जनसंख्या नियंत्रण कानून जनहित के मोर्चों पर विफल भाजपा का सियासी पैंतराः ऐपवा

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वाराणसी: ऐपवा राज्य सचिव कुसुम वर्मा ने कहा कि उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव ने दस्तक दे दी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार के मामले में पूरी तरह से फेल  योगी सरकार अपनी कमियों को छुपाने के लिए जनसंख्या नियंत्रण कानून 2021 का प्रस्ताव लेकर आ रही हैं। इस कानून के सहारे यह सरकार अपने साम्प्रदायिक एजेंडे को आगे बढाते हुए मुसलमानों के ख़िलाफ़ भ्रामक प्रचार ले जा रही है कि मुसलमान अधिक बच्चे पैदा करते हैं। कई लोगो को लग रहा है कि यह कानून मुसलमानों के खिलाफ है अन्य समुदाय का इससे कोई लेना देना नहीं है जबकि सच तो यह है कि इस कानून में निहित दो बच्चों की कानूनी मान्यता से सभी महिलाओं  और गरीबों पर बुरा असर पड़ेगाl समाज में  कन्या-भ्रूण हत्या के आंकड़े बढ़ेंगे बल्कि लिंगानुपात भी घटेगा।

उन्होंने कहा कि भारत में तथाकथित निचली जातियों और अल्पसंख्यकों ख़ास करके मुसलमानों को बढ़ती आबादी के लिए अधिक जि़म्मेदार ठहराकर मुसलमान विरोधी माहौल बनाया जाता रहा है। जनसंख्या नियंत्रण क़ानूनों को इस अभियान के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा है। झूठा प्रचार किया जाता रहा है कि मुसलमान अधिक बच्चे पैदा करते हैं। जबकि हक़ीक़त यह है कि किसी आबादी में बच्चों की जन्म-दर किसी और के मुकाबले में अधिक होने का धर्म से कोई सीधा संबंध नहीं है। आम तौर पर ग़रीब मेहनतकश आबादी में पढ़े-लिखे मध्य वर्ग के मुकाबले बच्चों की जन्म दर अधिक होती है। इसका मुख्य कारण उनके जीवन के खराब हालातों से पैदा हुए डर होते हैं।

खराब स्वास्थ्य सुविधाओं और ग़रीबी के कारण बच्चों की मृत्यु-दर अधिक होती है। दूसरा जीवन की सुख-सुविधाओं से वंचित जनता एकमात्र सहारे के तौर पर अधिक बच्चों में सुरक्षा महसूस करते हैं। एक या दो बच्चों के माता-पिता इस डर में रहते हैं कि अगर उनके बच्चे को कुछ हो जाए, तो उनका कोई सहारा नहीं बचेगा। क्योंकि आम मेहनतकश आबादी को हासिल नाममात्र की सामाजिक सुरक्षा से भी सरकारें लगातार पीछे हट रही हैं। इसके बावजूद पिछले समय से मेहनतकश आबादी के बहुत बड़े हिस्से में कम बच्चे पैदा करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। अल्पसंख्यक मुस्लिम आबादी का ज़्यादा हिस्सा मेहनतकश आबादी में आता है। आँकड़ों के अनुसार मुस्लिम समुदाय में जन्म-दर में लगातार गिरावट का रुझान है। फिर भी फासीवादी संघ परिवार नए प्रस्तावित क़ानूनों के प्रचार के ज़रिए हिंदुत्वी सांप्रदायिकता को चारा डाल रही है। इसके बिना हर मोर्चे पर असफलता के कारण पैदा होने वाले जनाक्रोश के कारण जनता का ध्यान भटकाने के लिए भी ऐसे मुद्दे समय-समय पर उछाले जाते हैं।विगत 11 सिंतम्बर को ऐपवा ने  राज्यस्तरीय कार्यक्रम के मातहत  वाराणसी में संगठित और असंगठित क्षेत्र की महिलाओं के साथ महिला संवाद कार्यक्रम आयोजित किया। जिसके तहत “क्या गरीबी का मूल कारण जनसंख्या है” पर चर्चा हुई।  महिला संवाद में घरेलू कामगार महिलाएं, बुनकर महिलाएं, रेलवे महिला कर्मचारी, छात्र- छात्राएं प्रमुख रूप से शामिल थे।

इस मौके पर अपने संबोधन में बीएचयू की प्रो. प्रतिमा गोंड ने कहा कि महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए सँगठित संघर्ष करना होगा। शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं  के बुनियादी ढांचे को दुरुस्त करके और कल्याणकारी राज्य की स्थापना से ही गरीबी को दूर किया जा सकता हैं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि  भारत के नवनिर्माण के लिए और गैर बराबरी को दूर करने के लिए  देश में वैज्ञानिक चेतना से युक्त वृहत सांस्कृतिक आंदोलन की भी जरूरत है।
चिंतक और लेखक एवं ट्रेड यूनियन नेता वी. के सिंह ने कहा कि सरकार की आर्थिक नीतियों  का असर संगठित और असंगठित दोनो क्षेत्रो पर दिखाई दे रहा है। भारत आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है और जिसका बुरा प्रभाव  महिलाओं पर सबसे अधिक पड़ रहा है। आर्थिक गैरबराबरी की नीतियो से गरीब और अमीर के बीच की खाई और बढ़ रही है जिसका हल जनसंख्या कानून के जरिये नहीं निकाला जा सकता है।
बीएचयू की प्रो. पुष्पा कुमारी ने कहा कि महिलाओं को अपने ऊपर हो रहे  उत्पीड़न  के खिलाफ बोलना होगा और आगे आना होगा यही वक्त की मांग है।
बीसीएम के छात्र अनुपम ने कहा कि हमारे देश में  संसाधनों पर मेहनतकशों का नहीं बल्कि अमीरों के ही अधिपत्य रहा है जिसके कारण बुनियादी  सुविधाओ जैसे स्वास्थ्य शिक्षा रोजगार से एक वर्ग महरूम रहता आया है जिसका सबसे बुरा असर महिलाओं पर पढ़ रहा है। अनुपम ने कहा कि कोई भी देश अपनी बुनियादी ढांचे को मजबूत करके सस्ती समान शिक्षा को जनता के निचले स्तर तक पहुंचा करके ही  जनसंख्या को नियंत्रित कर सकता है न कि ऊपर से कानून लाद कर।
महिला संवाद में,  बीरेका से अनीता देवी, बुनकर महिलाओं की नेता कैसर जहां, घरेलू कामगारिनो में धनशिला, विमला, चंदा आदि ने भी अपनी बात रखी। इसके अतिरिक्त अनिल, बीसीएम से उमेश, आइसा से राजेश साथ ही प्रेरणा और पूनम ने भी विषय पर अपने विचार व्यक्त किये। इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम की भी प्रस्तुति की गई जिसका संचालन युद्धेश ने किया।
महिला संवाद का संचालन ऐपवा जिला सचिव स्मिता बगड़े ने किया। अतिथियों का स्वागत ऐपवा जिला अध्यक्ष सुतपा गुप्ता ने किया और धन्यवाद ज्ञापन ऐपवा सहसचिव सुजाता भट्टाचार्य ने दिया। इस मौके पर जन गीतकार युद्धेश ने दरिया की कसम … ये तानाबाना बदलेगा गीत भी प्रस्तुत किया।

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