पॉलिसी लैप्स है मोरबी पुल हादसा

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मोरबी पुल हादसा एक पालिसी लेप्स है। इसके कई पहलू ऐसे हैं, जिन्हें छूने की मीडिया ने हिम्मत ही नहीं की।
देश की प्राचीन और पुरातत्व संबंधी इमारतों की देखरेख का जिम्मा पहले पुरातत्व विभाग के पास होता था। विभाग के पास विशेषज्ञों की टीम रहती है और उसे रख रखाव संबंधी सारा ज्ञान होता है।
मगर मोदी सरकार ने इसमें बड़ा नीतिगत बदलाव किया। आपको याद होगा कि जब  देखभाल के नाम पर लाल किला डालमिया को मोदी सरकार ने लीज पर दिया तो निष्पक्ष विशेषज्ञों ने इसे गलत बताया था। इसके नुकसान गिनाए थे मगर मोदी सरकार ने किसी की भी सलाह न सुनते हुए इसे नीति बना लिया।
निजी कंपनियां, जिनके पास पुरातत्व संपदा के संरक्षण का कोई अनुभव नहीं होता, लीज मिलते ही सबसे पहला काम ये करती हैं कि टिकट का रेट बढ़ाती हैं, क्योंकि उनका उद्देश्य सिर्फ कमाई है।
संरक्षण के नाम पर ये कैंपस सिलेक्शन से एक दो सस्ते इंजीनियर भर्ती करती हैं, जिन्हें प्राचीन इमारतों के संरक्षण का कोई  अनुभव नहीं होता और ठेके पर मजदूरों को मरम्मत पर लगा देती हैं। मजदूरों को पुरातन ढांचे की इंजीनियरिंग का कुछ ज्ञान नहीं होता, उन्हें जो कहा जाता है, करते हैं।
मोरबी पुल की मरम्मत छह महीने तक किस तरह हुई होगी?
इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
क्या मरम्मत के नाम पर जंग लगे जर्जर पुराने हिस्से को रंग रोगन में ही निपटा दिया गया? यह जांच का विषय है?
क्या पुल को पर्यटकों के लिए चालू करने से पहले उसकी क्षमता का लीज पर लेने वाली कंपनी ने कोई वैज्ञानिक अध्ययन कराया था? एक बार में कितने व्यक्ति जा सकते हैं ऐसा कोई बोर्ड लगाया था? यह भी जांच का विषय है।
 मीडिया का एक बेबकूफ हिस्सा शंका जाहिर कर रहा है कि पर्यटकों ने पुल को हिलाया, उछलकूद की।  इसलिए गिरा। इन लोगों को पता होना चाहिए कि वह हैंगिंग पुल था। यही उसकी खासियत थी और उसे झूलता अनुभव करने के लिए ही पर्यटक टिकट लेकर उस पर जाता था। वह कोई परिवहन पुल नहीं था। उसका नाम ही गुजराती में जूलतो पुल है।
टीवी मीडिया ने एक और बेवकूफी का प्रमाण दिया जो एक साथ शोर मचाया कि पुल पर क्षमता से ज्यादा भीड़ थी मगर वह बोर्ड नहीं दिखाया, जिस पर पुल की घोषित क्षमता लिखी हो?
पृथम दृष्ट्या यही लगता है कि देखभाल कर रही कंपनी के पास ऐसे पुरातत्व विशेषज्ञता वाले इंजीनियर नहीं थे, जो कमजोर हिस्से की ठीक से पहचान कर उचित उपाय करते।
 जिन इंजीनियर, ठेकेदार, सुरक्षा कर्मियों और पर्ची काटने वालों को गिरफ्तार किया गया है अगर उनके पास पुरातत्व इमारतों के संरक्षण का काम करने का कोई अनुभव नहीं है तो उन्हें तत्काल रिहा करना चाहिए और ऐसे गैर अनुभवी लोगों को हायर कर लोगों की जान से खेलने के लिए कंपनी पर सामूहिक नरसंहार का मुकदमा चलाया जाना चाहिए।
सबसे पहले तो इन मौतों के लिए उस मूर्ख गिरफ्तार किया जाना चाहिए, जिसने यह नीति बना डाली कि प्राचीन इमारतों की देखरेख पुरातत्व विभाग नहीं गैर अनुभव वाली कंपनियां करेंगी।
सुधीर राघव

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