वर्तमान कृषि संकट, उससे निकलने का रास्ता व हमारी रणनीति

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वर्तमान कृषि संकट की जड़ें पिछले तीन दशकों की नवउदारवादी नीतियों और भारत की अर्धसामंती- अर्ध औपनिवेशिक व्यवस्था में हैं। इन उदारवादी नीतियों का जन्म साम्राज्यवादी पूंजी और भारत के बड़े पूंजीपतियों के लुटेरे हितों से जुड़ा हुआ है। भारत के बड़े पूंजीपतियों के हित साम्राज्यवादी वैश्विक पूंजी से जुड़े हुए हैं। सरकार किसानों को यह आश्वस्त कर रही है कि विदेशी कंपनियों के आने से किसान बिचौलियों और दलालों के चंगुल से निकल जाएंगे। ऐसा मालूम पड़ रहा है जैसे यह कंपनियां किसानों की मुक्तिदाता बनकर आ रही हों। सच तो यह है कि जैसे ही इन कंपनियों के पैर कृषि बाजार में जम जाएंगे, वो अंतराष्ट्रीय बाजार की रणनीतियों के हिसाब से काम करना शुरू कर देंगे।
भारतीय कृषि बाजार को विदेशी व देशी बड़ी पूंजी के लिए खोलने के चलते वैश्विक बाजार में उत्पादों की कीमतों का सीधा असर भारतीय किसानों को मिलने वाली कीमतों पर पड़ेगा। चीजों के अंतराष्ट्रीय दामों में गिरावट भारतीय किसान की जेब से जाएगी। मगर अंतराष्ट्रीय दामों में जो उछाल होगा उसका लाभ कॉरपोरेट कंपनियों को मिलेगा। अंतराष्ट्रीय बाजार में भाव बढ़ने पर ये कंपनियां अनाज व अन्य कृषि उत्पादों को बाहर भेजने लगेंगी। जिससे आम देशी उपभोक्ताओं के लिए खाद्यान्न के दाम काफी बढ़ जाएंगे। जिसका सबसे ज्यादा असर देश की गरीब और मेहनतकश जनता पड़ेगा। वास्तविकता यह है कि विदेशी पूंजी और देश के बड़े दलाल पूंजीपतियों की निगाहें किसानों की जमीन पर हैं। जहां वो अपनी कंपनी के निवेशकों, साम्राज्यवादी हितों और निर्यात की जरूरतों के हिसाब से उत्पादन करा सकें। जमीन आने वाले समय का सबसे बड़ा कच्चा माल है। साम्राज्यवादियों की निगाहें जिस तरह से भारत के खेतों पर है, जल्द ही भारत के गांव व समतल के इलाके युद्ध के मैदान बनने वाले हैं।
भारत सरकार अपनी सारी नीतियां विश्व बैंक व विश्व व्यापार संगठन(WTO) के निर्देशन में बना रही है। 1995 में WTO के गठन के बाद से भारत के दलाल शासक वर्गों द्वारा उससे किये गए समझौतों के कारण अर्थव्यवस्था से सार्वजनिक क्षेत्र का नियंत्रण पूरी तरह खत्म होने की राह में है। ताकि देशी- विदेशी कॉरपोरेट संस्थाओं के लिए लूट का मार्ग प्रशस्त किया जा सके। यह एक खुला तथ्य है कि WTO पर अमेरिकी साम्राज्यवाद का वर्चस्व है। WTO दुनिया के पिछड़े देशों पर लगातार कृषि व अन्य  क्षेत्रों से सब्सिडी खत्म करने के लिए दबाव बनाए हुए है। वो सरकार के ऊपर सार्वजनिक क्षेत्र में निवेश को पूरी तरह खत्म कर डालने के लिए भी दबाव बनाए हुए है। भारत सरकार बड़े कॉरपोरेटों व साम्राज्यवादी पूंजी के लिए उद्दोगों, बाजार व अन्य क्षेत्रों के साथ- साथ कृषि क्षेत्र को भी पूरी तरह खोल देने के लिए कटिबद्ध है। इसी को ध्यान में रखकर यह तीनों कृषि कानून लाये गए हैं। व्यापार की खुली छूट होने पर मुनाफा खूब होने की संभावना है जिसकी वजह से विदेशी पूंजी और उसकी सहयोगी बड़ी पूंजी यह सुनिश्चित करना चाहती है कि सरकार इस व्यापार में किसी तरह का हस्तक्षेप न करे।
