करने की जरूरत है, जिसकी शुरुआत स्कूलों, सार्वजनिक मंचों और उच्च कार्यालयों में होनी चाहिए। लड़कों को सिखाया जाना चाहिए कि महिलाओं के बारे में वाहियात ढंग से बात करना, लड़कियों को अपशब्द कहना,गलत टिप्पणी करना और उन्हें लेकर झूठ बोलना गलत और एक तरह का अपराध भी है । इस काम को अकेले माता-पिता पर नहीं छोड़ा जा सकता। इसे प्राथमिक स्कूलों से लेकर आगे की पढ़ाई तक स्कूल के पाठ्यक्रम का हिस्सा होना चाहिए, जहाँ पर इस तरह के दृष्टिकोणों को गढ़ा जाता है। पुराने विद्यार्थियों के लिए, लैंगिक संवेदीकरण कक्षाएं और टेस्टों को अनिवार्य करना चाहिए। भारत में महिलाओं के विरुद्ध अपराध इस कदर गहराई से जड़ जमाए हुए है कि हमें बुनियादी पठन एवं लेखन में संवेदीकरण के कार्य को प्राथमिकता से लागू करवाना चाहिए। लड़कियों को सशक्त, मुखर और अपराधों के प्रति असहिष्णु होने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, फिर वे चाहे छोटे ही क्यों न हों।

कार्यस्थलों पर उन पुरुषों पर अवश्य ही कार्रवाई होनी चाहिए जो यौन आधारित चुटकुले करते हैं। हमें यौनिक आक्रमण को हल्के में लेना बंद कर देना चाहिए क्योंकि यह असम्वेदनशीलता की ओर ले जाती है, लापरवाही के साथ शुरू होती है और अंततः यौन हिंसा को सामान्यीकृत करती है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकारी पदाधिकारियों और रोल मॉडल्स को महिलाओं को उनके पहनावे की पंसद या काम के घंटों के लिए दोष देना बंद कर देना चाहिए क्योंकि ये सब चीज़ों को दोष देने और भारत को महिलाओं के लिए एक सुरक्षित स्थान बनाने में कोई संबंध नहीं है। इसके अलावा, ऐसी फिल्मों को कतई भी बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए जो पितृसत्ता एंव स्त्री-द्वेष या लिंग-आधारित भेदभाव को बढ़ावा देती हैं। ऐसे गानों को भी पार्टियों में या कही भी नहीं बजाना चाहिए जो महिलाओं को वस्तु के रूप में पेश करती हैं। रात के खाने के समय दोस्तों एवं परिवार के साथ लैंगिक संवेदनशीलता पर होने वाली प्रतिदिन चर्चाएं प्रभावी कदम हो सकती है।

इस प्रकार से हमारा मानना है कि लड़के स्वाभाविक रूप से हिंसक नहीं होते हैं; पितृसत्तामक रूपी संस्कृति उन्हें असंवेदनशील बनाते हैं। अतएव, हर व्यक्ति समस्या का हिस्सा नहीं है लेकिन हर व्यक्ति समाधान का हिस्सा बन सकता है।

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