हमें पूँजी और श्रम के बीच के अंतरविरोध पर लगातार बात करनी होगी: डॉ. वंदना चौबे

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बीएचयू, वाराणसी: प्रगतिशील लेखक संघ की बनारस इकाई की सचिव डॉ. वंदना चौबे ने कहा कि पूँजी और श्रम के बीच के अंतरविरोधों को उत्तर आधुनिकतावाद ने संदेहास्पद बनाने की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि स्त्रीवाद के अनेकशः रूप सामने आ चुके हैं और हमें यह तय करना पड़ेगा कि हमें लड़ाई कहाँ से शुरू करनी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि हमें पूँजी और श्रम के बीच के अंतरविरोध पर लगातार बात करनी होगी।
(पाठकों की सुविधा के लिए सुश्री वंदना चौबे के पूरे वक्तव्य की रिकार्डिंग को यहाँ अटैच कर दिया गया है।)


वह भगत सिंह छात्र मोर्चा द्वारा आयोजित सावित्री बाई फुले और फातिमा शेख़ के जन्मदिवस के अवसर पर “21वीं सदी के भारत में महिलाओं की स्थिति और उनकी मुक्ति का रास्ता” विषय पर एक दिवसीय सेमिनार को संबोधित कर रही थीं। कार्यक्रम की शुरुआत संगठन की सांस्कृतिक टीम द्वारा “आ गए यहां जवां कदम जिंदगी की ढूंढते हुए” गाने से किया गया।

हिंदी विभाग, बीएचयू की असिस्टेंट प्रोफेसर प्रियंका सोनकर ने “अकादमी जगत में जाति और जेंडर का प्रभाव” विषय पर अपना वक्तव्य रखा। उन्होंने कहा कि कोई भी बदलाव समानता की बुनियाद पर ही हो सकती है। किसी भी ऊंच-नीच की सोच के साथ हम कोई आमूल बदलाव नहीं ला सकते। आज भी एकेडमिक जगत में महिलाओं की संख्या काफी कम है। वर्षों के संघर्ष के बाद भी आज भी महिलाओं के साथ भेदभाव बना हुआ है। शिक्षण संस्थानों में पदों पर आज भी पुरुष ही विद्यमान है।
महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ की रिटायर्ड प्रो. शाहीना रिज़वी तबियत खराब होने के कारण अनुपस्थित रहीं। पर उन्होंने अपने बात को वीडियो के माध्यम से भेजा जिसे स्क्रीनिंग की गई। उन्होंने मुस्लिम व अल्पसंख्यक महिलाओं का समाज और राज्य द्वारा शोषण और इसके खिलाफ उनका प्रतिरोध विषय पर बात रखी। उन्होंने कहा कि हिंदू हो या मुस्लिम तालीम का अधिकार किसी भी महिलाओं को नही थी। मुस्लिम महिलाओं के भी कलम को तोड़ दिया जाता था जब भी वह पढ़ती थी। पढ़ने के अधिकार के लिए एक लंबे संघर्ष के बाद समाज में शिक्षा का अधिकार मिल पाया।
लखनऊ विश्वविद्यालय की प्रोफेसर और पूर्व कुलपति रूपरेखा वर्मा ने महिलाओं पर राजकीय दमन पर बात रखते हुए कहा कि ऐतिहासिक रूप से जातिगत ऊंच नीच का अनंत विभाजन है। आज के दौर में जाति और धर्म के आधार पर हिंसा हो रही है। इसमें न्याय जाति और धर्म के ख़ाके में रखकर किया जाता है। बिल्किस बानो और हाथरस रेप मामले का उदाहरण दिया। आज राज्य और देश को एक कर दिया गया है। राज्य की आलोचना देश की आलोचना हो गई है। कई बुद्धिजीवियों, कलाकारों, पत्रकारों को सरकार की आलोचना करने के लिए देशद्रोही बताकर जेल में डाल दिया गया है। हमारे देश में महिलाओं पर हिंसा के मामले बढ़े हैं। इन सब पर राज्य या केंद्र सरकार द्वारा कोई बयान नहीं आता, कभी इस तरह के मामलों को निपटने के लिए पुलिस को सचेत नहीं किया जाता। इसमें राज्य का चुप रहना हिंसा की सहमति है।
राजनीतिक- सामाजिक कार्यकर्ता अमिता शिरीन ने महिलाओं के मुक्ति के सवाल पर बात रखा। उन्होंने कहा कि महिलाओं की मुक्ति का सवाल सबकी मुक्ति के सवाल से जुड़ा है। पितृसत्ता की शुरुआत समाज में वर्ग के बनाने से शुरू हुआ है। पितृसता के खिलाफ की लड़ाई सीधे सत्ता के खिलाफ की लड़ाई है। इसलिए यह लड़ाई आसान नहीं है।
कार्यक्रम में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर राहुल मौर्य व प्रोफेसर विवेक पांडे, भाषा विज्ञान के असिस्टेंट प्रोफेसर योगेश उमले, आर्य महिला पीजी कॉलेज की वंदना चौबे, पूर्व प्रधानाध्यापक भैयालाल यादव, एंग्लो बंगाली इंटर कॉलेज के अध्यापक पियूष दत्त सिंह ने अपनी उपस्थिति दी। कार्यक्रम का संचालन इप्शिता ने व धन्यवाद ज्ञापन अध्यक्ष आकांक्षा आज़ाद ने किया। कार्यक्रम का समापन सांस्कृतिक टीम ने अपने क्रांतिकारी गीत के माध्यम से किया।

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