इन तीनों कानूनों का सीधा असर पूरे देश की जनता पर पड़ेगा। साम्राज्यवादी पूँजी और बड़ी पूंजी न केवल धनी किसानों को बर्बाद करेगी बल्कि छोटे और मझोले किसानों को भी बर्बाद करेगी। सरकारी क्रय केंद्र समाप्त हो जाएंगे। सरकारी भंडारण गृह समाप्त हो जाएंगे। धीरे- धीरे फ़ूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया(एफसीआई ) भी समाप्त हो जाएगी। इनमें काम करने वाले लाखों लोगों का रोजगार चला जायेगा व उसके द्वारा होने वाली सरकारी आमदनी भी खत्म हो जाएगी।
ये बड़ी कंपनियां कभी यह बर्दाश्त नहीं करेंगी की सरकारी राशन की दुकान पर सस्ते दर में गरीबों को अनाज उपलब्ध हो। इस तरह  धीरे- धीरे सरकारी राशन की दुकानें भी बंद हो जाएंगी। ये कंपनियां किसानों से सस्ते से सस्ते दर पर अनाज खरीदेंगी और महंगे से महंगे दर पर बेचेंगी। जो लोग कह रहे हैं कि एमएसपी लागू करने की मांग मजदूर व गरीब विरोधी है वो गलत कह रहे हैं। एमएसपी से बाजार में कीमतों के निर्धारण में कोई फर्क नहीं पड़ेगा। क्योंकि कॉर्पोरेट कंपनियां खाद्यान्न की कीमतें अंतराष्ट्रीय बाजार और अपने मुनाफे को ध्यान में रखकर तय करेंगी। निश्चित तौर पर खाद्यान्न की वो काफी महंगे दर पर बाजार में बिक्री करेंगी। जमाखोरी खत्म होने की जगह बढ़ेगी और उसपे भी विदेशी पूंजी और बड़ी पूंजी का एकाधिकार हो जाएगा। एमएसपी लागू होने से किसानों को कुछ फायदा जरूर है मगर असली फायदा तब होगा जब एमएसपी का निर्धारण किसानों के उचित लाभ को ध्यान में रखकर किया जाए। फिलहाल सरकार द्वारा तय एमएसपी बहुत ही कम होती है। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू हो जाएं तो निश्चित तौर पर धनी व मध्यम किसानों को कुछ लाभ मिलेगा। लेकिन इससे भी न तो भारत का कृषि संकट हल होगा और न ही करोड़ों मजदूरों- भूमिहीनों व गरीब किसानों की समस्याएं हल होंगी। किसानों को बाजार से महंगा खाद्यान न खरीदना पड़े इसके लिए एमएसपी का विरोध करने का नहीं बल्कि गांव व मुहल्ले स्तर पर पर्याप्त सरकारी राशन की दुकानें खोंलने की मांग को लेकर लड़ना चाहिए। हमें यह भी मांग उठाना चाहिए कि सरकारी राशन की दुकान पर सभी गरीबों को न केवल सस्ते से सस्ते दर पर गुणवत्तापूर्ण खाद्यान्न बल्कि रोजमर्रा की जरूरत के अन्य सामान भी सस्ते से सस्ते दर पर मिलने चाहिए।
जिन लोगों को यह लगता है कि छोटे, गरीब व मध्यम किसान अनाज नहीं बेचते हैं उन्हें अभी वास्तविकता का ज्ञान नहीं है। छोटे, गरीब व मध्यम किसान अपने कृषि लागत और घरेलू जरूरतों के लिए सेठ, महाजन, साहूकार, आढ़तिये से ब्याज पर लिये गए पैसे पे निर्भर होते हैं। खेती से पैदावार होते ही पहले वो अपनी फसल बेचकर अपना कर्ज चुकता करते हैं और अन्य जरूरतें पूरी करते हैं। जबकि उस समय फसल का बाजार मूल्य बहुत कम रहता है। हाँ यह सच है कि कुछ ही महीने बाद उन्हें फिर से महंगे दर पर बाजार से अनाज खरीदना पड़ता है। इसलिए एमएसपी की मांग उनकी भी मांग है। सरकारी क्रय केंद्र इतने सुलभ होने चाहिए कि किसी भी प्रकार का किसान वहां न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अपना अनाज बेच सके। सरकार घर से आकर सभी किसानों का खाद्यान्न एमएसपी पर खरीदे।
गरीबों, खेतिहर मजदूरों, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, भूमिहीन- गरीब व सीमांत किसानों की मांगें तो केंद्र में आ ही नहीं पा रही हैं। क्योंकि उनके आंदोलन बहुत कमजोर हैं। वे संगठित नहीं हैं और उनको संगठित करने वाली शक्तियां भी बहुत कमजोर हैं। इनकी सबसे पहली मांग होनी चाहिए क्रांतिकारी भूमिसुधार की और साम्राज्यवादी पूंजी तथा दलाल बड़े पूंजीपतियों की संपत्ति के राष्ट्रीयकरण की। ताकि कृषि, उद्दोगों व अन्य क्षेत्रों में मौजूद अर्ध सामंती, दलाल पूंजीवादी और साम्राज्यवाद परस्त व्यवस्था को नेस्तानाबूद करके मजदूर वर्ग के नेतृत्व में एक सच्चे जनवादी अर्थव्यवस्था का निर्माण हो सके। यह सवाल स्पष्ट तौर पर मजदूर व किसान वर्ग द्वारा राज्यसत्ता पर कब्जे का सवाल है। जो बिना इंक़लाब के सम्भव नहीं है। 1947 के बाद से ही देश को साम्राज्यवादी वित्तीय पूंजी नियंत्रित कर रही है। इस देश की अर्धसामंती व्यवस्था व दलाल पूंजीपति देश में साम्राज्यवादी वित्तीय पूंजी के मजबूत आधार हैं। इनकी उपस्थिति साम्राज्यवादी लूट के रास्ते को सुगम बनाती है।
ये तीनों कानून पूरी तरह से किसानों और बाजार को अपने गिरफ्त में ले लेंगे। जमाखोरी पहले से भी ज्यादा बढ़ेगी क्योंकि साम्राज्यवादी पूंजी किसी तरह के मुक्त बाजार व्यवस्था को जन्म नहीं लेने देगी। यहां पे सिर्फ साम्राज्यवादी पूंजी और बड़ी पूंजी का एकाधिकार चलेगा।
दिल्ली में जो किसान आंदोलन चल रहा है वो इन्हीं वजहों से व्यापक अर्थ लिए हुए है। ये बात सच है कि आन्दोलन में धनी किसानों का वर्चस्व है। लेकिन भारत जैसे देश में जो प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर अर्ध औपनिवेशिक शोषण का शिकार है। जहाँ की बड़ी पूंजी का अपना कोई स्वतंत्र चरित्र नहीं है। जहाँ अर्धसामंती व्यवस्था अभी भी बरकरार है वहाँ धनी किसान हमारा मुख्य दुश्मन नहीं है। साम्राज्यवादी पूंजी और बड़ी पूंजी द्वारा लगातार शोषित व पीड़ित होने की वजह से उसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए क्रांति में मजदूर वर्ग के साथ आएगा। क्योंकि दोनों बड़ी पूंजी और साम्राज्यवादी पूंजी के गठजोड़ से पीड़ित हैं।
भारत का यांत्रिक ढंग से वर्ग विश्लेषण करके मजदूरों और किसानों को आपस में लड़ाना ठीक नहीं है। यह एक प्रतिक्रियावादी व क्रांति विरोधी काम है। समाज में जितने भी वर्ग या तबके हैं वो अपने हितों के लिए लड़ेंगे ही। अब मजदूर वर्ग के हिरावल को यह तय करना है कि कौन क्रांति में उसका दोस्त है और कौन दुश्मन। क्रांति की सफलता के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात होता है दोस्तों और दुश्मनों की सटीक पहचान।
तेलंगाना, तेभागा, वारली विद्रोह, श्रीकाकुलम, नक्सलबाड़ी के किसान संघर्षों से घबड़ाकर देश के शासक वर्ग ने भूमि सुधार कानून बनाया। किसानों को धोखाधड़ी से बचाने व उनके गुस्से को शांत करने के लिए एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट सिस्टम(एपीएमसी) की व्यवस्था की गई। हालांकि यह जमींदारों, बैंकों के प्रतिनिधियों, दलालों व आढ़तियों का अड्डा बन कर रह गया है। कहने के लिए यह सार्वजनिक कृषि बाजार है मगर इसके संचालक मंडल को चुनने का अधिकार किसानों को नहीं है। लेकिन इसे सुधारने की जगह सरकार वित्तीय पूंजी के हित में इसे खत्म करने की योजना बना चुकी है। यह बात पूरी तरह से सच है कि जमींदारों ने तमाम हथकंडे अपनाकर भूमि सुधार कार्यक्रम को लागू नहीं होने दिया। एक के बाद एक आने वाली सरकारों ने भी कभी ईमानदारी से भूमिसुधार कानून को लागू नहीं किया। सच बात यह है कि पिछले 6 दशकों में जितनी भूमि अतिरिक्त भूमि के रूप में घोषित की गई वो कुल कृषि योग्य भूमि का 2 प्रतिशत से भी कम था। असल में वितरण उससे भी कम हुआ। जोत के आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर हदबंदी की सीमा 8 हेक्टेयर लागू करने पर आज तक वितरित की गई कुल जमीन का 3 गुना ज्यादा जमीन वितरण के लिए उपलब्ध होगा। अगर क्रांतिकारी भूमिसुधार होगा तो हदबंदी की सीमा 8 हेक्टेयर भी नहीं तय होगी क्योंकि फिर नारा होगा- “जोतने वाले के हांथ में जमीन”। क्रांतिकारी भूमिसुधार  जमींदारों, धनी किसानों के प्रतिक्रियावादी तबकों व देशी- विदेशी बड़ी पूंजी को मटियामेट कर देगा। ऐसे परिवर्तन की वास्तविक प्रक्रिया एक ऐसी सामाजिक उथल पुथल पैदा करेगी जिसका उदाहरण अभी तक के इतिहास में नहीं मिलेगा। देश के अंदर सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक हर क्षेत्र में जनवादी संघर्षों का उफान पैदा हो जाएगा।
एक समय में जब जनपक्षधर औद्योगिक विकास को तीव्र करने के लिए कृषि संबंधों में परिवर्तन अनिवार्य माना जाता था, अब वह कुछ संशोधनवादी कम्युनिस्टों की नजर में व्यवहारिक नहीं रह गया है। उनकी नज़र में भूमि से संबंधित समस्याएं या तो हल हो चुकी हैं या अप्रासंगिक हो चुकी हैं। जबकि आज भी भारत में समाजवाद का सवाल दो क्रांतियों यानी जनवादी क्रांति व राष्ट्रीय क्रांति के सवाल से गहराई से जुड़ा हुआ है। भूमि सुधार को मुद्दा न बनने देने की एक मुख्य वजह इस देश की किस्म-किस्म की संशोधनवादी कम्युनिस्ट पार्टियाँ और सुधारवादी- अस्मितावादी संगठन भी हैं। खेती के अर्धसामंती चरित्र और उसमें वित्तीय पूंजी के घुसपैठ की वजह से लाखों लोग जो कृषि से उजड़ रहे हैं वो आखिर जा कहाँ रहे हैं? क्या उद्दोगों में जा रहे हैं? उत्तर है नहीं। साम्राज्यवादी पूंजी ने इस देश में स्वतंत्र तौर पर उद्दोगों का विकास होने ही नहीं दिया। 1991 के बाद से तो 5 लाख से ज्यादा छोटे उद्द्योग बंद हो चुके हैं। पूर्वांचल की ढेर सारी चीनी मिलें बंद हो गईं हैं। फिर कृषि से उजड़ती आबादी या तो असंगठित क्षेत्र में जा रही है, बेकारी का शिकार होकर लंपट बन रही है या फिर वापस गांव आकर जीविका के लिए किसी न किसी प्रकार गांव व खेती पर ही निर्भर हो रही है। आज देश में साम्राज्यवादी पूंजी, बड़ी पूंजी, सामंतों व आरएसएस जैसे दंगाई संगठनों के इस्तेमाल के लिए करोङों बेरोजगारों की आरक्षित फौज तैयार खड़ी है।
इसलिए जरूरी हो गया है कि संगठित व असंगठित क्षेत्र के मजदूर, खेतिहर मजदूर, भूमिहीन- छोटे व गरीब किसान तथा उनके संगठन अपने मुद्दों को तय करें और संघर्ष तेज करें। अपनी मांगे तय करने में मध्यम किसान को तो ध्यान में रखना है मगर धनी किसान से बहुत प्रभावित होने की जरूरत नहीं है। बड़ी पूंजी व साम्राज्यवादी पूंजी उसे स्वयं मजदूरों व भूमिहीन- गरीब किसानों के मोर्चे मे आने पर विवश कर देगी। लेकिन इसके लिए नीचे के 50 प्रतिशत मेहनतकश आबादी के आंदोलन तेज होने चाहिए, जो कि नहीं है। कम्युनिस्ट क्रांतिकारी अपने बुनियादी वर्गों को संगठित व आंदोलित कर पाने में अभी तक सफल नहीं हो पा रहे हैं।
मजदूर वर्ग और छोटे- गरीब व भूमिहीन किसानों को अपने आंदोलन को तेज करते हुए निम्न मांगों को उठाना चाहिए और मौजूदा किसान संगठनों की मांगों का समर्थन करते हुए उनसे से इन मांगों के आधार पर एकता कायम करने का प्रयास करना चाहिए।
ये मांगें हैं-
1- सामंतों,भू माफिया, मठों आदि की जमीन व धार्मिक स्थलों की अतिरिक्त व अवैध जमीन को जब्त कर भूमिहीनों व गरीब किसानों को आवंटित किया जाए। “जो जमीन को जोते बोये, वो जमीन का मालिक होए” के नारे को व्यवहार में लागू किया जाए।
2- देशी- विदेशी कॉरपोरेट कंपनियों की समस्त जमीन, उद्दोगों व संपत्ति का राष्ट्रीयकरण होना चाहिए।
3- सभी किसानों के अतिरिक्त व खराब होने वाले फसल के भंडारण के लिए सरकारी भंडारगृह व कोल्डस्टोरेज की स्थापना की जाए।
4- गांव से लेकर शहर तक के सभी गरीबों के लिए सरकारी राशन की दुकानों की पर्याप्त व्यवस्था हो और अनाज से लेकर रोजमर्रा के सभी वस्तुओं को उन्हें सस्ते से सस्ते दर पर सरकार द्वारा उपलब्ध कराया जाए ताकि उन्हें बाजार के उतार- चढ़ाव पर निर्भर न रहना पड़े।
5- बैंकों के साथ- साथ सूदखोरों, महाजनों, व्यापारियों और जमींदारों से लिये गए खेतिहर मजदूरों, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों और भूमिहीन- गरीब किसानों के सारे कर्जे माफ किये जायें।
6- असंगठित क्षेत्र के सभी महिला व पुरुष मजदूरों को पंजीकृत कर मजदूर कार्ड उपलब्ध कराया जाए। सभी पंजीकृत मजदूरों को प्रतिदिन 1500 मजदूरी वाले सम्मानजनक रोजगार की गारंटी की जाए। रोजगार न मिलने पर 750 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से बेरोजगारी भत्ता मुहैया कराया जाए।
पूंजीवादी साम्राज्यवाद के नेतृत्व में चल रहे विकास के मॉडल के खिलाफ कोई जनपक्षधर विकास का मॉडल खड़ा न होने पाए इसलिए जनता को धर्मांधता की आग में झोंका जा रहा है। जनता, उसके आंदोलन और संगठनों पर फासीवादी हमले दिन- प्रतिदिन तेज हो रहे हैं। हर तरफ असुरक्षा का माहौल है। हिन्दू होना ही आज देशभक्त होना हो गया है। ऐसे में आरएसएस- भाजपा का एक महत्वपूर्ण जनाधार किसान अगर अपने हितों के लिए फासीवादी भाजपा सरकार के खिलाफ आंदोलित है तो इस मौके का फायदा उठाकर क्रांतिकारी ताकतों को इन किसानों के साथ(जिनका नेतृत्व धनी किसान कर रहे हैं) तत्काल एक व्यापक संयुक्त मोर्चा जरूर बनाना चाहिए। ये मौका हमें हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। आज के समय का सबसे फौरी कार्यभार यही है।
                                         – रितेश विद्यार्थी

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